जीवन संध्या की सुनहरी धूप

 “लेकिन बेटा, असली अग्निपरीक्षा तो तब शुरू हुई जब मेरे ससुर जी का अचानक निधन हो गया,” आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “ससुर जी के जाने के बाद मेरी सास बिल्कुल अकेली हो गईं। वे स्वभाव से बेहद अधिकारवादी, तेज-तर्रार और दबंग महिला थीं। सत्यप्रकाश अपने भाइयों में सबसे सीधे और अपनी माँ के प्रति जरूरत से ज्यादा आज्ञाकारी थे। माँ ने साफ कह दिया कि वे गाँव या अपने पुराने घर में अकेले नहीं रहेंगी, और उन्होंने अपने रसूख और बीमारी का वास्ता देकर अपने बेटे का तबादला उसी शहर में अपने पास करवा लिया जहाँ वे रहती थीं।”

सुबह की हल्की गुलाबी ठंड में जब भी मैं पार्क की पगडंडी से गुजरती, उस सफेद रंग के दोमंजिला बंगले के बाहर मेरी नजरें अनायास ही ठहर जाती थीं। वह घर कोई बहुत बड़ा महल नहीं था, लेकिन उसमें एक अजीब सा सुकून और गरिमा झलकती थी। सामने का छोटा सा लॉन हमेशा मखमली हरी घास से सजा रहता था, क्यारियों में गेंदे, गुलाब और बोगनवेलिया के फूल खिले रहते थे। पर उस घर की सबसे खूबसूरत तस्वीर उसका बरामदा था।

हर सुबह, लगभग ठीक सात बजे, दो सफेद बालों वाले बुजुर्ग पति-पत्नी वहाँ रखी लकड़ी की आरामकुर्सियों पर बैठे मिलते थे। हाथ में भाप उड़ाती चाय की प्याली, सामने मेज पर फैला दैनिक अखबार, और दोनों के चेहरों पर एक ऐसी निश्चिंत हंसी जो आज के भागदौड़ भरे दौर में दुर्लभ हो चुकी है। कभी सज्जन चश्मा उतारकर पत्नी को अखबार की कोई खबर पढ़कर सुनाते, तो कभी महिला अपनी धीमी, मीठी आवाज में कुछ कहकर खिलखिला पड़तीं। दुनिया जहाँ अवसाद, अकेलेपन और बिखराव से जूझ रही थी, वहीं यह वृद्ध जोड़ा अपनी ही बनाई एक छोटी सी स्वर्ग जैसी दुनिया में पूरी तरह मस्त दिखता था।

मन में बार-बार यह सवाल उठता था कि आखिर इस उम्र में, जब शरीर बीमारियों से घिर जाता है और रिश्ते अक्सर औपचारिक हो जाते हैं, तब इन दोनों के चेहरे पर यह तेज और आँखों में इतना गहरा अनुराग कैसे जिंदा है? उनकी इस जिंदादिली की थाह लेने की ललक मेरे भीतर कई दिनों से सुलग रही थी।

संयोग ऐसा बना कि हमारे स्थानीय सामाजिक संगठन की पत्रिका के लिए मुझे ‘वरिष्ठ नागरिक दिवस’ पर समाज के कुछ ऐसे जोड़ों से बात करनी थी जिन्होंने गृहस्थ जीवन के पचास वर्ष सफलतापूर्वक पूरे किए हों। मेरे लिए उस बंगले के दरवाजे पर दस्तक देने का यह सबसे मुफीद बहाना था।

एक दिन सुबह की सैर के दौरान जब वे दोनों अपने लॉन के पौधों को पानी दे रहे थे, मैं हिम्मत जुटाकर लोहे के छोटे फाटक पर रुक गई। मैंने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा, “नमस्ते अंकल जी, नमस्ते आंटी जी! मैं अक्सर आप दोनों को यहाँ साथ देखती हूँ। अगर आप बुरा न मानें, तो क्या मैं कल शाम आप लोगों से थोड़ी देर बात करने आ सकती हूँ? हमारी पत्रिका के लिए एक छोटा सा साक्षात्कार लेना था।”

मेरी बात सुनकर दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और उनके चेहरों पर वही जानी-पहचानी आत्मीय मुस्कान तैर गई। अंकल जी ने स्नेह भरे स्वर में कहा, “अरे बेटा, इसमें पूछना क्या है? बुजुर्गों के पास तो अब वक्त ही वक्त है। कल शाम चार बजे आ जाओ, साथ में चाय पिएंगे।”

अगले दिन नियत समय पर जब मैंने उनके घर में कदम रखा, तो मैं भीतर की व्यवस्था देखकर दंग रह गई। हर कोना सलीके से सजा था। दीवारों पर पुरानी पारिवारिक तस्वीरें, पीतल की नक्काशीदार घंटी, किताबों की एक छोटी सी अलमारी और हल्की भीनी अगरबत्ती की सुगंध। 72 वर्षीय मनोरमा आंटी ने खादी की एक बेहद सादी लेकिन सुरुचिपूर्ण साड़ी पहन रखी थी। अंकल जी, जिनका नाम सत्यप्रकाश जी था, ने मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया और कुछ ही पलों बाद बोले, “आप दोनों बातें कीजिए, मैं जरा बाहर अपने दोस्तों के साथ चौपाल तक हो आता हूँ, तब तक आपकी बातें भी बिना किसी झिझक के हो जाएंगी।”

उनके बाहर जाते ही माहौल एकदम सहज हो गया। मनोरमा आंटी ने मेरे सामने अदरक की गरमागरम चाय और घर के बने कुरकुरे मेथी के मठरी की प्लेट रखी। मैंने बातचीत का सिरा पकड़ा, “आंटी, बाहर से देखकर लगता है कि आपका यह पचास साल का सफर किसी परियों की कहानी जैसा रहा होगा। इस अटूट प्रेम और तालमेल का राज क्या है?”

मेरी बात सुनकर आंटी के होंठों पर एक हल्की सी फीकी मुस्कान आई, जिसमें बरसों के दर्द और संघर्ष की परछाईं साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने अपनी चाय की चुस्की ली और खिड़की से बाहर देखते हुए बोलीं, “बेटा, दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं। आज जो तुम्हें यह शांत समंदर दिख रहा है, उसने न जाने कितने खौफनाक तूफानों का सामना किया है। यह जो सुकून तुम हमारे चेहरे पर देख रही हो, यह हमें किसी थाली में परोसकर नहीं मिला, इसे मैंने अपने खून-पसीने, आंसुओं और असीम सब्र से सींचकर कमाया है।”

मनोरमा आंटी ने अपनी यादों के पन्नों को पलटना शुरू किया। उन्होंने बताया कि जब वे केवल बीस वर्ष की थीं, तब उनके पिता ने सत्यप्रकाश जी के साथ उनका रिश्ता तय कर दिया था। पिता पुराने खयालात के, बेहद अनुशासनप्रिय और रोबीले स्वभाव के व्यक्ति थे। उनके सामने घर में किसी को भी ‘ना’ कहने की इजाजत नहीं थी। सत्यप्रकाश जी उस वक्त सिंचाई विभाग में एक कनिष्ठ अभियंता के पद पर थे। पिता ने सिर्फ उनकी पक्की सरकारी नौकरी और खानदान की प्रतिष्ठा देखी। उन्होंने यह जानने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की कि जहाँ उनकी बेटी ब्याह कर जा रही है, वहाँ का पारिवारिक माहौल कैसा है।

आंटी ने कहा, “सच कहूँ तो मुझे उस समय यह शादी बिल्कुल पसंद नहीं थी। मेरे अपने कुछ छोटे-मोटे ख्वाब थे, पढ़ने की इच्छा थी। लेकिन उस दौर में बेटियों की मर्जी पूछता ही कौन था? हाँ, मेरे पिता ने मुझे घर-गृहस्थी, सिलाई-कढ़ाई और पाक कला में पूरी तरह निपुण बनाया था। विदाई के समय मेरी माँ ने सिर्फ एक ही सीख दी थी—’बेटी, ससुराल में सब्र, बर्दाश्त और झुकना ही एक स्त्री का सबसे बड़ा गहना होता है। मायके की चौखट छोड़ दी है, अब उसी घर को अपना संसार समझना।’ उस वक्त मेरे पास सामंजस्य बिठाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।”

विवाह के शुरुआती दो-तीन साल दोनों एक छोटे से कस्बे में अकेले रहे जहाँ सत्यप्रकाश जी की पहली पोस्टिंग थी। शुरू में खान-पान, रहन-सहन और सोच के स्तर पर काफी खिंचाव हुआ। लेकिन सत्यप्रकाश जी स्वभाव से बेहद शांत, संवेदनशील और ख्याल रखने वाले इंसान थे। धीरे-धीरे मनोरमा जी ने उनके मिजाज को समझा और खुद को उस नए सांचे में ढाल लिया। इसी बीच उनकी एक बेटी और एक बेटा हुआ। जिंदगी सामान्य ढर्रे पर चल रही थी।

“लेकिन बेटा, असली अग्निपरीक्षा तो तब शुरू हुई जब मेरे ससुर जी का अचानक निधन हो गया,” आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “ससुर जी के जाने के बाद मेरी सास बिल्कुल अकेली हो गईं। वे स्वभाव से बेहद अधिकारवादी, तेज-तर्रार और दबंग महिला थीं। सत्यप्रकाश अपने भाइयों में सबसे सीधे और अपनी माँ के प्रति जरूरत से ज्यादा आज्ञाकारी थे। माँ ने साफ कह दिया कि वे गाँव या अपने पुराने घर में अकेले नहीं रहेंगी, और उन्होंने अपने रसूख और बीमारी का वास्ता देकर अपने बेटे का तबादला उसी शहर में अपने पास करवा लिया जहाँ वे रहती थीं।”

उस संयुक्त परिवार में कदम रखते ही मनोरमा जी का जीवन नर्क के समान हो गया। सास को बेटे और बहू का आपस में हंसना-बोलना भी बर्दाश्त नहीं होता था। उनके मन में हमेशा यह असुरक्षा और डर बना रहता था कि कहीं यह पढ़ी-लिखी बहू उनके बेटे को उनके प्रभाव से पूरी तरह दूर न कर दे। इसी इनसिक्योरिटी के चलते सास ने मनोरमा जी के खिलाफ षड्यंत्रों का जाल बुनना शुरू कर दिया।

“सुबह चार बजे उठने से लेकर रात के ग्यारह बजे तक मेरी सांसों पर पहरा था,” आंटी ने अपनी नम आँखें पोंछते हुए कहा। “मैं क्या पहनूँगी, बच्चों को क्या खिलाऊँगी, यहाँ तक कि अपने पति से कब और कैसे बात करूँगी, यह सब मेरी सास तय करती थीं। छोटी-छोटी बातों पर ताने, रिश्तेदारों के सामने अपमान और बात-बात पर मेरे मायके को कोसना उनका रोज का नियम बन गया था। और सबसे दुखद बात यह थी कि मेरे पति अपनी माँ के सामने बिल्कुल भीगी बिल्ली बन जाते थे। वे अपनी माँ के किसी भी अन्याय का विरोध नहीं कर पाते थे। माँ की हर गलत बात को भी वे सिर झुकाकर सच मान लेते थे। उन्हें लगता था कि माँ का विरोध करना मातृ-धर्म के खिलाफ है।”

उस दौर में सत्यप्रकाश जी का व्यवहार भी बदल गया था। माँ के डर और दबाव के कारण वे मनोरमा जी से सीधे मुँह बात तक नहीं करते थे। किसी समारोह में साथ जाना तो दूर, घर में एक साथ बैठकर चाय पीना भी एक गुनाह जैसा बन गया था।

मनोरमा जी ने गहरी सांस लेते हुए आगे कहा, “बेटा, वे बीस साल मैंने कैसे काटे हैं, यह केवल मेरा ईश्वर जानता है। कई बार ऐसा दौर आया जब मेरा दम घुटने लगता था। मन करता था कि बच्चों को लेकर कहीं दूर भाग जाऊँ, या फिर इस जिल्लत भरी जिंदगी को ही हमेशा के लिए खत्म कर लूँ। लेकिन फिर अपने नन्हे बच्चों के मासूम चेहरे देखती, अपनी माँ की वह बात याद आती कि ‘धैर्य कभी व्यर्थ नहीं जाता’, और मैं अपने आंसुओं को पीकर खामोश रह जाती थी। सास अब इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए मैं उनके बारे में कोई अपशब्द नहीं कहना चाहती, पर यह सच है कि उन्होंने मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत और ऊर्जावान साल अपनी असुरक्षा की भेंट चढ़ा दिए।”

मैंने उत्सुकता से पूछा, “फिर यह बदलाव कैसे आया आंटी? अंकल जी का यह रूप कब सामने आया?”

आंटी के चेहरे पर एक कोमल संतोष की रेखा खिंच गई। वे बोलीं, “जब मेरी सास का देहांत हुआ, तब जाकर घर की वह घुटन भरी हवा धीरे-धीरे साफ हुई। उनकी मृत्यु के बाद जब घर में सन्नाटा पसरा, तब मेरे पति को शायद पहली बार यह अहसास हुआ कि जिस औरत ने पिछले दो दशकों से बिना किसी शिकायत के उनकी माँ की सेवा की, हर अपमान का घूंट पिया और कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, वह वास्तव में इस घर की कितनी बड़ी रीढ़ थी। उन्हें अपनी गलतियों और अपनी बेबसी का गहरा पछतावा हुआ।”

समय के साथ बच्चे बड़े हो गए, उच्च शिक्षा पाकर अच्छी कंपनियों में स्थापित हो गए और अपने-अपने परिवारों के साथ महानगरों में बस गए। जब सत्यप्रकाश जी सरकारी सेवा से मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए, तो उन्होंने अपनी बाकी बची जिंदगी पूरी तरह से मनोरमा जी के नाम समर्पित करने का संकल्प लिया।

“रिटायरमेंट के बाद उन्होंने मुझसे हाथ जोड़कर माफी मांगी थी,” आंटी की आँखों में चमक आ गई। “उन्होंने कहा कि ‘मनोरमा, तुम्हारी जवानी का जो सुकून मैंने अपनी मजबूरी के चलते छीना था, मैं उसे तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन अपनी बची हुई हर सांस अब सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिए जिऊंगा।’ और सच में, पिछले दस-बारह सालों में उन्होंने मुझे वह सारा प्यार और सम्मान लौटा दिया जिसकी मैं कभी हकदार थी। आज अच्छी पेंशन है, कोई आर्थिक तंगी नहीं है। हम दोनों देश-विदेश के कई तीर्थ और पर्यटन स्थल घूम चुके हैं। आज वे मेरी बिना कही बात भी समझ जाते हैं। रसोई से लेकर दवाइयों तक, मेरा ऐसा ख्याल रखते हैं जैसे किसी नन्हीं बच्ची का रखा जाता है।”

आंटी ने मुस्कुराते हुए आगे कहा, “बच्चे बहुत अच्छे हैं। वे बार-बार कहते हैं कि हमारे साथ बड़े शहर में आकर रहो, लेकिन हमें उनके पास हफ्ते-दस दिन से ज्यादा अच्छा नहीं लगता। हमारा मन अपने इसी आशियाने में रमता है। आज हम दोनों एक-दूसरे के सबसे पक्के दोस्त हैं। जवानी में जो प्रेम जिम्मेदारियों और बंधनों की धूल में दब गया था, वह आज इस ढलती उम्र में सोने की तरह चमक रहा है।”

मैंने उनसे अंतिम सवाल पूछा, “आंटी, आज की पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है? आज अरेंज मैरिज, लव मैरिज और लिव-इन को लेकर बहुत बहसें होती हैं।”

मनोरमा आंटी ने बेहद संजीदगी से जवाब दिया, “बेटा, शादी का तरीका कोई भी हो—चाहे परिवारों द्वारा तय की गई हो या खुद चुनी गई हो—शादी की सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसकी शुरुआत कैसे हुई थी। अरेंज मैरिज में अक्सर परिवारों की दखलअंदाजी और अपेक्षाएं ज्यादा होती हैं, जो कई बार कड़वाहट पैदा करती हैं। लव मैरिज में शुरुआत में तो सब परियों जैसा लगता है, लेकिन जैसे ही शुरुआती आकर्षण और प्रेम का नशा उतरता है, दोनों एक-दूसरे की कमियों को बर्दाश्त नहीं कर पाते और बात तलाक तक पहुँच जाती है। और लिव-इन रिलेशनशिप में तो जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं होता, जहाँ जिम्मेदारी नहीं वहाँ समर्पण कैसा? किसी भी रिश्ते को लंबा चलाने के लिए केवल प्यार काफी नहीं होता; उसके लिए अपार धैर्य, एक-दूसरे के प्रति गहरा सम्मान, विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़े रहने का हौसला और समय के साथ चीजों को भूलकर माफ करने का हुनर चाहिए होता है।”

बातें खत्म होते-होते बाहर सत्यप्रकाश जी की कदमों की आहट सुनाई दी। वे हाथ में ताजे चमेली के फूलों का एक छोटा सा गजरा लिए अंदर आए और बड़े लाड़ से मनोरमा जी की हथेली पर रख दिया। दोनों की आँखों में जो मूक संवाद और प्रेम था, उसे देखकर मेरा मन श्रद्धा से भर गया।

यह कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण थी कि जीवन की असली खूबसूरती केवल शुरुआती वसंत में नहीं होती, बल्कि उन पतझड़ों को झेलकर साथ खड़े रहने के बाद आने वाली सुनहरी धूप में होती है। प्रेम अगर सच्चा और धैर्यवान हो, तो वह जीवन के किसी भी मोड़ पर बंजर जमीन में भी फूल खिला सकता है।

पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:

विवाह जैसी संस्था को अटूट और जीवंत बनाए रखने के लिए आपके विचार से सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्या है—आकर्षण, धन-दौलत, या एक-दूसरे के प्रति अटूट धैर्य और सम्मान? अपने अनमोल अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : कुमुद मोहन

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