एक रात जब तान्या भूख से बिलखते हुए खाली दूध का गिलास देखकर सो गई और आरव अपनी फटी हुई कॉपी को गोंद से चिपका रहा था, मंजरी पूरी रात आलोक की तस्वीर के सामने घुटनों के बल बैठकर रोती रही। “हे ईश्वर, मैं क्या करूं? मैं तो अनपढ़ नहीं हूं, बीए किया है मैंने, पर कभी चूल्हा-चौका छोड़कर कुछ किया ही नहीं। अब इन बच्चों को किसके सहारे छोड़ूं?”
सुबह की पहली किरण जब जयपुर के पुराने परकोटे के मकान की बालकनी पर उतरती, तो मंजरी की दिनचर्या भी सूरज की उसी गति के साथ दौड़ने लगती थी। मंजरी की पूरी दुनिया बस चारदीवारी के भीतर सिमटी हुई थी—उसका पति आलोक और दो मासूम बच्चे, सात साल का आरव और पांच साल की तान्या। सुबह आलोक के लिए अदरक की कड़क चाय बनाना, आरव का स्कूल बैग सजाना, तान्या के बालों में लाल रिबन बांधना और फिर पूरे दिन घर को एक मंदिर की तरह करीने से संजोना ही उसका संसार था। मंजरी ने गृहस्थी के सिवा कभी बाहर की दुनिया में झांकने की कोशिश ही नहीं की थी। उसे लगता था कि आलोक नाम का एक मजबूत पेड़ उसके ऊपर छाया किए खड़ा है, इसलिए उसे किसी आंधी या धूप की चिंता करने की कतई जरूरत नहीं है।
आलोक एक निजी कपड़ा निर्यात कंपनी में लेखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। मेहनती, शांत और परिवार के प्रति समर्पित। जब भी वह शाम को घर लौटता, बच्चों की खिलखिलाहट और मंजरी के हाथों से बनी गर्म रोटियां उसकी दिनभर की थकान मिटा देती थीं। मंजरी अक्सर कहती, “आलोक, मुझे दुनियादारी समझ नहीं आती। बैंक का काम हो या बिजली का बिल, जब तुम हो तो मुझे सीखने की क्या जरूरत?” आलोक प्यार से मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ फेर देता और कहता, “तुम्हें जरूरत भी क्या है मंजरी, मैं हूं ना।”
लेकिन जिंदगी कब किस मोड़ पर करवट ले ले, कोई नहीं जानता। नियति को शायद यह ठहराव और सादगी पसंद नहीं आई।
वह अक्टूबर की एक मनहूस शाम थी। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। आरव और तान्या ड्राइंग शीट पर रंग भर रहे थे और मंजरी रसोई में आलोक की पसंद की कचौड़ियां तल रही थी। तभी दरवाजे की घंटी लगातार बजने लगी। मंजरी ने पल्लू से हाथ पोंछते हुए दरवाजा खोला तो सामने आलोक के दफ्तर का एक कर्मचारी और दो पड़ोसी खड़े थे। उनके चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई थीं।
“भाभी जी… आलोक साहब की तबीयत दफ्तर में अचानक बहुत बिगड़ गई। दिल का दौरा पड़ा है, उन्हें सीधे सवाई मानसिंह अस्पताल ले जाया गया है।”
मंजरी के हाथ से दरवाजे की कुंडी छूट गई। पलभर में उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने बच्चों को पड़ोस की एक बुजुर्ग चाची के पास छोड़ा और बदहवास हालत में अस्पताल की ओर भागी। अस्पताल के सफेद बरामदे की गंध और वहां की मशीनों की आवाजें मंजरी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रही थीं। जब वह आईसीयू के बाहर पहुंची, तो डॉक्टर ने सिर झुकाकर वही शब्द कहे जिन्हें कोई भी सुहागिन अपनी जिंदगी में कभी सुनना नहीं चाहती—”हम बहुत माफी चाहते हैं, जब तक वे यहां पहुंचे, बहुत देर हो चुकी थी।”
उस एक पल में मंजरी की दुनिया बिखरकर चकनाचूर हो गई। वह चीख भी नहीं पाई; उसका गला जैसे सूखकर पत्थर हो गया था। जो औरत कभी घर की दहलीज से बाहर अकेले सब्जी खरीदने भी नहीं निकली थी, उस पर अचानक दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था।
अंतिम संस्कार के बाद के तेरह दिन किसी भयावह दुःस्वप्न की तरह बीत गए। रिश्तेदार आए, सहानुभूति के दो-चार शब्द कहे, कुछ ने किस्मत को कोसा, कुछ ने मासूम बच्चों को देखकर आंसू बहाए। लेकिन जैसे ही तेरहवीं बीती, सब धीरे-धीरे अपने-अपने घरों को लौट गए। जो घर कल तक मेहमानों की आवाजाही से भरा था, वहां अब एक दमघोंटू सन्नाटा पसरा हुआ था।
असली हकीकत तो अब सामने आनी थी। आलोक की बचत बहुत ज्यादा नहीं थी, क्योंकि हाल ही में मकान की मरम्मत और बच्चों के स्कूल के दाखिले में काफी पैसा खर्च हो चुका था। दो महीने बीतते-बीतते रसोई के डिब्बे खाली होने लगे। बच्चों की स्कूल फीस की पर्चियां आने लगीं और मकान का किराया सिर पर चढ़ने लगा। आलोक के कुछ दूर के रिश्तेदारों ने मदद के नाम पर केवल सलाहें दीं—”मंजरी, बच्चों को किसी सस्ते स्कूल में डाल दो, गांव लौट जाओ या किसी रिश्तेदार के यहां आश्रय ले लो।”
एक रात जब तान्या भूख से बिलखते हुए खाली दूध का गिलास देखकर सो गई और आरव अपनी फटी हुई कॉपी को गोंद से चिपका रहा था, मंजरी पूरी रात आलोक की तस्वीर के सामने घुटनों के बल बैठकर रोती रही। “हे ईश्वर, मैं क्या करूं? मैं तो अनपढ़ नहीं हूं, बीए किया है मैंने, पर कभी चूल्हा-चौका छोड़कर कुछ किया ही नहीं। अब इन बच्चों को किसके सहारे छोड़ूं?”
उस रात आंसुओं के समंदर में डूबते हुए अचानक मंजरी के भीतर कुछ बदला। उसने आलोक की तस्वीर को देखा, फिर कोने में सो रहे अपने दोनों मासूम बच्चों को देखा। उनके अबोध चेहरे जैसे कह रहे थे—’मां, हमारे पास अब सिर्फ तुम हो।’ मंजरी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे। उसने तय किया कि वह रोते हुए जिंदगी नहीं काटेगी। आलोक चला गया, लेकिन उसका प्रेम और उसके दिए संस्कार इन बच्चों में जिंदा हैं। अगर मां अपने बच्चों के लिए चट्टान नहीं बनेगी, तो यह बेरहम दुनिया उन्हें बहा ले जाएगी।
अगली सुबह जब धूप निकली, तो मंजरी की आंखों में आंसुओं की जगह एक अनोखी चमक और दृढ़ता थी। उसने सबसे पहले आलोक की पुरानी अलमारी खोली। वहां रखी बैंक की पासबुक, बीमा के कागजात और अपनी डिग्री की फाइल निकाली। वह पहली बार अकेले बैंक गई। वहां के फॉर्म, प्रक्रियाएं और अधिकारियों के सवाल उसके लिए बिल्कुल नए थे। कई बार वह झिझकी, एक-दो बार लोगों ने उसे टहलाया भी, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने पूछ-पूछकर आलोक के खाते का निपटारा करवाया और थोड़ी-बहुत जमा पूंजी निकाली जिससे दो महीने का राशन और बच्चों की फीस दी जा सके।
पर यह तो तात्कालिक समाधान था। आगे की जिंदगी जीने के लिए एक स्थायी सहारे की जरूरत थी। मंजरी ने शहर के कई स्कूलों और दफ्तरों में क्लर्क या रिसेप्शनिस्ट की नौकरी के लिए आवेदन किया। लेकिन दस साल का घरेलू गैप होने के कारण हर जगह से उसे एक ही जवाब मिलता—”आपके पास कोई कार्यानुभव नहीं है, कंप्यूटर की नई जानकारी नहीं है, हम आपको नहीं रख सकते।”
मंजरी हताश होकर घर लौटती, पर बच्चों के सामने अपनी मुस्कान फीकी नहीं पड़ने देती। एक दिन आरव ने स्कूल से लौटकर कहा, “मां, आज टिफिन में जो आपने बेसन के गट्टे और मैथी की मठरी दी थी, मेरी क्लास की मैडम ने खाई। वो कह रही थीं कि इतना स्वादिष्ट स्वाद उन्होंने कभी किसी होटल में भी नहीं चखा। वो पूछ रही थीं कि क्या आपकी मम्मी हमारे लिए भी ऐसा नाश्ता बना सकती हैं?”
बच्चे की इस मासूम बात ने मंजरी के दिमाग में एक बिजली-सी कौंधा दी। उसने सोचा, “जब मुझे दफ्तरों का काम नहीं आता, तो मैं उस हुनर को अपनी ताकत क्यों न बनाऊं जो मुझे सबसे बेहतर आता है?” मंजरी के हाथों के बने पारंपरिक राजस्थानी खाने और नाश्ते की तारीफ आलोक के दोस्त भी हमेशा किया करते थे।
मंजरी ने देर नहीं की। उसने अपनी बची हुई छोटी-सी पूंजी से पास के बाजार से आटा, बेसन, शुद्ध मसाले और पैकेजिंग के कुछ डिब्बे खरीदे। उसने शुरुआत में घर के बने शुद्ध नाश्ते, जैसे मठरी, बेसन के लड्डू, खाखरा और घर का बना ताजा अचार तैयार किया। उसने हाथ से छोटे-छोटे पर्चे लिखे—”घर का बना शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक भोजन एवं नाश्ता।” आरव ने उत्साह से उन पर्चों पर रंगीन बॉर्डर बनाए।
मंजरी ने अपने संकोच और झिझक के सारे पर्दे गिरा दिए। वह पास की एक बहुमंजिला रिहायशी सोसायटी में गई, जहां ज्यादातर कामकाजी पति-पत्नी रहते थे। उसने सुरक्षा गार्ड से इजाजत लेकर वहां के फ्लैटों में अपने पर्चे बांटे और कुछ घरों में स्वाद के लिए छोटे-छोटे डिब्बों में मठरी और लड्डू भेंट किए।
पहले तीन दिन कोई फोन नहीं आया। मंजरी का दिल बैठने लगा था। लेकिन चौथे दिन शाम को पहला फोन आया। सोसायटी की एक कामकाजी महिला ने कहा, “मंजरी जी, आपकी मठरी और लड्डू लाजवाब थे। क्या आप मेरे परिवार के लिए रोज का टिफिन बना सकती हैं? हमें बाहर का तेल-मसाले वाला खाना बिल्कुल पसंद नहीं आता।”
वह एक फोन कॉल मंजरी के जीवन का नया मोड़ साबित हुआ। उसने पूरे मन, स्वच्छता और मातृत्व के भाव से वह पहला टिफिन तैयार किया। खाने का स्वाद इतना शुद्ध और घर जैसा था कि उस महिला ने अपने दफ्तर के दूसरे साथियों को भी इसके बारे में बताया। देखते ही देखते एक टिफिन से पांच, पांच से पंद्रह और दो महीने के भीतर मंजरी के पास पैंतीस टिफिन के ऑर्डर आ गए।
अब मंजरी की सुबह चार बजे शुरू होती थी। वह खुद सब्जियां चुनकर लाती, मसाले खुद पीसती और बिना किसी मिलावट के खाना बनाती। आरव और तान्या भी अपनी छोटी-छोटी कोशिशों से मां का हाथ बंटाते—कोई डिब्बों पर ढक्कन लगाता, तो कोई चम्मच रखता। बच्चों ने भी समय से पहले समझदारी सीख ली थी। उन्होंने कभी खिलौनों या फिजूलखर्ची की जिद नहीं की।
काम बढ़ा तो मुश्किलें भी आईं। कभी सिलेंडर खत्म हो जाता, कभी डिलीवरी वाला लड़का समय पर नहीं आता। कई बार भारी बर्तनों को उठाते-उठाते मंजरी की कलाइयां दुखने लगतीं और उंगलियां जल जातीं। एक दिन भारी बारिश में डिलीवरी बॉय नहीं आया। पैंतीस लोगों का दोपहर का भोजन तैयार रखा था। अगर खाना समय पर नहीं पहुंचता, तो उसकी मेहनत और साख दोनों मिट्टी में मिल जाती। मंजरी ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने बरसाती पहनी, टिफिन के बड़े-बड़े थैले अपनी पुरानी स्कूटी पर बांधे और खुद तेज बारिश में निकल पड़ी। जब उसने भीगते हुए दफ्तरों में जाकर गरम खाना पहुंचाया, तो ग्राहकों की आंखों में उसके प्रति सिर्फ एक रसोइये का नहीं, बल्कि एक कर्मठ योद्धा का सम्मान दिखाई दिया।
छह महीने बीतते-बीतते मंजरी का काम इतना बढ़ गया कि उसने अपने मोहल्ले की दो जरूरतमंद और विधवा महिलाओं को भी अपने साथ काम पर रख लिया। उसने अपने इस छोटे से गृह-उद्योग का नाम रखा—”अन्नपूर्णा स्वाद—मां के हाथों से।”
अब मंजरी केवल टिफिन तक सीमित नहीं रही। उसने कॉरपोरेट बैठकों, छोटे पारिवारिक आयोजनों और त्योहारों पर पारंपरिक मिठाइयों के ऑर्डर लेना भी शुरू कर दिया। उसने पास के एक संस्थान से शाम को एक घंटे का बेसिक कंप्यूटर और ऑनलाइन पेमेंट का कोर्स भी सीख लिया, ताकि वह अपने हिसाब-किताब और डिजिटल ऑर्डर को खुद संभाल सके। जो मंजरी कभी चेक भरने से डरती थी, आज वह यूपीआई, जीएसटी और ऑनलाइन बैंकिंग की बारीकियों को चुटकियों में समझ रही थी।
दो साल बीत गए। वही मकान जहां कभी आंसुओं और अभावों का अंधेरा था, आज आत्मविश्वास और सम्मान की रोशनी से जगमगा रहा था। आरव और तान्या उसी अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे, उनकी हर जरूरत पूरी हो रही थी। मंजरी ने न केवल आलोक के सभी अधूरे कर्ज चुका दिए थे, बल्कि अपने और बच्चों के भविष्य के लिए एक अच्छी बचत भी सुरक्षित कर ली थी।
एक शाम शहर के महिला उद्यमी मंच द्वारा मंजरी को “प्रेरणादायी महिला सम्मान” के लिए आमंत्रित किया गया। सभागार खचाखच भरा हुआ था। जब मंजरी का नाम पुकारा गया, तो वह सादी सूती साड़ी पहने, आत्मविश्वास से भरी चाल के साथ मंच पर पहुंची। उसके पीछे दर्शक दीर्घा में पहली कतार में बैठे आरव और तान्या गर्व से अपनी मां को देखकर तालियां बजा रहे थे।
मंच पर माइक संभालते हुए मंजरी ने कहा, “जब मेरे पति मुझे छोड़कर गए, तो मुझे लगा कि मेरी जिंदगी का अंत हो गया है। मैं सोचती थी कि मैं तो सिर्फ एक आम घरेलू औरत हूं, जो अपने पति की परछाई के बिना एक कदम भी नहीं चल सकती। लेकिन उस विपत्ति ने मुझे सिखाया कि स्त्री जब अपनी कमजोरियों के आंसुओं को पोंछकर अपने बच्चों के लिए खड़ी होती है, तो उसके भीतर की मां एक ऐसी शक्ति बन जाती है जिसे दुनिया की कोई भी आंधी डिगा नहीं सकती। निर्भरता एक आदत है, और आत्मनिर्भरता एक संकल्प। हर औरत के भीतर एक हुनर छिपा होता है, बस जरूरत होती है अपनी सीमाओं की चौखट को लांघकर अपने आत्मसम्मान को पहचानने की।”
पूरा सभागार खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मंजरी ने ऊपर आसमान की ओर देखा; उसे महसूस हुआ कि कहीं दूर बादलों की ओट से आलोक मुस्कुरा रहा था और कह रहा था—’मंजरी, मुझे तुम पर गर्व है।’
जीवन अब भी आसान नहीं था, चुनौतियां अब भी थीं, लेकिन अब मंजरी किसी परछाई के सहारे नहीं चल रही थी। उसने खुद अपनी धूप तराश ली थी। वह अब सिर्फ एक अबला विधवा नहीं थी, वह एक सफल उद्यमी, एक स्वाभिमानी स्त्री और अपने बच्चों की सबसे मजबूत ढाल थी।
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