चक्रव्यूह से मुक्ति की भोर

विवाह को अभी मुश्किल से चालीस दिन ही हुए थे कि एक दोपहर वर्तिका ने अपने सारे कीमती जेवर और कपड़े सूटकेस में भरे और मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली। कौशल्या जी ने घबराकर पूछा, “अरे बहू, यह क्या? अचानक कहाँ की तैयारी है?” वर्तिका ने मुड़कर देखे बिना रूखेपन से कहा, “बाजार तक जा रही हूँ, मेरा ममेरा भाई गाड़ी लेकर बाहर खड़ा है।” जब तक कौशल्या जी संभल पातीं, वह गाड़ी में बैठकर जा चुकी थी। शाम को भानुप्रताप जी का फोन आया कि वर्तिका सकुशल अपने मायके पहुँच गई है और कुछ दिन वहीं रहेगी।

हवा में चमेली की भीनी-भीनी महक घुली हुई थी और ड्राइंग रूम में रिश्तेदारों के ठहाकों की गूंज थी। अवसर ही कुछ ऐसा था; छब्बीस वर्षीय अक्षत ने अपने पहले ही प्रयास में राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर वाणिज्य कर अधिकारी का प्रतिष्ठित पद हासिल किया था। सादगी पसंद, मृदुभाषी और अपने माता-पिता के आज्ञाकारी अक्षत के चेहरे पर वही चिर-परिचित सौम्यता थी जो हर किसी का मन मोह लेती थी। पिता हरिशंकर जी, जो शिक्षा विभाग से हाल ही में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए थे, अपने जीवन भर के उसूलों और बेटे की इस उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहे थे। माँ कौशल्या जी की आँखें बेटे की नजर उतारते हुए बार-बार छलक आती थीं। मोहल्ले और नाते-रिश्तेदारी के लोग अक्षत के संस्कारों की मिसालें देते नहीं थक रहे थे कि आज के बदलते दौर में भी यह लड़का किसी व्यसन या गलत संगत से कोसों दूर अपनी जड़ों से जुड़ा रहा।

समारोह के समाप्त होने के कुछ दिन बाद कौशल्या जी के मन का संकोच बाहर आ ही गया। उन्होंने अक्षत को अपने पास बैठाकर स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तूने हमारी हर उम्मीद पूरी कर दी। अब मेरी बस एक ही आखिरी ख्वाहिश बची है कि इस सूने आंगन में एक संस्कारी बहू के कदमों की आहट हो जाए। अगर तेरे मन में कोई हो तो बेझिझक बता दे।” अक्षत झेंप गया और मुस्कुराते हुए बोला, “माँ, आप भी कैसी बातें करती हैं। मेरी अपनी कोई पसंद नहीं है। आप और बाबूजी जिसे चुनेंगे, वही मेरे लिए सर्वोपरि होगी। लेकिन अभी नौकरी शुरू हुई है, दो-तीन साल रुक जाते तो ठीक रहता।” परंतु कौशल्या जी का ममतामयी मन अब और प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपनी बहनों और परिचितों को सुयोग्य कन्या की तलाश का जिम्मा सौंप दिया।

सैकड़ों प्रस्तावों के बीच एक प्रतिष्ठित दीवानी वकील भानुप्रताप जी की सुपुत्री वर्तिका का रिश्ता आया। भानुप्रताप जी शहर के जाने-माने कानूनी माहिर थे और उनकी बातों में एक अजीब सी शिष्टता थी। जब वे औपचारिक बातचीत के लिए हरिशंकर जी के घर पधारे, तो उन्होंने दोनों परिवारों के संस्कारों की खूब प्रशंसा की। बातों-बातों में जब उन्होंने लेन-देन और दहेज की चर्चा छेड़ी, तो हरिशंकर जी ने हाथ जोड़कर स्पष्ट शब्दों में कहा, “वकील साहब, हम शिक्षक परिवार से हैं। हमने बेटे को काबिल बनाया है, कोई सौदा करने के लिए नहीं। हमें आपके धन-दौलत से कोई सरोकार नहीं है। हमें केवल एक संस्कारी बेटी चाहिए जो हमारे घर को अपना समझे और प्रेम से दो रोटियां परोस सके।” भानुप्रताप जी ने अति-उत्साह में हरिशंकर जी के दोनों हाथ थाम लिए और भावुक स्वर में बोले, “समधी जी, आज के भौतिकवादी युग में आप जैसे देवता समान इंसान मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। मेरी बेटी सचमुच बड़े भाग्य लेकर आई है जो उसे ऐसा ससुराल मिल रहा है।”

कुछ ही महीनों के अंतराल में शहनाइयों की गूंज और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अक्षत और वर्तिका का विवाह संपन्न हो गया। विवाह के शुरुआती सात-आठ दिन रिश्तेदारों की आवभगत, रस्मों-रिवाजों और दावतों के शोर में बीत गए। धीरे-धीरे मेहमान अपने घरों को लौट गए और घर में रखा गया अस्थाई बावर्ची भी विदा हो गया। अक्षत की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं, इसलिए वह सुबह तैयार होकर अपने कार्यालय के लिए निकलने लगा। कौशल्या जी, जो गठिया के दर्द से जूझ रही थीं, पहले की तरह भोर में ही उठकर झाड़ू-पोंछा और रसोई का मोर्चा संभाल लेती थीं। वर्तिका का नियम बिल्कुल अलग था; वह सुबह नौ या दस बजे से पहले कभी अपने शयनकक्ष का दरवाजा नहीं खोलती थी। नाश्ते की मेज पर जब वह आती, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सा रूखापन और खिंचाव होता था।

अक्षत ने एक शाम बड़ी नजाकत से वर्तिका से कहा, “वर्तिका, माँ की उम्र हो चुकी है और उनके घुटनों में तकलीफ रहती है। अगर तुम सुबह थोड़ी जल्दी उठकर उनके साथ हाथ बंटा दिया करो तो उन्हें बहुत राहत मिलेगी।” वर्तिका उस समय तो खामोश रही, लेकिन अगली सुबह जब वह उठी, तो उसके तेवर बदले हुए थे। उसने कानों में वायरलेस ईयरफोन ठूंस रखे थे और हाथ में झाड़ू लेकर बरामदे में टहलने लगी। चालीस मिनट तक वह एक ही कोने पर झाड़ू फेरती रही और फोन पर किसी से हंस-हंस कर बातें करती रही। कौशल्या जी ने इस बीच अक्षत के लिए नाश्ता बनाया, उसका टिफिन पैक किया और पानी की बोतल बैग में रखी। अक्षत माँ के चरण छूकर कार्यालय निकल गया।

कुछ दिन तक यही तमाशा चलता रहा। एक सुबह जब कौशल्या जी को पूजा के लिए देर हो रही थी और वर्तिका उसी तरह फोन पर मग्न होकर दालान में खड़ी थी, तो उन्होंने बड़े प्यार से कहा, “बहू, आज थोड़ा जल्दी नाश्ता बना लो, मुझे पंडित जी के आने से पहले मंदिर की तैयारी करनी है।” वर्तिका की आँखें एकदम से लाल हो गईं। उसने हाथ से झाड़ू पटकते हुए तीखे स्वर में कहा, “आपको नजर नहीं आता कि मैं काम कर रही हूँ? क्या मेरे चार हाथ हैं जो एक साथ झाड़ू भी लगाऊँ और चूल्हा भी फूँकूँ? नौकरानी समझ रखा है क्या मुझे इस घर में?” कौशल्या जी स्तब्ध रह गईं। उनके शांत स्वभाव ने उस दिन के बाद से बहू को किसी भी बात के लिए टोकना छोड़ दिया।

विवाह को अभी मुश्किल से चालीस दिन ही हुए थे कि एक दोपहर वर्तिका ने अपने सारे कीमती जेवर और कपड़े सूटकेस में भरे और मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली। कौशल्या जी ने घबराकर पूछा, “अरे बहू, यह क्या? अचानक कहाँ की तैयारी है?” वर्तिका ने मुड़कर देखे बिना रूखेपन से कहा, “बाजार तक जा रही हूँ, मेरा ममेरा भाई गाड़ी लेकर बाहर खड़ा है।” जब तक कौशल्या जी संभल पातीं, वह गाड़ी में बैठकर जा चुकी थी। शाम को भानुप्रताप जी का फोन आया कि वर्तिका सकुशल अपने मायके पहुँच गई है और कुछ दिन वहीं रहेगी।

लेकिन इसके ठीक तीन हफ्ते बाद जो हुआ, उसने हरिशंकर जी के परिवार के पैरों तले से जमीन खिसका दी। थाने से एक नोटिस आया, जिसमें अक्षत, कौशल्या जी और हरिशंकर जी के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और जानलेवा हमले की संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की सूचना थी। अक्षत और उसके पिता के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत भानुप्रताप जी को फोन लगाया, लेकिन उनका फोन बंद मिला। कई दिनों की जद्दोजहद के बाद जब बात हुई, तो वकील साहब के सुर पूरी तरह बदल चुके थे। वे कानूनी धमकियां देने लगे और कहा कि अदालत में ही बात होगी।

यह केवल एक मुकदमे की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का जाल था। भानुप्रताप जी ने अपनी वकालत की धौंस और संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए यह केस अपने गृह जनपद से भी सात सौ किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे की अदालत में स्थानांतरित करवा दिया था। हर पेशी पर अक्षत और उसके बूढ़े पिता को रात भर की थका देने वाली ट्रेन यात्रा करनी पड़ती, वकीलों की भारी-भरकम फीस भरनी पड़ती और अदालत के बाहर घंटों अपमान का घूंट पीना पड़ता। हर तारीख पर जाने-आने का खर्च पचास हजार रुपये से ऊपर बैठता था। हरिशंकर जी की जीवन भर की जमा पूंजी, जो उन्होंने अपने बुढ़ापे और दवा-दारू के लिए बचा रखी थी, वकीलों की जेबों में समाने लगी।

वर्ष बीतते गए। तारीख पर तारीख मिलती रही, लेकिन मुकदमे का कोई अंत नजर नहीं आ रहा था। अक्षत की नौकरी पर भी इस मुकदमे का काला साया मंडराने लगा था। वह दिन-रात मानसिक तनाव में रहने लगा। जो लड़का कभी चाय तक को हाथ नहीं लगाता था, उसने इस अंतहीन जिल्लत और बेबसी से भागने के लिए धीरे-धीरे शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। रात-रात भर वह बालकनी में बैठकर बोतलें खाली करता और अपनी किस्मत को कोसता। कौशल्या जी बेटे की यह बर्बादी देखकर भीतर ही भीतर घुटने लगीं। एक दिन अदालत से लौटते वक्त स्टेशन पर ही उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा। समय रहते अस्पताल पहुँचाए जाने से डॉक्टरों ने उनकी जान तो बचा ली, लेकिन उनका शरीर आधा शिथिल हो गया।

इस बीच रिश्तेदारों के जरिए एक बेहद चौंकाने वाली खबर उड़ते-उड़ते अक्षत के कानों तक पहुँची कि वर्तिका ने किसी अन्य संपन्न व्यापारी से चुपचाप दूसरा विवाह कर लिया है और वह उस शहर में ठाठ से रह रही है। अक्षत और उसके पिता ने राहत की सांस लेने की सोची कि अगर यह सच है तो वे अदालत में इसे साबित करके इस नरक से मुक्ति पा सकते हैं। उन्होंने एक निजी जांच एजेंसी को मोटी रकम देकर इस बात का पता लगाने का काम सौंपा। जासूसों ने उस शहर के दर्जनों नर्सिंग होम और अस्पतालों की खाक छानी जहाँ संभवतः वर्तिका के किसी बच्चे के जन्म का रिकॉर्ड मिल सके, परंतु कोई सुराग हाथ न लगा। भानुप्रताप जी इतने शातिर थे कि उन्होंने कानूनी शिकंजे से बचने के लिए सारे दस्तावेज किसी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के एक फर्जी पते पर बनवा रखे थे।

अदालत में जब भी अक्षत के वकील इस बात का उल्लेख करते, तो न्यायाधीश महोदय ठोस प्रमाण मांगते। प्रमाण के अभाव में अक्षत की बात को केवल मनगढ़ंत आरोप मानकर खारिज कर दिया जाता। अक्षत ने इस अंतहीन पीड़ा से छूटने के लिए मध्यस्थता केंद्र में पचास लाख रुपये तक की एकमुश्त गुजारा भत्ता राशि देने की पेशकश की, ताकि तलाक हो सके और वह चैन की सांस ले सके। लेकिन वर्तिका और उसके पिता का उद्देश्य केवल पैसा नहीं, बल्कि इस परिवार को पूरी तरह तबाह कर अपनी झूठी आन की तुष्टि करना था। सात लंबे साल बीत गए। अक्षत की जवानी मुकदमों की फाइलों, अदालत के गलियारों और शराब के गिलासों में घुलती चली गई।

तभी एक दिन, जब अक्षत पूरी तरह अपनी जीने की उम्मीद छोड़ चुका था, उसके जीवन में एक नया मोड़ आया। अक्षत के विभाग में एक नए युवा सतर्कता अधिकारी, राघवेंद्र का तबादला हुआ। राघवेंद्र न केवल कानून का प्रकांड ज्ञाता था, बल्कि अक्षत के शांत स्वभाव और उसकी आंखों में छिपे गहरे दर्द को भांप गया। एक दिन उसने अक्षत को अपने कक्ष में बुलाया और बड़ी आत्मीयता से उसकी इस हालत का कारण पूछा। अक्षत फूट-फूट कर रो पड़ा और उसने पिछले सात वर्षों का सारा काला चिट्ठा राघवेंद्र के सामने खोलकर रख दिया।

राघवेंद्र ने सारी फाइलें ध्यान से देखीं और मुस्कुराते हुए कहा, “अक्षत भाई, जहां बुराई अपने चरम पर होती है, वहीं वह अपनी सबसे बड़ी चूक भी करती है। वकील भानुप्रताप ने कागजों की बाजीगरी जमीन पर तो बहुत मजबूत की है, लेकिन आज का युग डिजिटल है। जो इंसान सच छुपाने के लिए सौ झूठ बोलता है, वह कहीं न कहीं अपने डिजिटल निशान छोड़ ही देता है।”

राघवेंद्र ने अक्षत को संभाला और सबसे पहले उससे शराब छोड़ने की सख्त प्रतिज्ञा करवाई। उसने कहा, “अगर तुम खुद को ही नष्ट कर लोगे, तो सच की लड़ाई कौन लड़ेगा? अपने माता-पिता के आंसुओं का कर्ज उतारना है तो तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा।” अक्षत के भीतर जैसे किसी ने बुझती हुई लौ को दोबारा सुलगा दिया। उसने उस दिन के बाद से शराब की एक बूंद को भी हाथ न लगाने की कसम खाई।

राघवेंद्र की योजना के अनुसार, उन्होंने पारंपरिक जासूसी के बजाय आधुनिक तकनीकी रास्तों को चुना। चूंकि वर्तिका का दूसरा पति एक बड़ा व्यापारी था, राघवेंद्र ने वाणिज्यिक कर और कंपनी मामलों के सार्वजनिक डेटाबेस की पड़ताल शुरू की। उन्होंने पाया कि उस व्यापारी की एक नई फर्म में एक महिला निदेशक के रूप में दर्ज थी, जिसका नाम वर्तिका था। राघवेंद्र ने उस फर्म के दस्तावेजों से जुड़े पैन कार्ड और बैंक खातों के विवरण का कानूनी रूप से विश्लेषण करवाया। वहाँ से मिले विवरणों के आधार पर जब उन्होंने पासपोर्ट सेवा केंद्र और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का ब्योरा खंगाला, तो सच शीशे की तरह साफ हो गया।

वर्तिका अपने नए पति के साथ पिछले ही वर्ष एक पारिवारिक अवकाश पर विदेश गई थी, जहाँ उसने अपने वीज़ा आवेदन में स्पष्ट रूप से उस व्यापारी को अपना कानूनी पति घोषित किया था। इतना ही नहीं, उस आवेदन के साथ उनकी शादी का एक नोटरीकृत हलफनामा और उनके दो वर्षीय पुत्र के जन्म प्रमाण पत्र की प्रति भी संलग्न थी, जो एक बड़े मेट्रो शहर के निजी अस्पताल से जारी हुआ था। भानुप्रताप जी ने जिस सच को छोटे शहरों में छुपाने की साजिश रची थी, वह एक अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस में पूरी तरह सुरक्षित दर्ज था।

अगली तारीख पर जब अदालत की कार्यवाही शुरू हुई, तो भानुप्रताप जी हमेशा की तरह अपने अहंकारी अंदाज में अक्षत पर नए आरोप मढ़ रहे थे और तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहे थे। तभी अक्षत के नए अधिवक्ता ने, जिसे राघवेंद्र ने विशेष रूप से तैयार किया था, अदालत के समक्ष एक सीलबंद लिफाफा प्रस्तुत किया।

उस लिफाफे में वर्तिका के दूसरे विवाह के प्रमाणित कानूनी दस्तावेज, विदेश यात्रा के वीज़ा आवेदन पत्र, शपथ पत्र और उसके बच्चे के आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र की सत्यापित प्रतियां थीं। जैसे ही न्यायाधीश महोदय ने उन पन्नों को पलटा, उनके चेहरे के भाव अत्यंत कठोर हो गए। अदालत के कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। भानुप्रताप जी के हाथ से पेन छूटकर मेज पर गिर पड़ा और उनका चेहरा सफेद फक हो गया।

न्यायाधीश महोदय ने न केवल अक्षत और उसके परिवार पर लगे सभी झूठे मुकदमों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया, बल्कि कानून की पवित्र प्रक्रिया का दुरुपयोग करने, अदालत को गुमराह करने और एक निर्दोष परिवार को सात वर्षों तक प्रताड़ित करने के जुर्म में वर्तिका और उसके पिता के खिलाफ धोखाधड़ी, झूठी गवाही और द्विविवाह की गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का आदेश सुना दिया। साथ ही, अक्षत के परिवार को हुए मानसिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए एक भारी क्षतिपूर्ति राशि जमा करने का निर्देश दिया।

अदालत से बाहर निकलते ही दोपहर की धूप अक्षत के चेहरे पर एक नई सुबह की रोशनी बनकर चमकी। सात साल बाद उसके फेफड़ों में जो हवा गई, वह आजादी और गरिमा की हवा थी। हरिशंकर जी की आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली, लेकिन ये आंसू लाचारी के नहीं, बल्कि न्याय की जीत के थे। अक्षत ने झुककर अपने पिता के चरण छुए और फिर राघवेंद्र को गले से लगा लिया। घर पहुँचकर जब अक्षत ने अपनी बीमार माँ की गोद में अपना सिर रखा और कहा, “माँ, हम जीत गए… आपका बेटा अब हर कलंक से मुक्त है,” तो कौशल्या जी के कांपते हाथों ने उसके गालों को चूम लिया। घर के मंदिर में जलता हुआ दीपक आज पहले से कहीं अधिक प्रज्वलित लग रहा था। अक्षत ने समझ लिया था कि सत्य कितना भी प्रताड़ित क्यों न हो जाए, यदि मनुष्य धैर्य, संयम और सही दिशा में प्रयास करे, तो अंधकार का अंत निश्चित है।

कानून समाज की रक्षा और न्याय की स्थापना के लिए बनाया गया है, लेकिन जब कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ, अहंकार या प्रतिशोध के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं, तो निर्दोष परिवारों की जिंदगियां तबाह हो जाती हैं। ऐसे कठिन समय में अक्सर लोग टूटकर गलत रास्तों या व्यसनों की ओर मुड़ जाते हैं, जबकि असल आवश्यकता धैर्य, आत्मबल और सही कानूनी ज्ञान के साथ लड़ने की होती है। क्या आपकी नजर में भी झूठे मुकदमों की रोकथाम और निर्दोषों की सुरक्षा के लिए हमारे कानूनी तंत्र में और कड़े प्रावधान होने चाहिए? ऐसे मामलों से निपटने के लिए समाज और कानून को किस तरह की पहल करनी चाहिए? अपने विचार और राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : उर्मिला शर्मा

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