कर्ज से रिश्ते तक

 मैंने आगे बढ़कर शारदा को उठाया और देवेश से कहा, “देवेश जी, पुरानी गलतियों का पश्चाताप रोने से नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को सुधारने से होता है। अगर आप सच में शारदा और अपनी बेटियों से प्यार करते हैं, तो आपको इस दलदल से बाहर निकलना होगा। क्या आप एक नई शुरुआत करने के लिए तैयार हैं?”

देवेश ने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा, “मेमसाब, अगर मुझे इस नर्क से निकलने का कोई रास्ता मिले, तो मैं अपनी जान की बाजी लगा दूँगा।”

उदयपुर की हल्की गुलाबी ठंड वाली एक सुहानी सुबह थी। मैं अपनी बालकनी में बैठी गुनगुनी धूप के साथ चाय की चुस्कियां ले रही थी। तभी घर की घंटी बजी और मेरी घरेलू सहायिका शारदा अंदर आई। आम तौर पर शारदा जब भी काम पर आती थी, तो उसके चेहरे पर एक बुझी हुई उदासी और रात भर की थकान साफ नजर आती थी। उसके चेहरे की झुर्रियां और आँखों के नीचे के काले घेरे उसकी मुश्किल जिंदगी की गवाही देते थे। मगर आज कुछ अजीब था। शारदा के चेहरे पर एक गजब की चमक थी, होंठों पर धीमी सी मुस्कान तैर रही थी और वह अपने काम में कुछ ज्यादा ही फुर्ती दिखा रही थी। यहाँ तक कि पोछा लगाते हुए वह धीमी आवाज में कोई पुराना लोकगीत भी गुनगुना रही थी।

मुझसे रहा नहीं गया। मैंने चाय का कप मेज पर रखा और मुस्कुराते हुए पूछा, “अरे शारदा, आज तो बड़ी खुश नजर आ रही हो! क्या बात है? कोई खास लॉटरी लग गई है या मायके से कोई अच्छी खबर आई है?”

मेरी बात सुनकर शारदा के हाथ वहीं थम गए। उसने अपना पल्लू ठीक किया, अपनी गीली हथेलियों को एप्रन से पोंछा और एक गहरी, सुकून भरी सांस लेकर बोली, “क्या बताऊँ भाभी जी, कल करवाचौथ था ना… और पूरे आठ बरसों में पहली बार ऐसा हुआ कि देवेश शाम को बिल्कुल होश में घर लौटा। कोई नशा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं। उल्टा काम से लौटते वक्त उसने मोहल्ले की दुकान से गर्म-गर्म गुलाब जामुन खरीदे, घर आकर खुद नहाया, साफ कुरता पहना और पूजा के वक्त चुपचाप मेरे सामने आकर बैठ गया। उसने दोनों बच्चों को अपने हाथों से मिठाई खिलाई और मेरे सिर पर हाथ रखकर बोला कि बहुत सताया है मैंने तुम्हें। भाभी जी, कहते-कहते उसका गला भर आया था… और मेरी तो जैसे जान ही निकल गई खुशी के मारे।”

शारदा की आँखों में उमड़ आई नमी उसकी खुशी बयां कर रही थी, लेकिन मुझे उसकी यह बात सुनकर तसल्ली नहीं हुई, बल्कि भीतर ही भीतर एक तीव्र झुंझलाहट महसूस हुई। देवेश की पुरानी आदतों से मैं भली-भांति वाकिफ थी। वह आए दिन शराब पीकर आता था, मेहनत-मजदूरी के पैसे जुए और नशे में उड़ा देता था और घर आकर शारदा पर अपनी सारी कुंठा उतारता था। घर का राशन, बच्चों की स्कूल की फीस, कपड़े, मकान का किराया—सब कुछ शारदा चार घरों में चौका-बर्तन करके अकेले अपने दम पर चला रही थी।

मैंने तल्ख लहजे में कहा, “शारदा, तुम भी न कितनी भोली हो! एक दिन आदमी ढंग से पेश आ गया तो तुम पुराने सारे जख्म भूल गईं? यह सब सिर्फ एक दिन का दिखावा है, एक रील जैसी चमक है। देखना, आज शाम होते ही वह फिर उसी ठेके पर मिलेगा और रात को वही तमाशा होगा। मुझे तो तुम्हारी समझ पर तरस आता है। तुम अपने पैरों पर खड़ी हो, महीने के बीस हजार रुपये कमाती हो, अपने बच्चों को पाल रही हो, उस निकम्मे को भी पाल रही हो। फिर उसकी ये धौंस, उसकी ये गालियां और मार-पीट क्यों सहती हो? छोड़ क्यों नहीं देती ऐसे इंसान को? जब दो वक्त की रोटी के लिए तरसेगा, तब जाकर उसकी अक्ल ठिकाने आएगी!”

मेरी बात सुनकर शारदा के चेहरे की मुस्कान गायब नहीं हुई, बल्कि उसमें एक ठहराव और गहरा दर्द घुल गया। उसने एक लंबी सांस ली, फर्श पर ही दीवार के सहारे बैठ गई और अपनी पुरानी यादों की परतें खोलने लगी।

“छोड़ तो वह भी सकता था मुझे भाभी जी… उस वक्त, जब मेरी दुनिया पूरी तरह उजड़ चुकी थी,” शारदा ने बहुत धीमी और कांपती आवाज में कहना शुरू किया।

“आपको तो पता ही नहीं है कि देवेश की इस बर्बादी के पीछे का सच क्या है। करीब नौ साल पहले की बात है। मैं उनके बड़े भाई, यानी अपने पहले पति मयंक जी के साथ बहुत खुश थी। हमारा एक छोटा सा भरा-पूरा संसार था। दो छोटी-छोटी दूधमुंही बेटियां थीं। तभी एक मनहूस शाम को फैक्ट्री से लौटते वक्त एक बेकाबू ट्रक ने मयंक जी को कुचल दिया। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। उस हादसे ने मेरी पूरी जिंदगी को श्मशान बना दिया।”

शारदा की आँखों से आंसू बहकर उसके गालों पर फिसलने लगे, लेकिन उसकी आवाज में एक अजीब सा दृढ़ संकल्प था। उसने आगे कहा, “उस समय मेरी हालत ऐसी थी कि न तो ससुराल में मेरे और मेरी दो बच्चियों के लिए कोई हमदर्दी बची थी और न ही मायके में इतना दम था कि वे दो मासूमों के साथ एक विधवा बेटी का बोझ उठा सकें। ससुराल वाले मुझे ही मनहूस कहने लगे थे कि आते ही जवान बेटे को खा गई। दूर-दूर तक मुझे और मेरी बच्चियों के लिए सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा था। कई बार मन में आया कि दोनों को छाती से बांधकर किसी कुएं में छलांग लगा लूं।”

“फिर क्या हुआ?” मैंने उत्सुक और सजल नेत्रों से पूछा।

“उसी वक्त देवेश आगे आया था भाभी जी,” शारदा ने सिहरते हुए बताया। “देवेश की अपनी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही थी। वह शहर के एक बड़े गैरेज में मुख्य मैकेनिक था, अच्छा कमाता था। उसकी अपनी सगाई हो चुकी थी, शादी के सिर्फ दस दिन बचे थे और पूरे घर में उसकी शादी की शहनाइयां बजने वाली थीं। लेकिन जब उसने देखा कि उसके सगे बड़े भाई की मौत के बाद उसकी भाभी और मासूम भतीजियों को धक्के देकर घर से निकालने की तैयारी हो रही है, तो उसने एक ऐसा फैसला लिया जिसे सुनकर पूरा खानदान हिल गया। उसने अपनी होने वाली शादी तोड़ दी। उसने अपने माँ-बाप के पैरों में गिरकर मिन्नतें कीं, पूरे समाज के ताने सहे, बिरादरी के बहिष्कार का सामना किया, और भरी पंचायत में अपनी ही मर्जी से मेरे सिर पर लाल चुनरी ओढ़ाकर मुझे अपनी पत्नी का दर्जा दिया।”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। मैं अवाक होकर शारदा का चेहरा देख रही थी।

शारदा ने पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं और आगे बोली, “भाभी जी, जिस समाज में लोग विधवा को अपशकुन मानते हैं, वहाँ उसने अपनी पूरी जवानी, अपनी खुशियाँ और अपने सपने मुझ जैसी एक बेसहारा औरत और दो अनाथ बच्चियों के नाम कर दिए। उसके माँ-बाप ने उसे जायदाद से बेदखल कर दिया, दोस्तों ने मुंह मोड़ लिया, जिस लड़की से उसकी शादी होने वाली थी उसके परिवार ने देवेश को सरेआम अपमानित किया। उसने वह सारा जहर अकेले पिया ताकि मैं और मेरी बच्चियां इज्जत की छत के नीचे सिर छुपा सकें। उसने सालों तक खून-पसीना एक करके हम तीनों को पाला।”

“तो फिर वह इस रास्ते पर कैसे चला गया शारदा?” मैंने भर्राए हुए गले से पूछा।

“जब आदमी के आत्मसम्मान पर हर तरफ से चोट पड़ती है भाभी जी, तो कभी-कभी वह अंदर से टूट जाता है,” शारदा ने आह भरी। “गैरेज में मंदी आई, उसकी नौकरी छूट गई। समाज के ताने कम नहीं हुए थे। लोग उसे ‘भाभी से ब्याह करने वाला’ कहकर चिढ़ाते थे। धीरे-धीरे उस तनाव और अकेलेपन ने उसे शराब के गर्त में धकेल दिया। वह दिन-ब-दिन चिड़चिड़ा होता गया। जब वह होश में होता है, तो अपनी ही नजरों में खुद को गिरा हुआ महसूस करता है कि वह हमें वो सुख नहीं दे पाया जो देना चाहता था। इसी हीनभावना को दबाने के लिए वह पीने लगा और फिर उस नशे में अपना आपा खो बैठता था।”

शारदा ने सिर उठाकर मेरी आँखों में देखा, “भाभी जी, आज अगर मैं जिंदा हूँ, अपने पैरों पर खड़ी हूँ, मेरी दोनों बेटियां अच्छे स्कूल में पढ़ रही हैं, तो यह उसी देवेश के उस एक फैसले की बदौलत है। अगर मैं उस दिन को भूल जाऊं, तो मेरा इंसान कहलाना ही व्यर्थ हो जाएगा। उसने जो अहसान मुझ पर और मेरी बच्चियों पर किया था, उसके बदले अगर वह मुझे चार कड़वी बातें भी सुना दे या हाथ भी उठा दे, तो मेरा दिल कहता है कि मैं उसके सौ गुनाह माफ कर सकती हूँ। मैं उसे कैसे छोड़ दूँ? जब पूरी दुनिया ने मेरा साथ छोड़ दिया था, तब वह मेरे साथ खड़ा था। आज जब वह खुद अपनी जिंदगी की जंग हार रहा है, तो क्या मेरा फर्ज नहीं बनता कि मैं उसका हाथ थामे रखूँ?”

शारदा का काम खत्म हो चुका था। वह हाथ जोड़कर, अपने चेहरे पर वही हल्की सी उम्मीद की चमक लिए दूसरे घर काम करने चली गई।

लेकिन उसके जाने के बाद, मैं गहरे असमंजस और विचारों के भंवर में फंस गई। पूरा दिन मेरे दिमाग में बस वही बातें घूमती रहीं।

एक तरफ देवेश का वह महान त्याग था, जिसने एक बेसहारा औरत और दो मासूम बच्चियों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी खुशियों की आहुति दे दी थी। दूसरी तरफ उसका वर्तमान था—शराब की लत, गाली-गलौज और हिंसा।

और शारदा? शारदा का यह समर्पण क्या था? क्या यह सच्चा प्रेम और कृतज्ञता थी, या फिर अहसान तले दबी एक बेबस औरत की मजबूरी? क्या किसी पुराने अहसान का बदला चुकाने के लिए एक इंसान को अपनी पूरी जिंदगी अपमान और हिंसा के हवाले कर देनी चाहिए? देवेश ने शादी करके शारदा पर अहसान किया था, और अब शारदा उसकी हर ज्यादती को चुपचाप सहकर उस पर अहसान कर रही थी। लेकिन क्या रिश्तों की नींव अहसानों के लेन-देन पर टिक सकती है? नहीं, अहसान रिश्ते को शुरू तो कर सकता है, लेकिन उसे चला नहीं सकता। रिश्ते तो बराबरी, सम्मान और समझदारी की जमीन पर ही पनपते हैं।

शारदा की उस बात ने मेरे भीतर कुछ झकझोर दिया था—”कल उसने मिठाई लाई और बोला कि बहुत सताया है तुम्हें।” इसका मतलब था कि देवेश के भीतर का वह भला इंसान पूरी तरह मरा नहीं था। वह शराब के नशे की मोटी परत के नीचे कहीं जिंदा था, बस उसे एक सहारे की, एक सही दिशा की जरूरत थी। शारदा की अंध-सहनशीलता देवेश को सुधार नहीं रही थी, बल्कि अनजाने में उसकी कमजोरी को बढ़ावा दे रही थी।

मैंने फैसला किया कि मैं इस परिवार को यूँ बिखरने और घुटने नहीं दूंगी।

दो दिन बाद, मैंने अपने पति सुमित से बात की। सुमित शहर के एक प्रमुख नशामुक्ति और पुनर्वास केंद्र के ट्रस्टी थे और साथ ही एक हुनर विकास केंद्र भी चलाते थे। मैंने सुमित को पूरी बात बताई। सुमित भी देवेश के अतीत के त्याग से बेहद प्रभावित हुए।

रविवार की दोपहर, मैंने शारदा को किसी बहाने से अपने घर रोका और देवेश को भी एक छोटे से काम के सिलसिले में घर बुलवा लिया। देवेश जब आया, तो वह बहुत झिझक रहा था। उसके चेहरे पर वही पुरानी ग्लानि और नजरें चुराने की आदत साफ दिख रही थी।

सुमित ने उसे बड़े आदर से ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठाया और चाय पिलाई। किसी बड़े घर में ऐसा सम्मान पाकर देवेश की आँखें भर आईं।

सुमित ने सीधे मुद्दे पर बात शुरू की, “देवेश जी, मुझे आपकी कहानी पता चली। जो फैसला आपने नौ साल पहले लिया था, वह कोई कायर नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े जिगर वाला मर्द ही ले सकता है। समाज चाहे कुछ भी कहे, लेकिन हमारी नजरों में आप एक सच्चे नायक हैं।”

यह सुनते ही देवेश का चेहरा फक पड़ गया। उसकी आँखें डबडबा गईं। उसने पिछले नौ सालों में अपने लिए सिर्फ ताने और धिक्कार ही सुने थे, किसी ने उसकी उस कुर्बानी को सम्मान की नजर से नहीं देखा था।

सुमित ने आगे कहा, “लेकिन देवेश भाई, जिस परिवार को बचाने के लिए आपने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी, आज आप खुद अपने ही हाथों से उस परिवार को बर्बाद कर रहे हैं। शारदा आपका सम्मान करती है, आपके उस त्याग के आगे सिर झुकाती है, लेकिन आपकी यह लत आपकी बच्चियों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। क्या आप चाहते हैं कि लोग कहें कि देवेश ने बचाया तो था, लेकिन अंत में खुद ही सब खत्म कर दिया?”

देवेश फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया, “साहब, मैं बर्बाद हो चुका हूँ। मैं अंदर से मर चुका हूँ। जब काम छूटा और लोगों ने बातें बनाईं, तो मैं खुद को संभाल नहीं पाया। मैं अपनी ही नजरों में गिर गया। मैं रोज सोचता हूँ कि पीना छोड़ दूँ, पर यह लत मुझे जीने नहीं देती। मैं शारदा का गुनहगार हूँ… मैंने उस देवी जैसी औरत की जिंदगी नरक बना दी।”

शारदा जो दरवाजे की ओट में खड़ी यह सब सुन रही थी, दौड़कर कमरे में आई और देवेश के पैरों के पास बैठ गई।

“नहीं… आप गुनहगार नहीं हैं। आपने तो हमें जिंदगी दी है। अगर आप ही हिम्मत हार जाएंगे तो हम कहाँ जाएंगे?” शारदा रोते हुए बोली।

मैंने आगे बढ़कर शारदा को उठाया और देवेश से कहा, “देवेश जी, पुरानी गलतियों का पश्चाताप रोने से नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को सुधारने से होता है। अगर आप सच में शारदा और अपनी बेटियों से प्यार करते हैं, तो आपको इस दलदल से बाहर निकलना होगा। क्या आप एक नई शुरुआत करने के लिए तैयार हैं?”

देवेश ने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा, “मेमसाब, अगर मुझे इस नर्क से निकलने का कोई रास्ता मिले, तो मैं अपनी जान की बाजी लगा दूँगा।”

उस दिन के बाद से कहानी ने एक नया मोड़ लिया।

सुमित की मदद से देवेश को शहर के एक बेहतरीन नशामुक्ति केंद्र में भर्ती कराया गया। शुरुआती तीन महीने देवेश के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। शरीर की तलब, मानसिक तनाव और बेचैनी ने उसे कई बार तोड़ा, लेकिन इस बार शारदा उसके साथ केवल एक मूक दर्शक बनकर नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ढाल बनकर खड़ी थी। वह हर हफ्ते उससे मिलने जाती, उसे उसकी बेटियों के स्कूल की प्रगति बताती और उसमें यह विश्वास जगाती कि उसका मान अभी भी बाकी है।

शारदा ने भी अपनी सोच बदली। उसने समझ लिया था कि प्यार का मतलब सब कुछ चुपचाप सहना नहीं होता, बल्कि सही समय पर कड़े फैसले लेकर अपनों को सही राह पर लाना होता है।

इलाज के साथ-साथ सुमित के संस्थान ने देवेश की पुरानी मैकेनिकल कुशलता को पहचाना और उसे आधुनिक कारों और इलेक्ट्रिक वाहनों की रिपेयरिंग का उन्नत प्रशिक्षण दिलवाया। देवेश के हाथों में गजब का हुनर था, जो शराब की धुंध में खो गया था।

छह महीने बाद, जब देवेश केंद्र से बाहर आया, तो वह पूरी तरह से एक बदला हुआ इंसान था। उसकी आँखों में वो पुराना संकोच और हीनभावना नहीं थी, बल्कि एक नया आत्मविश्वास और अपनी पहचान वापस पाने की चमक थी।

सुमित ने अपने एक परिचित के बड़े ऑटोमोबाइल वर्कशॉप में देवेश को बतौर सुपरवाइजर नियुक्त करवा दिया। देवेश ने दिन-रात एक करके काम करना शुरू किया। उसकी मेहनत और ईमानदारी देखकर वर्कशॉप का मालिक भी दंग रह गया। पहले ही महीने की तनख्वाह जब देवेश के हाथ में आई, तो वह सीधे घर गया।

उस शाम जब मैं किसी काम से शारदा के घर की तरफ से गुजरी, तो मैंने जो दृश्य देखा, उसने मेरी आत्मा को तृप्त कर दिया।

घर के छोटे से आंगन में तुलसी के पौधे के पास दीया जल रहा था। देवेश ने अपनी पूरी तनख्वाह शारदा की हथेली पर रख दी थी और दोनों बेटियां अपने पिता की बाहों में लिपटी हुई खिलखिला रही थीं। शारदा की आँखों में आंसू थे, लेकिन ये आंसू बेबसी या मजबूरी के नहीं थे, बल्कि एक बिखरे हुए घर के दोबारा बस जाने के परम आनंद के थे।

देवेश ने शारदा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “शारदा, तुमने सालों तक मेरे हर दर्द को सहा, मेरे उस पुराने फैसले का मान रखा। लेकिन आज से हम किसी अहसान के बोझ तले नहीं जिएेंगे। आज से हमारा रिश्ता बराबरी, सम्मान और सच्चे प्यार का होगा।”

उस दिन मुझे समझ आया कि जिंदगी में केवल त्याग कर देना ही काफी नहीं होता, बल्कि उस त्याग की गरिमा को जीवन भर संभाले रखना और मुश्किल वक्त में एक-दूसरे की कमजोरी को ताकत में बदलना ही असली परिवार की परिभाषा है। अहसानों के तराजू पर तौले गए रिश्ते एक दिन दम तोड़ देते हैं, लेकिन जब वही रिश्ते समझदारी, संवाद और क्षमा की डोर से बंध जाते हैं, तो वे हर तूफ़ान से पार निकल जाते हैं।

जीवन में कई बार हम रिश्तों को ‘अहसान’ और ‘कर्तव्य’ के भारी-भरकम शब्दों के नीचे दबा देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि किसी का एक उपकार हमें उसकी गलतियों को सहने का आजीवन लाइसेंस नहीं देता, और न ही गलतियों को चुपचाप सहना सच्चा समर्पण है। सच्चा रिश्ता वही है जहाँ दोनों साथी एक-दूसरे की गलतियों को सुधारकर साथ आगे बढ़ें।

क्या आपको लगता है कि शारदा का इतने सालों तक सब कुछ सहना सही था, या फिर रिश्तों में सीमाएं तय करना और सही समय पर आवाज उठाना ज्यादा जरूरी होता है? आपकी सोच और अनुभव इस बारे में क्या कहते हैं? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!