“तो फिर आज इस बात से तकलीफ़ क्यों?” रश्मि ने अपनी आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए कहा, “इंसान को दूसरों के साथ वही बर्ताव करना चाहिए, जो वह कल अपने लिए चाहता है। कर्म लौटकर ज़रूर आते हैं। अगर हम आज अपने बड़ों को यह संदेश देंगे कि उनका वक़्त ख़त्म हो चुका है और वे सिर्फ़ अपने कमरों तक सीमित रहें, तो कल हमारी औलादें हमें बैठक से भी बाहर का रास्ता दिखाने में एक पल नहीं सोचेंगी। तुम्हारी यह सोच न केवल खोखली है, बल्कि रिश्तों की बुनियाद को हिलाने वाली है।
शाम की हल्की गुलाबी ठंडक में कॉलोनी का पार्क धीरे-धीरे गुलज़ार हो रहा था। सीमेंट की बेंच पर बैठकर शालिनी अपनी उंगलियों में फँसी चाय की चुस्की ले रही थी, लेकिन उसका ध्यान सामने खेलते बच्चों पर कम और पड़ोस की बातों पर ज़्यादा था। उसके पास ही बैठी उसकी सबसे करीबी सहेली रश्मि अपने मोबाइल में कुछ देख रही थी। दोनों में बरसों पुरानी जान-पहचान थी, पर दोनों का मिज़ाज एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा था। शालिनी हर बात में नफ़ा-नुकसान और आधुनिक जीवनशैली की बंदिशें तलाशती, जबकि रश्मि रिश्तों को सहजता और आत्मीयता की नज़र से देखती थी।
शालिनी ने चाय का कुल्हड़ किनारे रखा और धीरे से बोली, “रश्मि, तुमने कभी राघव जी के घर का माहौल देखा है? कल मैं उनकी पत्नी अंकिता से मिलने गई थी। जितनी देर मैं उस घर में बैठी, उनके बाबूजी यानी सदानंद जी बैठक में ही जमे रहे। मजाल है कि कोई अपनी निजी बात कर सके। अंकिता बेचारी रसोई से पानी और नाश्ता लाती रही, पर अपनी सहेली के साथ खुलकर दो पल बैठ भी न सकी। हद तो यह है कि राघव जी अपने पिता से कुछ नहीं कहते, बल्कि उल्टा हर छोटी-बड़ी बात में बाबूजी की ही राय लेते हैं। मुझे तो समझ नहीं आता कि आज के ज़माने में इतनी पाबंदी कोई कैसे झेलता है।”
रश्मि ने मोबाइल बंद करके अपनी गोद में रखा और हैरानी से शालिनी की ओर देखा। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “तो इसमें ग़लत क्या है शालिनी? राघव जी अगर अपने पिता का सम्मान करते हैं, तो यह तो उनकी अच्छी परवरिश है। वह अपने बाबूजी से क्या कहें? क्या उनसे यह कहें कि आप अपने ही बनाए घर की बैठक में मत बैठिए? जिस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी उस चौखट को सींचने में लगा दी, क्या बुढ़ापे में उसे एक कोने में सिमट जाना चाहिए? मेरी समझ में नहीं आता कि तुम बुजुर्गों की मौजूदगी को बोझ क्यों मानती हो।”
शालिनी ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं और तल्ख़ आवाज़ में कहा, “तुम बात को समझ नहीं रही हो रश्मि। आज के दौर में हर इंसान को अपनी स्पेस और प्राइवेसी चाहिए होती है। कोई बाहरी मेहमान आए, तो चार बातें खुलकर करने की आज़ादी होनी चाहिए। मैंने तो कितने ही आधुनिक घरों में देखा है कि जब कोई मिलने आता है, तो बड़े-बुजुर्ग चुपचाप अपने कमरों में रहते हैं। वे बेवजह बीच में नहीं पड़ते। अब नौजवानों को भी अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीने का हक़ है। बैठक तो मिलने-जुलने की जगह होती है, वहाँ हर वक़्त किसी का पहरा क्यों रहे?”
रश्मि ने ठंडी साँस भरी और बेहद शांत स्वर में बोली, “प्राइवेसी? शालिनी, जब परिवार बनता है, तो दीवारें सुरक्षा के लिए होती हैं, अपनों से दूरी बनाने के लिए नहीं। जिस घर में यह तय होने लगे कि कौन किस कमरे में रहेगा और कौन बैठक में पाँव नहीं रखेगा, वह घर नहीं रहता, होटल बन जाता है। अनुशासन, कायदे और पाबंदियाँ बच्चों को संवारने के लिए सिखाई जाती हैं, उन बुजुर्गों पर थोपने के लिए नहीं जिनके अनुभव की छांव में पूरा परिवार पलता है। बाबूजी का जहाँ दिल चाहेगा, वहाँ बैठेंगे। वह उस घर के मालिक हैं, कोई किराएदार नहीं जो इजाज़त लेकर कदम बाहर निकालें।”
“लेकिन इसका असर अंकिता पर पड़ता है!” शालिनी ने तुरंत बात का रुख बदला, “तुमने कभी अंकिता का चेहरा देखा है? वह कितनी थकी और तनाव में दिखती है। सास-ससुर का ऐसा साया हर वक़्त सिर पर रहे, तो किसी भी बहू का दम घुटने लगेगा। राघव जी अपनी माँ-बाबूजी के आगे अंकिता की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। हर फ़ैसले में बाबूजी की मुहर लगना क्या अंकिता के आत्मसम्मान के ख़िलाफ़ नहीं है? इसी वजह से घर में मनमुटाव रहता है।”
रश्मि ने एक पल के लिए शालिनी की आँखों में झाँका। फिर उसने नरमी से पूछा, “शालिनी, मुझे एक बात का सच्चा जवाब दो। आज अंकिता बहू है, कल वह भी किसी की सास बनेगी। आज उसके बच्चे छोटे हैं, कल वे भी बड़े होंगे और उनकी अपनी दुनिया होगी। क्या तब अंकिता यह चाहेगी कि जब उसके बेटे-बहू के दोस्त आएँ, तो उसे अपने ही बेडरूम में क़ैद कर दिया जाए? क्या वह उस उम्र में ख़ुशी, सम्मान और परिवार के केंद्र में रहना पसंद नहीं करेगी, जिस तरह आज सदानंद जी रह रहे हैं?”
शालिनी थोड़ा झेंप गई। उसने अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, “वह तो आगे की बात है… पर हाँ, ज़ाहिर है कि बुढ़ापे में हर कोई यही चाहेगा कि उसकी इज़्ज़त हो, उसे कोई किनारे न धकेले।”
“तो फिर आज इस बात से तकलीफ़ क्यों?” रश्मि ने अपनी आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए कहा, “इंसान को दूसरों के साथ वही बर्ताव करना चाहिए, जो वह कल अपने लिए चाहता है। कर्म लौटकर ज़रूर आते हैं। अगर हम आज अपने बड़ों को यह संदेश देंगे कि उनका वक़्त ख़त्म हो चुका है और वे सिर्फ़ अपने कमरों तक सीमित रहें, तो कल हमारी औलादें हमें बैठक से भी बाहर का रास्ता दिखाने में एक पल नहीं सोचेंगी। तुम्हारी यह सोच न केवल खोखली है, बल्कि रिश्तों की बुनियाद को हिलाने वाली है। अंकिता को तनाव इस बात का नहीं है कि बाबूजी बैठक में बैठते हैं, बल्कि शायद तनाव इस बात का है कि दुनिया उसके कान भरती है।”
शालिनी के पास रश्मि के इस तर्क का कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप बैठी रही, पर उसके मन में एक बेचैनी तैरने लगी। उसे लगा कि रश्मि शायद भावुक होकर बोल रही है, ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और होती है। दोनों सहेलियाँ कुछ देर खामोश रहीं और फिर अपने-अपने घर लौट गईं।
उधर, अंकिता के घर में सचमुच अजीब सी कशमकश चल रही थी। सदानंद जी की उम्र पचहत्तर के पार थी। जब से उनकी पत्नी का देहांत हुआ था, वे थोड़े अकेले पड़ गए थे। उनका मन सिर्फ़ इस बात से बहलता था कि बैठक में बैठकर अख़बार पढ़ें, आते-जाते लोगों को देखें और बेटे-बहू की चहल-पहल महसूस करें। राघव जब भी दफ़्तर से लौटता, सबसे पहले अपने पिता के चरण छूता और दिनभर की बातें साझा करता। कोई भी नया सामान घर में आना हो या कोई फ़ैसला लेना हो, राघव हमेशा पूछता, “बाबूजी, आप क्या कहते हैं?”
अंकिता को शुरू-शुरू में यह सब बहुत अच्छा लगता था, लेकिन अपनी कुछ सहेलियों और रिश्तेदारों की बातें सुन-सुनकर उसके मन में भी यह ग्रंथि बनने लगी थी कि उसकी अपनी कोई आज़ादी नहीं है। जब भी उसकी कोई सहेली आती, बाबूजी वहीं सोफ़े पर बैठे रहते, कभी किसी से हाल-चाल पूछ लेते तो कभी राजनीति पर चर्चा छेड़ देते। अंकिता को लगता कि उसकी निजता छीनी जा रही है।
उस रात जब राघव दफ़्तर से आया, तो अंकिता ने पहली बार खुलकर अपनी बात रखी। खाने की मेज़ पर जब सदानंद जी अपने कमरे में जा चुके थे, अंकिता ने बुझे मन से कहा, “राघव, क्या हम अपने घर के तौर-तरीके थोड़े बदल नहीं सकते? जब मेरे मिलने वाले आते हैं, तो बाबूजी का हर वक़्त ड्राइंग रूम में रहना मुझे असहज कर देता है। हमें भी तो अपनी थोड़ी स्पेस चाहिए। ऐसा लगता है जैसे हर वक़्त कोई हम पर नज़र रखे हुए है।”
राघव ने शांत भाव से अपनी पत्नी को देखा। उसने कोई गुस्सा नहीं दिखाया, न ही आवाज़ ऊँची की। उसने बहुत आहिस्ते से अंकिता का हाथ थामा और कहा, “अंकिता, जब मैं छोटा था, तब बाबूजी के पास एक छोटा सा स्कूटर था। बारिश हो या कड़ाके की धूप, वे मुझे आगे खड़ा करके स्कूल छोड़ते थे और खुद भीगते हुए दफ़्तर जाते थे। उस ज़माने में उनकी भी कोई प्राइवेसी रही होगी, उनके भी कुछ ख़्वाब रहे होंगे, लेकिन उन्होंने अपनी पूरी जवानी हमारे लिए उस बैठक और बाहर की दुनिया की धूप सहने में गुज़ार दी। आज जब उनके पाँव थक गए हैं, तो क्या मैं उनसे कहूँ कि आप उस कमरे में छिपकर बैठिए जिसे मैंने अपने पैसों से सजाया है? अंकिता, यह घर उनका है। वे किसी पर नज़र नहीं रखते, वे सिर्फ़ यह महसूस करना चाहते हैं कि वे अब भी इस परिवार का हिस्सा हैं, कोई फालतू सामान नहीं जिसे अलमारी में बंद कर दिया जाए।”
अंकिता कुछ बोल न सकी, पर राघव की बातों ने उसके दिल पर दस्तक ज़रूर दी।
अगले ही हफ़्ते एक ऐसी घटना घटी जिसने सारे समीकरण हमेशा के लिए बदल दिए। राघव तीन दिनों के लिए किसी ज़रूरी आधिकारिक दौरे पर शहर से बाहर गया हुआ था। घर पर सिर्फ़ अंकिता, उसका आठ साल का बेटा आरव और सदानंद जी थे। दोपहर का समय था। अचानक अंकिता की तबीयत बिगड़ने लगी। उसके सीने में बाईं तरफ़ तेज़ दर्द उठा और पसीने छूटने लगे। वह दर्द से कराहते हुए सोफ़े पर गिर पड़ी। आठ साल का आरव बुरी तरह डर गया और रोने लगा।
कमरे में आराम कर रहे सदानंद जी ने बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी, तो अपनी लाठी संभालते हुए तुरंत बैठक की तरफ़ भागे। अंकिता की हालत देखते ही वे भांप गए कि मामला गंभीर है। पचहत्तर साल के उस बुज़ुर्ग में न जाने कहाँ से इतनी फुर्ती आ गई। उन्होंने बिना एक पल गंवाए पड़ोस के डॉक्टर को फ़ोन किया, जो उनके पुराने परिचित थे। साथ ही उन्होंने आरव को गले लगाकर शांत कराया, अंकिता को सहारा देकर लिटाया और तुरंत एम्बुलेंस बुलाई।
जब तक अंकिता अस्पताल पहुँची, सदानंद जी खुद उसके साथ स्ट्रेचर के बगल में दौड़ रहे थे। डॉक्टरों ने बताया कि यह माइल्ड हार्ट अटैक था, अगर अस्पताल पहुँचने में पंद्रह-बीस मिनट की भी देरी हो जाती तो जान को ख़तरा हो सकता था। सदानंद जी ने राघव को इत्तला दी और खुद खड़े होकर सारे कागज़ी काम और दवाइयों का इंतज़ाम कराया। उस उम्र में भी उनके चेहरे पर केवल अपनी बहू की सलामती की चिंता थी।
शाम को जब राघव बदहवास हालत में अस्पताल पहुँचा, तो उसने देखा कि आईसीयू के बाहर सदानंद जी थके हुए बेंच पर बैठे ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे। राघव दौड़कर अपने पिता के गले लग गया।
दो दिन बाद जब अंकिता को होश आया और वह ख़तरे से बाहर होकर सामान्य वार्ड में शिफ्ट हुई, तो उसने देखा कि सदानंद जी अपनी कमज़ोर कांपती उंगलियों से उसके सिर पर हाथ फेर रहे थे। उनकी आँखों में आँसू थे। वे धीरे से बोले, “बहू, तू ठीक है न? जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुझे और इस घर को कुछ नहीं होने दूँगा।”
अंकिता की आँखों से पछतावे के आँसू बह निकले। उसने कांपते हाथों से अपने ससुर के हाथ थाम लिए। उसे याद आया कि कैसे वह इसी बुज़ुर्ग की मौजूदगी को ‘दखलअंदाज़ी’ और ‘प्राइवेसी में खलल’ समझ रही थी। जिस इंसान को वह एक बोझ मान रही थी, उसी की सजगता और छत्रछाया ने आज उसकी जान बचाई थी। अगर सदानंद जी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके अपनी अलग दुनिया में रहते, तो शायद उस दिन कुछ भी हो सकता था।
घर लौटने के बाद माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
कुछ दिनों बाद, शालिनी अंकिता की तबीयत का हालचाल जानने उसके घर आई। सदानंद जी हमेशा की तरह बैठक की खिड़की के पास वाली आरामकुर्सी पर बैठे धूप सेक रहे थे और आरव को कोई पुरानी कहानी सुना रहे थे। शालिनी ने दबे पाँव अंदर आकर अंकिता से फुसफुसाते हुए कहा, “अंकिता, तुम्हारी तबीयत अब कैसी है? चलो तुम्हारे बेडरूम में चलते हैं, यहाँ तो फिर बाबूजी बैठे हैं, आराम से बात नहीं हो पाएगी।”
इस बार अंकिता मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में कोई झिझक नहीं थी। उसने शालिनी का हाथ पकड़ा और उसे बैठक के मुख्य सोफ़े पर बैठाते हुए पूरे गर्व और स्नेह से कहा, “नहीं शालिनी, हम यहीं बैठेंगे। बेडरूम तो सिर्फ़ सोने के लिए होता है, ज़िंदगी तो बैठक में अपनों के साथ जी जाती है। और जहाँ तक बाबूजी की बात है, तो यह बैठक उनकी है, यह घर उनका है। सच कहूँ तो, जब तक चौखट पर यह बुज़ुर्ग बरगद खड़ा है, तब तक हमारे घर पर कोई आंधी नहीं आ सकती। इनके नखरे नहीं, यह तो इनका आशीर्वाद है जो हमें हर बला से महफ़ूज़ रखता है।”
सदानंद जी ने बहू की बात सुनी तो उनके चेहरे पर एक असीम संतोष और मुस्कान तैर गई। शालिनी ने अंकिता की आँखों में वह चमक और आत्मविश्वास देखा, जो पहले कभी नहीं था। शालिनी को उस दिन रश्मि की कही हर एक बात याद आ गई। उसका सिर शर्म से झुक गया और उसके मन की सारी भ्रांतियाँ धूप में ओस की तरह उड़ गईं। रिश्तों की असली मिठास फासलों में नहीं, बल्कि बड़ों के मान-सम्मान और उनके साथ में होती है।
क्या आपको भी लगता है कि आज की तथाकथित ‘प्राइवेसी’ की दौड़ में हम अपने ही बुज़ुर्गों को घर के कोनों में धकेल कर अपनी सबसे बड़ी ढाल खोते जा रहे हैं? अपने घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ आपका अनुभव कैसा है, हमें अपनी राय से ज़रूर अवगत कराएं।
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मूल लेखिका
आभा अदीब राज़दान
लखनऊ