दिल के रिश्ते

  “बाबूजी, आप हमसे नाराज हो लीजिए, हमें डांट लीजिए, लेकिन भगवान के लिए अब अपनी यह जिद छोड़ दीजिए। अगर कल रात माँ को कुछ हो जाता, तो हम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते। हमारा यह सारा पैसा, यह पद, यह प्रतिष्ठा किस काम की, अगर हम अपने माँ-बाप के काम ही न आ सकें?”

दीनानाथ जी स्तब्ध खड़े रहे। उन्होंने अपने उन बेटों को देखा जिन्हें वे अब तक दुनिया के सामने खुदगर्ज कहते आए थे। तीनों बेटे अपनी लाखों की जिम्मेदारियाँ, दफ्तर के काम और परिवार छोड़कर एक फोन कॉल पर भागे चले आए थे।

कस्बे के पुराने मोहल्ले में खड़ी वह भव्य हवेलीनूमा कोठी बाहर से देखने पर किसी समृद्ध परिवार की गवाही देती थी। नक्काशीदार लोहे का भारी मुख्य द्वार, चारों तरफ फैला आम और अमरूद के पेड़ों से घिरा आँगन, और दो मंजिला मकान की खिड़कियों पर लगे संगमरमर के छज्जे। लेकिन इस विशाल और सजे-संवरे मकान के भीतर पसरी खामोशी इतनी गहरी थी कि दोपहर के वक्त पत्तों की सरसराहट भी भीतर तक साफ सुनाई देती थी। इस असीम सन्नाटे के बीच रहते थे बहत्तर वर्षीय दीनानाथ त्रिवेदी और उनकी पैंसठ वर्षीया पत्नी गिरिजा देवी। दीनानाथ जी जिला अदालत से मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इलाके में उनका बड़ा मान-सम्मान था। जो कोई भी उस आलीशान मकान के सामने से गुजरता और दालान में दो बूढ़ी आकृतियों को अकेले बैठे देखता, वह बरबस ही आह भरकर कहता कि ऊपर वाले ने सब कुछ दिया, लेकिन बुढ़ापे में औलाद का सुख नहीं दिया।

पहली नजर में देखने पर किसी को भी यही लगता कि दीनानाथ जी के तीनों बेटे निहायत ही मतलबी, लापरवाह और नालायक हैं, जिन्होंने अपने जन्मदाताओं को उम्र के इस नाजुक मोड़ पर लावारिस छोड़ दिया है। मगर जीवन के पर्दे के पीछे जो सच छुपा होता है, वह अक्सर आँखों देखे सच से बिल्कुल जुदा होता है। वास्तविकता यह थी कि दीनानाथ जी ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों की परवरिश और उनकी शिक्षा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। एक अनुशासित पिता होने के नाते उन्होंने अपने तीनों बेटों को हमेशा बड़े सपने देखने और मेहनत करने के लिए प्रेरित किया था।

तीनों बेटे भी कुशाग्र बुद्धि के निकले। सबसे बड़ा बेटा, आलोक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु की एक अंतरराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में वरिष्ठ तकनीकी निदेशक बना। दूसरा बेटा, मयंक, भारतीय स्टेट बैंक में अधिकारी के पद पर चयनित हुआ और वर्तमान में मुंबई के मुख्य आंचलिक कार्यालय में कार्यरत था। सबसे छोटा बेटा, नितेश, जो स्वभाव से बेहद भावुक और माता-पिता का सबसे लाडला था, उसने सिविल सेवा की परीक्षा पास की और दिल्ली में रेल मंत्रालय में उप-सचिव के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहा था। तीनों बहुएँ भी पढ़ी-लिखी, संस्कारी और अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय थीं। पोते-पोतियों की किलकारियों से भरा-पूरा परिवार था।

समस्या यह थी कि दीनानाथ जी जिस छोटे से कस्बे में रहते थे, वहाँ आधुनिक जीवनशैली, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर या उच्च प्रशासनिक सेवा के अवसर नहीं थे। बेटों को अपने करियर और अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए महानगरों का रुख करना ही पड़ा। जब भी तीनों बेटों की शादियाँ हुईं, उन्होंने हमेशा अपने माता-पिता को अपने साथ रखने की इच्छा जताई। आलोक ने बेंगलुरु के अपने पॉश विला में उनके लिए भूतल पर एक अलग कमरा पूरी तरह उनकी सहूलियत के हिसाब से तैयार करवाया था। मयंक ने मुंबई के अपने फ्लैट में मंदिर की स्थापना विशेष रूप से माँ के लिए की थी। नितेश तो हर महीने दिल्ली से कस्बे का चक्कर लगाता और हाथ जोड़कर विनती करता कि बाबूजी, आप और अम्मा दिल्ली चलिए, सरकारी आवास में बड़ा सा बगीचा है और बेहतरीन अस्पताल भी पास में हैं।

लेकिन दीनानाथ जी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती थी। उनका एक ही रटंत जवाब होता, “जिस कोठी को मैंने अपनी जवानी का पसीना बहाकर, पाई-पाई जोड़कर खड़ा किया है, उसे छोड़कर मैं किसी पराए शहर के फ्लैट की कबूतरखाने जैसी कोठरी में घुटने नहीं जाऊंगा। तुम लोगों को अगर माँ-बाप की इतनी ही फिक्र है, तो अपनी-अपनी नौकरियाँ छोड़ो और इसी कस्बे में आकर रहो।”

बेटे बेबस होकर एक-दूसरे का मुँह ताकते रह जाते। वे समझाते कि आज के दौर में जमी-जमाई नौकरियों और बच्चों के नामी स्कूलों को छोड़कर छोटे कस्बे में लौटना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। लेकिन दीनानाथ जी किसी भी तर्क को सुनने के लिए तैयार नहीं थे। वे न केवल खुद अड़े रहते, बल्कि गिरिजा देवी को भी बच्चों के पास जाने से रोक देते थे। जब भी गिरिजा देवी बच्चों से मिलने की बात कहतीं, वे भड़क उठते और कहते कि क्या तुम भी मुझे यहाँ अकेला छोड़कर बेटों के पीछे भागना चाहती हो? लोकलाज और पति के डर से गिरिजा देवी भी अपने मन की चाहत को दिल में ही दबा लेती थीं।

दीनानाथ जी की इस ज़िद का सबसे कड़वा पहलू यह था कि वे समाज के सामने खुद को एक असहाय और उपेक्षित पिता के रूप में पेश करते थे। शाम को जब वे कस्बे के मंदिर की चौपाल पर बैठते या मोहल्ले का कोई परिचित उनके घर आता, तो वे एक गहरी ठंडी सांस भरकर कहते, “अरे भाई, औलाद को कितना भी पढ़ा-लिखा लो, अंत में उन्हें अपने ही बूढ़े माँ-बाप बोझ लगने लगते हैं। तीन-तीन बेटे अफसर बने बैठे हैं, और हम दोनों यहाँ तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं। भगवान ऐसी औलाद किसी को न दे।”

उनकी ये बातें सुनकर कस्बे के लोग बेटों को कोसने लगते। यह बात जब कभी फोन के जरिए बेटों तक पहुँचती, तो उनका दिल छलनी हो जाता था। वे समझ नहीं पाते थे कि जिस पिता की हर जरूरत, दवाओं का खर्च, घर के नौकरों की पगार वे हर महीने नियमित भेजते हैं, दिन में दो बार फोन पर हाल-चाल लेते हैं और हर त्योहार पर आने की मिन्नतें करते हैं, वही पिता उन्हें दुनिया भर में नालायक और पत्थरदिल साबित करने पर क्यों तुले हैं? क्या ईंट-सीमेंट से बने इस निर्जीव मकान का मोह, खून के सजीव रिश्तों से भी बड़ा हो चुका था?

दिन बीतते गए और उम्र की ढलान ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। दीनानाथ जी के जोड़ों का दर्द बढ़ गया था और गिरिजा देवी का रक्तचाप अक्सर अनियंत्रित रहने लगा था।

सर्दियों के दिन थे। एक रात अचानक कस्बा घने कोहरे की चादर में लिपटा हुआ था। रात के करीब दो बजे गिरिजा देवी के सीने में असहनीय दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर हो गईं और बिस्तर पर ही छटपटाने लगीं। दीनानाथ जी घबराकर उठे। उन्होंने कांपते हाथों से पत्नी को संभाला, पानी पिलाने की कोशिश की, लेकिन गिरिजा देवी की सांसें उखड़ने लगी थीं। दीनानाथ जी बाहर दालान की तरफ दौड़े। उस कड़कड़ाती ठंड और सन्नाटे में दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था। कस्बे का सरकारी अस्पताल पाँच किलोमीटर दूर था और रात के वक्त कोई सवारी मिलना नामुमकिन था।

दीनानाथ जी ने मोहल्ले के दो-चार दरवाजों पर दस्तक दी, लेकिन आधी रात को किसी ने जल्दी दरवाजा नहीं खोला। जो एक-दो पड़ोसी बाहर निकले भी, उनके पास कोई गाड़ी नहीं थी। दीनानाथ जी बेबसी से आँगन में खड़े होकर अपनी उस भव्य हवेली को देखने लगे। वह मकान, जिस पर उन्हें कभी इतना गुमान था, उस वक्त एक विशाल, डरावने और बेजान खंडहर जैसा लग रहा था। वे रोते हुए चिल्लाए, “कोई तो मदद करो! मेरी गिरिजा को बचा लो!” लेकिन उस आलीशान कोठी की दीवारें केवल उनकी बेबस चीखों की प्रतिध्वनि लौटा रही थीं। ईंट और गारे से बना वह मकान उनकी जीवनसंगिनी को एक सांस तक देने में असमर्थ था।

उसी घबराहट में दीनानाथ जी ने सबसे छोटे बेटे नितेश को फोन मिलाया। नितेश ने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया। पिता की रोती हुई आवाज सुनकर वह समझ गया कि मामला गंभीर है। नितेश ने तुरंत दिल्ली में बैठकर अपने प्रशासनिक संपर्कों का इस्तेमाल किया। उसने जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और पुलिस अधीक्षक को फोन किया। पंद्रह मिनट के भीतर कस्बे के पास से एक अत्याधुनिक एम्बुलेंस सायरन बजाती हुई दीनानाथ जी के दरवाजे पर आ पहुँची। साथ में डॉक्टर और ऑक्सीजन सिलेंडर भी थे।

गिरिजा देवी को तुरंत जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें दिल का हल्का दौरा पड़ा था, अगर दस मिनट की भी देर हो जाती तो अनहोनी टलना मुश्किल था। अगली सुबह होते-होते आलोक बेंगलुरु से पहली फ्लाइट पकड़कर पहुँच गया, मयंक मुंबई से आ गया और नितेश रात में ही गाड़ी चलाकर अस्पताल पहुँच चुका था।

जब दीनानाथ जी ने अस्पताल के गलियारे में तीनों बेटों और बहुओं को बदहवास हालत में खड़े देखा, तो उनके पैर कांपने लगे। बेटों की आँखों में माँ को खोने का खौफ और पिता के लिए असीम चिंता साफ झलक रही थी। आलोक ने आगे बढ़कर अपने बूढ़े पिता को दोनों बाहों में समेट लिया। नितेश पिता के पैरों के पास बैठ गया और रोते हुए बोला, “बाबूजी, आप हमसे नाराज हो लीजिए, हमें डांट लीजिए, लेकिन भगवान के लिए अब अपनी यह जिद छोड़ दीजिए। अगर कल रात माँ को कुछ हो जाता, तो हम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते। हमारा यह सारा पैसा, यह पद, यह प्रतिष्ठा किस काम की, अगर हम अपने माँ-बाप के काम ही न आ सकें?”

दीनानाथ जी स्तब्ध खड़े रहे। उन्होंने अपने उन बेटों को देखा जिन्हें वे अब तक दुनिया के सामने खुदगर्ज कहते आए थे। तीनों बेटे अपनी लाखों की जिम्मेदारियाँ, दफ्तर के काम और परिवार छोड़कर एक फोन कॉल पर भागे चले आए थे। दूसरी तरफ, उनका वह पुश्तैनी मकान था, जिसे वे अपनी प्रतिष्ठा की ढाल बनाए बैठे थे।

उस दिन अस्पताल के उस सफेद गलियारे में दीनानाथ जी के भीतर का बरसों पुराना अहंकार और जड़ता चूर-चूर हो गई। उन्हें समझ आ गया कि मकान इंसान को पनाह तो दे सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं। जीवन की संध्या में अपनों का हाथ थामना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी समझदारी होती है। उन्होंने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और पहली बार अपने बेटों के सिर पर कांपता हुआ हाथ रखा।

कुछ ही दिनों में गिरिजा देवी स्वस्थ होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो गईं। जब वे घर लौटीं, तो दीनानाथ जी ने कोठी के मुख्य दरवाजे पर एक बड़ा सा ताला लगाया और उसकी चाबियाँ अपने एक भरोसेमंद पुराने मित्र को सौंप दीं ताकि वह मकान की देखभाल कर सके।

उन्होंने मुड़कर अपनी पत्नी और तीनों बेटों की ओर देखा और एक अत्यंत कोमल स्वर में कहा, “आलोक, मयंक, नितेश… अब यह बूढ़ा बाप किसी ईंट-पत्थर की कैद में नहीं रहेगा। हमारी असली कोठी तो तुम सब हो। अब हम साल के चार महीने बेंगलुरु में रहेंगे, चार महीने मुंबई में और चार महीने दिल्ली में। जहाँ हमारे बच्चे होंगे, वही हमारा तीर्थ होगा।”

यह सुनते ही गिरिजा देवी की आँखों से बरसों बाद राहत और खुशी के आँसू बह निकले। तीनों बेटों के चेहरे खिल उठे और बहुओं ने दौड़कर सास-ससुर के चरण स्पर्श किए। पूरा परिवार एक-दूसरे के गले लग गया। हवेली का वह सूनापन हमेशा के लिए मिट चुका था, क्योंकि जीवन का असली उल्लास ईंट-पत्थर की दीवारों में नहीं, बल्कि अपनों के दिलों के जुड़ाव में सांस लेता है।

पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:

आज के समय में जब युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए बाहर जाने को विवश हैं, तो क्या बुजुर्गों का अपनी जड़ों और मकान के मोह में अड़े रहकर बच्चों से दूर रहना और समाज में उन्हें दोषी ठहराना उचित है? क्या बुजुर्गों को भी समय के साथ अपने विचारों में लचीलापन नहीं लाना चाहिए? अपनी राय और अनुभव कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें।

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लेखिका : रमा शुक्ला

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