एक रिश्ता ऐसा भी

सुमित्रा जी की आँखों में भी नमी उतर आई। उन्होंने कृतिका के सिर पर ममता से हाथ फेरते हुए कहा, “पगली बच्ची, इसमें माफ़ी कैसी? गलती तुम्हारी नहीं है। हमारे समाज में टीवी सीरियलों ने, पुरानी दकियानूसी कहानियों ने और कुछ कड़वे अनुभवों ने सास-बहू के रिश्ते को एक जंग का मैदान बना दिया है। लोग यह भूल जाते हैं कि सास भी कभी बहू थी और बहू भी कल को किसी की सास बनेगी। रिश्ता कोई भी हो कृतिका, वह इस बात से तय नहीं होता कि उसका नाम क्या है, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसमें नीयत और सम्मान कितना है। 

रविवार की खिली हुई गुनगुनी धूप में नोएडा के एक खूबसूरत कैफ़े के कोने वाली मेज़ पर दो पुरानी सहेलियां, अवनि और कृतिका, चाय की चुस्कियों के बीच अपने कॉलेज के दिनों को याद कर रही थीं। दोनों करीब छह साल बाद मिली थीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए थे। कृतिका कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ी कंपनी में काम करने लगी थी और अपनी स्वतंत्र, आधुनिक सोच पर बेहद गर्व करती थी। वहीं अवनि ने एक मल्टीनेशनल बैंक में बतौर सीनियर एनालिस्ट अपनी पहचान बनाई थी और तीन साल पहले उसकी शादी इंदौर के रहने वाले समर के साथ हुई थी, जो खुद एक सॉफ्टवेयर कंसलटेंट था।

बातचीत के दौरान जब घर-परिवार की बात चली, तो कृतिका ने बड़े गर्व से बताया कि वह अपने पति के साथ एक अलग हाई-राइज अपार्टमेंट में रहती है। फिर उसने मुस्कुराते हुए अवनि से पूछा, “वैसे अवनि, तुम दोनों का फ्लैट कैसा है? क्या समर के माता-पिता तुम्हारे साथ रहने आए हैं या वे अलग ही रहते हैं?”

अवनि के चेहरे पर एक सहज, मीठी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी चाय का कप मेज़ पर रखते हुए कहा, “नहीं कृतिका, हम अलग फ्लैट में नहीं रहते। हम समर के पुश्तैनी मकान में पूरे परिवार के साथ रहते हैं। मेरी सास-ससुर हमारे साथ ही हैं।”

यह सुनते ही कृतिका की आँखें आश्चर्य और दया के मिले-जुले भाव से चौड़ी हो गईं। उसने तुरंत अपना माथा पकड़ लिया और सहानुभूति जताने के लहजे में बोली, “हे भगवान अवनि! तुम इतनी पढ़ी-लिखी, इंडिपेंडेंट लड़की होकर सास के साथ एक ही छत के नीचे रह रही हो? बेचारी! मैं तो सोच भी नहीं सकती। इसका मतलब तो यह हुआ कि ऑफिस से थकी-हारी लौटने के बाद भी तुम्हें रसोई संभालनी पड़ती होगी? सुबह छह बजे उठकर सबकी चाय-नाश्ते की फ़िक्र, हर बात में रोक-टोक, न अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आज़ादी और न अपने तरीके से जीने की छूट। हर वक्त सास की निगरानी और हुक्म के साए में घुट-घुट कर जीना पड़ता होगा तुम्हें!”

अवनि कृतिका की इस पूर्वग्रह से भरी बातें सुनकर न तो असहज हुई और न ही उसने गुस्सा दिखाया। उसने कृतिका के हाथ पर अपना हाथ रखा और शांत भाव से बोली, “कृतिका, तुम्हारी बात सुनकर मुझे अजीब नहीं लगा, क्योंकि अक्सर हमारे समाज में सास-बहू के रिश्ते को एक तय चश्मे से ही देखा जाता है। पर सच कहूं तो मेरी ज़िंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरी सासू माँ, जिन्हें मैं माँ जी कहती हूँ, उनके साथ रहकर मुझे कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि मैं किसी पराये घर में आई हूँ।”

कृतिका ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा, “अरे छोड़ो भी, ऊपर-ऊपर से तो सब यही कहते हैं। असलियत हम सबको पता होती है।”

अवनि मुस्कुराई और बोली, “नहीं, मैं बिल्कुल सच कह रही हूँ। मैं जब शाम को बैंक से काम निपटाकर घर पहुँचती हूँ, तो माँ जी मुझे रसोई की चौखट तक फटकने नहीं देतीं। वो हाथ से मेरा बैग ले लेती हैं, पानी का गिलास आगे करती हैं और कहती हैं—’अवनि, दिनभर कंप्यूटर के आगे दिमाग खपाकर आई हो, जाओ पहले कमरे में जाकर आराम करो, कपड़े बदलो और थोड़ा वक्त रूही (अवनि की दो साल की बेटी) के साथ खेलो। समर के साथ बैठकर चाय पियो और अपने दिनभर की बातें साझा करो। रसोई संभालने के लिए अभी मेरे हाथ-पैर बहुत अच्छे से चल रहे हैं। तुम दोनों की अभी काम करने और खुलकर जीने की उम्र है। गृहस्थी और रसोई के काम तो पूरी ज़िंदगी खत्म नहीं होने वाले।’ कृतिका, तुम यकीन नहीं करोगी, मेरी माँ जी मेरी अपनी सगी माँ से भी बढ़कर मेरी सेहत और मेरी खुशियों का ध्यान रखती हैं। यहाँ तक कि जब हमारी शादी की बात चली थी, तो उनके परिवार ने एक रुपये का भी लेन-देन या दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था। उनका सिर्फ एक ही कहना था कि हमें हमारे घर की खुशियां चाहिए, कोई सामान नहीं।”

कृतिका ने गहरी सांस ली, उसकी त्योरियां चढ़ गईं। वह व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए बोली, “अरे अवनि, तू कितनी भोली है! तू कहाँ फंस गई? क्या तूने कभी यह सोचा कि इतनी अच्छाई के पीछे की वजह क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तेरे पति समर में या उनके खानदान में कोई बहुत बड़ा खोट हो जिसे छुपाने के लिए वो तेरे आगे इतने अच्छे बनने का ढोंग कर रहे हैं? आज के ज़माने में बिना किसी मतलब के कौन सास इतनी अच्छी होती है?”

अवनि अब थोड़ा झुंझला गई। उसने कृतिका की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “खोट? कैसा खोट कृतिका? मैं तीन साल से उस घर में बहू बनकर रह रही हूँ और समर को शादी से पहले से जानती हूँ। समर इतने साफ़-सुथरे और सीधे इंसान हैं कि नशा तो दूर की बात, उन्होंने कभी चाय के अलावा किसी चीज़ को हाथ तक नहीं लगाया। पूरा परिवार मर्यादा और प्यार से बंधा है। हमारे यहाँ हर किसी के आत्मसम्मान का पूरा ख्याल रखा जाता है।”

अवनि आगे बोली, “तुम्हें एक और बात बताती हूँ। मेरा मायका ऐसा था जहाँ कभी-कभार प्याज-लहसुन भी नियमों के हिसाब से बनता था और समर का परिवार पूरी तरह वैष्णव और सख्त शाकाहारी है। लेकिन शादी से पहले मुझे बाहर दोस्तों के साथ कभी-कभी नॉन-वेज खाने की आदत थी। जब मेरे माता-पिता को यह बात पता चली कि समर के घर में मांस-मछली का नाम लेना भी पाप समझा जाता है, तो मेरे पापा ने मुझसे साफ़ कह दिया था—’शादी करनी है तो अपनी यह आदत छोड़नी होगी, मांस खाना कोई अच्छी बात नहीं है, तुम्हें वहाँ के तौर-तरीके अपनाने होंगे।’ लेकिन जब यह बात माँ जी को पता चली, तो उन्होंने जो कहा, वह सुनकर मेरी आँखें भर आई थीं।”

कृतिका ने उत्सुकता से पूछा, “क्या कहा उन्होंने? ज़रूर उन्होंने तुम्हें त्याग और भारतीय नारी के आदर्शों का लंबा भाषण दिया होगा?”

अवनि ने सिर हिलाकर कहा, “बिल्कुल नहीं! माँ जी ने मुझे पास बिठाया और बड़े प्यार से कहा—’बेटा, खान-पान हर इंसान की अपनी निजी पसंद और आदत होती है। हमारे घर की मर्यादा और आस्था है कि हम घर की रसोई में माँस नहीं बनाते और न खा सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि तुम अपनी पसंद का गला घोंट दो। अगर तुम्हें कभी बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ अपनी पसंद का खाना खाना हो, तो तुम बिना किसी झिझक के खा सकती हो। और अगर तुम्हारा मन कभी घर पर ही खाने का करे, तो हमारे मकान की सबसे ऊपरी मंजिल पर जो अलग से छोटा सा कमरा और किचन शेल्फ है, मैं वहाँ तुम्हारे लिए नए बर्तन और इंडक्शन चूल्हे का पूरा इंतज़ाम करवा दूँगी, ताकि किसी की भावनाएं भी आहत न हों और तुम्हें भी परायापन न लगे।’ कृतिका, तुम बताओ, आज के दौर में ऐसी सोच कौन सी सास रखती है?”

कृतिका ने एक पल के लिए सोचा, फिर अपनी उसी अविश्वास भरी मुस्कान के साथ बोली, “हाँ, तो इसे अच्छी सास नहीं, बल्कि बेहद शातिर और समझदार सास कहते हैं अवनि! उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि अगर वो तुम्हें सीधे मना करेंगी, तो शायद तुम बगावत कर दो या उनके बेटे से झगड़ा करो। इसलिए उन्होंने तुम्हें यह छूट देने का ऐसा ढोंग रचा ताकि तुम उनके एहसान तले दब जाओ और खुद ही शर्मिंदगी के मारे वह सब खाना छोड़ दो। सच कह रही हूँ न मैं? यह सब बहुओं को मानसिक रूप से बांधने के पुराने नुस्खे हैं।”

अवनि ने कृतिका की बात सुनी और एक गहरी सांस ली। वह समझ गई कि कृतिका के मन में सास के रिश्ते को लेकर एक ऐसी कड़वाहट और नकारात्मक छवि बैठ चुकी है, जिसे केवल बातों से मिटाया नहीं जा सकता। अवनि ने बात को वहीं समेटा और मुस्कुराते हुए कहा, “शायद तुम बाहर से देखकर ऐसा सोच रही हो कृतिका, लेकिन जो प्यार और सम्मान मुझे उस घर में मिला है, वह किसी एहसान की बेड़ियों से नहीं, बल्कि दिल के रिश्तों से बंधा है।”

कुछ हफ़्तों बाद की बात है। कृतिका के ऑफिस का एक बड़ा प्रोजेक्ट इंदौर में चल रहा था। एक दिन अचानक ऑफिस की भागदौड़ के बीच कृतिका को गंभीर फूड पॉइजनिंग और डिहाइड्रेशन की शिकायत हो गई। वह अपने होटल के कमरे में दर्द से तड़प रही थी। इंदौर में उसका कोई अपना नहीं था। घबराहट और बेबसी के आलम में उसे अवनि की याद आई। कृतिका ने कंपकपाते हाथों से अवनि को फोन किया और अपनी हालत बताई।

अवनि उस समय एक बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग में थी जिसे वह तुरंत छोड़ नहीं सकती थी। उसने कृतिका को ढाढस बंधाया, “कृतिका, तुम बिल्कुल चिंता मत करो, मैं कुछ करती हूँ।”

अवनि ने तुरंत अपनी सास, सुमित्रा देवी को फोन लगाया और कृतिका की तबीयत और उसके होटल का पता बताया। अगले पैंतालीस मिनट के भीतर जो हुआ, उसने कृतिका की पूरी सोच की नींव हिला दी।

होटल के कमरे का दरवाज़ा खुला और सामने अवनि की सासू माँ, सुमित्रा जी, खड़ी थीं। उनके चेहरे पर किसी अजनबी के लिए औपचारिकता नहीं, बल्कि एक माँ जैसी गहरी चिंता थी। उनके साथ घर की गाड़ी का ड्राइवर था। उन्होंने कृतिका के माथे को छुआ, जो बुखार से तप रहा था। बिना एक पल गंवाए, उन्होंने कृतिका का सहारा बनकर उसे उठाया, गाड़ी में बिठाया और सीधे अपने पारिवारिक डॉक्टर के पास ले गईं। ड्रिप चढ़वाने, दवाइयां लेने और डॉक्टर से सारे निर्देश समझने के बाद, वे कृतिका को होटल वापस छोड़ने के बजाय सीधे अपने घर ले आईं।

जब कृतिका की आँख खुली, तो उसने खुद को एक बेहद शांत, साफ़-सुथरे और हवादार कमरे के आरामदायक बिस्तर पर पाया। उसके सिरहाने ठंडे पानी की पट्टियां रखी थीं। सामने एक कुर्सी पर सुमित्रा जी बैठी धीरे-धीरे उसके पैरों पर कम्बल ठीक कर रही थीं।

कृतिका ने उठने की कोशिश की, तो सुमित्रा जी ने बड़े ही वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “अरे बेटा, उठो मत। डॉक्टर ने कहा है कि कमजोरी बहुत ज्यादा है, तुम्हें पूरा आराम चाहिए। अवनि का फोन आया था, वह ऑफिस से बस निकलने ही वाली है। जब तक वह आती है, मैंने तुम्हारे लिए एकदम हल्का, मूँग की दाल का पानी और पतली खिचड़ी बनाई है। पहले थोड़ा सा यह पी लो, फिर दवाई लेनी है।”

कृतिका अवाक रह गई। वह औरत, जिसे उसने कुछ दिन पहले “शातिर” और “दिखावेबाज़” का तमगा दिया था, आज खुद रसोई में खड़े होकर उसके लिए परहेज़ का खाना बना रही थी और एक बीमार बेटी की तरह उसकी तीमारदारी कर रही थी। कृतिका के गले में एक भारी गोला सा अटक गया।

शाम को जब अवनि घर पहुँची, तो उसने देखा कि कृतिका बिस्तर पर बैठी सुमित्रा जी के हाथों से सूप पी रही थी और उसकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। अवनि घबराकर आगे बढ़ी, “कृतिका! क्या हुआ? दर्द ज्यादा बढ़ गया क्या?”

कृतिका ने सुमित्रा जी का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और रोते हुए बोली, “दर्द शरीर में नहीं अवनि, दर्द मेरी उस सोच में था जो मैंने सालों से अपने दिमाग में पाल रखी थी।”

फिर वह सुमित्रा जी की ओर देखकर हाथ जोड़कर रुंधे गले से बोली, “माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने अपनी आधुनिकता के घमंड में यह मान लिया था कि सास कभी माँ नहीं हो सकती। मैंने अवनि से कहा था कि आपका प्यार एक दिखावा है, आपका त्याग एक चाल है। लेकिन आज जब मैं बेसहारा थी, तो आपने मुझे यह नहीं देखा कि मैं कौन हूँ, आपने सिर्फ यह देखा कि मैं आपकी बहू की सहेली हूँ, यानी आपके लिए एक बेटी जैसी हूँ। आपने जिस निस्वार्थ भाव से मेरी सेवा की है, उसने मेरी आँखें खोल दी हैं।”

सुमित्रा जी की आँखों में भी नमी उतर आई। उन्होंने कृतिका के सिर पर ममता से हाथ फेरते हुए कहा, “पगली बच्ची, इसमें माफ़ी कैसी? गलती तुम्हारी नहीं है। हमारे समाज में टीवी सीरियलों ने, पुरानी दकियानूसी कहानियों ने और कुछ कड़वे अनुभवों ने सास-बहू के रिश्ते को एक जंग का मैदान बना दिया है। लोग यह भूल जाते हैं कि सास भी कभी बहू थी और बहू भी कल को किसी की सास बनेगी। रिश्ता कोई भी हो कृतिका, वह इस बात से तय नहीं होता कि उसका नाम क्या है, बल्कि इस बात से तय होता है कि उसमें नीयत और सम्मान कितना है। जब एक सास अपनी बहू को सिर्फ घर का काम करने वाली मशीन न समझकर किसी दूसरे घर से आई एक मासूम बेटी समझे, और बहू अपनी सास को अपनी आज़ादी की दुश्मन न मानकर एक मार्गदर्शक माँ समझे, तो घर में स्वर्ग अपने आप उतर आता है।”

कृतिका ने उस दिन उस घर में सिर्फ एक परिवार नहीं देखा, बल्कि प्यार, विश्वास और आपसी सम्मान की एक ऐसी मिसाल देखी जिसने उसके जीवन के दृष्टिकोण को हमेशा के लिए बदल दिया। उसने देखा कि कैसे शाम को समर, अवनि, उनके ससुर जी और सुमित्रा जी सब मिलकर एक साथ हँसते-बोलते चाय पी रहे थे। वहाँ न कोई किसी पर हावी था, न कोई किसी से दबा हुआ था। वहाँ सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम और आदर था।

अगले दिन जब कृतिका पूरी तरह स्वस्थ होकर विदा लेने लगी, तो उसने झुककर सुमित्रा जी के चरण स्पर्श किए। इस बार उसके चेहरे पर कोई संशय या पूर्वग्रह नहीं था, बल्कि एक नई समझ और श्रद्धा की चमक थी। उसने अवनि को गले लगाते हुए धीरे से कहा, “अवनि, तू सचमुच बहुत खुशनसीब है। और मुझे गर्व है कि तेरी इस सच्चाई ने आज मेरी सोच की सबसे बड़ी दीवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया।”

दोस्तो, अक्सर हम समाज द्वारा बनाई गई नकारात्मक धारणाओं के चश्मे से रिश्तों को तौलने लगते हैं। सास-बहू का रिश्ता विश्वास, सम्मान और थोड़ी सी संवेदनशीलता से माँ-बेटी से भी ज्यादा खूबसूरत बन सकता है। आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि अगर दोनों तरफ से समझदारी और खुलापन हो, तो संयुक्त परिवार आज भी सबसे बड़ा संबल बन सकते हैं? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ ज़रूर साझा करें।

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