देवी का सच्चा दरबार

 वंदना ने झुककर एक-एक बच्ची के नन्हे-मुन्ने पाँव पीतल की परात में रखे, अपने हाथों से गंगाजल से उनके चरण धोए, उन पर महावर और रोली का लेप लगाया और झुककर उनके पाँव छुए। उन बच्चियों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र और बेदाग आनंद था, वह किसी भी सांसारिक वैभव से परे था। बच्चियों ने जब तृप्त होकर हलवा-पूरी खाई और वंदना ने उन्हें चुनरी और खिलौने भेंट किए, तो उन मासूमों के होठों से निकली दुआओं ने उस घर को एक अलौकिक शांति से भर दिया।

 हवा में हल्की ठंडक और नवरात्र के पावन दिनों की महक घुली हुई थी। कल महाअष्टमी थी। रसोई में पीतल की परातों और तांबे के कलश को माँजने की धीमी खटपट हो रही थी। ड्राइंग रूम में सोफे पर अपनी फाइल समेटते हुए सिद्धार्थ ने घड़ी की तरफ देखा और फिर पर्स निकालते हुए अपनी पत्नी वंदना से मुखातिब हुआ, “वंदना, मैं नीचे सुपरमार्केट जा रहा हूँ। कल महाअष्टमी की पूजा है, अगर कुछ कच्चा राशन, पूजा की सामग्री, नारियल, चुनरी या फल रह गए हों तो मुझे अभी बता दो। बाद में ऐन वक्त पर भागदौड़ नहीं होनी चाहिए।”

वंदना ने रसोई के दरवाजे से सिर बाहर निकाला। उसके माथे पर लाल चंदन का तिलक चमक रहा था। उसने चेहरे पर एक शांत और सात्विक मुस्कान लाते हुए कहा, “नहीं, बाकी सारी पूजा की सामग्री मैंने कल ही मंगा ली थी। सूखे मेवे, सूजी, घी और काले चने भी आ गए हैं। बस कन्याओं को देने के लिए थोड़े और फल और उपहार के कुछ खिलौने कम पड़ रहे हैं, वो लेते आना।”

सिद्धार्थ ने कार की चाबी उंगलियों पर घुमाते हुए थोड़ा गंभीर लहजे में पूछा, “सामान तो आ जाएगा वंदना, लेकिन कन्या पूजन का क्या सोचा है तुमने? इस बार कन्याएं कहाँ से आएंगी? हमारी सोसाइटी के इस नए टावर में आए हमें अभी कुछ ही महीने हुए हैं। यहाँ के लोग अपनी रईसी और स्टेटस के नशे में इतने चूर रहते हैं कि अपने बच्चों को किसी के घर भेजना तो दूर, लिफ्ट में ढंग से नमस्ते तक नहीं करते। मुझे नहीं लगता कि सामने वाले फ्लैट वाली मिसेज मल्होत्रा अपनी लाडली को हमारे घर कंजक पूजने के लिए भेजेंगी।”

वंदना ने अपनी आँखें बंद कर हाथ जोड़ते हुए दीवार पर टंगी माँ दुर्गा की तस्वीर को देखा और बहुत ही सहज, विश्वास भरे स्वर में कहा, “तुम व्यर्थ चिंता मत करो। माँ भगवती सब संभाल लेंगी। जिसके द्वार पर साक्षात जगदंबा का वास होता है, वहाँ कंजकों की कमी कभी नहीं होती। तुम बस बाज़ार का काम निपटा आओ।”

सिद्धार्थ के बाहर जाते ही घर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। वंदना सोफे पर बैठ गई और उसकी आँखें बालकनी से बाहर फैले कंक्रीट के उस विशाल जंगल को देखने लगीं। उसका मन बरबस ही छह महीने पहले के उस पहले नवरात्र की तरफ चला गया, जो इस पॉश सोसाइटी में उसका पहला अनुभव था। वंदना एक छोटे और पारंपरिक शहर से ब्याह कर आई थी। उसके मायके और पुराने मोहल्ले में अष्टमी का मतलब होता था—सुबह से ही गलियों में छोटी-छोटी बच्चियों की पायल की रुनझुन, लाल-पीली चुनरियों की चमक और हर घर के दरवाजे खुले रहना। जब तक कन्याओं के नन्हे चरणों को अपने आंसुओं और गंगाजल से धोया न जाए, उनके पाँव में महावर न लगाया जाए और उन्हें अपने हाथों से पूरी-हलवा न खिलाया जाए, तब तक वंदना का व्रत पूरा नहीं होता था।

लेकिन इस शहर के पॉश इलाके का माहौल बिल्कुल जुदा था। यहाँ बड़ी-बड़ी गाड़ियों और करोड़ों के फ्लैटों में रहने वाले लोगों के दिल बहुत संकीर्ण थे। पिछले चैत्र नवरात्र में वंदना ने बड़ी विनम्रता से अपने सामने वाले फ्लैट की मालकिन, मिसेज नीरजा मल्होत्रा से विनती की थी। नीरजा जी शहर के बड़े उद्योगपति की पत्नी थीं और हर बात में ‘क्लास’ और ‘स्टैंडर्ड’ की बात करना उनकी आदत थी। बहुत मान-मनौव्वल के बाद नीरजा जी अपनी सात साल की इकलौती बेटी मायरा को भेजने के लिए तैयार हुई थीं।

उस दिन सुबह मायरा अपनी निजी नैनी के साथ वंदना के घर आई थी। गुलाबी रंग की फ्रॉक पहने, हाथ में एक विदेशी टेडी बियर लिए वह गुड़िया जैसी लग रही थी। ठीक उसी समय वंदना के घर में काम करने वाली बाई, पार्वती, अपनी पाँच साल की बेटी गुडिया को भी साथ ले आई थी। गुडिया ने एक पुरानी, लेकिन धुली हुई नीली फ्रॉक पहन रखी थी। उसके उलझे बालों में एक लाल रिबन बंधा था और उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों में घर की सजावट और सुगंधित अगरबत्ती को देखकर एक असीम कौतूहल था।

वंदना ने जैसे ही मायरा को बड़े प्यार से बुलाकर रेशमी गद्देदार सोफे पर बिठाया, गुडिया भी मासूमियत से मुस्कुराती हुई उसी सोफे के दूसरे कोने पर जाकर बैठ गई। यह देखते ही मिसेज मल्होत्रा की नैनी ने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया और तीखे स्वर में वंदना से कहा, “मैडम, ये कामवाली की बच्ची भी हमारे बेबी के साथ बैठेगी क्या? मैम ने साफ कहा था कि मायरा का हाइजीन सबसे पहले है। अगर ये स्लम की लड़की साथ बैठेगी तो मैम बहुत गुस्सा करेंगी।”

वंदना के कुछ बोलने से पहले ही, पांच साल की गुडिया ने शायद उन कठोर शब्दों के भाव को भांप लिया। वह सहम गई। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में भय और हीनता के आंसू छलक आए। वह चुपचाप सोफे से नीचे उतरी और रसोई के अंधेरे कोने में जाकर अपनी माँ पार्वती की फटी साड़ी के पल्लू के पीछे छुप गई। पार्वती का सिर शर्म और बेबसी से झुक गया था। उसकी आँखों से गिरता पानी उसकी गालों पर सूख रहा था। पार्वती ने कांपते हुए हाथ जोड़कर कहा था, “मेमसाब, आप पहले बड़ी मैडम की बच्ची का पूजन कर लीजिए। मेरी गुडिया तो घर की है, इसका पूजन बाद में फर्श पर बिठाकर कर देना। बड़े लोगों के बच्चे हमारे बच्चों के साथ कैसे बैठेंगे।”

उस पल वंदना का सीना किसी तीखे खंजर से छलनी हो गया था। उसने पार्वती का हाथ पकड़ा और दृढ़ स्वर में कहा था, “पार्वती, माँ जगदंबा के दरबार में जात, पात और पैसे का भेद करने वाला कभी भक्त नहीं हो सकता। देवी किसी के बैंक बैलेंस को देखकर नहीं आतीं।” वंदना दौड़कर रसोई में गई और उसने सहमी हुई गुडिया को अपनी बाहों में उठा लिया। उसने भरी आँखों से गुडिया के माथे को चूमा और सोफे के सबसे बीच वाले स्थान पर बिठाते हुए कहा था, “ये तो मेरी सबसे छोटी और सबसे लाडली कंजक है। आज इसकी पूजा सबसे पहले होगी।”

मायरा की नैनी ने यह सब देखा और मुंह बिचकाते हुए मायरा का हाथ खींचकर ले गई। अगले ही घंटे मिसेज मल्होत्रा का फोन आ गया था। फोन पर वे गुस्से से आगबबूला हो रही थीं, “मिसेज वंदना, अगर आपको अपनी सोसाइटी का स्टेटस मेंटेन करना नहीं आता, तो अपने इस अंधविश्वास में हमारे बच्चों को मत घसीटिए। कामवाली के बच्चों के साथ हमारे बच्चे बैठेंगे? व्हाट नॉनसेंस! आइंदा मेरी बच्ची को अपने घर बुलाने की हिम्मत मत करना।”

उस दिन वंदना खूब रोई थी। उसने गुडिया को हलवा-पूरी खिलाई, नए कपड़े दिए, लेकिन समाज के उस खोखलेपन ने उसके मन पर गहरा घाव छोड़ दिया था।

अचानक दरवाजे की घंटी बजी और वंदना वर्तमान में लौट आई। सामने सिद्धार्थ खड़ा था, उसके दोनों हाथों में फलों और खिलौनों के थैले थे। सिद्धार्थ ने सामान डाइनिंग टेबल पर रखते हुए पूछा, “क्या सोच रही हो वंदना? कल की तैयारी हो गई पूरी? मुझे अभी भी चिंता हो रही है कि कल सुबह पूजा के लिए नौ कन्याएं कहाँ से पूरी होंगी।”

वंदना ने मुस्कुराकर कहा, “तुम बस कल सुबह का चमत्कार देखना। मेरी माँ दुर्गा अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं।”

अगली सुबह, महाअष्टमी की पावन बेला में पूरे घर में शंख और घंटों की गूँज सुनाई दे रही थी। हवन कुंड से उठती सुगंधित आहुति की महक पूरे वातावरण को पवित्र कर रही थी। वंदना ने नौ थालियों में गरमा-गरम सूजी का हलवा, काले चने और फूली हुई पूरियां सजा रखी थीं। सिद्धार्थ नहा-धोकर कुर्ते-पायजामे में तैयार होकर ड्राइंग रूम में आया।

जैसे ही उसने मुख्य दरवाजे की तरफ देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। पूरा कमरा छोटी-छोटी कन्याओं की खिलखिलाहट, उनकी रंग-बिरंगी चुनरियों की सरसराहट और पायल की मीठी झंकार से गूंज रहा था। कमरे में एक नहीं, दो नहीं, बल्कि बारह छोटी-छोटी बच्चियां बैठी हुई थीं। किसी के सिर पर लाल चुनरी थी, किसी के माथे पर चमकीली बिंदी, और उन सब के बीच में बैठी थी गुडिया, जो आज रानी बिटिया जैसी सज-धज कर आई थी। उसके चेहरे पर फैली मुस्कान पूरे कमरे को रोशन कर रही थी।

सिद्धार्थ ने अचरज से वंदना की तरफ देखा और भावुक होकर बोला, “वंदना! यह सब… यह तो सचमुच साक्षात चमत्कार है। इतनी सारी कन्याएं कहाँ से आ गईं? आज तो माँ भगवती की असीम कृपा बरस पड़ी है हम पर।”

वंदना कुछ कहती, उससे पहले ही पार्वती अपने हाथ में पानी का कलश लिए आगे बढ़ी। उसकी आँखों में कृतज्ञता के आंसू थे। पार्वती ने हाथ जोड़कर कहा, “भैया जी, ये सब मेरी बस्ती की बच्चियां हैं। कल शाम को दीदी ने मुझसे कहा था कि पार्वती, इस बार कन्या पूजन में मैं किसी घमंडी को नहीं बुलाऊंगी। तू अपनी गुडिया की जितनी भी सहेलियां हैं, जो कभी किसी बड़े घर में बैठकर आदर से भोजन नहीं कर पाईं, उन सबको अपने साथ ले आना। जब मैंने बस्ती में यह बात बताई, तो गुडिया खुशी के मारे नाचने लगी और उसने पूरी बस्ती की छोटी बच्चियों को निमंत्रण दे दिया। आज सुबह से ही ये बच्चियां नहा-धोकर तैयार बैठी थीं कि आज उन्हें देवी माँ का आदर मिलने वाला है।”

वंदना ने झुककर एक-एक बच्ची के नन्हे-मुन्ने पाँव पीतल की परात में रखे, अपने हाथों से गंगाजल से उनके चरण धोए, उन पर महावर और रोली का लेप लगाया और झुककर उनके पाँव छुए। उन बच्चियों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र और बेदाग आनंद था, वह किसी भी सांसारिक वैभव से परे था। बच्चियों ने जब तृप्त होकर हलवा-पूरी खाई और वंदना ने उन्हें चुनरी और खिलौने भेंट किए, तो उन मासूमों के होठों से निकली दुआओं ने उस घर को एक अलौकिक शांति से भर दिया।

तभी फ्लैट का मुख्य दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था। बाहर लिफ्ट से मिसेज नीरजा मल्होत्रा अपनी बेटी मायरा के साथ गुजर रही थीं। अंदर से आती बाल-हंसी और मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनकर उनके कदम खुद-ब-खुद ठिठक गए। उन्होंने कौतूहलवश अंदर झांका।

अंदर का दृश्य देखकर मिसेज मल्होत्रा के पैरों तले की जमीन खिसक गई। उन्होंने देखा कि एक संपन्न, पढ़ी-लिखी महिला उन गरीब, झुग्गी-झोपड़ी की बच्चियों के चरणों में अपना सिर झुकाए बैठी थी और उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। उन बच्चियों के चेहरों पर एक ऐसा तेज और आभा थी, जैसी किसी मंदिर की मूर्तियों में भी दुर्लभ होती है। वहीं पास में खड़ी मायरा ने अपनी माँ की उंगली छोड़ दी और अंदर की ओर देखते हुए मासूमियत से बोली, “मम्मा, देखो वो सब लड़कियां कितनी खुश हैं! उनके सिर पर कैसी सुंदर चुनरी है। मुझे भी वहां जाना है मम्मा, मुझे भी उन दीदी के पास जाना है।”

अपनी सात साल की बच्ची के इन सीधे शब्दों ने मिसेज मल्होत्रा के कलेजे पर सीधा वार किया। उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके चेहरे पर ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया हो। उनका तथाकथित ‘क्लास’, उनकी रईसी का झूठा घमंड, उनके करोड़ों के फ्लैट का अहंकार उस क्षण उस मिट्टी के फर्श पर बहते गंगाजल के आगे तिनके की तरह बिखर गया। उन्हें याद आया कि कैसे उन्होंने इस पावन पर्व को भी अमीरी और गरीबी की तराजू में तौल दिया था। उन्होंने कैसे एक पाँच साल की बच्ची के दिल को तोड़ा था, केवल इसलिए क्योंकि उसकी माँ एक गरीब कामवाली थी।

मिसेज मल्होत्रा की आँखों में पश्चाताप के आंसू भर आए। उनका गला रुंध गया। वे अपनी झिझक और झूठे स्टेटस की बेड़ियों को तोड़ते हुए धीरे-धीरे कदमों से वंदना के घर की चौखट के भीतर दाखिल हुईं।

ड्राइंग रूम में सब खामोश हो गए। पार्वती डर कर एक तरफ हट गई। सिद्धार्थ भी थोड़ा असहज हो गया। वंदना ने सिर उठाकर देखा और विनम्रता से खड़ी हो गई।

मिसेज मल्होत्रा ने आगे बढ़कर अपने कांपते हाथ जोड़ लिए। उनकी आवाज थरथरा रही थी, “वंदना जी… मुझे माफ कर दीजिए। आज आपके इस घर ने, आपके इस खुले दिल ने मेरी बंद आँखों पर पड़ा अंधकार का पर्दा हमेशा के लिए हटा दिया है। मैं अपने पैसों के नशे में इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल गई थी कि ईश्वर कभी इंसान की बनाई सीमाओं में नहीं बंधता। देवी अमीरी-गरीबी देखकर नहीं, सिर्फ श्रद्धा और पवित्रता देखकर आती हैं।”

उन्होंने मायरा को आगे किया और रोते हुए बोलीं, “मैंने कल अपनी बेटी को इस दिव्य अनुभव से दूर रखने का जो पाप किया था, आज मुझे उसका प्रायश्चित करने दीजिए। क्या आप मेरी मायरा को भी इन देवियों के साथ बैठने की अनुमति देंगी? क्या मेरी बच्ची भी इन कंजकों के साथ बैठकर आपके हाथ का प्रसाद पा सकती है?”

वंदना की आँखें छलक उठीं। उसने बिना एक पल गंवाए मिसेज मल्होत्रा के हाथ थाम लिए और स्नेह से कहा, “नीरजा जी, माँ के दरबार में किसी से कोई बैर नहीं होता। यहाँ तो जो भी आ जाए, वही उनका अपना है। मायरा तो साक्षात माँ का ही रूप है।”

वंदना ने मायरा को प्यार से गोद में उठाया और ले जाकर ठीक गुडिया के बगल में बिठा दिया। गुडिया ने मुस्कुराकर मायरा का हाथ पकड़ लिया और अपनी थाली से एक काजू उठाकर मायरा की हथेली पर रख दिया। मायरा खिलखिला कर हंस पड़ी। दोनों बच्चियों के हाथों का वह मिलन वास्तव में उस क्षण दो अलग-अलग दुनियाओं, अमीरी और गरीबी के बीच का सबसे सुंदर संगम बन गया था।

मिसेज मल्होत्रा ने भी अपनी रेशमी साड़ी की परवाह किए बिना फर्श पर घुटने टेक दिए। उन्होंने खुद अपने हाथों से गुडिया और बस्ती की अन्य बच्चियों के पाँव छुए और उन्हें अपने आंचल से उपहार दिए। उस दिन उस घर में जो उत्सव मना, वह सिर्फ नवरात्र का कन्या पूजन नहीं था, बल्कि वह मानवीय संवेदनाओं, समानता और सच्चे संस्कारों की सबसे बड़ी विजय थी। घर के मंदिर में जल रही अखंड ज्योति की लौ अचानक ऊंची उठकर लहराई, मानो साक्षात माँ जगदंबा मुस्कुराकर अपने इस सच्चे दरबार को अपना आशीर्वाद दे रही हों।

क्या आपको भी लगता है कि भक्ति और ईश्वर के दरबार में अमीरी, गरीबी और सामाजिक रुतबे का कोई स्थान नहीं होना चाहिए? क्या सच्ची पूजा वही है जो बिना किसी भेदभाव के हर आत्मा में परमात्मा का दर्शन कराए? इस प्रेरक प्रसंग पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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