महेंद्र भी आगे बढ़े, उनकी आंखें भी नम थीं। उन्होंने अनुष्का के सिर पर हाथ रखा और भरे गले से कहा, “बेटा, आज तन्वी ने हमारी आंखों से लालच की पट्टी उतार दी है। कल सुबह ही हम वकील को बुलाएंगे। तुम्हारे पिता का जो भी था—दुकान, मकान और बैंक बैलेंस—वह सब तुम्हारे नाम किया जाएगा। और यह घर भी तुम्हारा ही है।”
कल्याणी ने खुद अपने हाथों से अनुष्का का पुराना ट्रंक उठाया और उसे तन्वी के कमरे के ठीक सामने वाले सबसे बड़े और हवादार कमरे में रखवाया। उसने अपने हाथों से अनुष्का को नहलाया, उसे तन्वी के लाए हुए सुंदर कपड़े पहनाए और अपने हाथों से उसे खाना खिलाया।
उदयपुर की सर्द सुबह में कोहरे की चादर अभी पूरी तरह छंटी भी नहीं थी कि हवेलीनुमा पुराने मकान के पिछले हिस्से में बर्तनों के खटकने की आवाज़ गूंजने लगी। हवेली का वह पिछला कमरा सीलन, अंधेरे और पुरानी रद्दी से अटा पड़ा था। वहीं एक कोने में रखी थी लोहे की वह पुरानी, जंग खाई अलमारी। कल्याणी ने जब उस भारी अलमारी के पल्ले को खींचा, तो चरमराती आवाज के साथ उसमें से बंद हवा और फफूंद की तीखी बदबू का भभका बाहर आया। कल्याणी ने अपनी रेशमी साड़ी के पल्लू से नाक ढकी और घृणा से भीतर झांकने लगी।
“बड़ी ताई जी, कुछ ढूंढ रही हैं क्या आप? कहिए तो मैं निकाल दूं?”
पीछे से आई बेहद शांत, मीठी और दबी हुई आवाज ने कल्याणी को चौंका दिया। कल्याणी ने मुड़कर देखा। सामने उन्नीस साल की अनुष्का खड़ी थी। सूती, धुंधली पड़ चुकी पुरानी कुर्ती पहने, दोनों हाथों में गीला पोछा और घुटनों तक उठी सलवार। उसकी आंखों में एक अजीब सा संकोच और भय था।
कल्याणी की आवाज में स्वाभाविक रूखापन और अचानक पैदा हुई घबराहट घुल गई, “नहीं… मुझे क्या चाहिए होगा तेरी इस टूटी-फूटी अलमारी से! मैं तो बस यह देख रही थी कि यहां कितनी गंदगी फैला रखी है तूने।” फिर कुछ सोचकर कल्याणी का स्वर थोड़ा धीमा और बनावटी रूप से कोमल हो गया, “सुन, आज दोपहर को तन्वी बंगलुरु से लौट रही है। छह महीने बाद छुट्टियों में घर आ रही है। तू जानती है ना कि वह कितनी सफाई पसंद है? अगर उसने यह कबाड़खाना देखा तो उसका मूड खराब हो जाएगा। तू ऐसा कर, अपने यह फटे-पुराने कपड़े और अपनी यह पेटी ऊपर वाली छत के बरसाती कमरे में रख आ। जब तक तन्वी यहां है, तू वहीं रहना और उसके सामने ज्यादा मत आना।”
अनुष्का ने कोई सवाल नहीं किया। उसने केवल अपनी नजरें झुका लीं और धीरे से सिर हिला दिया, “जी ताई जी, जैसा आप कहें।”
अनुष्का सब समझती थी। वह जानती थी कि यह आदेश सफाई के लिए नहीं, बल्कि उस सच को छिपाने के लिए दिया जा रहा था जो पिछले बारह सालों से इस हवेली की दीवारों के भीतर घुट रहा था।
अनुष्का जब महज सात बरस की थी, तब उसके माता-पिता—कल्याणी के देवर हेमंत और देवरानी शारदा—एक भयानक सड़क दुर्घटना में इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। हेमंत जी शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी थे। उनके अचानक चले जाने के बाद उनका विशाल कारोबार, पुश्तैनी जायदाद और बैंक खाते सब कुछ लावारिस से हो गए थे। कल्याणी और उसके पति महेंद्र ने दुनिया के सामने तो यह ढोंग रचा कि वे अपने दिवंगत भाई की इकलौती अमानत को अपनी सगी बेटी की तरह पालेंगे, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।
महेंद्र ने कानूनी दांव-पेच और फर्जी वसीयत के सहारे हेमंत की सारी संपत्ति, दुकानें और जमीनें धीरे-धीरे अपने नाम करवा लीं। और घर के भीतर कल्याणी ने उस मासूम बच्ची की जिंदगी को नर्क बना दिया। जहां कल्याणी की अपनी बेटी तन्वी को शहर के सबसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में भेजा गया, वहीं अनुष्का की पढ़ाई पर सातवीं कक्षा के बाद ही पूर्ण विराम लगा दिया गया। बहाना यह बनाया गया कि बच्ची का मन पढ़ाई में नहीं लगता, जबकि सच्चाई यह थी कि कल्याणी को घर का मुफ्त नौकर चाहिए था। सुबह की चाय से लेकर रात के बर्तनों तक, पूरे घर का झाड़ू-पोछा, कपड़े धोना और मसाले पीसना—सब अनुष्का के नाजुक कंधों पर डाल दिया गया। उसे बचा-खुचा खाना दिया जाता और तन ढकने के लिए तन्वी के उतारे हुए पुराने कपड़े। महेंद्र ने भी कभी इस अन्याय के खिलाफ मुंह नहीं खोला, क्योंकि हेमंत की दौलत से ही उनकी तिजोरियां भर रही थीं।
दोपहर के करीब बारह बजे दरवाजे पर टैक्सी रुकने की आवाज आई। तन्वी आ गई थी। बंगलुरु से फैशन डिजाइनिंग की डिग्री पूरी कर रही तन्वी केवल सुंदर और पढ़ी-लिखी ही नहीं थी, उसका दिल भी सोने जैसा खरा था। वह बचपन से ही अपनी चचेरी बहन अनुष्का से बेइंतहा प्यार करती थी। जब वह छोटी थी, तब मां के धोखे को नहीं समझ पाती थी, लेकिन हॉस्टल जाने के बाद और दुनिया को करीब से देखने के बाद उसे अपनी मां के दोहरे चरित्र का अहसास होने लगा था।
जैसे ही तन्वी ने घर की दहलीज पर कदम रखा, पूरा सन्नाटा उसकी पायल की झंकार और हंसी से टूट गया।
“मां! पापा! देखो मैं आ गई!” तन्वी ने चहकते हुए कहा।
कल्याणी ने दौड़कर अपनी लाडली को सीने से लगा लिया। “मेरी बच्ची! कितनी कमजोर हो गई है वहां हॉस्टल में। नजर उतारूं तेरी।” महेंद्र भी मुस्कुराते हुए बाहर आ गए और बेटी के सिर पर हाथ रखा।
तन्वी ने मां-बाप से मिलने के बाद अपनी नजरें पूरे आंगन में दौड़ाईं। उसकी आंखें किसी को ढूंढ रही थीं।
“अनु कहां है मां? वह बाहर क्यों नहीं आई?” तन्वी ने पूछा।
कल्याणी के चेहरे पर हल्की सी शिकन आई, पर उसने बात संभालते हुए कहा, “अरे… वो कहीं काम कर रही होगी। तू पहले अंदर आ, हाथ-मुंह धो, मैंने तेरे लिए काजू का हलवा बनाया है।”
लेकिन तन्वी रुकी नहीं। वह अपने बड़े-बड़े ट्रॉली बैग्स को वहीं छोड़कर सीधे पिछले हिस्से की तरफ भागी। सीढ़ियां चढ़कर जब वह छत के बरसाती कमरे के पास पहुंची, तो उसका दिल दहल गया। उस ठंडे, बिना खिड़की वाले कमरे में जमीन पर एक पतली सी चटाई बिछी थी और अनुष्का एक पुरानी बाल्टी में कपड़े धो रही थी। उसकी उंगलियां ठंड से नीली पड़ चुकी थीं।
“अनु!” तन्वी की आवाज कांप गई।
अनुष्का ने चौंककर सिर उठाया। तन्वी को सामने देखकर उसकी थकी हुई आंखों में एक अनूठी चमक तैर गई, पर अगले ही पल वह अपनी फटी हुई आस्तीन को छिपाने की कोशिश करने लगी। तन्वी आगे बढ़ी और उसने बिना कुछ सोचे-समझे अनुष्का को अपनी बाहों में कसकर भींच लिया। दोनों बहनें काफी देर तक एक-दूसरे के गले लगी रहीं। अनुष्का के आंसुओं ने तन्वी के कंधे को भिगो दिया।
तन्वी उसे नीचे खींच लाई। उसने अपना सबसे बड़ा सूटकेस खोला। उसमें से उसने खूबसूरत कश्मीरी कढ़ाई वाला शॉल, दो महंगे सिल्क के कुर्ते और चांदी की एक सुंदर पायल निकाली। उसने वे सारे उपहार अनुष्का के हाथों में रख दिए।
“ये सब तेरे लिए लाई हूं अनु। बंगलुरु में जब भी मैं कोई खूबसूरत चीज देखती थी, मुझे सिर्फ तेरा चेहरा याद आता था।”
अनुष्का के हाथ कांपने लगे। उसने घबराकर उन कपड़ों को छुआ तक नहीं। ठीक उसी समय कल्याणी वहां पहुंच गई। अनुष्का के हाथों में महंगे रेशमी कपड़े और चमकती पायल देखकर उसकी त्योरियां चढ़ गईं। उसके भीतर का लालच और जलन बाहर आ गई।
कल्याणी ने तपाक से कहा, “तन्वी! यह क्या पागलपन है? इसके लिए इतने महंगे तोहफे लाने की क्या तुक थी? जो लड़की दिन भर चूल्हे-चौके में रहती है, गोबर और बर्तन मांजती है, वो इन सिल्क के कपड़ों और चांदी की पाजेब का क्या करेगी? पैसे की कोई कद्र नहीं है तुझे? वहां हॉस्टल में रहकर तू फिजूलखर्ची सीख गई है।”
आंगन में एक गहरा, भारी सन्नाटा छा गया। महेंद्र भी अखबार छोड़कर वहीं आ खड़े हुए। अनुष्का ने डर के मारे कपड़े वापस रखने के लिए हाथ बढ़ाए, लेकिन तन्वी ने उसका हाथ थाम लिया।
तन्वी के चेहरे पर अब वह चुलबुलापन नहीं था। उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो सच की तपिश से जल रही थी। उसने अपने हैंडबैग की चेन खोली। उसमें से उसने खादी का एक बहुत ही साधारण, सस्ता सा सफेद रुमाल निकाला। उसने वह रुमाल आगे बढ़ाकर अपनी मां कल्याणी के हाथों पर रख दिया।
कल्याणी ने उस रुमाल को अचरज और अपमान के मिले-जुले भाव से देखा। “यह… यह क्या है तन्वी? छह महीने बाद तू अपनी मां के लिए यह दो कौड़ी का रुमाल लेकर आई है? यह कोई मजाक है क्या?”
“नहीं मां, यह कोई मजाक नहीं है,” तन्वी की आवाज में इतनी गंभीरता और दृढ़ता थी कि पूरा कमरा गूंज उठा। “यह रुमाल आपके लिए बिल्कुल सही है। क्योंकि आप भी तो पिछले बारह सालों से इस घर में यही करती आ रही हैं—भेदभाव! जब आप अपनी कोख से जन्मी बेटी और अपने दिवंगत देवर की अनाथ बेटी के बीच जमीन-आसमान का भेद कर सकती हैं, तो मुझे भी यह अधिकार है कि मैं अपनी मां और अपनी बहन के बीच ऐसा ही भेद करूं!”
“तन्वी! होश में रहकर बात कर, मां है वो तेरी!” महेंद्र ने गरजते हुए कहा।
“पापा, आप चुप ही रहिए तो बेहतर होगा,” तन्वी ने मुड़कर अपने पिता की आंखों में देखा, जिससे महेंद्र की नजरें अपने आप झुक गईं। “आप दोनों को क्या लगता था कि मैं अंधी हूं? मैं नासमझ हूं? बचपन में मुझे हॉस्टल इसलिए भेजा गया ताकि मैं यह न देख सकूं कि इस घर के बंद कमरों में चाचा जी की बेटी के साथ क्या सुलूक किया जा रहा है। पर मैं अब बच्ची नहीं हूं पापा। मैं जानती हूं कि चाचा जी के मरने के बाद उनकी जो तीन मंजिला दुकान थी, वह आज किसके नाम पर है? उनके बैंक खातों का पैसा किसकी सुख-सुविधाओं पर उड़ रहा है? मेरी फैशन डिजाइनिंग की लाखों रुपये की फीस चाचा जी के छोड़े हुए पैसों से भरी जाती है, और चाचा जी की अपनी बेटी यहां नौकरों की तरह जूठे बर्तन धोती है!”
कल्याणी का चेहरा फक पड़ गया। उसके होंठ फड़कने लगे, “तन्वी… तू… तू अपनी मां पर इतना बड़ा इल्जाम लगा रही है? हमने इसे छत दी, खाना दिया…”
“छत दी? वो भी उस छत के बरसाती कमरे की, जहां कुत्ते भी न बैठें?” तन्वी की आंखों से गुस्से और दर्द के आंसू छलक पड़े। “और खाना? वो भी बासी और बचा-खुचा? मां, कैसी मां हो तुम? एक मां का दिल तो इतना बड़ा होता है कि वह पराए बच्चे को भी अपनी छाती से लगा ले। लेकिन तुमने तो अपने ही परिवार के खून को निचोड़ लिया। उसकी जायदाद हड़प ली, उसकी पढ़ाई छीन ली, उसके बचपन को अपने घर की चारदीवारी में झाड़ू-पोंछे की भेंट चढ़ा दिया! मुझे शर्म आती है यह सोचते हुए कि मैं तुम्हारी बेटी हूं। जिस पैसे पर, जिस शान-ओ-शौकत पर तुम घमंड करती हो, वह इस बेबस अनाथ बच्ची के आंसुओं की नींव पर खड़ी है।”
तन्वी के एक-एक शब्द हथौड़े की तरह कल्याणी के सीने पर चोट कर रहे थे। जिस बेटी को उसने अपनी झूठी शान का मुकुट बनाकर पाला था, उसी ने आज उसके चेहरे से ममता का झूठा नकाब नोच फेंका था। कल्याणी ने चारों ओर देखा। हवेली के बड़े-बड़े शीशों में उसे अपना ही अक्स किसी भयानक, लालची और क्रूर साये की तरह दिखने लगा।
तन्वी ने अनुष्का का हाथ पकड़ा और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी।
“चल अनु, तू इस घर में अब एक पल भी नहीं रुकेगी। मैं तुझे अपने साथ बंगलुरु ले जाऊंगी। तू पढ़ेगी, अपना भविष्य बनाएगी। और पापा, अगर आपने चाचा जी की जायदाद में से अनु का पूरा हिस्सा कानूनी रूप से उसके नाम नहीं किया, तो मैं खुद कोर्ट जाकर आपके खिलाफ गवाही दूंगी।”
दरवाजे की चौखट पर जैसे ही दोनों बहनों के कदम पड़े, पीछे से एक चीख जैसी आवाज उभरी।
“रुक जाओ तन्वी… रुक जाओ मेरी बच्ची!”
तन्वी और अनुष्का ने पलटकर देखा। कल्याणी घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ी थी। उसका सारा अहंकार, सारा दंभ मिट्टी में मिल चुका था। उसके सीने में बरसों से दबा पश्चाताप का ज्वालामुखी फूट पड़ा था।
कल्याणी घिसटती हुई अनुष्का के कदमों के पास पहुंची। उसने अपने कांपते हाथों से अनुष्का के वे पैर पकड़ लिए, जिनमें बिवाइयां फटी हुई थीं।
“मुझे माफ कर दे अनुष्का… मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची! मैं अंधी हो गई थी। दौलत और स्वार्थ ने मेरी ममता पर पत्थर रख दिया था। मैंने तेरी मां को वचन दिया था कि तुझे अपनी बेटी बनाकर रखूंगी, पर मैं डायन बन गई। मैंने तुझ पर बहुत जुल्म किए हैं।”
अनुष्का यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने झुककर अपनी ताई जी को उठाया। उसके दिल में वर्षों की प्रताड़ना के बावजूद कोई मैल, कोई नफरत नहीं थी। उसने कल्याणी के आंसू पोंछते हुए कहा, “नहीं ताई जी, ऐसा मत कहिए। आप मेरी मां जैसी हैं। मैंने कभी आपसे कोई शिकायत नहीं की।”
अनुष्का के इस निश्छल और पवित्र प्रेम ने कल्याणी के दिल को और भी गहरे से चीर दिया। उसने अनुष्का को कसकर अपने सीने से लगा लिया। आज पहली बार उस सीने में मालकिन की हनक नहीं, बल्कि एक पछतावे से भरी मां की धड़कन थी। कल्याणी की आंखों से बहते आंसुओं ने अनुष्का के पुराने जख्मों पर मरहम का काम किया।
महेंद्र भी आगे बढ़े, उनकी आंखें भी नम थीं। उन्होंने अनुष्का के सिर पर हाथ रखा और भरे गले से कहा, “बेटा, आज तन्वी ने हमारी आंखों से लालच की पट्टी उतार दी है। कल सुबह ही हम वकील को बुलाएंगे। तुम्हारे पिता का जो भी था—दुकान, मकान और बैंक बैलेंस—वह सब तुम्हारे नाम किया जाएगा। और यह घर भी तुम्हारा ही है।”
कल्याणी ने खुद अपने हाथों से अनुष्का का पुराना ट्रंक उठाया और उसे तन्वी के कमरे के ठीक सामने वाले सबसे बड़े और हवादार कमरे में रखवाया। उसने अपने हाथों से अनुष्का को नहलाया, उसे तन्वी के लाए हुए सुंदर कपड़े पहनाए और अपने हाथों से उसे खाना खिलाया।
उस दिन के बाद से उस हवेली की आबोहवा हमेशा के लिए बदल गई। अनुष्का का दाखिला शहर के सबसे अच्छे ओपन कॉलेज में कराया गया ताकि वह अपनी आगे की पढ़ाई पूरी कर सके। कल्याणी अब रसोई में अकेली काम नहीं करती थी, दोनों बेटियां उसके साथ हंसती-गाती थीं। हवेली की दीवारें अब सन्नाटे से नहीं, बल्कि दो बहनों के खिलखिलाहट और एक सुधरे हुए परिवार के प्यार से गूंजती थीं। भेद की वह काली दीवार ढह चुकी थी और उसकी जगह सच्चे अपनत्व की रोशनी ने ले ली थी।
दोस्तों, हमारे समाज में कई बार पारिवारिक रिश्तों में दौलत, लालच और स्वार्थ की ऐसी दीवारें खड़ी हो जाती हैं जो अपनों को ही पराया बना देती हैं। खासकर जब किसी अनाथ या कमजोर रिश्तेदार की बात आती है, तो लोग अक्सर उनके अधिकारों को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन सच्चा परिवार वही है जहां हर सदस्य को बराबरी का मान, सम्मान और अधिकार मिले।
क्या आपने भी कभी अपने आस-पास या समाज में ऐसा कोई भेदभाव देखा है जहां अनाथ बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार किया गया हो? और क्या तन्वी की तरह गलत के खिलाफ अपनों के सामने भी खड़े होने का साहस हर संतान में होना चाहिए? अपने विचार और राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।
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लेखिका : मोहिनी मिश्रा