भाभी हो तो ऐसी! – श्वेता अग्रवाल

दरवाजे की घंटी बजी, और जैसे ही माला देवी ने दरवाजा खोला, सामने का नजारा देखकर उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। सामने उनकी बहू सिया उनकी बेटी अवनी को लिए खड़ी थी।

अवनी के माथे से खून बह रहा था, उसके होंठ कटे हुए थे और चेहरे तथा हाथ-पांव पर चोट के नीले-काले निशान थे।

अपनी फूल-सी बच्ची की यह हालत देखकर माला देवी चीख पड़ीं। अभी एक महीना ही तो हुआ था फूल जैसी लाडली अवनी को धूमधाम से विदा किए, और वह आज इस हालत में घर के दरवाजे पर खड़ी थी! उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

शोर सुनकर कमरे से उनका बेटा अनुज भी बदहवास-सा बाहर दौड़ा आया। अपनी छोटी बहन को खून से लथपथ देखकर उसके भी हाथ-पांव फूल गए।

“सिया! ये… ये सब क्या है? अवनी की ये हालत किसने की?”

“निलेश ने…” यह कहकर वह अवनी को सहारा देकर भीतर लाई और सोफे पर बैठा दिया। अवनी अभी भी डर के मारे थर-थर कांप रही थी।

बेटी की ऐसी हालत देखकर माला देवी वहीं जमीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगीं। बेटी की यह दुर्दशा देखकर मां और भाई दोनों अंदर तक सिहर उठे थे।

सिया ने आगे बढ़कर माला देवी को उठाया, “माँ, संभालिए अपने आप को। अगर आप इस तरह हिम्मत हार जाएंगी तो अवनी को कौन संभालेगा? मैंने डॉक्टर को कॉल कर दिया है, वे बस पहुंचने ही वाले हैं। आप दोनों अभी अवनी को संभालिए, तब तक मैं इसके लिए कुछ खाने को लेकर आती हूँ।” बोलते हुए सिया किचन की ओर बढ़ गई।

कुछ ही देर में डॉक्टर भी आ गए और उन्होंने अवनी का चेकअप करके उसे दवाइयां दे दीं। दवाइयां लेकर जब अवनी नींद के आगोश में चली गई, तब सिया फटाफट किचन में जाकर अपना काम करने लगी।

तभी अनुज वहां आ गया और सिया का हाथ पकड़कर बोला, “सिया… तुमने कितनी बार कहा था कि अवनी ठीक नहीं है, कुछ तो गड़बड़ है। लेकिन मैंने तुम्हें हमेशा यह कहकर डांट दिया था कि पति-पत्नी का आपसी मामला है, इसमें हमें दखल नहीं देना चाहिए। लेकिन बात इस हद तक बिगड़ जाएगी और अवनी की जान पर बन आएगी, ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था!”

माला देवी भी वहां आकर रोते हुए बोलीं, “हां बहू, अगर आज तू न होती तो न जाने मेरी बच्ची के साथ क्या अनहोनी हो जाती!”

“लेकिन सिया, तुम्हें इन सब बातों का पता कैसे चला? क्या अवनी ने तुम्हें…” अनुज ने पूछा।

“नहीं अनुज, अवनी ने मुझे कभी कुछ नहीं बताया।” बोलते-बोलते सिया की आंखों में दर्द उमड़ आया।

“अवनी ने कभी अपनी तकलीफ नहीं बताई थी। लेकिन उसकी बातों और उसके चेहरे पर मुझे कभी भी नई-नई शादी वाली खुशी महसूस ही नहीं हुई। जब वह पगफेरे पर भी यहां आई थी, तब भी उसके चेहरे पर नई-नवेली दुल्हन वाली कोई रौनक नहीं थी। और शायद आप लोगों ने गौर नहीं किया था कि जब निलेश उसे लेने आया था, तो वह उसे देखते ही डर गई थी। इन सबसे मेरे मन में एक खटका-सा लग गया था और उसका हाल-चाल पूछने के लिए मैं उसे रोज कॉल करती थी।”

सिया ने एक पल रुककर अपनी भर्राई आवाज को संभाला,

“लेकिन वह कभी भी ज्यादा बातें ही नहीं करती थी। कई बार फोन के पीछे से मुझे निलेश के चिल्लाने की आवाजें भी आती थीं। इन सबसे मेरे मन में कहीं न कहीं शक गहरा रहा था, इसीलिए मैंने आप लोगों से कहा भी था। लेकिन…”

अनुज ने शर्मिंदगी से अपना सिर झुका लिया।

सिया ने आगे कहा, “कल जब मैंने उसे फोन किया, उसके ‘हेलो भाभी’ कहते ही पीछे से निलेश के चिल्लाने की आवाज आई और अवनी ने घबराकर फोन रख दिया, लेकिन जल्दबाजी में कॉल कटी नहीं। उस तरफ से निलेश की गालियां, एक जोरदार तमाचे की गूंज और फिर अवनी की चीख सीधे मेरे कानों में पड़ी। 

उसके बाद मैंने अवनी को बार-बार फोन लगाया लेकिन उसका फोन लगातार बंद आ रहा था। मेरा दिल बैठ गया। मैंने निलेश को भी कई बार फोन किया लेकिन उसने मेरा फोन नहीं उठाया। मुझसे रहा नहीं गया और मैं आप लोगों से अपने मायके जाने का बहाना करके सीधे उसके ससुराल पहुंच गई।

वहां निलेश ने मुझे बताया कि अवनी अपनी सहेली के पास गई है और उसका फोन खराब हो गया है। यह सुनते ही मैं वहां से निकलने लगी। लेकिन तभी मुझे बगल वाले कमरे से कुछ गिरने की जोरदार आवाज आई।

आवाज सुनते ही मैंने निलेश से पूछा, ‘आप तो कह रहे थे कि आप घर में अकेले हैं, फिर यह कैसी आवाज है?’

यह सुनते ही निलेश के चेहरे का रंग उड़ गया, ‘शायद हवा से कुछ गिर गया होगा।’ लेकिन मेरा मन नहीं माना और मैं उसके मना करने के बावजूद उस कमरे की तरफ बढ़ गई।

अंदर जाकर देखा तो मेरे होश उड़ गए—कमरे के एक कोने में अवनी डरी-सहमी बैठी थी। उसके माथे से खून बह रहा था, हाथ बेड से बंधे हुए थे और मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था। वह तो अवनी ने मेरी आवाज सुनकर अपने पैर से फूलदान गिरा दिया था, नहीं तो मुझे कुछ पता ही नहीं चलता।

मैंने जब निलेश की तरफ गुस्से से देखा तो वह बेशर्मी से बोला, ‘भाभी, आप इन बातों में न ही पड़ें तो बेहतर रहेगा, यह हम पति-पत्नी के बीच का मामला है।’

उसकी बात सुनते ही मैं गुस्से से सुलग उठी और मैंने खींचकर उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और अवनी  की ओर बढ़ चली।

थप्पड़ लगते ही गुस्से से तिलमिलाकर उसने मुझ पर हाथ उठाने की कोशिश की। लेकिन उसे नहीं पता था कि मैंने जूडो कराटे की ट्रेनिंग ली हुई है। जैसे ही उसका हाथ उठा, मैंने फुर्ती से उसकी कलाई पकड़कर ऐसा मरोड़ा कि वह दर्द से बिलबिलाता हुआ सीधे घुटनों के बल फर्श पर आ गिरा। दर्द से छटपटाते निलेश को फर्श पर ही छोड़, मैंने तुरंत अवनी के बंधन खोले और उसे अपने साथ ले आई। 

यह कहकर सिया ने गहरी सांस ली और अपनी सास और पति की ओर देखा, “लेकिन, अभी इन सब बातों का वक्त नहीं है। भगवान का शुक्र है कि हमारी अवनी सही-सलामत हमारे पास है। अब हमें उसे संभालना है।”

उसकी सास और अनुज ने भी सिया की बातों से सहमति जताई। लेकिन जितना सिया ने सोचा था, यह उतना आसान नहीं था। जैसे ही रिश्तेदारों में यह बात फैली, जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं।

रिश्ते की ताई, चाचियां आकर रोज ही माला देवी से कहने लगीं, “ऐसा थोड़ी होता है, शादी की है तो ऐसे लड़की को घर बिठाकर थोड़ी न रख सकते हैं। यह सब तो चलता ही रहता है। हमारी मानिए, लड़के वालों से समझौता कर लीजिए नहीं तो अवनी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। भाई-भाभी कितने दिन बिठाकर खिलाएंगे?”

रिश्तेदारों की बातों में आकर एक बार फिर सिया की सास माला देवी अवनी को ससुराल भेजने की बातें करने लगीं, “सिया, गलतियां सबसे हो जाती हैं। मुझे लगता है हमें जंवाई बाबू से बात करके अवनी को भेज देना चाहिए।”

लेकिन सिया ने अपनी सास की बात मानने से साफ इनकार कर दिया “माँ, अवनी अब उस नरक में कभी वापस नहीं जाएगी।”

“ससुराल नहीं जाएगी तो क्या करेगी? शादीशुदा लड़की का ससुराल के अलावा कोई ठौर नहीं होता।”

“यह सब पुरानी बातें हैं माँ कि ससुराल के बिना लड़की का कोई अस्तित्व नहीं होता। अवनी अपने पैरों पर खड़ी होगी। मैं उसे खड़ा करूंगी। लेकिन उस दलदल में उसे वापस नहीं भेजूंगी,” सिया ने दृढ़ता से कहा और अवनी के कमरे में चली गई, जहां अवनी तकिये में सिर छुपाए रो रही थी।

उसने अवनी के आंसू पोंछते हुए प्यार से कहा, “अवनी, रोने से कुछ हासिल नहीं होगा। रोना बंद कर और अपने पैरों पर खड़े होने की तैयारी कर।”

“लेकिन कैसे भाभी? मैं तो…” अवनी ने रोते हुए कहा।

“मैं तो क्या? बी.एड. किया हुआ है तूने। खुद को इतना लाचार क्यों समझ रही है? ले इसे भर दे, सुनहरा भविष्य तेरा इंतजार कर रहा है,” कहते हुए सिया ने शिक्षक भर्ती परीक्षा का फॉर्म उसके हाथ में रख दिया।

अवनी परीक्षा की तैयारी करने लगी। सिया ने पढ़ाई के साथ-साथ अवनी की जूडो-कराटे की ट्रेनिंग भी शुरू करवा दी, ताकि जिंदगी में वह कभी खुद को कमजोर या बेबस न समझे।

वह अवनी का ध्यान बिल्कुल अपनी बेटी की तरह रखती। जब भी अवनी रात को पढ़ते-पढ़ते थककर या पुराने जख्मों को याद करके रोने लगती, सिया चुपचाप उसके सिर पर हाथ फेरकर हिम्मत बंधाती।

अगले कुछ महीनों तक अवनी ने दिन-रात एक करके जी-तोड़ मेहनत की। सिया के अटूट विश्वास और अवनी के कठिन परिश्रम ने रंग दिखाया। अवनी ने राज्य शिक्षक भर्ती परीक्षा में पूरे जिले में पहला स्थान हासिल किया।

परिणाम देखते ही माला देवी की आंखों में भी खुशी के आंसू आ गए।

यह खबर मिलते ही निलेश और उसके घरवालों का सारा घमंड चकनाचूर हो गया और वे अवनी को वापस ले जाने के लिए मिन्नतें करने लगे।

लेकिन आज सिया से पहले उसकी सास माला देवी ने आगे बढ़कर उनके मुंह पर घर का दरवाजा बंद कर दिया, “जिस घर में मेरी बेटी का सम्मान नहीं, उन लोगों के लिए मेरे घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हैं। जल्द ही तलाक के कागज आपको मिल जाएंगे।”

निलेश सिर झुकाए उल्टे पाॅंव लौट गया।

माला देवी अंदर आईं और उन्होंने सिया के सिर पर हाथ रखकर कहा, “बहू, जिस ननद की तेरे जैसी भाभी हो, उसका कोई चाह कर भी बुरा नहीं कर सकता।”

यह सुनकर अवनी भी दौड़कर आई और सिया के गले लग गई, “हाँ माँ, आप बिल्कुल सही कह रही हो। मेरी भाभी तो लाखों में एक है। भगवान करे, ऐसी भाभी सबको मिले। ये सिर्फ मेरी भाभी नहीं, मेरी गुरु हैं जिन्होंने मुझे सिखाया है कि कभी अन्याय के आगे झुकना नहीं चाहिए और हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करना चाहिए।”

यह सुनते ही सिया की आंखों में भी खुशी और सुकून के आंसू छलक आए।

धन्यवाद 

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता –

#ऐसी भाभी सबको मिले 

शीर्षक- भाभी हो तो ऐसी 

लेखिका- श्वेता अग्रवाल 

धनबाद, झारखंड

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