विश्वास का सिंदूर

 कबीर की बात सुनकर आंगन में खड़ी सभी स्त्रियों की आँखें भर आईं। कल्याणी जी आगे बढ़ीं और उन्होंने अवनी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि बहू, कबीर सच कह रहा है। शास्त्रों में ‘आपद्धर्म’ का विधान है। जब शरीर साथ न दे, तो भावना ही सबसे बड़ी पूजा बन जाती है। तूने पूरे दिन जो तप किया है, करवा माता ने उसे स्वीकार कर लिया है। कबीर ने चांदी की कटोरी में थोड़ा सा जल लिया और अवनी के होंठों से लगा दिया। अवनी ने कबीर की आँखों में देखा, जहाँ किसी अनहोनी का कोई डर नहीं था, केवल एक अथाह, सुरक्षित समंदर जैसा प्रेम लहरा रहा था।

जयपुर के गुलाबी भोर की पहली किरण जब हवेलीनुमा मकान के झरोखों से छनकर कमरे में आई, तो हवा में जलते हुए चन्दन और ताजे गेंदे के फूलों की महक घुली हुई थी। अवनी पलंग के कोने पर बैठी अपनी हथेलियों पर चढ़े गहरे लाल रंग को एकटक निहार रही थी। मेहंदी का रंग इतना चटक आया था जैसे किसी ने प्रेम की समूची स्याही उसी पर उड़ेल दी हो। अवनी और कबीर के विवाह को अभी छह महीने ही बीते थे। यह अवनी का पहला करवा चौथ था, एक ऐसा दिन जिसे लेकर वह बचपन से ही कौतूहल और अनगिनत आशंकाओं के भंवर में झूलती रही थी।

दरवाजे की हल्की सी आहट हुई और कबीर एक सजी हुई चांदी की थाली लेकर भीतर आया। उसकी आँखों में नींद की जगह गहरी आत्मीयता तैर रही थी। थाली में बादाम का हलवा, सूखे मेवे, फल और केसरिया दूध की कटोरी रखी थी, जिसे कबीर की माँ, कल्याणी जी ने भोर के तारे की छांव में सरगी के तौर पर खुद तैयार किया था। कबीर ने बड़े जतन से थाली तिपाई पर रखी और अवनी के पास बैठ गया। उसके चेहरे पर बिखरी लटों को प्यार से पीछे करते हुए उसने मुस्कुराकर कहा कि महारानी जी, आपकी प्रजा आपके लिए भोर की पहली दावत लेकर हाजिर है, अब मुस्कुराइए और इस मीठे हलवे से दिन की शुरुआत कीजिए।

अवनी ने थाली देखी, फिर कबीर के चेहरे को देखा। उसने हलवे का एक छोटा सा टुकड़ा चखा, लेकिन जैसे ही कबीर ने पानी का गिलास आगे बढ़ाया, अवनी का हाथ कांप गया। उसके भीतर कोई पुरानी याद अचानक जाग उठी थी, जिसने उसके गले को सूखा दिया। बचपन में उसने अपने मायके में जो देखा था, वह श्रद्धा से अधिक भय का ताना-बाना था। उसे याद आया कि जब वह मुश्किल से बारह वर्ष की थी, उसकी ताई जी व्रत के दिन चक्कर खाकर गिर पड़ी थीं। डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें तुरंत दवा और ग्लूकोज की जरूरत है, पर पूरे कुनबे की बुजुर्ग औरतों ने छाती पीट ली थी कि अगर पानी का एक घूंट भी हलक से उतरा, तो पति के जीवन पर विपदा आ जाएगी। ताई जी पूरे दिन तड़पती रहीं और संयोग ऐसा हुआ कि उसी रात ताऊ जी की गाड़ी का दफ्तर से लौटते वक्त एक्सीडेंट हो गया। सबने उस हादसे का दोष ताई जी के उस एक चम्मच पानी पर मढ़ दिया था जो डॉक्टर ने जबरन उन्हें पिलाया था। उस दिन से अवनी के बालमन में यह वहम पत्थर की लकीर बन गया था कि व्रत के नियमों में जरा सी भी चूक सीधे पति के प्राणों पर हमला होती है।

कबीर ने उसके चेहरे का उड़ता हुआ रंग भांप लिया। उसने पानी का गिलास आगे करते हुए बहुत मनुहार से कहा कि अवनी, अभी सूरज पूरी तरह निकला भी नहीं है, कम से कम दो घूंट पानी पी लो ताकि पूरे दिन ऊर्जा बनी रहे। लेकिन अवनी ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसकी आँखों में भय की परतें तैरने लगीं। उसने थरथराते होंठों से कहा कि नहीं कबीर, मैं एक बूंद भी नहीं पी सकती। अगर मेरे कुछ खाने-पीने से तुम्हारी जिंदगी में कोई भी आंच आ गई, तो मैं जीते जी मर जाऊंगी। मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खोने का जोखिम नहीं ले सकती। कबीर ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, उसने कहा कि ईश्वर इतना कठोर कभी नहीं हो सकता कि वह किसी के भूखे रहने पर ही दूसरे की सांसें बख्शे, पर अवनी के मन का भय तर्कों से कहीं अधिक भारी था।

दोपहर का सूरज जब सिर पर चढ़ा, तो गरमी ने अपना असर दिखाना शुरू किया। कबीर ने आज दफ्तर से पूरी छुट्टी ले रखी थी। उसने माँ से पहले ही कह दिया था कि अवनी के लिए दिन का हर पल सहज होना चाहिए। कल्याणी जी स्वभाव से बहुत सुलझी हुई और ममतामयी स्त्री थीं। वे दोपहर में अवनी के कमरे में आईं और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए बोलीं कि बहू, अगर थोड़ा सा भी सिर भारी लगे तो अनार का थोड़ा सा रस निकाल देती हूँ, पी ले। हमारे शास्त्रों में भाव बड़ा होता है, हठ नहीं। अवनी ने अपनी सास के हाथों को थाम लिया और नम आँखों से कहा कि माँ जी, आपने मुझे बेटी जैसा माना है, पर मुझे यह व्रत अपने पूरे मन और नियम से पूरा करने दीजिए। मेरी माँ हमेशा कहती थीं कि सुहाग की डोर जितनी नाजुक होती है, व्रत का संकल्प उसे उतना ही फौलादी बना देता है। मैं कोई चूक नहीं करना चाहती।

कबीर जो दरवाजे की ओट में खड़ा यह सब देख रहा था, चुपचाप बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था। उसने आकर अवनी के पास सोफे पर आसन जमा लिया। जब अवनी ने उससे पूछा कि वह दोपहर की चाय क्यों नहीं पी रहा, तो कबीर ने शांत भाव से उत्तर दिया कि जब तक इस घर में मेरी अर्धांगिनी बिना अन्न-जल के रहेगी, तब तक कबीर के गले से भी पानी की एक बूंद नीचे नहीं उतरेगी। अवनी स्तब्ध रह गई। उसने कबीर के हाथ पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगी कि यह आप क्या कर रहे हैं, यह व्रत पतियों के लिए होता है, पत्नियों की लंबी उम्र के लिए पुरुष थोड़े ही भूखे रहते हैं। आप जाइए और भोजन कीजिए, आपको मेरी कसम है।

कबीर ने उसकी कसम को बहुत नरमी से दरकिनार कर दिया। उसने अवनी की आँखों में झांकते हुए कहा कि अवनी, अगर विवाह दो आत्माओं का मिलन है, अगर हम हर सुख-दुख में बराबर के हिस्सेदार हैं, तो फिर तपस्या केवल तुम्हारी क्यों हो? अगर तुम मेरे जीवन के लिए भूखी रह सकती हो, तो क्या मेरी जिम्मेदारी केवल तुम्हारे सामने बैठकर पकवान उड़ाने की है? प्रेम में सौदा नहीं होता और न ही प्रेम किसी एकतरफा यातना का नाम है। अगर आज निर्जला व्रत है, तो हम दोनों का है। अवनी की आँखों से आंसुओं की दो बूंदें ढुलक कर उसकी कलाई पर गिर पड़ीं। उसने पहली बार महसूस किया कि समर्पण केवल त्याग करने में नहीं, बल्कि उस त्याग को साझा करने में होता है।

जैसे-जैसे दिन ढलने लगा, अवनी की देह कमजोर पड़ने लगी थी, पर कबीर का साथ उसके आत्मबल को डिगने नहीं दे रहा था। शाम को कल्याणी जी ने अवनी को सोलह श्रृंगार करने में मदद की। लाल बनारसी साड़ी, मांग में चमकता गहरा सिंदूर, कानों में कुंडल, हाथों में लाल-हरी कांच की चूड़ियों की खनक और पाँवों में बजती बिछिया ने अवनी को साक्षात देवी जैसा रूप दे दिया था। पर भूख और प्यास की वजह से उसके चेहरे का पीलापन छुपाए नहीं छुप रहा था। कबीर भी थका हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में अवनी के प्रति जो आदर था, वह किसी भी थकान से बड़ा था।

शाम की पूजा के लिए छत पर सुंदर चौक पूरा गया। कल्याणी जी ने मोहल्ले की अन्य औरतों को भी आमंत्रित किया था। सबने मिलकर करवा माता की कथा सुनी। जब कथा समाप्त हुई, तो आकाश की ओर सबकी निगाहें टिक गईं। पर आज मानो बादलों ने भी परीक्षा लेने की ठान रखी थी। शरद पूर्णिमा के ठीक बाद का यह चौथ का चांद कहीं घने बादलों की ओट में छिपकर बैठ गया था। घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं—आठ बजा, साढ़े आठ बजा, फिर नौ बज गए। अवनी का सिर घूमने लगा था। उसका गला इतना सूख चुका था कि बोलना भी दूभर हो रहा था।

कबीर छत की मुंडेर पर खड़ा बेचैनी से आसमान को घूर रहा था। वह हर पांच मिनट में नीचे आता और अवनी के पास बैठकर उसका हाथ सहलाता। अचानक अवनी की आँखें बंद होने लगीं और वह लड़खड़ाकर कल्याणी जी के कंधे पर झुक गई। पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया। पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला ने फुसफुसाते हुए कहा कि चांद तो अभी बादलों से निकलेगा नहीं, लड़की की तबीयत बिगड़ रही है, कोई अनहोनी न हो जाए। कबीर दौड़ा हुआ आया और उसने अवनी को संभाला। उसने तुरंत पानी का लोटा उठाया और अवनी के होंठों से लगाने लगा।

अवनी ने अर्ध-बेहोशी की हालत में भी अपने दोनों हाथ आगे करके लोटे को रोक दिया। उसकी आँखों से अविरल आंसू बह रहे थे। उसने बेहद कमजोर आवाज में कहा कि नहीं कबीर… ऐसा मत करो। शास्त्रों का नियम टूट जाएगा… मेरी ताई जी की तरह… तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो जाएगा। मैं मर जाऊंगी पर तुम्हें संकट में नहीं डालूंगी।

कबीर की आँखों में भी आंसू छलक आए। उसने लोटा किनारे रखा और अवनी के दोनों कंधों को थामकर पूरे अधिकार और असीम वात्सल्य से कहा कि अवनी, मेरी तरफ देखो। क्या तुम्हें लगता है कि जो परमात्मा इस पूरी सृष्टि को चलाता है, जो प्रेम का साक्षात स्वरूप है, वह इतना क्रूर हो सकता है कि अपनी एक बीमार बेटी के पानी पीने पर उसके निर्दोष पति की जान ले लेगा? क्या हमारा वैवाहिक रिश्ता इतना कमजोर है कि वह कुछ बूंद पानी से टूट जाएगा? सच्चा धर्म जीवन की रक्षा करना सिखाता है, अंधविश्वास में घुटकर मरना नहीं। अगर पत्नी की जान संकट में हो और पति चुपचाप परंपराओं का तमाशा देखे, तो वह पति कहलाने के लायक नहीं है। मेरी लंबी उम्र तुम्हारे भूखे रहने से नहीं, तुम्हारे जीवित और स्वस्थ रहने से है। अगर तुम ही नहीं रहोगी, तो मैं इस लंबी उम्र का क्या करूंगा?

कबीर की बात सुनकर आंगन में खड़ी सभी स्त्रियों की आँखें भर आईं। कल्याणी जी आगे बढ़ीं और उन्होंने अवनी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि बहू, कबीर सच कह रहा है। शास्त्रों में ‘आपद्धर्म’ का विधान है। जब शरीर साथ न दे, तो भावना ही सबसे बड़ी पूजा बन जाती है। तूने पूरे दिन जो तप किया है, करवा माता ने उसे स्वीकार कर लिया है। कबीर ने चांदी की कटोरी में थोड़ा सा जल लिया और अवनी के होंठों से लगा दिया। अवनी ने कबीर की आँखों में देखा, जहाँ किसी अनहोनी का कोई डर नहीं था, केवल एक अथाह, सुरक्षित समंदर जैसा प्रेम लहरा रहा था। उसने कबीर के हाथों से पानी की वह घूंट पी ली। जैसे ही जल उसके हलक से उतरा, उसकी चेतना लौट आई और उसके चेहरे की कांति वापस आ गई।

और ठीक उसी पल, जैसे प्रकृति भी उस सच्चे प्रेम और समझदारी के आगे नतमस्तक हो गई हो, पूरब के आसमान से बादलों का पर्दा हटा और पूर्ण आभा के साथ चौथ का रूपहला चांद मुस्कुरा उठा। छत पर मौजूद सभी स्त्रियों ने एक स्वर में जयकारा लगाया। अवनी ने कबीर के सहारे खड़े होकर छलनी उठाई। पहले उसने उस शीतल, पावन चंद्रमा को देखा, जल का अर्घ्य दिया और फिर छलनी को थोड़ा नीचे करके अपने उस जीवनसाथी का दीदार किया, जिसने रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़कर प्रेम की असली परिभाषा गढ़ी थी।

कबीर ने अवनी के माथे पर लगे सिंदूर को धीरे से छुआ और अपनी जेब से काजू की बर्फी निकालकर उसके मुंह में रख दी। फिर अवनी ने वही टुकड़ा कबीर के मुंह में दिया और दोनों ने एक-दूसरे के चरण स्पर्श किए। वहाँ मौजूद बुजुर्ग महिलाओं ने भी सिर हिलाकर स्वीकार किया कि आज उन्होंने व्रत का असली अर्थ देखा था—जहाँ भय का कोई स्थान नहीं था, केवल परस्पर विश्वास और सम्मान का वास था। वह रात केवल एक रस्म का पूरा होना नहीं थी, बल्कि दो हृदयों का वह पावन उत्सव थी जिसने अंधविश्वास के अंधकार को मिटाकर प्रेम का अमर उजाला फैला दिया था।

प्यारे पाठकों, करवा चौथ केवल भूखे-प्यासे रहकर खुद को कष्ट देने का पर्व नहीं है, बल्कि यह दो आत्माओं के बीच बराबरी, त्याग, अटूट विश्वास और एक-दूसरे के स्वास्थ्य व जीवन की परवाह करने का महापर्व है। क्या आज के समय में भी हमें परंपराओं को भय की दृष्टि से देखना चाहिए, या फिर कबीर और अवनी की तरह समझदारी और सच्चे प्रेम से रिश्तों को सींचना चाहिए? इस बारे में आपकी क्या राय है? अपनी भावनाएं और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

 मूल लेखिका : कुमुद मोहन

error: Content is protected !!