ममता की छांव

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने हिम्मत जुटाकर टॉर्च की रोशनी उस अंधेरे कोने में डाली। वहां कोई भूत या साया नहीं था, बल्कि लगभग बारह-तेरह वर्ष का एक दुबला-पतला, मैले कपड़ों में लिपटा लड़का बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उसके हाथ में एक फटा हुआ, मैला सा पुराना कपड़े का टुकड़ा था—वही साड़ी का सिरा, जिसे बौरानी हमेशा अपने आंचल से बांधे रखती थी।

कस्बे के पुराने रेलवे फाटक के पास एक विशाल पीपल का पेड़ सदियों से अपनी जटाएं फैलाए खड़ा था। उस पेड़ के नीचे खंडहर हो चुकी एक पुरानी सराय थी, जिसकी टूटी-फूटी दीवारों के बीच धूल, गर्द और बंजर सन्नाटा पसरा रहता था। जब भी कोई उस रास्ते से निकलता, नाक पर रुमाल रख लेता था, क्योंकि वहीं उस मटमैले और फटे हुए चीथड़ों में लिपटी एक लाचार स्त्री बैठी रहती थी। लोग उसे बस ‘बौरानी’ कहकर पुकारते थे। वह किसी से कुछ नहीं बोलती थी, कभी अपनी ही धुन में आसमान की ओर ताकती तो कभी सूखे पत्तों को बटोरने लगती।

मेरी उम्र उस वक्त मुश्किल से दस साल रही होगी। हर सुबह अपनी मां सुमित्रा के साथ जब मैं फाटक पार स्थित देवी मंदिर में दर्शन करने जाता, तो रास्ते में उस सराय के सामने महिलाओं का झुंड कानाफूसी करता दिखता। मां अक्सर पड़ोस की चाची से फुसफुसा कर कहती थी, “हे भगवान, कलयुग आ गया है। न जाने किस दरिंदे का गुनाह यह अभागन अपनी कोख में समेटे घूम रही है। समाज को कलंकित करने वाले पाप का बोझ है ये।”

मैं बालक था, इन भारी-भरकम शब्दों का असल अर्थ तो नहीं समझ पाता था, लेकिन उस स्त्री की पथराई आँखों में तैरती एक गहरी उदासी मेरे नन्हे दिल को कचोट जाती थी। ऐसा लगता था जैसे वह जीवित होकर भी किसी मरे हुए सपने का कंकाल ढो रही हो।

कुछ महीने बीत गए। मेरी पांचवीं की पढ़ाई शुरू हुई और जब मैं दोबारा मंदिर जाने लगा, तो दृश्य बदल चुका था। सराय के चबूतरे पर अब वह अकेली नहीं थी। उसकी फटी हुई पुरानी चुन्नी के छोर से एक नन्हा-सा बालक लिपटा हुआ था। वह बालक उसकी दुनिया बन चुका था। बौरानी ने अपनी फटी साड़ी का एक सिरा उस बच्चे की कमर से बांध रखा था, ताकि वह खेलते-खेलते सड़क की तरफ न निकल जाए। वह पूरे दिन उसी धूल-मिट्टी में उसे अपनी आंचल की छांव में सुलाती, खुद भूखी रहकर भी कहीं से मिले सूखे टुकड़े पहले उसके मुंह में डालती। जब वह मुस्कुराता, तो बौरानी के मैले चेहरे पर ऐसी चमक आ जाती थी मानो उसे तीनों लोकों का खजाना मिल गया हो।

एक दोपहर, जब स्कूल से लौटते समय तेज आंधी आई, तो मेरी स्कूल की नोटबुक हवा में उड़कर सराय की टूटी चारदीवारी के उस पार गिर गई। मैं हड़बड़ाहट में बिना सोचे-समझे दीवार की संकरी मुंडेर पर चढ़ गया। पैर फिसलने ही वाला था और नीचे नुकीले पत्थरों पर गिरकर मेरा सिर फूट जाता, लेकिन ऐन उसी पल किसी के खुरदुरे और काले पड़ चुके हाथों ने पीछे से मेरी कमीज पकड़कर मुझे पूरी ताकत से खींच लिया। मैं धड़ाम से चबूतरे पर सुरक्षित गिर पड़ा। सामने वही बौरानी खड़ी थी, उसके चेहरे पर एक अजीब-सी घबराहट और फिर अपनों जैसी ममता भरी राहत थी। तभी उस छोटे से बच्चे ने घुटनों के बल चलकर मेरे पास आकर मेरी बस्ते की लटकी पट्टी पकड़ ली।

मैंने डर और घबराहट में पीछे हटना चाहा, पर उस नन्हे बच्चे ने अपनी मुट्ठी खोली और मेरी वही खोई हुई नोटबुक, जो उसने धूल से उठाकर अपने सीने से लगा रखी थी, मेरी तरफ बढ़ा दी। उसकी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों में इतनी निष्पाप करुणा थी कि मेरा सारा भय हवा में उड़ गया। तभी मंदिर से लौट रहीं मेरी मां की नज़र मुझ पर पड़ी। वे लगभग चीखते हुए दौड़ी आईं और मुझे झटके से खींचते हुए बोलीं, “अरे सत्यानाश! इस कलंक के साए में क्या कर रहा है? खबरदार जो दोबारा इस पाप की पैदाइश के पास गया तो।” उन्होंने मुझे ज़ोर से डांटा और घसीटते हुए घर ले आईं।

समाज ने उस बच्चे को एक ही नाम दे रखा था—’पाप की संतान’। कोई उसे पास नहीं आने देता था, कोई उसे इंसान तक नहीं समझता था।

साल बीतते चले गए। मेरी स्कूली पढ़ाई पूरी हुई और उच्च शिक्षा के लिए मैं शहर चला गया। सात साल बाद जब मैं प्रशासनिक सेवा की प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद पहली बार अपने कस्बे लौटा, तो सब कुछ बहुत बदल चुका था। फाटक पर अब एक बड़ा ओवरब्रिज बन रहा था। पीपल का वह पेड़ तो वहीं था, पर सराय पूरी तरह वीरान थी। वहां कोई नहीं था। जब मैंने रिक्शे वाले से पूछा, तो उसने उदासीनता से कहा, “बाबूजी, कौन बौरानी? अरे वो तो चार-पांच साल पहले ही गायब हो गई। जब उसका बच्चा कहीं खो गया, तो वो भी शहर-दर-शहर भटकने लगी और फिर किसी ने उसकी खबर नहीं ली।”

घर पहुंचा तो रौनक थी। मां ने मेरे घर आने की खुशी में सत्यनारायण की कथा और भोज रखा था। शाम ढलते ही मैंने अपने छोटे भाई अमित से कहा कि चलो फाटक की तरफ घूमकर आते हैं, कुछ ताजी हवा ले लेंगे। लेकिन तभी मां ने रसोई से बाहर आकर मेरा हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “नहीं देवांग! आज पूनम की रात है, उस पुराने पीपल के रास्ते से कोई नहीं जाता। शहर में पढ़-लिखकर तू इन बातों को दकियानूसी समझेगा, पर मैं मां हूं तेरी। मेरा कलेजा कांपता है जब कोई उस तरफ जाता है।”

मां की आँखों में सचमुच गहरा खौफ था। रात को जब मैं और अमित छत पर लेटे थे, तो मैंने पूछा, “अमित, मां किस बात से इतना डर रही हैं? यह सब क्या बकवास है?”

अमित ने चारों तरफ देखते हुए फुसफुसा कर कहा, “भैया, यह कोई अफवाह नहीं है। जिस बौरानी को आप बचपन में देखते थे, पांच साल पहले सावन के मेले में उसका बेटा भीड़ में खो गया था। उस दिन पूनम की ही रात थी। उसके बाद वह औरत पागल सी होकर हर शुक्रवार और पूनम की रात उस पीपल के नीचे आकर खड़ी हो जाती थी। जो भी वहां से निकलता, उसका हाथ पकड़कर रोते हुए बस एक ही गुहार लगाती थी—’मोरा लल्ला देख्यो काहू? मोरा लाल लौटाए दो।’ उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत होती थी। लोग डर के मारे भागते थे। फिर दो साल पहले कड़ाके की ठंड में किसी अज्ञात वाहन ने उसे टक्कर मार दी। दो दिन तक उसकी देह वहीं झाड़ियों में लावारिस पड़ी रही। नगरपालिका वालों ने जैसे-तैसे मिट्टी में दबा दिया। तब से पूरे इलाके में खौफ है कि उसकी अतृप्त आत्मा आज भी अपने बच्चे को ढूंढने भटकती है और उस रास्ते से गुजरने वाले हर अजनबी से अपना बच्चा मांगती है।”

अमित तो यह सब बताकर गहरी नींद में सो गया, लेकिन मेरे सीने पर जैसे किसी ने भारी चट्टान रख दी हो। मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया। मेरी आँखों के सामने वह दृश्य घूमने लगा जब उस लाचार स्त्री ने अपनी सूखी हड्डियों की ताकत लगाकर मुझे गिरने से बचाया था। जब उसने अपनी फटी साड़ी से अपने बच्चे को बांध रखा था ताकि वह दुनिया की बुरी नजरों से बचा रहे।

लोग उसे पाप कहते थे, कलंक कहते थे। लेकिन ममता की दृष्टि से देखें तो क्या उस मां का कोई कसूर था? समाज के किसी वहशी दरिंदे ने उसके साथ अन्याय किया, और उसने उस असह्य पीड़ा को सहते हुए भी नौ महीने उस बच्चे को अपने लहू से पाला। जब प्रसव की असह्य वेदना हुई होगी, तब किसी ने उसे अस्पताल नहीं पहुंचाया, वह उसी खंडहर में तड़पी होगी। उसने कूड़े के ढेरों से, फेंके हुए जूठन से अपने बच्चे का पेट भरा। उसके त्याग में क्या मेरी मां के त्याग से कोई कमी थी? क्या सिर्फ इसलिए कि वह असहाय और लाचार थी, उसकी ममता पाप बन गई?

उस रात मुझे एक पल के लिए भी नींद नहीं आई। कानों में केवल एक ही पुकार गूंजती रही—’मोरा लल्ला देख्यो काहू?’ सुबह चार बजे जब सारा घर गहरी नींद में था, मैंने रसोई में जाकर चुपचाप ताजी बनी पूरियां और थोड़ा गुड़ एक पत्तल में लपेटा और भारी कदमों से उस वीरान सराय की ओर चल पड़ा।

कोहरे के बीच पीपल का पेड़ किसी शांत तपस्वी की तरह खड़ा था। चारों तरफ गहरा सन्नाटा था। खंडहर के चबूतरे पर पहुंचकर मैंने पत्तल वहां रख दी। मेरे हाथ कांप रहे थे, डर से नहीं, बल्कि एक अजीब से पश्चाताप और सम्मान से। मैंने हाथ जोड़कर मन ही मन कहा, “हे मां, इस दुनिया ने तुम्हें सिर्फ दर्द और दुत्कार दिया। अगर तुम्हारी आत्मा कहीं है, तो मुझे क्षमा कर देना कि हम तुम्हारा लाल तुम्हें लौटा न सके।”

मैं पीछे मुड़ने ही वाला था कि तभी चबूतरे के पिछले हिस्से से एक धीमी सी सिसकी सुनाई दी।

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने हिम्मत जुटाकर टॉर्च की रोशनी उस अंधेरे कोने में डाली। वहां कोई भूत या साया नहीं था, बल्कि लगभग बारह-तेरह वर्ष का एक दुबला-पतला, मैले कपड़ों में लिपटा लड़का बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे और वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उसके हाथ में एक फटा हुआ, मैला सा पुराना कपड़े का टुकड़ा था—वही साड़ी का सिरा, जिसे बौरानी हमेशा अपने आंचल से बांधे रखती थी।

मैंने चौंक कर धीरे से पूछा, “तुम कौन हो बेटा? यहां इस ठंड में क्या कर रहे हो?”

लड़का सहम गया और दीवार से सट गया। उसकी आँखों में वही पुरानी मासूमियत और डर था, जो मैंने सालों पहले देखा था। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “साहब, मारना मत। मैं… मैं अपनी मां को ढूंढने आया हूं। मेले में किसी ने मुझे एक होटल वाले को बेच दिया था। मैं वहां बर्तनों की सफाई करता था और मार खाता था। पर मुझे याद था कि मेरी मां मुझे इसी पीपल के पेड़ से बांधकर रखती थी। तीन दिन पहले मौका पाकर मैं उस ढाबे से भाग निकला। रेलवे लाइन पकड़कर यहां पहुंचा, पर यहां मां कहीं नहीं है। सब कहते हैं वो मर गई… पर मेरी मां मुझे छोड़कर नहीं जा सकती।”

लड़के की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने अपनी मुट्ठी में भींचा हुआ वह चिथड़ा अपने सीने से लगा लिया।

यह वही बालक था! नियति का चक्र देखिए, जिस बच्चे को पूरा समाज ढूंढने का प्रयास तक नहीं कर सका, वह अपनी मां की ममता की गंध सूंघता हुआ वापस उसी पीपल की छांव में लौट आया था। लेकिन विडंबना यह थी कि जिस मां ने अपनी आखिरी सांस तक उसका इंतजार किया, वह अब इस दुनिया में नहीं थी।

मेरी आँखों से आंसू छलक पड़े। मुझे समझ आ गया कि उस अतृप्त मां की आत्मा किसी को नुकसान पहुंचाने नहीं, बल्कि अपने इस अंश की रक्षा के लिए तड़प रही थी। उस बच्चे का जीवन अब फिर से उसी अंधेरे में जाने वाला था जहां से वह भागकर आया था। समाज उसे फिर से वही ‘पाप’ कहकर दुत्कार देता या वह किसी अपराध की दुनिया में धकेल दिया जाता।

मैंने आगे बढ़कर उस बच्चे के ठंडे पड़ चुके दोनों हाथ थाम लिए। उसने डरकर मेरी तरफ देखा। मैंने कहा, “तुम्हारी मां कहीं नहीं गई है, वह यहीं है। इस पीपल की छांव में, इस हवा में, और तुम्हारे भीतर। और उसने ही आज मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”

मैंने उसे चबूतरे पर रखी पूरियां खिलाईं। वह भूख से बेहाल था, उसने एक सांस में सब खा लिया। फिर मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “चलो मेरे साथ।”

जब मैं उस बच्चे को लेकर अपने घर के दरवाजे पर पहुंचा, तो मां और पिताजी आंगन में खड़े थे। मुझे उस बच्चे के साथ देखकर मां का चेहरा गुस्से और अचरज से लाल हो गया, “देवांग! यह कौन है? इसे घर के अंदर क्यों ला रहा है?”

मैंने शांत स्वर में कहा, “मां, यह वही बच्चा है जिसे सब उस अभागन का पाप कहते थे। यह उसका लाल है, जो अपनी मां को ढूंढते हुए वापस आया है।”

मां पीछे हटते हुए बोलीं, “पागल हो गया है क्या? इस अछूत और लावारिस को हम अपने घर में रखेंगे? समाज क्या कहेगा?”

उस दिन मैंने पहली बार अपनी मां की आँखों में देखकर दृढ़ता से कहा, “मां, आप हमेशा कहती हैं कि मां का दर्जा भगवान से भी ऊंचा होता है। अगर आपका अपने बच्चों के लिए प्यार पवित्र है, तो उस अभागन का प्यार अपवित्र कैसे हो सकता है? जिसने भूख, प्यास, सर्दी और समाज की गालियां सहकर भी इस बच्चे को जिंदा रखा, उसकी ममता पर सवाल उठाने का हक किसी को नहीं है। समाज ने उसे सिर्फ नोचा और दुत्कारा। पर मैं अब इस बच्चे को लावारिस नहीं रहने दूंगा। मैं शहर जा रहा हूं, अपनी आगे की ट्रेनिंग के लिए। यह मेरे साथ चलेगा। मैं इसे पढ़ाऊंगा, लिखाऊंगा और एक ऐसा इंसान बनाऊंगा जिसे देखकर यह समाज कभी इसे पाप कहने की हिम्मत न कर सके। अगर मैं एक अफसर बनकर भी इस अन्याय को सही न कर सका, तो मेरी पढ़ाई-लिखाई सब व्यर्थ है।”

मेरे पिता, जो अब तक चुपचाप खड़े थे, आगे आए। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और फिर उस नन्हे बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “सुमित्रा, हमारा बेटा आज सचमुच बड़ा हो गया है। इसने किताबों का ज्ञान नहीं, जीवन का सबसे बड़ा धर्म सीख लिया है। ममता कभी अशुद्ध नहीं होती, अशुद्ध तो समाज की संकीर्ण सोच होती है।”

मां की आँखें झुक गईं। उनके भीतर का मातृत्व भी शायद उस बालक की बेबसी देखकर पिघल गया था। उन्होंने धीरे से बढ़कर उस बच्चे के सिर पर अपनी साड़ी का पल्लू रख दिया और कहा, “जाओ, पहले इसे नहलाकर साफ कपड़े पहनाओ, बहुत ठंड है बाहर।”

उस दिन पीपल के उस पुराने पेड़ की शाखाओं से छनकर आती हुई भोर की पहली किरण ने खंडहर पर एक नया उजाला बिखेर दिया था। ऐसा लगा मानो हवा में गूंजती वह दर्दभरी पुकार अब एक शांत, तृप्त और मंगलकारी आशीष में बदल गई हो। उस बच्चे को एक नाम मिला—’आनंद’।

सालों बाद, जब आनंद ने अपनी मेहनत और देवांग के मार्गदर्शन से राज्य सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की, तो उसने सबसे पहला काम उसी पीपल के पेड़ के नीचे एक अनाथालय और महिला आश्रय की नींव रखकर किया, जिसका नाम उसने रखा—’मां की छांव’।

क्या समाज द्वारा किसी मजबूर स्त्री और उसकी संतान को ‘कलंक’ मान लेना सही है, जबकि असल दोषी तो वह विकृत मानसिकता है जो उन्हें इस हाल में छोड़ देती है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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 मूल लेखिका : सौम्या मिश्रा जौहरी

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