सूरत की एक शांत और प्रतिष्ठित कॉलोनी में बने दो मंजिला बंगले ‘आनंद निकेतन’ के बड़े से दालान में बैठी सुमित्रा देवी अपने कांपते हाथों से चाय की चुस्कियां ले रही थीं। सुबह की धूप आंगन में उतर आई थी, लेकिन उस विशाल घर का कोना-कोना एक अजीब से सन्नाटे में डूबा हुआ था। दीवार पर लगी एक बड़ी सी फ्रेम वाली तस्वीर में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा था। तस्वीर के एक कोने में सुमित्रा देवी अपने पति हरिशंकर जी के साथ बैठी थीं, और पीछे उनके दोनों बच्चे—बेटा अर्णव और बेटी तान्या—अपनी डिग्रियां हाथ में लिए गर्व से खड़े थे। उस तस्वीर को देखते ही सुमित्रा देवी की आँखें नम हो गईं और स्मृतियों का एक लंबा कारवां उनके सामने से गुजरने लगा।
करीब तीन दशक पहले, जब सुमित्रा देवी नई-नवेली दुल्हन बनकर इस परिवार में आई थीं, तब माहौल बिल्कुल अलग था। हरिशंकर जी एक सरकारी उपक्रम में वरिष्ठ पद पर थे और परिवार का समाज में बड़ा मान-सम्मान था। उस दौर में हरिशंकर जी के परिवार और रिश्तेदारों में एक अजीब सी होड़ मची हुई थी। हर दूसरी शादी या पारिवारिक उत्सव में चर्चा का केवल एक ही केंद्र होता था—विदेश। किसी का बेटा लंदन में बस गया था, तो किसी का दामाद टोरंटो में बड़ी कंपनी में अधिकारी था। रिश्तेदार जब अपनी संतानों की डॉलर और पाउंड वाली जीवनशैली का बखान करते, तो बाकी लोग मुंह बाए उनकी बातें सुनते थे। समाज में प्रतिष्ठा का पैमाना अब इस बात से तय होने लगा था कि आपके बच्चे भारत में हैं या सात समंदर पार।
सुमित्रा देवी के कोमल मन पर उन महफिलों का गहरा असर हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे यह मान लिया कि असली सफलता, मान-सम्मान और मातृत्व की सार्थकता इसी में है कि उनके बच्चे भी विदेश की धरती पर अपना परचम लहराएं। जब तान्या और अर्णव बहुत छोटे थे, तभी से सुमित्रा देवी ने उनके कानों में सफलता के वही मानक घोलने शुरू कर दिए थे। वह बच्चों को अक्सर कहती थीं कि इस देश में मेहनत करने वालों की कद्र देर से होती है, असली तरक्की तो अमेरिका और यूरोप में है। तुम्हें दिन-रात पढ़ना है ताकि तुम बाहर जा सको।
तान्या पढ़ने में बहुत होनहार थी। उसने पुणे से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया और कैंपस प्लेसमेंट में ही एक अच्छी भारतीय कंपनी में उसे नौकरी मिल गई। लेकिन सुमित्रा देवी का सपना तो कुछ और ही था। वह चाहती थीं कि तान्या उच्च शिक्षा के लिए तुरंत अमेरिका जाए। तभी परिवार की एक दूर की चाची ने सुमित्रा को सलाह दी कि जवान लड़की को अकेले परदेस भेजने में तमाम तरह की चिंताएं होती हैं। क्यों न ऐसा रिश्ता ढूंढा जाए जो पहले से वहीं settled हो? शादी के बाद बेटी पति के साथ चली जाएगी, वहीं मास्टर्स भी कर लेगी और करियर भी बन जाएगा। सुमित्रा देवी को यह युक्ति भा गई। उन्होंने और हरिशंकर जी ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कैलिफोर्निया में कार्यरत एक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट मयंक से तान्या का रिश्ता पक्का कर दिया। धूमधाम से विवाह हुआ और तान्या अपनी माँ की महत्वाकांक्षा का झोला उठाए अमेरिका चली गई। कुछ ही सालों में उसने वहाँ एमएस पूरा किया और एक बड़ी टेक फर्म में डायरेक्टर बन गई। जब भी कोई रिश्तेदार सुमित्रा से मिलता, वह बड़े गर्व से तान्या के आलीशान जीवन की कहानियां सुनातीं।
बेटी के बाद अब बारी अर्णव की थी। अर्णव स्वभाव से थोड़ा शांत और घर-परिवार से जुड़ा हुआ लड़का था। उसने मैकेनिकल इंजीनियरिंग पूरी की और भारत में ही किसी ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करना चाहता था। लेकिन सुमित्रा देवी की हठ के आगे उसकी एक न चली। सुमित्रा ने साफ कह दिया कि तान्या जब विदेश में नाम कमा रही है, तो बेटा पीछे कैसे रह सकता है? समाज क्या कहेगा कि बेटा माँ-बाप के पल्लू से बंधकर रह गया? अर्णव ने अपनी माँ की खुशी के लिए जीआरई की परीक्षा दी और टेक्सास की एक यूनिवर्सिटी से मास्टर्स करने चला गया। पढ़ाई पूरी होते ही उसे वहीं एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिल गई। सुमित्रा देवी ने फिर वही किया, एक संस्कारी लड़की रोहिणी से उसकी शादी करवाई और उसे भी अमेरिका भेज दिया।
उस समय सुमित्रा देवी की खुशी का कोई ठिकाना न था। पूरे सूरत शहर में उनके नाम की चर्चा थी कि सुमित्रा के दोनों बच्चे विदेश में हैं। किटी पार्टियों और पारिवारिक सम्मेलनों में सुमित्रा देवी की गर्दन गर्व से तनी रहती थी। वह बड़े चाव से लोगों को बताती थीं कि कैसे उनके नाती-पोते फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और कैसे उनके बच्चे हर महीने उन्हें डॉलर भेजते हैं। हरिशंकर जी कभी-कभार टोकते भी थे कि सुमित्रा, बच्चे इतने दूर चले गए हैं, जब बुढ़ापे में हाथ-पांव कांपेंगे तब यह डॉलर काम नहीं आएंगे, अपनों की मौजूदगी काम आएगी। लेकिन सुमित्रा उस वक्त प्रतिष्ठा के नशे में चूर थीं।
साल दर साल बीतते गए। समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। हरिशंकर जी सेवानिवृत्त हो गए और उम्र के साथ कई बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। सुमित्रा देवी के घुटने भी जवाब देने लगे थे। अब वह आलीशान बंगला, जो कभी बच्चों की हंसी और चहल-पहल से गूंजता था, एक शांत खंडहर जैसा प्रतीत होने लगा। नौकर-चाकर सब थे, बैंक खाते में बच्चों द्वारा भेजे गए पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उस बड़े घर में बात करने वाला कोई नहीं था।
एक दिन हरिशंकर जी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ। सुमित्रा देवी बदहवास हो गईं। पड़ोसियों की मदद से किसी तरह उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। आईसीयू के बाहर बैठी सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से पहले बेटे अर्णव को फोन मिलाया। अमेरिका में उस वक्त रात थी। फोन कई बार बजने के बाद उठा। अर्णव की नींद में डूबी आवाज आई। सुमित्रा देवी ने रोते हुए कहा, “बेटा अर्णव, तुम्हारे पापा की हालत बहुत खराब है। डॉक्टर कह रहे हैं कि दिल का बड़ा दौरा पड़ा है। तुम तुरंत आ जाओ बेटा, मुझे बहुत डर लग रहा है।”
फोन के उस पार कुछ पलों की चुप्पी छा गई। फिर अर्णव की संभली हुई लेकिन औपचारिक आवाज गूंजी, “माँ, आप शांत रहिए। मैंने ऑनलाइन बेहतरीन कार्डियोलॉजिस्ट्स से बात करने की कोशिश की है। मैं तुरंत अस्पताल के खाते में पैसे ट्रांसफर कर रहा हूँ। लेकिन माँ, मेरा इस वक्त भारत आना लगभग नामुमकिन है। कंपनी में एक बहुत बड़ा मर्जर चल रहा है, जिसकी अगुवाई मैं कर रहा हूँ। अगर मैं इस वक्त छुट्टी लेता हूँ, तो मेरी सालों की मेहनत और प्रमोशन पर पानी फिर जाएगा। वैसे भी रिया के बोर्ड एग्जाम्स हैं। आप चिंता मत कीजिए, मैं बेस्ट मेडिकल फैसिलिटी का पूरा खर्च उठाऊंगा।”
सुमित्रा का दिल बैठ गया। उन्होंने भारी मन से बेटी तान्या को फोन लगाया। तान्या ने सहानुभूति तो बहुत जताई, लेकिन उसकी लाचारी भी कम नहीं थी। उसने कहा, “माँ, मैं समझ सकती हूँ आपकी परेशानी। पर काश आपने मुझे पहले बताया होता! इस हफ्ते मेरी न्यू यॉर्क में तीन क्लाइंट मीटिंग्स हैं और फिर बच्चों का समर कैंप है। मैं कैसे सब छोड़कर आ सकती हूँ? आप प्लीज किसी अच्छे अटेंडेंट को रख लीजिए, जितना भी खर्च होगा मैं और भैया आधा-आधा बांट लेंगे।”
उस रात आईसीयू के बाहर ठंडी बेंच पर बैठी सुमित्रा देवी के कानों में सालों पहले खुद के कहे शब्द गूंजने लगे। उन्होंने ही तो अपने बच्चों को सिखाया था कि करियर और मुकाम से बढ़कर कुछ नहीं होता। उन्होंने ही तो उनकी जड़ों को सींचने के बजाय उन्हें ऐसी उड़ान भरने के लिए मजबूर किया था, जहां से जमीन कभी दिखाई ही न दे। उन्हें समझ आया कि जो बीज उन्होंने बोए थे, आज उसी का फल उनके सामने था। पैसों का ढेर था, पर आंसू पोंछने वाला कोई हाथ नहीं था।
ईश्वर की कृपा से हरिशंकर जी की जान तो बच गई, लेकिन वे बहुत कमजोर हो गए। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब वे घर लौटे, तो घर का सन्नाटा सुमित्रा को काटने लगा। अब वे दोनों बुजुर्ग बस एक-दूसरे का सहारा थे। कुछ महीने ऐसे ही घुटन और पश्चाताप में बीते। सुमित्रा देवी ने मोहल्ले में जाना और किटी पार्टियों में अपनी शेखी बघारना पूरी तरह बंद कर दिया था। अब जब भी कोई पूछता कि बच्चे कब आ रहे हैं, तो सुमित्रा नजरें चुरा लेती थीं।
तभी एक दिन सुमित्रा देवी के जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। हरिशंकर जी की दवाइयां लेने के लिए पास की एक मेडिकल शॉप पर जब सुमित्रा गईं, तो वहां उनकी मुलाकात अपनी एक पुरानी सहेली मालती से हुई। मालती का बेटा भी बेंगलुरु में एक साधारण नौकरी करता था और बेटी पास के ही कस्बे में ब्याही थी। मालती के चेहरे पर जो सुकून और संतोष था, वह सुमित्रा के चेहरे से नदारद था। मालती ने बातों-बातों में कहा, “सुमित्रा, जिंदगी का सबसे बड़ा सच यह है कि हम जो बोते हैं, वही काटते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी बाकी बची जिंदगी को पश्चाताप के आंसुओं में डुबो दें। अगर बच्चे अपने पंखों के साथ उड़ गए हैं, तो हमें भी अपने खाली घोंसले में सिर्फ मातम नहीं मनाना चाहिए। जब तक सांस है, जिंदगी को किसी मकसद से जोड़ना चाहिए।”
मालती की इस बात ने सुमित्रा के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने घर आकर हरिशंकर जी से लंबी बात की। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने अपने बच्चों को अपने सपनों का बंधक बनाया था, और अब वे अपनी तन्हाई का बोझ उन पर डालकर उन्हें अपराधबोध में नहीं धकेलना चाहतीं। उन्होंने स्वीकार किया कि दोष बच्चों का नहीं, बल्कि उनकी अपनी उस अंधी चाहत का था जिसने सफलता की परिभाषा को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और विदेशी ठप्पे तक सीमित कर दिया था।
सुमित्रा देवी ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने बंगले के निचले हिस्से में उन बच्चों के लिए एक शाम की पाठशाला शुरू करने का निर्णय लिया, जो आर्थिक रूप से कमजोर थे और जिनके पास पढ़ने के साधन नहीं थे। हरिशंकर जी, जो गणित और विज्ञान के अच्छे जानकार थे, उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और सुमित्रा ने उन्हें नैतिक शिक्षा, भाषा और जीवन के मूल्य सिखाने शुरू किए।
शुरुआत में चार बच्चे आए, फिर देखते ही देखते बीस और फिर पचास बच्चे उस आंगन में जुटने लगे। जो घर सालों से सन्नाटे की चादर ओढ़े पड़ा था, वह अब मासूम किलकारियों, कविताओं के पाठ और बच्चों के सवालों से गूंजने लगा। सुमित्रा देवी को महसूस हुआ कि उनका मातृत्व केवल दो बच्चों तक सीमित नहीं था; उनके पास तो इतना प्यार था जो अनगिनत बेसहारा बच्चों के जीवन को संवार सकता था। हरिशंकर जी के चेहरे पर भी एक नई चमक और ताजगी लौट आई थी। उनकी दवाइयों की खुराक कम होने लगी और जीने की एक नई वजह मिल गई।
करीब एक साल बाद, दीवाली का त्यौहार था। सुमित्रा और हरिशंकर जी बच्चों के साथ आंगन में दीये सजा रहे थे। तभी अचानक मुख्य द्वार पर एक गाड़ी आकर रुकी। दरवाजे से अर्णव और तान्या अपने-अपने परिवारों के साथ उतरे। उनके हाथों में सूटकेस थे और चेहरों पर एक अजीब सी झिझक और भावुकता थी।
सुमित्रा देवी उन्हें देखकर हैरान रह गईं। अर्णव आगे बढ़ा और अपनी माँ के पैरों में झुक गया। उसकी आँखों में पश्चाताप के आंसू थे। उसने कहा, “माँ, हमें माफ कर दीजिए। हमने सोशल मीडिया पर आपके इस नए काम के बारे में देखा। हमारे पड़ोसियों ने हमें बताया कि कैसे आप दोनों ने अकेले रहकर यह सब शुरू किया। हमें लगा था कि हम आपको पैसे भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, लेकिन हम भूल गए थे कि माँ-बाप को पैसों से ज्यादा औलाद के साथ की जरूरत होती है। माँ, मैं अपनी कंपनी के साथ बात करके अपने प्रोजेक्ट्स का बड़ा हिस्सा भारत ट्रांसफर करवा रहा हूँ। अब मैं हर साल कम से कम तीन महीने आपके पास रहकर यहीं से काम करूंगा, और तान्या ने भी तय किया है कि वह हर छह महीने में बच्चों के साथ यहाँ आएगी।”
तान्या ने अपनी माँ को गले से लगा लिया और रोते हुए बोली, “माँ, आपने हमें उड़ना तो सिखाया, लेकिन हम यह भूल गए थे कि जिस पेड़ की छांव में हम बड़े हुए, उसे धूप में अकेला नहीं छोड़ते। अब हम आपको अकेला नहीं रहने देंगे।”
सुमित्रा देवी ने दोनों बच्चों को अपने सीने से लगा लिया। आज उनके आंसुओं में कोई दर्द या कड़वाहट नहीं थी, बल्कि एक गहरा सुकून था। उन्होंने अपने बच्चों से कहा, “मेरे बच्चों, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। मैंने तुम्हें दूर भेजा था क्योंकि मेरी समझ वहीं तक थी। लेकिन आज मुझे समझ आया है कि सच्चा रिश्ता वह नहीं जो मजबूरी या लाचारी की बेड़ियों से बंधा हो, बल्कि वह है जो एक-दूसरे के फैसलों का सम्मान करे और दूर रहकर भी दिल से जुड़ा रहे। तुम जहाँ भी रहो, खुश रहो, लेकिन अपनी जड़ों को कभी मत भूलना।”
उस रात आनंद निकेतन का आंगन दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था। वह केवल दीवाली का उजाला नहीं था, बल्कि एक परिवार के भीतर उपजे उस नए विश्वास और समझ का प्रकाश था, जिसने झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा की जगह सच्चे अपनत्व को स्थापित कर दिया था।
प्यारे पाठकों, यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी कहीं अपने बच्चों को अंधी सामाजिक प्रतिष्ठा की दौड़ में झोंककर अपने भविष्य को तन्हा तो नहीं कर रहे हैं? क्या सफलता का मतलब केवल सात समंदर पार जाना ही है, या फिर अपनी जड़ों से जुड़े रहकर अपनों का साथ निभाना भी उतना ही जरूरी है? इस विषय पर आपकी क्या राय है, हमें अपनी सोच और अनुभव से नीचे कमेंट करके जरूर अवगत कराएं।
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