तकदीर की देहरी पर ठहरी मोहब्बत

“तुमने ऐसा क्यों किया देवांग? तुमने मुझे इतना कमजोर, इतना स्वार्थी समझ लिया?” नैना ने रोते हुए उसके सीने पर अपनी हथेलियों से मारा, “क्या मेरा प्यार सिर्फ तुम्हारी अच्छी सेहत, तुम्हारी दो सीधी टांगों से था? अगर आज मेरी जगह तुम्हारे साथ यह हादसा हुआ होता, तो क्या तुम मुझे छोड़कर चले जाते? बोलो!”

देवांग की आंखों से बेबसी के आंसू बह निकले, “नैना, मैं तुम्हें एक टूटे हुए इंसान का बोझ नहीं देना चाहता था। तुम्हारे सपने, तुम्हारे माता-पिता की जिम्मेदारियां… मैं तुम्हारा सहारा बनना चाहता था, तुम्हारी बेबसी नहीं।”

सुबह के छह बजते ही अलार्म की तीखी आवाज़ के साथ नैना की आंखें खुल गईं। हमेशा की तरह आज का दिन साधारण नहीं था। घड़ी का पेंडुलम जितनी तेजी से हिल रहा था, नैना के हाथ रसोई में उतनी ही फुर्ती से चल रहे थे। गैस की एक आंच पर चाय की केतली खदबद कर रही थी और दूसरी तरफ तवे पर रोटियां सिक रही थीं। दाल और हरी सब्ज़ी उसने पहले ही बनाकर कैसरोल में रख दी थी। आज का दिन उसके करियर और जीवन दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। शहर के नामी ‘आदित्य मेमोरियल कॉलेज’ में वाइस प्रिंसिपल के रूप में जॉइन किए उसे अभी मुश्किल से पैंतालीस दिन ही हुए थे, और आज कॉलेज के नए शैक्षणिक सत्र का उद्घाटन होने के साथ-साथ ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारियों का सालाना दौरा भी तय था।

एप्रन उतारकर खूंटी पर टांगते हुए नैना ने अपने बाल समेटे और डाइनिंग टेबल पर नाश्ता सजाने लगी। तभी सामने वाले कमरे से खांसने की हल्की आवाज़ आई। नैना तुरंत हाथ पोंछते हुए उस कमरे की तरफ लपकी।

कमरे में उसके पिता बृजमोहन जी अखबार पढ़ने की कोशिश कर रहे थे और मां सुशीला देवी दवाइयों की पर्चियां मिला रही थीं। नैना को देखते ही सुशीला जी ने प्यार भरी झिड़की के साथ कहा, “अरे बिटिया! इतनी भी क्या आपाधापी है? तुझे तो जैसे पंख लग गए हैं आज। रात को भी देर से सोई थी और सुबह पांच बजे से ही खटपट कर रही है।”

नैना ने आगे बढ़कर पिता के सिर पर हाथ फेरा और मां के हाथ से दवा की गोलियां लेते हुए पानी का गिलास आगे बढ़ाया, “मां, आज ट्रस्ट बोर्ड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर खुद आ रहे हैं। पिछले कई सालों से कॉलेज का जो नया साइंस ब्लॉक अटका पड़ा था, आज उसी की अंतिम रूपरेखा तय होनी है। पहले दिन ही मैं लेट नहीं हो सकती। मैंने पापा के नाश्ते के साथ-साथ दोपहर का खाना भी पैक करके रख दिया है। पापा, आपकी ब्लड प्रेशर की नीली गोली नाश्ते के ठीक दस मिनट बाद लेनी है, और मां, आपको अपनी घुटनों के दर्द वाली दवा दोपहर के खाने के बाद लेनी है। कोई भी लापरवाही नहीं चलेगी, समझे आप दोनों?”

बृजमोहन जी ने लाड़ से बेटी के गाल थपथपाए, “तू हमारी इतनी फिक्र मत किया कर बेटा। तूने हमारी खातिर अपनी पूरी जवानी, अपनी खुशियां सब दांव पर लगा दीं। सात साल पहले अगर तूने खुद को न संभाला होता, तो शायद हम दोनों भी इस दुनिया से रुखसत हो गए होते।”

पिता की बात सुनकर नैना की आंखों की कोर अचानक भीग गई, लेकिन उसने चेहरे पर जबरन मुस्कान बिखेरते हुए बात को हंसी में उड़ा दिया, “पापा, आप भी सुबह-सुबह पुरानी बातें लेकर बैठ गए। मेरी असली खुशी तो आप दोनों के मुस्कुराते चेहरों में है। अच्छा, अब मैं निकलती हूं।”

जैसे ही वह दरवाजे की ओर बढ़ी, मां ने पीछे से आवाज़ लगाई, “अरे नैना! सुन तो, अपनी छाछ की बोतल और फल का डब्बा तो यहीं छोड़ गई। दिनभर भूखे पेट काम करेगी क्या?”

“ओह हो मां, सच में आज दिमाग न जाने कहां खोया हुआ है,” कहते हुए नैना ने बैग में डिब्बा डाला, दोनों के पैर छुए और स्कूटी की चाबी उठाकर बाहर निकल आई।

चंडीगढ़ की चौड़ी सड़कों पर सुबह की ताजी हवा चल रही थी। नैना की स्कूटी कॉलेज के बड़े लोहे के गेट से जैसे ही अंदर दाखिल हुई, वहां का नजारा देखकर समझ आ गया कि आज हलचल आम दिनों से कहीं ज्यादा है। सुरक्षाकर्मी मुस्तैदी से गाड़ियों को कतार में लगवा रहे थे। प्रशासनिक भवन की सीढ़ियों को ताजे गेंदे के फूलों से सजाया गया था। जैसे ही नैना अपने केबिन की ओर बढ़ी, चपरासी रामदीन हांफता हुआ उसके सामने आ गया।

“नमस्ते मैडम! अच्छा हुआ आप आ गईं। वो… बड़े साहब लोग करीब बीस मिनट पहले ही आ गए हैं। वे सीधे आपके ही केबिन में बैठे हैं। रजिस्ट्रार साहब ने कहा है कि आप जैसे ही आएं, फौरन भीतर चली जाएं।”

नैना का दिल एक पल के लिए तेजी से धड़का। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी; वह समय से दस मिनट पहले ही थी, मगर ट्रस्टी उससे भी पहले पहुंच चुके थे। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी कॉटन की साड़ी का पल्लू ठीक किया, चेहरे पर पेशेवर शालीनता का भाव लाया और नेमप्लेट पर नजर डाली—‘डॉ. नैना वर्मा, उप-प्राचार्य’।

उसने आहिस्ता से केबिन का शीशे वाला दरवाजा खोला। अंदर एयर कंडीशनर की हल्की सनसनाहट के बीच सोफे पर एक पुरुष और एक शालीन महिला बैठे हुए थे। पुरुष की पीठ दरवाजे की तरफ थी और वह खिड़की से बाहर खेल के मैदान को देख रहा था, जबकि पास बैठी महिला फाइलों के पन्नों को पलट रही थी।

“बेहद क्षमा चाहती हूं, मुझे आने में कुछ क्षणों का विलंब हुआ। मुझे अंदेशा नहीं था कि आप लोग तय समय से पहले पधार जाएंगे,” नैना ने अपनी चिरपरिचित मधुर और गंभीर आवाज़ में कहा और अपनी मुख्य रिवॉल्विंग चेयर की ओर बढ़ गई।

उसकी आवाज़ गूंजते ही सोफे पर बैठे उस पुरुष के कंधे एकदम से तन गए, जैसे किसी ने उसे बिजली का तार छू दिया हो। लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया।

चेयर पर बैठते हुए नैना ने मुस्कुराकर कहा, “जी, मैं डॉ. नैना वर्मा। चूंकि इस संस्थान में यह मेरा दूसरा ही महीना है, इसलिए औपचारिक रूप से आपसे व्यक्तिगत भेंट नहीं हो पाई थी। यह संस्थान आपकी छत्रछाया में शिक्षा के नए प्रतिमान गढ़ रहा है, पर प्रशासनिक सुगमता के लिए यदि आप अपनी प्राथमिकताओं और नियमों से मुझे अवगत करा दें, तो मुझे काम करने में और आसानी होगी।”

इतना कहकर नैना ने जब फाइल से नजरें उठाकर सामने सोफे पर देखा, तो उसके मुंह से निकलते शब्द एकाएक उसके हलक में ही अटक कर रह गए।

सामने बैठा हुआ शख्स लगभग बत्तीस-तैंतीस साल का था। गहरे नीले रंग के सूट में उसकी सधी हुई दाढ़ी, चेहरे पर खिंची हुई गंभीरता और आंखों में एक अजीब सा ठहराव था। नैना के पैरों तले से जमीन खिसक गई। वह चेहरा… वे गहरी आंखें, बाईं भौंह के पास का वह छोटा सा कट… यह चेहरा कोई कैसे भूल सकता था?

‘देवांग?’ नैना के मन के किसी अंधेरे कोने में यह नाम गूंज उठा। उसका पूरा शरीर बर्फ की मानिंद ठंडा पड़ गया। कॉलेज के वो दिन, जब देवांग की एक मुस्कुराहट पर नैना का दिन बन जाया करता था। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं। फिर अचानक एक दिन, बिना कोई चिट्ठी, बिना कोई संदेश, देवांग हमेशा के लिए गायब हो गया था। उस सदमे ने नैना को तोड़ दिया था, उसी दौरान उसके पिता को पैरालिसिस का अटैक पड़ा था और नैना ने प्रेम के उस सूखे पत्ते को अपनी ज़िंदगी से जबरन झाड़कर केवल अपने परिवार और करियर को अपनी दुनिया बना लिया था।

सामने बैठे शख्स ने बहुत ही सधे हुए, सपाट और ठंडे स्वर में बोलना शुरू किया, “मेरा नाम समर है। समर सिंघानिया। और यह मेरी छोटी बहन है, रिया। हम दोनों मिलकर अपने स्वर्गीय ताऊजी के इस एजुकेशन ट्रस्ट की देखरेख करते हैं। आपकी अकादमिक उपलब्धियों और अनुशासन की रिपोर्ट हमने देखी है डॉ. वर्मा, आपका काम काबिल-ए-तारीफ है।”

समर के चेहरे पर रत्ती भर भी कोई भाव नहीं था। उसकी आंखों में पहचान की कोई चमक नहीं थी, न ही आवाज़ में कोई कंपन था। ऐसा लग रहा था मानो वह नैना को ज़िंदगी में पहली बार देख रहा हो।

नैना के दिल में सवालों का बवंडर उठ खड़ा हुआ। क्या वह धोखा खा रही है? क्या एक शक्ल के दो इंसान इतने हूबहू हो सकते हैं? उसकी आवाज़, उसके बात करने का अंदाज, यहां तक कि उंगलियों को आपस में फंसाने का तरीका भी बिल्कुल देवांग जैसा था। मगर यह शख्स तो खुद को समर बता रहा था।

अगले चालीस मिनट तक कॉलेज के नए बजट, प्रोफेसरों की भर्ती और लाइब्रेरी के आधुनिकीकरण पर गंभीर चर्चा होती रही। नैना ने अपने पेशेवर दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाया, मगर उसका दिल लगातार धड़क रहा था।

बातचीत समाप्त होने के बाद समर ने फाइल बंद की और कहा, “ठीक है डॉ. वर्मा, बाकी के प्रोजेक्ट्स पर हम अगले हफ्ते बात करेंगे। अब हमें चलना चाहिए।”

जैसे ही समर सोफे से उठने लगा, उसका बायां पैर अजीब तरह से मुड़ा और वह लड़खड़ा गया। उसने दर्द से अपनी आंखें मींच लीं। तुरंत ही रिया ने आगे बढ़कर अपने भाई का हाथ मजबूती से थामा और उसे सहारा देकर खड़ा किया। समर के चेहरे पर एक पल के लिए दर्द की गहरी लकीरें खिंच गईं, जिन्हें छिपाने की उसने पूरी कोशिश की। उसने हाथ में एक हल्की सी वॉकिंग स्टिक संभाली, जो अब तक सोफे के किनारे टिकी हुई थी।

उसे इस तरह लाचार और लंगड़ाते हुए देखकर नैना का कलेजा मुंह को आ गया। उसके अंतर्मन पर लगे सारे पेशेवर पर्दे एक झटके में गिर गए। जब दोनों दरवाजे की ओर बढ़ने लगे, तो उसके कांपते होठों से अनायास ही, बिना सोचे-समझे एक शब्द निकल गया—”देवांग!”

उस नाम की गूंज कमरे के सन्नाटे में हथौड़े की तरह टकराई।

समर के कदम ठीक चौखट पर आकर ठहर गए। उसकी पीठ नैना की तरफ थी। नैना ने साफ देखा कि उसके हाथ में पकड़ी छड़ी पर उसकी उंगलियों की पकड़ इतनी सख्त हो गई थी कि पोर सफेद पड़ गए थे। उसकी सांसों की गति तेज हो गई थी। कमरे में कुछ सेकंड के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया मानो वक्त की सुई रुक गई हो।

लेकिन अगले ही पल, समर ने खुद पर नियंत्रण पाया। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक लफ्ज़ भी नहीं कहा। उसने बस रिया के कंधे पर हाथ रखा और धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए कमरे से बाहर निकल गया।

नैना वहीं अपनी कुर्सी पर बुत बनी खड़ी रह गई। उसकी आंखों से आंसुओं की दो बूंदें गिरकर टेबल पर रखी कांच की शीट पर बिखर गईं। “नहीं, यह कोई भ्रम नहीं हो सकता… वह समर नहीं, मेरा देवांग ही था। पर वह इस हाल में कैसे पहुंचा? और वह मुझसे नजरें क्यों चुरा रहा है?”

दिनभर नैना का मन काम में नहीं लगा। हर फाइल के पीछे उसे वही लंगड़ाता हुआ साया नजर आता। शाम को कॉलेज की छुट्टी होने के बाद भी वह केबिन में बैठी रही। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।

नैना ने सिर उठाया तो देखा सामने रिया खड़ी थी। अकेले। उसके चेहरे पर अब वह औपचारिक गंभीरता नहीं थी, बल्कि एक संकोच और हमदर्दी का भाव था।

“क्या मैं अंदर आ सकती हूं, नैना जी?” रिया ने धीमे स्वर में पूछा।

नैना अपनी जगह से खड़ी हो गई, “रिया जी… आप? समर… मेरा मतलब है, आपके भाई कहां हैं?”

रिया ने केबिन का दरवाजा बंद किया और नैना के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने अपने बैग से पानी की एक बोतल निकाली, एक घूंट पिया और भरभराई आवाज़ में बोली, “भैया गाड़ी में बैठे हैं। नैना जी, मैं जानती हूं कि आपके सीने में इस वक्त सवालों की क्या सुनामी चल रही होगी। पर आज अगर मैं आपको सच नहीं बताऊंगी, तो शायद मेरे भैया खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे और घुट-घुट कर जी भी नहीं पाएंगे।”

नैना की सांसें थम गईं। उसने कुर्सी का हत्था थाम लिया, “सच? कैसा सच रिया? क्या वह देवांग ही है?”

रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े, “हां नैना जी। वह देवांग ही है। हमारे सगे ताऊजी, जो एक बहुत बड़े उद्योगपति थे, उनकी कोई औलाद नहीं थी। उन्होंने भैया को बहुत पहले गोद ले लिया था और उनका नाम कागजों में समर सिंघानिया दर्ज करवाया था। पर वो आपको बेहद प्यार करते थे। कॉलेज खत्म होने के बाद जब वे अपने परिवार को आपके रिश्ते के बारे में बताने शिमला जा रहे थे… तभी पहाड़ों पर उनकी कार का एक भयानक एक्सीडेंट हो गया।”

नैना ने अपने मुंह पर हाथ रख लिया। उसका दिल जैसे डूबने लगा।

रिया ने आगे कहा, “उस हादसे ने भैया से सब कुछ छीन लिया। उनकी दोनों टांगों की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं। डॉक्टरों ने तो यहां तक कह दिया था कि वे ज़िंदगी भर कभी बिस्तर से नहीं उठ पाएंगे। करीब डेढ़ साल तक वे कोमा और अस्पताल के चक्करों में रहे। जब उन्हें होश आया, तो उनकी पहली पुकार आप ही थीं। उन्होंने अपनी टूटी हुई हालत में आपको फोन करने की कोशिश की, पर फिर उन्हें पता चला कि उसी दौरान आपके पिताजी को पक्षाघात हुआ था और आप परिवार की इकलौती उम्मीद थीं।”

रिया की आवाज़ में दर्द का दरिया बह रहा था, “भैया ने सोचा कि अगर वे एक अपाहिज, लाचार इंसान बनकर आपकी ज़िंदगी में लौटेंगे, तो आप अपनी ज़िंदगी का सारा भविष्य उनके पैरों में कुर्बान कर देंगी। वे नहीं चाहते थे कि आप अपनी ज़िंदगी एक अपाहिज की तीमारदारी में गुजार दें। उन्होंने फैसला किया कि वे खुद को आपकी नजरों में बेवफा और भगोड़ा साबित होने देंगे, ताकि आप उनसे नफरत करके अपने जीवन में आगे बढ़ सकें। उन्होंने बरसों की असहनीय फिजियोथेरेपी और सर्जरी के बाद आज इस छड़ी के सहारे चलना सीखा है। जब उन्हें पता चला कि आप इस कॉलेज में हैं, तो वे खुद को रोक नहीं पाए। वे सिर्फ आपको एक नजर खुश और कामयाब देखना चाहते थे।”

नैना के कानों में रिया का एक-एक शब्द पिघले हुए शीशे की तरह उतर रहा था। जिस शख्स को वह पिछले सात सालों से पत्थरदिल और धोखेबाज समझकर अपने दिल में नफरत की आग जलाए बैठी थी, वह तो अपनी मोहब्बत की खातिर खुद को जिंदा दफ्न किए बैठा था। उसने अपना प्यार इसलिए कुर्बान कर दिया ताकि नैना पर उसकी लाचारी का बोझ न पड़े।

“कहा… कहां हैं वो इस वक्त?” नैना ने रोते हुए पागलों की तरह पूछा।

“पार्किंग में… गाड़ी में बैठे हैं,” रिया ने कहा।

नैना ने अपने आंसुओं को पोंछने की भी जहमत नहीं उठाई। उसने अपनी सैंडल की परवाह किए बिना दौड़ लगा दी। कॉलेज के लंबे गलियारे, सीढ़ियां और लॉन पार करते हुए वह तेजी से पार्किंग की तरफ भागी।

पार्किंग के एक कोने में सफेद रंग की बड़ी गाड़ी खड़ी थी। पिछली सीट की खिड़की खुली थी और देवांग अपना चेहरा हथेलियों में छिपाए चुपचाप रो रहा था। उसके कंधे आंसुओं के झटकों से कांप रहे थे।

नैना ने झटके से कार का दरवाजा खोला। देवांग ने चौंककर चेहरा उठाया। उसके चेहरे पर छुपा हुआ वही पुराना भोला देवांग था, जिसकी आंखों में नैना के लिए बेपनाह दर्द और इश्क का समंदर हिलोरें मार रहा था।

“नैना… तुम…” देवांग सकपका गया। उसने तुरंत अपनी छड़ी को छिपाने की कोशिश की और नजरें चुराते हुए बोला, “तुम यहां क्यों आई हो? जाओ अंदर…”

“चुप रहो! बिल्कुल चुप रहो देवांग!” नैना जोर से चिल्लाई और फिर फूट-फूट कर रोते हुए सीधे देवांग के सीने से लग गई। उसने देवांग के कोट को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया।

देवांग के हाथ हवा में कांपते रहे। उसने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की, पर सात सालों का सब्र टूट गया। उसने नैना के सिर पर अपनी हथेलियां रख दीं।

“तुमने ऐसा क्यों किया देवांग? तुमने मुझे इतना कमजोर, इतना स्वार्थी समझ लिया?” नैना ने रोते हुए उसके सीने पर अपनी हथेलियों से मारा, “क्या मेरा प्यार सिर्फ तुम्हारी अच्छी सेहत, तुम्हारी दो सीधी टांगों से था? अगर आज मेरी जगह तुम्हारे साथ यह हादसा हुआ होता, तो क्या तुम मुझे छोड़कर चले जाते? बोलो!”

देवांग की आंखों से बेबसी के आंसू बह निकले, “नैना, मैं तुम्हें एक टूटे हुए इंसान का बोझ नहीं देना चाहता था। तुम्हारे सपने, तुम्हारे माता-पिता की जिम्मेदारियां… मैं तुम्हारा सहारा बनना चाहता था, तुम्हारी बेबसी नहीं।”

नैना ने पीछे हटकर देवांग का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामा। उसकी आंखों में देखते हुए उसने कहा, “जो इंसान दूसरों की खुशी के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी पहचान तक मिटाने को तैयार हो जाए, उससे बड़ा सहारा इस दुनिया में कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। प्यार सिर्फ साथ हंसने का नाम नहीं होता देवांग, जीवन की हर टूटी हुई राह पर एक-दूसरे की लाठी बनने का नाम है। तुमने मुझे खोया नहीं था, बल्कि अपनी झूठी गलतफहमी में मुझे खुद से दूर रखा। अब मैं तुम्हें दोबारा कभी खुद से दूर नहीं जाने दूंगी।”

देवांग ने नम आंखों से मुस्कुराते हुए नैना के माथे को चूम लिया। दूर खड़ी रिया की आंखों में भी खुशी के आंसू थे। शाम की ढलती हुई धूप अब दोनों के चेहरों पर एक नई सुनहरी सुबह का पैगाम लेकर आ रही थी। सालों का बिछोह, दर्द और गलतफहमियां उस एक पल के सच्चे समर्पण में हमेशा-हमेशा के लिए धुल चुकी थीं।

जीवन में अक्सर हम जिसे त्याग या मजबूरी समझकर अपने रिश्तों से दूरी बना लेते हैं, दरअसल वही फैसला हमारे अपनों को ज़िंदगी भर का घाव दे जाता है। क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्रेम शारीरिक कमियों और हालातों से कहीं ऊपर होता है और सुख-दुख में साथ खड़े रहना ही रिश्ते की असली पहचान है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें।

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 मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश

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