अनुराधा ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आंखों में एक अपूर्व तेज था, “मंदोदरी विवश थी, उसने आगाह ज़रूर किया था पर रोक नहीं सकी। लेकिन मैं आज की स्त्री हूँ। मंदोदरी की लाचारी मेरे हिस्से नहीं आएगी। मुझमें असत्य को असत्य कहने और अन्याय के सामने सीना तानकर खड़े होने की पूरी हिम्मत है। तुम खुद को रावण की तरह सर्वशक्तिमान समझने की भूल कर रहे हो।”
सफेद संगमरमर से तराशी गई उस विशाल कोठी के भीतर पसरा सन्नाटा किसी वीराने से कम नहीं था। शहर के नामी रियल एस्टेट कारोबारी विक्रम सिंघानिया के लिए यह कोठी केवल एक घर नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और रसूख का प्रतीक थी। विक्रम का मानना था कि दुनिया की हर चीज़, हर जज़्बात और हर इंसान की एक कीमत होती है, जिसे चेकबुक पर दस्तखत करके हासिल किया जा सकता है। शादी के बारह बरस बीत जाने के बाद भी उसकी पत्नी अनुराधा उस मकान में एक जीवित आत्मा की तरह सिर्फ सांसें भर रही थी।
अनुराधा एक सुशिक्षित, गंभीर और स्वाभिमानी महिला थी। उसने हमेशा विक्रम के अहंकार और कटु वचनों को इस उम्मीद में सहा कि कभी न कभी उसके पति की चेतना जागेगी। लेकिन दौलत और शोहरत की अंधी दौड़ ने विक्रम को मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर धकेल दिया था।
त्योहार का दिन था। बाहर शहर भर में विजय उत्सव की तैयारियां चल रही थीं, लाउडस्पीकरों पर भजन गूंज रहे थे और लोग बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व मनाने के लिए रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे घूम रहे थे। विक्रम अपने विशाल शयनकक्ष में इत्र छिड़क रहा था। उसकी कलाई पर सजी महंगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। ठीक उसी समय अनुराधा कमरे में दाखिल हुई। उसकी आंखों में आंसुओं की जगह एक सर्द ठहराव था।
“विक्रम, मुझे तुमसे बात करनी है,” अनुराधा की आवाज़ शांत लेकिन दृढ़ थी।
विक्रम ने घड़ी का पट्टा ठीक करते हुए शीशे में देखा, “अनुराधा, तुम जानती हो मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है। आज विजयदशमी है। मुझे शहर के मुख्य आयोजन में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होना है। ग्राउंड पर हजारों लोग मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।”
“वक्त निकालना पड़ेगा विक्रम,” अनुराधा ने आगे बढ़ते हुए कहा। “तुम्हारे नए रिसॉर्ट में जो कुछ चल रहा है, क्या वह तुम्हारी नज़र में कोई फालतू बात है? तुम पल्लवी को अपनी निजी संपत्ति बनाकर वहां कैद रखने की कोशिश कर रहे हो। यह धोखा केवल मेरे साथ नहीं, इंसानियत के साथ भी है।”
विक्रम के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। उसने घमंड से अपनी बाहें फैलाईं, “धोखा? कैसा धोखा? पल्लवी बालिग है। वह उस शांत रिसॉर्ट में अपनी मर्जी से रह रही है। मैं उसे एक आलीशान ज़िंदगी, सुरक्षा और नया मुकाम दे रहा हूँ। तुम्हें इस बात से क्या आपत्ति हो सकती है? तुम अपने इस आलीशान घर में राज करो, नौकरों पर हुक्म चलाओ और मेरे मामलों में दखल देना बंद करो।”
“अपनी मर्जी से?” अनुराधा की आवाज़ में तीखा व्यंग्य उभरा। “पल्लवी के पिता तुम्हारी ही कंपनी में एक साधारण ठेकेदार थे। पिछले महीने उस रहस्यमयी सड़क हादसे में उसके माता-पिता दोनों की जान चली गई। वह लड़की अकेली रह गई, बेसहारा हो गई, कर्ज़ के बोझ तले दब गई। तुमने उसकी लाचारी को सहारा नहीं दिया, बल्कि उस पर अपने एहसानों का जाल बुनकर उसे अपनी जागीर बनाने का सौदा किया है। किसी अनाथ लड़की के आंसुओं का यह सौदा तुम्हें शोभा नहीं देता।”
विक्रम का चेहरा तमतमा उठा। उसने अपनी मुट्ठियां भींच लीं, “अपनी जुबान संभालो! मैं शहर का सबसे ताकतवर आदमी हूँ। कानूनी दांव-पेंच और कागज़ात मेरे इशारों पर काम करते हैं। इतिहास उठाकर देख लो, जब पुरुषों ने फैसले लिए तो समझदार स्त्रियों ने चुपचाप गृहस्थी संभाली। मंदोदरी ने भी तो कभी रावण की ताक़त और उसकी हरकतों पर सवाल नहीं उठाए थे। चुपचाप खड़ी रही थी।”
अनुराधा ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आंखों में एक अपूर्व तेज था, “मंदोदरी विवश थी, उसने आगाह ज़रूर किया था पर रोक नहीं सकी। लेकिन मैं आज की स्त्री हूँ। मंदोदरी की लाचारी मेरे हिस्से नहीं आएगी। मुझमें असत्य को असत्य कहने और अन्याय के सामने सीना तानकर खड़े होने की पूरी हिम्मत है। तुम खुद को रावण की तरह सर्वशक्तिमान समझने की भूल कर रहे हो।”
“मैं मूर्ख नहीं हूँ!” विक्रम गुर्राया। “मेरे पास शहर के सबसे महंगे वकीलों की फौज है। मैं चाहूँ तो तुम्हें एक झटके में तलाक देकर इस घर से बाहर कर सकता हूँ। तुम्हारे पास क्या है? वही किताबों का खोखला ज्ञान और आदर्शों का ढोंग! तुम कुछ नहीं कर सकतीं।”
“तुमने सही कहा, मेरे पास सिर्फ सिद्धांत थे, जिन्हें तुम मेरी दुर्बलता समझते रहे,” अनुराधा ने बिना पलक झपकाए कहा। “लेकिन अब मेरे पास सच और हौसला है। और हां, पल्लवी कोई खिलौना नहीं है। वह अब तुम्हारे उस रिसॉर्ट में नहीं है। वह मेरे पास है।”
विक्रम स्तब्ध रह गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें झलकने लगीं। उसने अविश्वास से पूछा, “क्या मतलब?”
अनुराधा ने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया। बाहर हॉल में पल्लवी खड़ी थी। उसकी आंखों में जो खौफ और बेबसी पहले दिखा करती थी, वह अब मिट चुकी थी। उसके हाथ में एक फाइल थी।
“पल्लवी ने मुझे सब बता दिया है विक्रम,” अनुराधा की आवाज़ अब हथौड़े की तरह बज रही थी। “तुमने उसके पिता के इंश्योरेंस के पैसे दबाने और उन पर कर्ज़ का झूठा दबाव बनाकर उसे उस रिसॉर्ट में रुकने पर विवश किया था। तुमने सोचा था कि एक अनाथ लड़की समाज के डर से मुंह नहीं खोलेगी और तुम्हारी पत्नी बदनामी के डर से घुट-घुट कर मर जाएगी। लेकिन अब हम दोनों एक साथ हैं। पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में तुम्हारी धोखाधड़ी, जबरन बंधक बनाने और ब्लैकमेलिंग की पूरी शिकायत तैयार है।”
विक्रम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव के बूते वह आज रावण दहन के मंच पर मुख्य अतिथि बनने जा रहा था, वह सब एक ही झटके में खाक होता दिख रहा था। अगर मीडिया में यह बात आ गई कि विक्रम सिंघानिया अपनी ही कंपनी के दिवंगत कर्मचारी की बेटी का शोषण कर रहा था, तो उसकी सालों की बनाई साख, उसका कारोबार और उसका राजनीतिक भविष्य मिनटों में धूल धूसरित हो जाएगा।
“तुम… तुम दोनों पागल हो गई हो!” विक्रम हताशा में चीखा, लेकिन उसकी आवाज़ में कंपन साफ महसूस हो रहा था।
“पागल हम नहीं, तुम्हारा अहंकार था,” पल्लवी ने आगे आकर कहा। उसकी आवाज़ में अब थरथराहट नहीं थी। “मैडम ने मुझे यह सिखाया कि डरकर झुकना अन्याय को बढ़ावा देना है। मैं अब डरने वाली नहीं हूँ।”
विक्रम का सारा घमंड पल भर में टूट कर बिखर गया। वह समझ गया कि इस बार अनुराधा सिर्फ चेतावनी नहीं दे रही थी, बल्कि उसके पास हर जुर्म का पुख्ता सबूत था। अदालत, पुलिस और प्रेस के सामने आते ही उसकी सल्तनत ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
विक्रम के घुटने मुड़ गए। वह लड़खड़ाते हुए सोफे पर बैठ गया और उसने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया। कुछ ही देर पहले शेर की तरह दहाड़ने वाला उद्योगपति अब एक बेबस कैदी की तरह नज़र आ रहा था। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “अनुराधा… पल्लवी… रुक जाओ। मेरी बात सुनो। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं दौलत के नशे में अंधा हो गया था। मुझे बर्बाद मत करो। मैं पल्लवी के पिता का पूरा बकाया, इंश्योरेंस का हर पैसा और रिसॉर्ट के सारे कागज़ात अभी उसके नाम करने को तैयार हूँ। मुझे पुलिस और मीडिया के सामने मत घसीटो।”
अनुराधा ने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में न तो बदले की कोई अंधी आग थी और न ही जीत का घमंड; वहां केवल न्याय और गरिमा का भाव था।
अनुराधा ने गंभीर स्वर में कहा, “विक्रम, हमारा मकसद तुम्हें तबाह करना नहीं, बल्कि तुम्हें तुम्हारे अपराध का आईना दिखाना था। तुमने हमेशा रिश्तों और इंसानों को अपनी दौलत से खरीदा समझा। यदि तुम सचमुच अपनी गलती पर शर्मिंदा हो, तो आज दशहरा के पावन दिन अपने भीतर के इस रावण को हमेशा के लिए जला दो। पल्लवी का जो भी हक है, वह सम्मानपूर्वक उसे सौंपा जाएगा। और रही बात हमारी, तो अब से इस घर में झूठ, प्रताड़ना और दिखावे की कोई जगह नहीं होगी। अगर तुम एक इंसान की तरह सम्मान से जीना सीख सकते हो, तभी इस छत के नीचे कोई रिश्ता बचेगा, वरना कानून का दरवाज़ा हमेशा खुला है।”
विक्रम ने हाथ जोड़कर दोनों से क्षमा मांगी। उसकी आंखों से बहते आंसू पहली बार उसके बनावटी मुखौटे को धो रहे थे। उसने तुरंत अपने वकील को फोन मिलाकर पल्लवी के परिवार के सारे कर्ज़ निरस्त करने और उसकी संपत्ति का कानूनी निपटारा उसके पक्ष में करने का निर्देश दिया।
उस शाम जब शहर के मैदान में रावण का विशाल पुतला धू-धू कर जल रहा था, विक्रम सिंघानिया किसी मंच पर भाषण देने नहीं गया था। वह अपने घर के आंगन में सिर झुकाए बैठा था, जहां सालों बाद अहंकार की राख पर पश्चाताप और मर्यादा की एक नई शुरुआत हो रही थी। अनुराधा ने यह सिद्ध कर दिया था कि न्याय के पथ पर चलने वाली एक अकेली स्त्री भी अन्याय के बड़े से बड़े साम्राज्य को झुकाने का सामर्थ्य रखती है।
क्या हमारे समाज में आज भी ताकतवर लोग कमजोरों की मजबूरी का फायदा उठाने से बाज नहीं आते? और जब कोई स्त्री अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो क्या समाज उसे वही संबल देता है जो उसे मिलना चाहिए? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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