सिंदूरी उम्मीद की वापसी

अवंतिका को अपनी ओर देखते पाकर समर की आंखें झुक गईं। एक वीर सिपाही, जो दुश्मनों के सामने कभी नहीं झुका, आज अपनी पत्नी के सामने हीनभावना और अपराधबोध से गड़ गया। उसके कांपते होठों से सिर्फ इतना निकला, “अवंतिका… मैं पूरा नहीं लौट सका। मैं आधा होकर लौटा हूँ। मुझे कई महीनों तक दुश्मन की सीमा के पास गुप्त शिविर में बंदी बनाकर रखा गया, फिर अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग… जब होश आया तो शरीर ऐसा हो चुका था। सोचा था तुम्हें इस अधूरे इंसान का बोझ क्यों दूं, लेकिन… तुम्हारा इंतजार मुझे खींच लाया। अगर तुम मुझे इस हाल में स्वीकार न कर सको, तो मैं लौट जाऊंगा…”

पहाड़ों की ढलानों पर बसे उस छोटे से कस्बे में शाम बड़ी तेजी से ढलती थी। चीड़ और देवदार के पेड़ों से छनकर आती सर्द हवाएं जब खिड़कियों के कांच से टकरातीं, तो एक अजीब सी सीटी जैसी आवाज गूंजती। उस पुराने लकड़ी के मकान की ऊपरी मंजिल पर बनी खिड़की के पास बैठी अवंतिका शॉल को अपने कंधों पर और कसते हुए धुंधली होती पगडंडी को निहार रही थी।

पूरे चार साल बीत चुके थे। बारह सौ से अधिक दिन, अनगिनत रातें और हर पल में सांस लेती केवल एक उम्मीद। चार साल पहले जब कारगिल की दुर्गम बर्फीली चोटियों पर घुसपैठ की खबर आई थी, तब मेजर समरजीत सिंह को अचानक अपनी बटालियन के साथ रवाना होना पड़ा था। वह दिन अवंतिका के जेहन में आज भी शीशे की तरह साफ था। हाथों में सजी मेहंदी का रंग अभी पूरी तरह उतरा भी नहीं था, शादी को मुश्किल से छह महीने ही बीते थे। समर ने सामान बांधते हुए जब उसके कांपते हाथों को थामा था, तो उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि तिरंगे की हिफाजत का एक शांत, अटूट संकल्प था।

“देश पहले है अवंतिका, यह वर्दी सिर्फ एक लिबास नहीं, मेरा ईमान है,” समर ने कहा था। अवंतिका ने रोते हुए उसका हाथ पकड़ना चाहा था, मगर देश की पुकार उस विवश प्रेम से कहीं अधिक भारी थी। जाते-जाते समर ने पलटकर एक बार देखा था। बिना कुछ कहे उसकी आँखों ने जैसे वादा किया था—’मैं लौटूंगा, तुम्हारा इंतजार खाली नहीं जाएगा।’

लेकिन डेढ़ साल बाद ही वह मनहूस खबर आई जिसने घर के आंगन की रौनक छीन ली। बर्फीले तूफान और भीषण गोलीबारी के बाद मेजर समरजीत सिंह की टुकड़ी का संपर्क टूट गया था। कई दिनों की खोज के बाद सेना ने उन्हें ‘लापता और मृत मान लिए गए’ की सूची में डाल दिया। समर के बूढ़े माता-पिता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रिश्तेदारों ने सांत्वना दी, कुछ ने अवंतिका को मायके लौट जाने और नई जिंदगी शुरू करने की सलाह दी। सफेद चादर ओढ़ाने की जल्दी में समाज भूल गया कि प्रेम केवल देह की मौजूदगी का नाम नहीं है।

अवंतिका ने कभी अपनी कलाई की लाल चूड़ियां नहीं तोड़ीं, न ही मांग का सिंदूर पोंछा। जब भी कोई उसे समझाता, वह दीवार पर टंगी समर की वर्दी वाली मुस्कुराती तस्वीर की ओर देखकर केवल इतना कहती, “वह वादा करके गए थे। जिस सिपाही ने कभी देश से गद्दारी नहीं की, वह अपनी मोहब्बत से किया वादा कैसे तोड़ सकता है? मेरा मन कहता है, वह सांस ले रहे हैं।”

ससुराल में मां जी अक्सर घुटनों के दर्द से परेशान रहतीं और बाबूजी खामोश होकर बस समर के पदकों को साफ किया करते। अवंतिका ने रोने में वक्त गंवाने के बजाय समर के परिवार को अपनी ताकत बना लिया। वह कस्बे के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने लगी, ताकि घर का खर्च भी चले और उसका ध्यान भी बंटा रहे। स्कूल से लौटकर वह मां जी की सेवा करती, बाबूजी को दवाएं देती और शाम ढलते ही बैठक की खिड़की पर एक तेल का दीया जलाकर रख देती। यह दीया केवल रोशनी नहीं था, यह उस पगडंडी के लिए एक पैगाम था कि मुसाफिर का घर अभी भी उसका इंतजार कर रहा है।

आज करवा चौथ की रात थी। आसमान में बादलों का पहरा था और हवा में कड़ाके की ठंड। आंगन में अलाव जल रहा था, जिसकी लाल लपटें दीवार पर अजीब से साए बना रही थीं। मां जी ने धीरे से आकर अवंतिका के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आंखों में बेबसी थी। “बिटिया, कब तक खुद को इस आग में तपाओगी? चार साल बहुत होते हैं। समर का फर्ज पूरा हो गया, लेकिन तुम्हारा जीवन अभी बहुत लंबा है। हमें तुम्हारी फिक्र होती है।”

अवंतिका ने मां जी के झुर्रियों भरे हाथ को अपने गाल से लगाया। उसकी आंखों से एक आंसू ढुलककर बूढ़ी हथेलियों पर गिरा। “मां, अगर समर सचमुच इस दुनिया में नहीं होते, तो मेरी रूह में यह हलचल न होती। जब हवाएं चलती हैं, तो मुझे उनकी खुशबू आती है। जब सीने में दिल धड़कता है, तो लगता है वह कहीं दूर से मुझे पुकार रहे हैं। बस आज की रात और सही… मैं चांद देखकर ही जल ग्रहण करूंगी।”

रात के करीब नौ बज रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि सूखी पत्तियों के गिरने की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। अवंतिका पूजा की थाली सजाकर समर की तस्वीर के सामने बैठी थी। “चार साल हो गए समर… कब तक इस बेजान फ्रेम के पीछे छिपकर मुस्कुराते रहोगे? आज मेरी हिम्मत भी डगमगाने लगी है। क्या तुम्हारा वादा इतना कमजोर था? तस्वीर से बाहर क्यों नहीं आ जाते? बस बहुत हुआ, अब आ भी जाओ…” उसने रुंधे गले से तस्वीर के कांच पर अपना माथा टेक दिया।

ठीक उसी पल, सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज आई—’ठक… ठक… ठक…’

दरवाजे पर खटखटाहट बहुत धीमी थी, जैसे कोई अपनी अंतिम बची हुई ताकत से दस्तक दे रहा हो।

पूरे घर में सन्नाटा खिंच गया। बाबूजी कमरे से बाहर निकल आए, मां जी का हाथ कांपने लगा। इस वक्त, इस बीहड़ पहाड़ी रास्ते पर कौन आ सकता था?

अवंतिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। पांवों में जैसे पंख लग गए हों, वह बिना चप्पल पहने ही मुख्य द्वार की ओर भागी। कुंडी खोलते वक्त उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने गहरी सांस ली और भारी लकड़ी का दरवाजा एक झटके में खींच दिया।

बाहर कोहरे की चादर फैली थी। चौखट पर एक साया खड़ा था।

अवंतिका की नजरें सबसे पहले उस चेहरे पर गईं। वह चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ था, गालों की हड्डियां उभर आई थीं, माथे पर एक गहरा पुराना जख्म था, लेकिन वे आंखें… वे वही भूरी, शांत और गहरी आंखें थीं, जो चार साल पहले उससे वादा करके गई थीं।

जुबान ने साथ छोड़ दिया। आंसुओं का सैलाब पलकों का बांध तोड़कर बह निकला। अवंतिका चीखना चाहती थी, समर का नाम पुकारना चाहती थी, लेकिन गले से केवल एक सिसकी निकली।

तभी उसकी नजरें चेहरे से फिसलकर नीचे की ओर गईं। समर के बाएं पैर की जगह एक स्टील की कृत्रिम टांग थी और दोनों हाथों में बैसाखियां थीं, जिनके सहारे वह बड़ी मुश्किल से अपना संतुलन बनाए हुए था। शरीर का आधा हिस्सा जैसे युद्ध की किसी भीषण त्रासदी की गवाही दे रहा था।

अवंतिका को अपनी ओर देखते पाकर समर की आंखें झुक गईं। एक वीर सिपाही, जो दुश्मनों के सामने कभी नहीं झुका, आज अपनी पत्नी के सामने हीनभावना और अपराधबोध से गड़ गया। उसके कांपते होठों से सिर्फ इतना निकला, “अवंतिका… मैं पूरा नहीं लौट सका। मैं आधा होकर लौटा हूँ। मुझे कई महीनों तक दुश्मन की सीमा के पास गुप्त शिविर में बंदी बनाकर रखा गया, फिर अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग… जब होश आया तो शरीर ऐसा हो चुका था। सोचा था तुम्हें इस अधूरे इंसान का बोझ क्यों दूं, लेकिन… तुम्हारा इंतजार मुझे खींच लाया। अगर तुम मुझे इस हाल में स्वीकार न कर सको, तो मैं लौट जाऊंगा…”

समर के शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि अवंतिका ने आगे बढ़कर उसकी दोनों बैसाखियों को एक तरफ झटक दिया। इससे पहले कि समर का संतुलन बिगड़ता, अवंतिका ने अपनी दोनों बांहें उसके सीने के इर्द-गिर्द लपेट दीं और अपना सिर उसके कंधों पर टिका दिया।

समर चौंक गया, फिर उसकी भी एक चीख आंसुओं में तब्दील हो गई। उसने अपने कांपते मजबूत हाथों से अवंतिका को सीने से भींच लिया।

वहां कोई शिकवा नहीं था, कोई शिकायत नहीं थी। न यह गिला था कि चार साल क्यों लगाए, न यह अफसोस था कि शरीर का एक हिस्सा जंग की भेंट चढ़ चुका था। उस पल में सिर्फ दो धड़कते दिलों की मूक गुफ्तगू थी। प्रेम शरीर की पूर्णता से नहीं, आत्मा के समर्पण से आंका जाता है—यह सच उस ठंडी रात में उस चौखट पर साकार हो रहा था।

बाबूजी और मां जी दरवाजे पर खड़े थे। अपने बेटे को जिंदा देखकर मां जी जमीन पर घुटनों के बल बैठ गईं और ईश्वर का शुक्रिया अदा करने लगीं। बाबूजी ने आगे बढ़कर समर के सिर पर हाथ रखा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।

अवंतिका ने धीरे से अपना चेहरा उठाया, अपने हाथों से समर के आंसुओं को पोंछा और मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने सोचा भी कैसे कि तुम अधूरे हो? तुम मेरे लिए कल भी पूरे थे, आज भी पूरे हो और हमेशा पूरे रहोगे। मेरा सुहाग, मेरा सिंदूर किसी बैसाखी का मोहताज नहीं है। तुम लौट आए, मेरी तपस्या पूरी हो गई।”

अवंतिका ने समर का हाथ थामा और उसे सहारा देकर घर के भीतर ले आई। आंगन में जलता अलाव अब और भी प्रखर हो उठा था। अवंतिका ने समर के हाथों से पानी का घूंट पीकर अपना करवा चौथ का व्रत पूरा किया।

उस रात उस घर ने केवल एक सिपाही का स्वागत नहीं किया था, बल्कि अटूट विश्वास, सच्ची निष्ठा और प्रेम की कभी न हारने वाली भावना का उत्सव मनाया था। समर ने अगले ही दिन से अपने जीवन को एक नया मोड़ देने का फैसला किया। उसने स्थानीय युवाओं को सेना भर्ती की ट्रेनिंग देने और गांव के बच्चों को खेलकूद सिखाने का संकल्प लिया। अवंतिका हर कदम पर उसकी ताकत बनी। जीवन ने फिर से मुस्कुराना सीख लिया था, क्योंकि जहां समर्पण और सच्चाई हो, वहां किसी भी युद्ध का घाव उम्मीद के उजाले को बुझा नहीं सकता।

जीवन में चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, क्या सच्चा प्रेम और अडिग विश्वास वास्तव में किसी भी बाधा को पार कर सकता है? क्या आपने भी कभी किसी के लौटने की ऐसी ही उम्मीद देखी या महसूस की है? अपनी राय और भावनाएं नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे ज़रूर साझा करें।

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