परिष्कृत सोच

     निर्मला को चक्कर आ रहे थे, वह निढाल सी कुर्सी पर बैठ गई | तौलिये से पसीना पोछा ,और राकेश से बोली ‘जरा पंखे का बटन दबा दो,घबराहट हो रही है |’ निर्मला की उम्र ६० साल की थी, उसे ब्लड प्रेशर की शिकायत थी, अस्थमा भी था | राकेश ने पंखा चालू किया, और बोला – ‘तुमने दवा ली या नहीं’ ‘दवा तो ले ली, मगर, पता नहीं क्यों चक्कर आ रहे हैं’ राकेश को अपनी पत्नी के स्वास्थ की चिन्ता तो थी, मगर इससे भी ज्यादा चिन्ता इस बात की थी कि माँ- पापा का टिफिन कैसे तैयार होगा |

              एक ही शहर में राकेश के माँ-पापा उनके पुश्तैनी मकान में रहते थे | उनकी जिद थी, वे अपना मकान छोड़ना नहीं चाहते थे | राकेश की जिस कम्पनी में नौकरी थी, वह घर से १० किलोमीटर दूर थी | उसे कम्पनी की तरफ से सर्व सुविधा युक्त क्वार्टर मिला हुआ था | वह चाहता था कि माँ- पापा उसके साथ रहै | वह इकलौता बेटा था, एक बहिन थी श्वेता जिसकी शादी हो गई थी, और वह अपने पति के साथ विदेश में ही बस गई थी | तीन साल में एक बार आती थी। इस वर्ष आने वाली थी | राकेश कम्पनी में उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त था , उसे समय-समय पर जाकर कम्पनी की स्थिति को सम्हालना पड़ता था | क्वार्टर में रहना उसकी मजबूरी थी ,इसलिए वह और निर्मला इस क्वार्टर में रहने के लिए आ गए थे |         

राकेश के घर में नौकर -चाकर थे, खाना बनाने वाली भी आती थी | मगर माँ- पापा को तो बहू के ही हाथ का बना खाना, खाना था | वे राकेश से कहते -‘क्या इस दिन के लिए तुम्हें बड़ा किया कि हम नौकर -चाकर के हाथ की रोटी खाए |’ राकेश को इस बात का एहसास था , कि उसके माँ-पापा ने उसे बड़े लाड़ प्यार से पाला है , वह उनका मन दु:खाना नहीं चाहता था | निर्मला ने भी कभी किसी काम में कोई कमी नहीं की | वह भी अपने स्वास्थ से लाचार थी, फिर भी दोनो समय उनका भोजन बनाकर भेजती थी, उसके हाथ का भोजन उन्हें पसन्द भी बहुत था | सास की उम्र ८० साल की थी और ससुर की ८५ साल की | दोनों पुराण पंथी विचार धारा के थे |

निर्मला ने घड़ी की ओर देखा १० बजकर ३० मिनिट हो गए थे | उसने सोचा, ‘माँ पापा के भोजन का समय हो रहा है, उठकर कुछ बना दूँ,’  मगर वह उठ नहीं पाई | उसकी साँसे बहुत तेज चल रही थी | राकेश ने उसे सहारा दे कर पलंग पर लिटा दिया, कहॉ- ‘तुम आराम करो, मैं कुछ बनाता हूँ |’ वह रसोई में गया, उसे ठीक से कुछ बनाना नहीं आता था | जैसे- तैसे उसने सब्जी काटी और कढ़ाई को गैस पर रखा |तभी दरवाजे पर घंटी बजी,उसने जाकर दरवाजा खोला तो देखा ,कि सामने उसकी बहिन श्वेता खड़ी है, उसने गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहिन रखा था | राकेश ने आगे बड़कर उसे गले से लगा लिया , बोला- ‘कब आई श्वेता ? तुझे देखने के लिए आँखे तरस जाती है | अचानक कैसे आना हुआ ? तूने मुझे आश्चर्य चकित कर दिया |’

‘ अब सब यहीं पूछोगे ? मुझे अन्दर आने दोगे या नहीं ?’ श्वेता ने आवाज लगाई ‘भाभी….मेंरी प्यारी भाभी..कहाँ हो तुम? ‘

अन्दर आकर निर्मला की ऐसी हालत देख कर उसे बहुत दु:ख हुआ, वह बोली-‘यह क्या भैया, क्या हाल बना रखा है भाभी का, इन्हें डॉक्टर को दिखाओ |’  ‘डॉक्टर आता ही होगा , मैंने उसे फोन लगा दिया है |’ श्वेता उसके भाई के साथ-साथ रसोई में गई, उसने पूछा- ‘भैया यह क्या कर रहै हो ?’ ‘माँ पापा के लिए ,खाना बनाने की कोशीश कर रहा हूँ | आज निर्मला से उठा नहीं जा रहा है |’  ‘माँ पापा की चिन्ता मत करो, मैं उन्हें खाना खिला कर आई हूँ | आप जल्दी से भाभी को डॉक्टर को दिखा दो |’ श्वेता की सहानुभुति से निर्मला को बहुत राहत मिली , उसने श्वेता का हाथ कसकर थाम लिया | श्वेता बोली -‘आप चिन्ता न करें सब ठीक हो जाएगा |’

डॉक्टर शर्मा आ गए थे, उन्होंने निर्मला का ब्लड प्रेशर चेक किया, बुखार नापा | निर्मला को तेज बुखार था, ब्लड प्रेशर भी बड़ा हुआ था | डॉक्टर ने दवाईयाँ दी, इन्जेक्शन लगाया और कहॉ- ‘ इन्हें आराम करने दो, मैं कल फिर देखने आऊँगा | ‘

राकेश डॉक्टर को बाहर तक छोड़ने गया | राकेश की कम्पनी में , कम्पनी वालो के लिए डॉक्टर की भी व्यवस्था थी, ताकि तुरन्त चिकित्सा मिल सके|

११ बजकर ३० मिनिट हो गए थे, कमला आ गई थी, वह इस समय दोनों का खाना बनाती थी | राकेश ने कहॉ- ‘ कमला सबसे पहले चाय पिला दो, थकान लग रही है, फिर खाना बनाना |’

‘जी बाबूजी ‘ फिर पूछा -‘ आज दीदी आई है क्या ?’ ‘हाँ मेंरी बहिन आई है | देखो ! है ना कितनी प्यारी ?’ कमला ने झुककर नमस्कार किया ,और बोली -‘दीदी, बाबूजी और मेम साहब आपको रोज याद करते हैं |’सच भैया ?’ कमला चाय बनाने के लिए चली गई थी | निर्मला को दवाई से राहत मिली तो उसे नींद आ गई | कमला चाय लेकर आई दोनों भाई -बहिन ने चाय पी |इधर – उधर की सारी बातें की | अपनी पुरानी यादें ताजा करते रहै | शाम को राकेश ने श्वेता को माँ पापा के पास छोड़ दिया |

श्वेता के घर आने पर माँ ने कहॉ- ‘ बेटी, आज तू आ गई तो खाना जल्दी मिल गया | रोज १२ बजे से पहले खाना आता ही नहीं |’ श्वेता अपने भाई- भाभी को जानती थी, और  माँ पापा के पुराण पंथी विचारों को भी | उसे माँ का कहना अच्छा नहीं लग रहा था, मगर वह चुप रही | वह चाह रही थी कि माँ एक बार में अपनी सारी भड़ास निकाल दे | माँ ने कहॉ- ‘पता नहीं क्या करती है महारानी, सब काम नौकर -चाकर करते हैं , फिर भी खाना कभी १२ बजे के पहले नहीं आता | क्या बहू का धरम है,? ७ बजे उठती है महारानी | राकेश को उस क्वार्टर में रहना जरूरी है, वह तो यहाँ रह सकती है | मगर उसे तो आराम करने को चाहिये | हर समय बिमारी का बहाना बनाती है, उसे हमारी क्या चिन्ता , वह तो मस्त है |’ ‘बस माँ, या और भी कुछ कहना है ?’ कोई दूसरी बात नहीं करोगी ? अपनी बेटी से ,उसके हाल चाल भी नहीं पूछोगी ?’माँ को याद आया कि उसने श्वेता से, उसके और उसके परिवार के बारे में तो कुछ पूछा ही नहीं | उसने पूछा- ‘ बेटा जमाई जी कैसे हैं ? सब ठीक है ना, तेरी सास तुझे ज्यादा परेशान तो नहीं करती ? ज्यादा काम मत करना, अपने स्वास्थ का ध्यान रखना |’

कुछ सोचकर श्वेता को हॅंसी आ गई, फिर बोली -‘ ठीक है माँ |’ श्वेता अपनी माँ को जीवन की सच्चाई से अवगत कराना चाहती थी | उसने पूछा- ‘माँ गौरव की शादी का एलबम होगा ना, कहाँ रखा है ?’गौरव श्वेता का भतीजा था, जिसकी शादी अभी ३ साल पहले हुई थी |’तूने देखा नहीं अभी तक ?’  ‘नहीं माँ , मैं कहाँ आ पाई उसकी शादी के बाद |’ माँ की इच्छा हुई एलबम को फिर से देखने की, उनके लाड़ले पोते की शादी का एलबम जो था | उन्होंने कहॉ- ‘मेंरी आलमारी के बीच वाले ड्राज में रखा है,जा ले कर आजा |’

श्वेता एलबम लेकर आई, साथ में भैया -भाभी की शादी का एलबम भी था | माँ ने कहॉ- ‘इसे क्यों लाई ?’  ‘इसे भी देखने की इच्छा है माँ |’ गौरव की शादी का एलबम देखा, सारे रीति रिवाज के फोटो देखे, माँ बहुत खुश थी |श्वेता ने कहॉ- ‘ माँ, यह फोटो देखो कितना सुन्दर है, इसमें अपना पूरा परिवार है |माँ-पापा, चाचा-चाची,भैया-भाभी,मैं, तुम्हारे जमाई, गौरव – सीमा ,कितना अच्छा लग रहा है |’ माँ के मन की खटास अभी गई नहीं थी | ‘हाँ बहुत. सुन्दर है , तेरी भाभी सास बन गई है , देख ! कैसी इतरा रही है |’श्वेता कुछ भी नहीं बोली |

भैया- भाभी की शादी की एलबम देखी, एलबम में अपनी फोटो देखकर माँ बहुत खुश हुई | शादी के समय उनकी उम्र ४२ साल की थी, चेहरे पर कोई झुर्री नहीं थी, बाल लम्बे और काले थे, सुन्दर दिख रही थी | एक पल के लिए उन्हें अपनी सुन्दरता पर गुमान हुआ बोली – ‘देख , मेंरे बेटे की शादी में मेंरी फोटो ,और निर्मला की फोटो देख, उसके बेटे की शादी में | कौन अच्छा दिख रहा है ?’  ‘माँ! आपकी फोटो अच्छी है, मगर इसका कारण है | माँ भैया की शादी के समय ,आपकी उम्र ४२ की थी | और गौरव की शादी के समय भाभी की उम्र ५४ साल की | आपकी उम्र चढ़ाव पर थी, और भाभी की ढलान पर | माँ, आप ४२ साल की थी ,तभी से भाभी आपके साथ हैं | भाभी ने आने के बाद क्या आपको कोई कार्य करने दिया ? नहीं ना, वे मायके भी कम जाती थी , उन्हें आपकी चिन्ता रहती थी | आपको याद है जब आपको हार्ट अटैक आया था, भाभी ने आपकी कितनी सेवा की थी | माँ, भाभी ने परिवार के प्रति अपने पूरे फर्ज निभाए हैं | वे अभी २ साल से ही भैया केसाथ गई हैं ,और आपको शिकायत होने लगी | गौरव की शादी के तो ६ महीने बाद ही,आपने सीमा को उसके साथ पूना भेज दिया था, कि गौरव को खाने पीने की परेशानी पड़ेगी, यह बच्चों के खाने पीने की उम्र है | फिर माँ भाभी भैया के साथ है, तो आपको परेशानी क्यों ? माँ वे बहू है,मगर उम्र तो उनकी भी बड़ रही है ना? आज वे ५८ साल की हैं, गौरव उन्हें पूना बुला रहा है, मगर वो आपके कारण नहीं जा रही, कहती हैं -‘”माँ पापा का खाना कौन बनाएगा |” माँ आपने कभी भाभी को समझने की कोशीश ही नहीं की | आज जब मैं गई , वे बुखार में तप रही थी, ब्लड प्रेशर बड़ा हुआ था, मगर उन्हें आपके भोजन की चिन्ता थी | आज अगर भाभी को कुछ हो जाए तो उनकी चिन्ता करने वाला कौन है ? उनकी तबियत ठीक नहीं रहती, इसलिए भैया ने खाना बनाने वाली रखी है | आपका भोजन वे, अपने हाथों से बनाती है | क्या इसमें आपको उनका प्यार नजर नहीं आता ? क्या वे खाना ठीक से बनाकर नहीं पहुँचाती ? भाभी के प्रति आपके मन में इतनी कड़ुआहट क्यों है माँ ?’

‘नहीं बेटा, निर्मला ने हमेशा हमारी पसन्द का खाना बनाकर पहुँचाया है, हमें उससे कोई शिकायत नहीं है | इसलिए तो हम उसके हाथ का बना खाना मंगवाते हैं |’ माँ के ऊपर श्वेता की बातों का असर हो रहा था, उनकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी ,कि वे श्वेता से नजरें मिलाने की | उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था | वे बोली – ‘ बेटा, तूने आज हमारी आँखे खोल दी, अब मैं स्वयं खाना बनाऊंगी |’ ‘ माँ आप फिर गलती कर रही हैं ,मेंरा यह मतलब नहीं है ,आपकी उम्र नहीं है खाना बनाने की |’

‘फिर क्या करूं मैं ? बेटा इस उम्र में यह घर छोड़ने का मन नहीं है | कुछ दिनों बाद , तू भी चली जाएगी |’ माँ के स्वर में तरलता थी | ‘ माँ तुम  बिल्कुल चिन्ता मत करो, मैं सारी व्यवस्था करके जाऊंगी | बस अपनी सोच को थोड़ा बदल दो | सही दिशा में सोचो |’

तभी फोन की घंटी बजी, श्वेता ने फोन उठाया | राकेश का फोन था – ‘श्वेता तेरी भाभी की तबियत खराब हो गई है, उसे अस्पताल में भर्ती किया है |

‘कहाँ  ? किस अस्पताल में,? ठीक है, आप चिन्ता न करें , मैं अभी आती हूँ |’पापा ने कहॉ- ‘ क्या बात है बेटा ?’

श्वेता ने कहॉ- ‘भाभी को अस्पताल में भर्ती किया है, उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई है | मैं अस्पताल जा रही हूँ |’

‘बेटा , हम भी तेरे साथ चलेंगे | बहू को हमारी जरूरत है |’ श्वेता ने कहॉ- ‘ ठीक है, आप भी चलो |’

वे अस्पताल गए, निर्मला को I. C. U. में भर्ती किया था, उसे साँस लेने में परेशानी हो रही थी, सर्दी के कारण गले में कफ जमा हो गया था, और शरीर में सोडियम की कमी हो गई थी | वह बेहोश थी |

बहू की ऐसी हालत देखकर ,शारदा जी की आँखे सजल हो गई | हरपल ,बहू में कमियाँ ढूँढने वाली शारदा जी को ,आज उसके गुणों का एहसास हो रहा था | एक पल के लिए वह डर गई, मन में विचार आया , अगर बहू को कुछ हो गया तो…..| नहीं- नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा ,उसने मन को समझाया | उसने बहू के लिए ईश्वर से प्रार्थना की |

१२ घंटे में निर्मला को होश आया , उसे दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया गया | अपने आस-पास पूरे परिवार को देख, निर्मला बहुत खुश थी | सास ने उसके सिर पर हाथ रखा तो वह सारा दर्द भूल गई |

दूसरे दिन निर्मला की अस्पताल से छुट्टी हो गई | सब क्वार्टर में आए | राकेश सोच रहा था, माँ पापा के खाने का क्या करें | माँ ने उलझन को समझा और कहॉ- ‘ तू परेशान मत हो, कमला आएगी ना, खाना बनाने , हम सब वही खाएंगे | बस बहू जल्दी अच्छी हो जाए |’ आठ दिन सब एक साथ रहै | निर्मला का स्वास्थ अब ठीक था | माँ ने कहॉ- ‘बेटा, हम उस घर जाना चाहते हैं |यहाँ आते रहेंगे, तुम भी आना |’ श्वेता और माँ पापा पुराने मकान में चले गए |

श्वेता ने एक काम वाली बाई लगा दी थी | वह सुबह ८ बजे आती और शाम को ८ बजे चली जाती | वह माँ पापा का भोजन ,नाश्ता ,चाय सब बनाती, घर के छोटे बड़े सभी कार्य करती | माँ पापा की पसन्द का खाना बनाना श्वेता ने उसे सिखा दिया था |श्वेता के जाने का समय आ गया था | निर्मला ने उसके पसन्द की मिठाई और नमकीन बनाया और उसे लेकर माँ पापा के यहाँ आई | हमेशा की आदत के अनुसार वह चाय पानी के लिए, रसोई में जाने लगी , तो सास ने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया , और प्यार से कहॉ – ‘कब तक करती रहेगी, तुझे भी तो आराम की आवश्यकता है |बस बैठ, मुझसे बातें कर |’ तभी रोमा पानी के गिलास लेकर आई, चाय नाश्ता लाई | निर्मला को सब कुछ एक सुखद सपने की तरह लग रहा था | सब खुश थे |एक परिवर्तन नजर आ रहा था , और यह परिवर्तनआया था, श्वेता की परिष्कृत सोच के कारण, जिसने माँ पापा को सोच की नई दिशा दी और सब ठीक हो गया |

प्रेषक

पुष्पा जोशी (इन्दौर)

स्वरचित, मौलिक

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