वकील के भेजे हुए उस भारी-भरकम लीगल लिफाफे को हाथ में थामे मालती के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही आंखों में आंसुओं की नमी। छब्बीस पन्नों के उस कानूनी मसौदे पर अंग्रेजी के बेजान अक्षरों में वैवाहिक अलगाव, भरण-पोषण और चल-अचल संपत्ति के अधिकारों की लंबी-चौड़ी दलीलें दर्ज थीं। जिंदगी के इक्यावनवें पड़ाव पर आकर जब औरत के बाल चांदी जैसे उजले होने लगते हैं और जिस्म जिम्मेदारियों के बोझ तले झुकने लगता है, तब अदालती नोटिस अक्सर रूह को कंपा देते हैं। पर मालती भीतर से चट्टान की तरह स्थिर थी। उसने अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी उम्मीदें और अपनी पहचान इसी एक मकान की दीवारों को घर बनाने में खपा दी थी। अब जब खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं था, तो डर किस बात का?
मालती की नजरें कमरे की खिड़की से बाहर आंगन में खड़े उस पुराने पारिजात के पेड़ पर जा टिकीं। यादों का एक घना बवंडर उसे करीब सत्ताईस साल पीछे खींच ले गया। जब वह इस हवेलीनुमा मकान में दुल्हन बनकर आई थी, तो पूरे कस्बे में चर्चा थी कि मालती के भाग्य खुल गए। ससुराल में रईसी का आलम यह था कि कदम-कदम पर नौकर-चाकर हाजिर रहते। खानदानी सर्राफा, संगमरमर का फर्श, चमचमाती गाड़ियां और इकलौते वारिस की पत्नी होने का रुतबा। दो बड़ी ननदें पहले ही अपने अमीर ससुराल जा चुकी थीं और सास-ससुर अपनी धार्मिक यात्राओं और सामाजिक दिखावे में मग्न रहते थे। नई-नवेली दुल्हन के तौर पर मालती की खिदमत में पूरा घर लगा रहता था। पर उस ठाठ-बाट के बीच भी मालती के अंतर्मन में एक अजीब-सी खालीपन की गूंज सुनाई देती थी।
विवाह से पहले उसके पिता से कहा गया था कि लड़का यानी जयंत आर्किटेक्ट है, बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स संभालता है और खानदानी कंस्ट्रक्शन फर्म का सर्वेसर्वा है। ब्याह के कुछ ही हफ्तों बाद जब मालती ने अलमारी की सफाई करते हुए जयंत के कागजातों की फाइल देखी, तो वह हैरान रह गई। फाइल में डिग्रियों और प्रशस्ति पत्रों का ढेर था, पर जब मालती ने उन संस्थाओं और डिग्रियों के बारे में बारीकी से जानने की कोशिश की, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वे तमाम डिग्रियां और प्रमाण-पत्र पैसों के बल पर खरीदे गए खोखले कागजी टुकड़े थे। जयंत को न तो नक्शे की समझ थी और न ही निर्माण कार्य की कोई जानकारी। जब उसने हिम्मत जुटाकर जयंत से पूछा, तो जयंत ने बेपरवाही से हंसते हुए कहा था कि आज के जमाने में हुनर से ज्यादा पैसा बोलता है। पिता के पास इतनी जायदाद है कि सात पुश्तें बैठकर खाएंगी, तो उसे धूप और धूल में जाकर काम करने की क्या जरूरत है?
मालती ने उस वक्त कड़वा घूंट पी लिया। उसने सोचा कि चलो, अगर नौकरी या आर्किटेक्चर नहीं भी करना, तो पुश्तैनी फर्म और दफ्तर तो है ही, वहीं जाकर बैठें। पर जयंत का मिजाज ही अलग था। सुबह दस बजे सोकर उठना, सज-धजकर तैयार होना और फिर दिनभर घर में बैठकर मालती के इर्द-गिर्द मंडराते रहना। मालती जब भी उससे काम पर जाने को कहती, वह उसके करीब आकर मुस्कुराते हुए कहता कि तुम इतनी हसीन हो कि तुम्हें छोड़कर बाहर जाने का दिल ही नहीं करता। तुम्हारी इस खूबसूरती के सामने दुनिया के सारे काम बेमानी लगते हैं। शुरुआत में यह बातें किसी भी युवती को लुभावनी लग सकती थीं, पर मालती समझती थी कि यह प्रेम नहीं, बल्कि निकम्मेपन को छिपाने का ढोंग था।
जब मालती टोकती कि सिर्फ बातों से घर नहीं चलते, कल को हमारे बच्चे होंगे, जिम्मेदारियां बढ़ेंगी, तो जयंत झुंझलाकर जवाब देता कि पिताजी की तिजोरियां भरी हैं, शहर में दुकानें किराये पर हैं, फिर कमाने की चिंता क्यों? रखे हुए पैसों पर कब तक घमंड करोगे, इस सवाल का जयंत के पास कभी कोई सीधा जवाब नहीं होता था। वह बात टालकर दोस्तों के साथ क्लब या सैर-सपाटे पर निकल जाता।
समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। दोनों बेटियां—अनन्या और अवनी—बड़ी होने लगीं। उनकी पढ़ाई, स्कूल की फीस और समाज में उठने-बैठने के खर्च आसमान छूने लगे। इसी बीच एक साल के भीतर सास और ससुर दोनों का साया सिर से उठ गया। जयंत पर अचानक परिवार का मुखिया होने का भार आ पड़ा, पर जिसके स्वभाव में सिर्फ ऐश-ओ-आराम लिखा हो, वह जिम्मेदारी का बोझ कैसे उठाता? पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे बिकने लगी। किराये की दुकानें मुकदमों में फंसकर हाथ से निकल गईं और बैंक बैलेंस बर्फ की तरह पिघल गया।
घर के बिगड़ते आर्थिक हालात देखकर मालती ने अपने बलबूते पर कुछ करने की ठानी। उसने अपने पुराने हुनर यानी बुटीक और सिलाई-कढ़ाई के काम को छोटे स्तर पर शुरू किया। दिन-रात मशीन चलाकर, आंखों की रोशनी कमजोर करके उसने बेटियों की इंजीनियरिंग और एमबीए की फीस भरी। दूसरी तरफ जयंत की दिनचर्या में रत्ती भर बदलाव नहीं आया। वह अब भी वही महंगे कपड़े पहनता, दोस्तों के साथ पार्टियां करता और घर में बैठकर हुक्म चलाता।
जब उम्र के चौथे दशक में मालती के चेहरे पर झुर्रियां उभरने लगीं, उसके हाथ सिलाई के काम से खुरदुरे हो गए और उसकी चाल में थकान झलकने लगी, तो जयंत की आंखों से वह तथाकथित ‘प्रेम’ भी गायब हो गया जिसकी दुहाई देकर उसने जवानी में काम पर जाना छोड़ दिया था। अब जयंत को मालती के चेहरे में कोई आकर्षण नहीं दिखता था। वह बाहर की चकाचौंध में, अपने से आधी उम्र की औरतों और क्लब की महफिलों में नए ठिकाने तलाशने लगा। मोहल्ले और रिश्तेदारों में जयंत के इन नए किस्सों की कानाफूसी जब मालती के कानों तक पहुंची, तो उसका कलेजा छलनी हो गया।
जब मालती ने इस खुलेआम बदचलनी पर आपत्ति जताई, तो जयंत आगबबूला हो गया। घर में रोज-रोज के झगड़े, चीख-पुकार और बदसलूकी आम बात हो गई। एक दिन जब दोनों बेटियों की शादियां अच्छी जगह तय हो गईं और वे अपने पैरों पर खड़ी होकर अपनी दुनिया बसाने की तैयारी में थीं, जयंत ने अपनी बेशर्मी की पराकाष्ठा पार कर दी। उसने अपनी नई प्रेमिका के साथ नई जिंदगी शुरू करने की खातिर मालती के सामने तलाक की मांग रख दी। उसने ताना मारते हुए कहा कि अब तुम्हारे साथ रहने का कोई मतलब नहीं है, तुम बूढ़ी और चिड़चिड़ी हो चुकी हो, तुम्हें जो हर्जाना चाहिए मैं अदालत के जरिए दिला दूंगा, बस मुझे आजाद कर दो।
उस दिन मालती ने अपनी दोनों बेटियों के चेहरों को देखा। वे मां के साथ खड़ी थीं। बेटियों ने साफ कहा कि मां, तुमने पूरी जिंदगी सिर्फ इसलिए इस नरक को सहा ताकि हमारी परवरिश न बिगड़े। अब हम अपने पैरों पर हैं, तुम्हें इस अपमानजनक समझौते को ढोने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। बेटियों की इस हिम्मत ने मालती के भीतर वर्षों से सुलग रही राख को शोला बना दिया।
जब वकील के भेजे हुए कागजात लेकर जयंत इतराते हुए कमरे में दाखिल हुआ और बोला कि साइन कर दो और आजादी की कीमत बताओ, तो मालती अपनी जगह से उठी। उसने उस फाइल को हाथ में लिया और सीधे जयंत की आंखों में देखा। उसकी आंखों में कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक ऐसी चमक थी जिससे जयंत की नजरें झुकने लगीं।
मालती ने बेहद शांत, गंभीर और खनकती आवाज में कहा कि जयंत, तुमने अदालत से मेरे लिए गुजारा भत्ता तय करवाया है? तुम इस बेजान कागज पर लिखकर मुझे आजाद करना चाहते हो? मुझे तुम्हारी किसी दौलत, किसी हर्जाने की भीख नहीं चाहिए। मैं इस कागज पर दस्तखत करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं, पर मेरी एक शर्त है। मुझे मेरी वह उम्र, मेरी वह जवानी और मेरा वह यौवन लौटा दो जो सत्ताईस साल पहले मैंने इस दहलीज पर लाकर तुम्हारे कदमों में रख दिया था। लौटा सकते हो मेरे वे सुनहरे साल? लौटा सकते हो मेरे वे बेदाग सपने, जो मैंने एक आलसी और झूठे इंसान के भरोसे छोड़ दिए थे? क्या तुम्हारी किसी अदालत या दौलत में इतनी ताकत है कि मेरे बालों की सफेदी और मेरे माथे की इन झुर्रियों को मिटाकर मुझे वही उन्नीस साल की हंसती-खिलखिलाती मालती बना दे?
जयंत सन्न रह गया। उसके पास मालती के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मालती ने उन कागजों को मेज पर पटका और आगे कहा कि तलाक का कागज थमा देना बहुत आसान होता है जयंत, पर किसी औरत की पूरी उम्र का हिसाब चुकाना नामुमकिन है। तुमने समझा था कि मैं इस उम्र में लाचार होकर तुम्हारे पैरों में गिरूंगी? नहीं। मैं यह कागजात स्वीकार करती हूं, पर हर्जाने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे इस सड़ चुके वजूद से हमेशा के लिए मुक्त होने के लिए।
मालती ने उसी क्षण अपनी अलमारी से अपना जरूरी सामान बांधा। उसकी बेटियों ने पहले ही शहर के बाहरी इलाके में उसके लिए एक खूबसूरत, हवादार फ्लैट की व्यवस्था कर दी थी, जहां धूप और हवा का खुला बसेरा था। मालती ने उस हवेली को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
अगले कुछ वर्षों में मालती ने अपनी जिंदगी का नया अध्याय शुरू किया। बेटियों के सहयोग और अपने बरसों के अनुभव के बल पर उसने ‘उत्थान’ नाम से एक छोटा-सा टेक्सटाइल और हैंडीक्राफ्ट सेंटर खोला। वहां उसने अपने जैसी कई बेसहारा, परित्यक्त और जरूरतमंद महिलाओं को जोड़कर उन्हें सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का प्रशिक्षण देना शुरू किया। देखते ही देखते उसका काम चल निकला। मालती अब किसी की दया की मोहताज नहीं थी। उसके चेहरे पर अब मजबूरी की झुर्रियां नहीं, बल्कि स्वाभिमान का तेज था। शाम को जब वह अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्की लेती, तो उसे महसूस होता कि जिंदगी का सबसे खूबसूरत पड़ाव तो अब आया है, जहां कोई झूठ नहीं, कोई छल नहीं और कोई बेपरवाह साथी नहीं है। उसने साबित कर दिया कि उम्र का कोई भी पड़ाव नए सिरे से जीने की शुरुआत बन सकता है।
एक स्त्री अपने जीवनसाथी को सिर्फ अपना वर्तमान नहीं, बल्कि अपना पूरा भविष्य और अपनी खिलती हुई जवानी सौंपती है। जब कोई पुरुष उस समर्पण की कीमत को भूलकर उम्र के ढलने पर उसे बेमानी समझने लगता है, तो वह केवल एक रिश्ता नहीं तोड़ता, बल्कि इंसानियत के विश्वास को कुचल देता है। क्या किसी इंसान के पास उस जवानी और उम्र का कोई मोल है जो किसी के झूठे वादों की भेंट चढ़ गई? अपनी राय हमें जरूर बताएं।
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