समझौतों की धूप-छांव

 सत्यनारायण जी की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने भरे गले से कहा, “यह घर तुम्हारी माँ के कंगन और मेरी उम्र भर की कमाई से बना है समर। मर्यादा और संस्कारों से समझौता करने की एक सीमा होती है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि तुम्हें इस तरह जीना है, तो हम यहाँ एक पल भी नहीं रह सकते।”

शाम की हल्की लालिमा धीरे-धीरे धुंधले अंधेरे में बदल रही थी। बालकनी में रखी पुरानी लकड़ी की आरामकुर्सी पर बैठे सत्यनारायण जी ने अपनी चश्मे की कमानी ठीक की और सामने तुलसी के पौधे के पास बैठी अपनी पत्नी कौशल्या को देखा। कौशल्या जी एक छोटी सी ऊनी शॉल की तह बना रही थीं, जिसे उन्होंने सालों पहले अपने इकलौते बेटे समर के लिए अपने हाथों से बुना था। सत्यनारायण जी ने धीमे स्वर में पूछा, “कौशल्या, क्या आज फिर पुराने संदूक से यादों की गठरी खोल ली? मन भारी हो रहा है क्या?”

कौशल्या जी ने झटके से उस शॉल को अपनी गोद में समेट लिया और पलकें झुकाते हुए बोलीं, “नहीं तो, मुझे भला क्या याद आना है! जो अपनी गृहस्थी में मशगूल हो गया, उसके पीछे रोने से क्या फायदा?”

सत्यनारायण जी के चेहरे पर एक उदास मुस्कान तैर गई। वे जानते थे कि आज समर की वह तारीख है जब उसने पहली बार इस दुनिया में कदम रखा था। एक माँ का दिल भले ही जुबान से इनकार कर दे, पर उसकी धड़कनें अपने बच्चे के हर लम्हे का हिसाब रखती हैं। सत्यनारायण जी कुछ न बोले, बस चुपचाप छड़ी उठाई और रोज़ की तरह सोसाइटी के पार्क की ओर निकल पड़े।

पीछे छूटी कौशल्या जी ने उस नीली शॉल को अपने सीने से लगा लिया। उनकी आंखें बंद हुईं तो वर्षों पुरानी स्मृतियां सजीव हो उठीं। छोटा सा समर, जो स्कूल से लौटते ही बस्ता फेंककर उनकी गोद में समा जाता था और कहता था, “माँ, आज भूख बहुत लगी है, बेसन के लड्डू बने हैं क्या?” सत्यनारायण जी एक साधारण स्कूल में शिक्षक थे। सीमित साधनों और एक-एक पैसे की बचत से उन्होंने समर को कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी थी।

समर बचपन से ही मेधावी था। जब उसने बारहवीं के बाद बेंगलुरु जाकर इंजीनियरिंग और फिर मैनेजमेंट करने की बात कही, तो दोनों बुजुर्गों का कलेजा धक से रह गया था। इकलौता सहारा था, पर उसके उज्ज्वल भविष्य के रास्ते में वे दीवार नहीं बनना चाहते थे। उन्होंने अपनी भविष्य निधि का बड़ा हिस्सा और पेंशन का सहारा दांव पर लगाकर बेटे को बड़े शहर भेज दिया।

शुरुआती महीनों में समर हर रोज़ फ़ोन करता था। दिनभर की बातें, मेस का खाना, नए दोस्त—सब माँ-बाबूजी से साझा करता। लेकिन वक्त के साथ फ़ोन कॉल्स हफ्तों में और फिर औपचारिक मिनटों में तब्दील हो गए। पढ़ाई पूरी होते ही समर घर लौटा, मगर उसके साथ केवल उसकी डिग्री नहीं थी, बल्कि उसकी ज़िंदगी का एक नया अध्याय भी था जिसका नाम था सोफिया।

सोफिया एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के बड़े अफ़सर की बेटी थी और समर के साथ ही काम करती थी। दोनों ने साथ जीवन बिताने का फैसला कर लिया था। समर ने घर आते ही साफ शब्दों में कह दिया कि सोफिया के पिता ने उसे शहर की एक नामी फ़र्म में ऊंचे पद का प्रस्ताव दिया है और वह सोफिया से ही शादी करेगा।

सत्यनारायण जी इस बात को पचा नहीं पा रहे थे। उनका परिवार पीढ़ियों से एक शांत, पारंपरिक और शाकाहारी जीवनशैली जीता आया था। उन्होंने समर को समझाने की कोशिश की, “बेटा, जीवन केवल आकर्षण से नहीं चलता। दो अलग-अलग संस्कृतियों और संस्कारों को एक छत के नीचे निभाना आसान नहीं होता। हमारे तौर-तरीके, मान्यताएं सब अलग हैं।”

मगर समर की ज़िद के आगे किसी की न चली। उसने दो टूक कह दिया कि अगर उसकी शादी सोफिया से नहीं हुई तो वह इस शहर में ही नहीं रहेगा। बेटे के आंसुओं और उसकी नाराजगी से डरकर कौशल्या जी टूट गईं। उन्होंने पति से हाथ जोड़कर कहा, “एक ही तो बेटा है, अगर यह रूठ गया तो हमारी दुनिया में क्या बचेगा? हमें ही थोड़ा झुक जाना चाहिए।”

सत्यनारायण जी ने भारी मन से सहमति दे दी। विवाह धूमधाम से हुआ, लेकिन रीतियों में भी समर ने आधुनिकता के नाम पर कई बदलाव करवा दिए, जिसे दोनों बुजुर्गों ने दिल पर पत्थर रखकर स्वीकार किया।

शादी के शुरुआती दिन सामान्य रहे। सोफिया अपने तरीके से घर में ढलने का दिखावा करती, लेकिन उसकी जीवनशैली और बुजुर्गों के नियमों में टकराव की चिंगारियां बार-बार सुलगतीं। एक दिन सोफिया के कुछ रिश्तेदार विदेश से आए। समर ने पिता से कहा, “बाबूजी, मेहमान आ रहे हैं और नीचे का कमरा उनके लिए बेहतर रहेगा। आप और माँ कुछ दिनों के लिए ऊपर की अटारी वाले कमरे में चले जाइए।”

सत्यनारायण जी ने अपनी पत्नी के घुटनों की ओर देखा और कहा, “समर, तेरी माँ को गठिया का दर्द रहता है। दिन में तीन बार सीढ़ियां चढ़ना-उतरना उसके लिए बहुत कष्टदायी होगा।”

समर ने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए कहा, “बाबूजी, बस तीन-चार दिन की तो बात है। इतना तो आप लोग हमारे लिए एडजस्ट कर ही सकते हैं। हर बात में परेशानी ढूंढना ठीक नहीं।”

कौशल्या जी ने पति का हाथ दबा दिया। वे दोनों चुपचाप अपनी दवाइयों और दैनिक सामान की पोटली लेकर ऊपर के सीलन भरे कमरे में चले गए। उस रात सीढ़ियां चढ़ते समय कौशल्या जी की आंखों से छलके आंसू सत्यनारायण जी के दिल को चीर गए, पर वे खामोश रहे।

चार दिन बाद जब मेहमान चले गए और बुजुर्ग नीचे आए, तो घर का वातावरण पूरी तरह बदल चुका था। रसोई से लहसुन, प्याज और मांस-मछली की ऐसी गंध आ रही थी जिसने सत्यनारायण जी का जी मिचला दिया। जब उन्होंने रसोई में देखा, तो सोफिया चिकन पका रही थी। जिस रसोई में कभी गंगाजल छिड़क कर भगवान का भोग लगता था, वहां मांस पकते देख सत्यनारायण जी का धैर्य जवाब दे गया।

“बहू! यह क्या हो रहा है? तुम जानती हो कि यह घर शुद्ध वैष्णव परंपरा का पालन करता है। हमारी रसोई में यह सब कभी नहीं आया!” सत्यनारायण जी की आवाज़ कांप रही थी।

तभी समर वहां आ गया और उसने सोफिया को पीछे करते हुए कहा, “बाबूजी, आप बात का बतंगड़ क्यों बना रहे हैं? सोफिया का खान-पान अलग है। वह अपनी पसंद का खाना अपने ही घर में नहीं खाएगी तो कहाँ जाएगी? ज़माने के साथ बदलिए, थोड़ा समझौता कीजिए।”

“समझौता?” सत्यनारायण जी ने आहत होकर पूछा, “अपनी आस्था, अपने संस्कारों की बलि चढ़ा देना समझौता है? और कितना समझौता करें हम?” समर ने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुंह फेरकर चला गया।

कड़वाहट बढ़ती गई। कुछ हफ्ते बाद कौशल्या जी का रक्तचाप अचानक बहुत बढ़ गया। सिर में असहनीय दर्द था। रात के करीब ग्यारह बजे ड्राइंग रूम से तेज़ पश्चिमी संगीत और कहकहों की आवाज़ें आने लगीं। कौशल्या जी करवटें बदलती रहीं। सत्यनारायण जी जब नीचे उतरे ताकि बच्चों से आवाज़ धीमी करने का आग्रह कर सकें, तो नज़ारा देखकर वे स्तब्ध रह गए।

सोफिया और उसके चार-पांच दोस्त सोफे पर पैर पसारे बैठे थे। मेज़ पर शराब की बोतलें सजी थीं और चारों तरफ सिगरेट का धुआं तैर रहा था। समर भी एक कोने में बैठा जाम छलका रहा था।

सत्यनारायण जी का संयम टूट गया। उन्होंने तेज़ स्वर में कहा, “समर! यह क्या तमाशा है? तुम्हारी माँ बीमार है, दर्द से तड़प रही है और तुम यहाँ इस पवित्र घर को मदिरालय बना रहे हो? तुरंत इन सब को यहाँ से बाहर करो!”

समर ने ग्लास मेज़ पर पटका और तैश में आकर बोला, “बाबूजी, यह मेरी ज़िंदगी है, मेरा घर है! मेरी पार्टी है। आप हर चीज़ में टोका-टोकी मत किया कीजिए। नई पीढ़ी के तौर-तरीके ऐसे ही होते हैं। आपको शांति चाहिए तो अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लीजिए और हमारे साथ तालमेल बिठाइए!”

सत्यनारायण जी की आंखों में अंगारे दहक उठे। उन्होंने भरे गले से कहा, “यह घर तुम्हारी माँ के कंगन और मेरी उम्र भर की कमाई से बना है समर। मर्यादा और संस्कारों से समझौता करने की एक सीमा होती है। अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि तुम्हें इस तरह जीना है, तो हम यहाँ एक पल भी नहीं रह सकते।”

कौशल्या जी किसी तरह लड़खड़ाते कदमों से नीचे आईं और रोते हुए पति का हाथ थाम लिया। वे बेटे को खोने से डर रही थीं। मगर सत्यनारायण जी इस बार अडिग थे। उन्होंने कहा, “कौशल्या, समझौते जब आत्मसम्मान को कुचलने लगें, तो वे समझौते नहीं, गुलामी बन जाते हैं। अपनी ही छत के नीचे तिल-तिल कर मरने से बेहतर है कि हम अपने स्वाभिमान के साथ जिएं।”

सत्यनारायण जी ने अपनी और पत्नी की दो जोड़ी साड़ियां, कुर्ते और जरूरी दवाइयां एक पुराने सूटकेस में रखीं। समर ने उन्हें रोकने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की, उसे लगा कि गुस्सा शांत होते ही दो दिन में बुजुर्ग लौट आएंगे।

सत्यनारायण जी अपनी पत्नी को लेकर शहर से कुछ दूर अपने पुराने मित्र और पूर्व सहकर्मी दीनानाथ जी के घर पहुंचे। दीनानाथ जी अकेले रहते थे और समाज सेवा में लगे रहते थे। उन्होंने बिना कोई सवाल पूछे अपने मित्र और भाभी का स्वागत किया। दीनानाथ जी ने कहा, “सत्य, घर तुम्हारा ही है। जब तक चाहो, जैसे चाहो यहाँ रहो। रिश्तों को बचाने के लिए झुकना अच्छा है, पर इतना झुक जाना कि रीढ़ ही टूट जाए, उचित नहीं।”

अगले दिन समर औपचारिकता निभाने दीनानाथ जी के घर आया और बोला, “बाबूजी, घर लौट चलिए। लोग क्या कहेंगे कि माता-पिता को घर से निकाल दिया? समाज में मेरी बदनामी हो रही है। आप आ जाइए, हम कुछ बीच का रास्ता निकाल लेंगे।”

सत्यनारायण जी ने शांत भाव से देखा और कहा, “समर, तुम समाज के डर से लेने आए हो, पश्चाताप या प्रेम से नहीं। जिस दिन तुम्हें यह समझ आ जाए कि माता-पिता कोई पुरानी वस्तु नहीं जिन्हें कोने में धकेल दिया जाए, उस दिन बात करेंगे। अभी तुम अपनी आज़ादी मुबारक समझो।” समर गुस्से में पैर पटकता हुआ लौट गया।

दिन बीतने लगे। सत्यनारायण जी और कौशल्या जी ने दीनानाथ जी के साथ मिलकर मोहल्ले के गरीब बच्चों को शाम को मुफ्त पढ़ाना शुरू कर दिया। उनके आंगन में फिर से बच्चों की खिलखिलाहट गूंजने लगी, जिससे उनका खालीपन भरने लगा। लेकिन एक माँ का मन तो माँ का ही होता है; कौशल्या जी अक्सर शाम को चुपके से समर की पुरानी तस्वीरें देखकर आंसू बहा लेती थीं।

उधर, समर के जीवन में सब कुछ वैसा नहीं रहा जैसा उसने सोचा था। माँ-बाबूजी के जाने के बाद घर की आत्मा जैसे गायब हो गई थी। आज़ादी तो मिल गई थी, लेकिन उस आज़ादी में एक वीराना था। सोफिया की माँगें और पार्टियों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा था। घर का खर्च अचानक बेतहाशा बढ़ गया।

कुछ महीनों बाद समर को दफ्तर के काम में भारी घाटा हुआ और उसकी नौकरी पर तलवार लटक गई। एक शाम जब वह बुरी तरह टूटकर घर लौटा और उसने सोफिया से सहारा चाहा, तो सोफिया ने सहानुभूति जताने के बजाय उस पर अक्षम होने का ताना कस दिया। उसी रात सोफिया अपना सामान समेटकर अपने मायके चली गई, यह कहकर कि वह ऐसे तनाव भरे माहौल में नहीं रह सकती।

समर उस बड़े, खाली मकान के ड्राइंग रूम में अकेला बैठा था। चारों ओर सन्नाटा था। उसे याद आया कि जब वह बचपन में परीक्षा में फेल होने के डर से रोता था, तो माँ उसे सीने से लगा लेती थी और बाबूजी कहते थे, “घबरा मत बेटा, हम हैं ना।” आज जब सच में संकट आया, तो आधुनिकता और समझौते की बातें करने वाले सब छोड़ गए। उसके माता-पिता ने उसके लिए अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी आस्था, अपनी खुशियां दांव पर लगा दी थीं, और उसने उनके बदले में उन्हें बेघर कर दिया।

समर का अहंकार आंसुओं के सैलाब में बह गया। अंतरात्मा के इस झटकों ने उसे जगा दिया था। वह समझ चुका था कि उसने क्या अनमोल रत्न खो दिया है।

अगली सुबह, सत्यनारायण जी और कौशल्या जी दीनानाथ जी के घर के बरामदे में बच्चों को वर्णमाला सिखा रहे थे। तभी गेट खुला। सामने समर खड़ा था। उसके बाल बिखरे थे, आंखें सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था।

कौशल्या जी का दिल धड़क उठा, वे उठने लगीं पर सत्यनारायण जी ने शांत रहने का इशारा किया। समर धीरे-धीरे कदमों से चलकर आया और बिना कुछ कहे सत्यनारायण जी और कौशल्या जी के चरणों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा।

“बाबूजी… माँ… मुझे माफ कर दीजिए। मैं भटक गया था। मैंने आधुनिक बनने की होड़ में उस पेड़ की जड़ों को ही काट दिया जिसकी छांव में मैं पला-बढ़ा था। मुझे समझ आ गया है कि असली परिवार क्या होता है। सोफिया मुझे छोड़कर चली गई, मेरे पास अब न वह झूठा घमंड बचा है और न कोई दिखावा। मुझे आप दोनों की ज़रूरत है।” समर हिचकियों के बीच बोल रहा था।

कौशल्या जी की ममता का बांध टूट गया। उन्होंने झुककर समर को उठा लिया और अपने गले से लगा लिया। सत्यनारायण जी की आंखों के कोर भी भीग गए थे। उन्होंने समर के कंधे पर हाथ रखा।

समर ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबूजी, उस घर की रसोई अब फिर से वैसी ही बनेगी जैसी माँ चाहती हैं। वहां अब कोई धुआं, कोई शराब नहीं होगी। मैंने उस मकान को बेचकर आपके लिए एक शांत, खुली जगह पर छोटा सा घर देखने का फैसला किया है। अब फैसले आप करेंगे, मैं सिर्फ आपका बेटा बनकर रहूंगा।”

सत्यनारायण जी ने आगे बढ़कर बेटे के सिर पर हाथ फेरा और गंभीर स्वर में कहा, “बेटा, ठोकर खाकर जो संभल जाए, वही समझदार कहलाता है। रिश्ते समझौतों से नहीं, परस्पर सम्मान और मर्यादा से चलते हैं। यदि तुमने यह सीख लिया है, तो हमारा घर फिर से बस सकता है।”

उस दिन पुरानी दूरियां प्रेम के आंसुओं में धुल गईं। समर अपने माता-पिता को लेकर सम्मानपूर्वक अपने साथ ले गया। घर में एक बार फिर तुलसी के चौरे पर दिया जला और घर की चौखट पर संस्कारों और स्वाभिमान की विजय हुई।

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मूल लेखिका : विभा गुप्ता

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