जड़ों की पुकार

“अरे मेरी सबसे सुंदर दादी जान! हमें बहुत तेज भूख लगी है, प्लीज अपने हाथों से हमें वो खीर और चूरमा खिला दो ना… हम बहुत भूखे हैं,” अयान ने एक मासूम पोते की तरह लाड़ जताते हुए कहा।

कायरा ने देवकी जी के गाल चूमते हुए कहा, “दादी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी डाइट भूल गए, हमें तो सिर्फ आपका प्यार खाना है।”

देवकी जी का कलेजा जैसे ठंडक से भर गया। उनके चेहरे पर बरसों की थकान एक पल में मिट गई। उनकी आंखों से खुशी के आंसू फिर बह निकले, पर इस बार उनमें ममता का गर्व था। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ फेरा और खुशी से गदगद होकर आवाज लगाई, “बहू… अरी कल्याणी, सुनंदा! जल्दी से थालियां लगाओ। मेरे बच्चे भूखे हैं!”

विशालकाय हवेलीनुमा मकान के दालान में नीम की घनी छांव पसरी हुई थी। आंगन के ठीक बीचोंबीच संगमरमर का एक चबूतरा बना था, जिस पर वर्षों पुराना, हरा-भरा तुलसी का बिरवा अपनी पवित्र सुगंध से वातावरण को महका रहा था। चबूतरे के पास ही रस्सी से बुनी मजबूत शीशम की चारपाई पर सत्तर पार कर चुकीं देवकी देवी बैठी थीं। सफेद सूती साड़ी, चेहरे पर समय के थपेड़ों से उभरी झुर्रियां, लेकिन आंखों में गजब का वात्सल्य और ममता। दालान से सटी खुली रसोई से शुद्ध देसी घी में सिक रहे कुरकुरे मालपुओं और ताजे दूध की गाढ़ी रबड़ी की सोंधी महक पूरे आंगन में तैर रही थी। पूरा घर जैसे किसी मांगलिक उत्सव की तैयारी में सांस ले रहा था।

तभी आंगन में सात साल के कबीर के नन्हे कदमों की धमक सुनाई दी। वह हाथ में झनझनाता हुआ स्मार्टफोन लिए हांफता हुआ दौड़ा आया और अपनी तोतली आवाज में चहकते हुए बोला, “दादी… ओ दादी! बुआ का फोन बज रहा है, लंदन से कॉल आया है!”

देवकी जी का चेहरा खिल उठा। उन्होंने अपने पल्लू से हाथ पोंछे और फोन कान से लगाते हुए बनावटी नाराजगी से बोलीं, “अरे सुनंदा! आज कितने महीनों बाद बूढ़ी मां की याद आई रे तुझे? सात समंदर पार जाकर तो तू ऐसे भूल गई जैसे इस गांव में कोई अपना रहता ही नहीं।”

फोन के उस पार से एक खनकती हुई आवाज आई, “अरे मेरी प्यारी मां! आप भी न बस उलाहने देना जानती हैं। आप तो जानती ही हैं न कि विक्रम की नौकरी और बच्चों के स्कूल का शेड्यूल कितना व्यस्त रहता है। पर अब अपनी सारी शिकायतें पोटली में बांधकर रख दीजिए, क्योंकि इस बार छठ और देव-दीपावली की पूरी छुट्टियों में मैं, आपके दामाद और दोनों बच्चे सीधे अपने पैतृक घर आ रहे हैं। पूरे छह साल बाद हम अपने वतन लौट रहे हैं मां!”

यह सुनते ही देवकी जी की आंखों में छलक आए खुशी के आंसू उनके गालों पर लुढ़क गए। उनका हृदय खुशी से नाच उठा। “अरे सच में? मेरी बिटिया आ रही है! मेरे नाती-नातिन आ रहे हैं! सुनंदा, तू बस जल्दी आ जा, अब मैं फोन रखती हूं, मुझे तो अभी से सौ तैयारियां करनी हैं।”

सुनंदा का विवाह लंदन में पदस्थापित एक बड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियर से हुआ था। विदेशी चकाचौंध, आधुनिक जीवनशैली और लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण छह वर्षों से उसका भारत आना टल रहा था। देवकी जी का नाती अयान अब सोलह वर्ष का हो चुका था और नातिन कायरा चौदह वर्ष की। बचपन में उन्होंने इन बच्चों को सिर्फ तस्वीरों या वीडियो कॉल पर देखा था।

फोन रखते ही देवकी जी ने अपनी बड़ी बहू को आवाज लगाई, “बहू… अरी कल्याणी! सुनती है? बाजार की सूची तैयार कर। सुनंदा अपने बच्चों के साथ आ रही है। आज ही पूरे घर का कोना-कोना चमक जाना चाहिए। बगीचे की छंटाई करवा और दालान के जाले साफ करवा ले। छह साल बाद घर में कोई परदेसी आ रहा है।”

अगले पांच दिन पलक झपकते ही बीत गए। पूरा घर किसी दुल्हन की तरह सज चुका था। मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बंधा था, देहरी पर गेरू और चूने से पारंपरिक मांडने उकेरे गए थे और रसोई में तरह-तरह के पारंपरिक पकवानों की तैयारी थी।

आखिरकार वह सुबह भी आ ही गई। सफेद रंग की बड़ी टैक्सी धूल उड़ाती हुई हवेली के मुख्य फाटक पर आकर रुकी। सुनंदा जैसे ही गाड़ी से उतरी, उसने दौड़कर देवकी जी के चरण स्पर्श किए और मां के सीने से लगकर फफक पड़ी। उसके लिए तो बचपन के वो आंगन, वो नीम का पेड़ और वो मिट्टी की खुशबू फिर से जीवंत हो उठे थे। परंतु गाड़ी से उतरे दोनों बच्चे—अयान और कायरा—माहौल को देखकर कुछ असहज और अनमने से खड़े थे। डिजाइनर धूप का चश्मा, कानों में महंगे एयरपॉड्स और चेहरों पर एक अजीब सी बेरुखी।

देवकी जी ने आगे बढ़कर दोनों को बाहों में भरना चाहा, लेकिन बच्चों ने बस एक औपचारिक “हाय ग्रैनी” कहकर हल्का सा हाथ मिलाया। देवकी जी थोड़ी ठिठकीं, पर ममता के आगे सब भूलकर मुस्कुरा दीं।

हाथ-मुंह धोने के बाद जब सब बैठक में बैठे, तो देवकी जी और कल्याणी चांदी की थालियों में गर्म-गर्म दाल-बाटी, चूरमा, केसरिया खीर और घर का बना ताजा मक्खन सजाकर ले आईं। पूरा कमरा खुशबू से भर गया था।

“ओह गॉड मॉम! सीरियसली? क्या हम सुबह-सुबह इतना ज्यादा ऑइली, अनहाइजीनिक और अनहेल्दी फूड खाएंगे? इट्स सो मच फैट एंड शुगर! वी कांट ईट दिस। प्लीज, यहां कोई ओट्स, अवोकाडो या टोस्ट नहीं मिलेगा क्या?” कायरा ने थाली को तिरछी नजर से देखते हुए नाक-भौं सिकोड़ी।

अयान ने भी अपना फोन जेब से निकालते हुए कहा, “यस मॉम, आई एम ऑन अ स्ट्रिक्ट डाइट। ये सब खाकर तो मेरा कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाएगा। मुझे बस एक ब्लैक कॉफी दे दो, दैट्स इनफ।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। देवकी जी के हाथ में पकड़ी कटोरी हल्की सी कांप गई। जिस बूढ़ी मां ने कल रात से जागकर अपने हाथों से चूरमा कूटा था, उसका मन भीतर तक आहत हो गया। दोनों बच्चे बिना एक निवाला खाए सोफे से उठकर अपने कमरों की तरफ बढ़ गए।

सुनंदा ने शर्मिंदा होकर कहा, “मां, भाभी… आप बुरा मत मानिए। बाहर के माहौल में पले-बढ़े हैं, खाने-पीने को लेकर बहुत चूजी हो गए हैं। आप सब बैठिए, मैं खाती हूं।”

दोपहर होते-होते दोनों बच्चे दालान के एक कोने में रखे सोफे पर धंसकर अपने-अपने फोन में खोए हुए थे। उनकी उंगलियां स्क्रीन पर तेजी से चल रही थीं और वे दुनिया से बेखबर थे। तभी कल्याणी की उन्नीस वर्षीय बेटी, अनुष्का, कॉलेज से लौटी। अनुष्का स्वभाव से बेहद सुलझी हुई, चुलबुली और संस्कारों से ओतप्रोत लड़की थी। उसने जब अपनी दादी को आंगन की चारपाई पर उदास बैठे देखा, तो उसका दिल पसीज गया।

वह मुस्कुराती हुई सीधे अयान और कायरा के पास गई और बड़े अपनेपन से बोली, “अयान भैया, कायरा दीदी! फोन छोड़ो न, चलो बाहर आंगन में चलते हैं। दादी से बातें करते हैं, वो कब से आप दोनों से मिलने का इंतजार कर रही थीं।”

अयान ने स्क्रीन से बिना आंखें हटाए ठंडी आवाज में कहा, “कम ऑन अनुष्का, हम वहां बैठकर क्या करेंगे? दादी के पास वही पुरानी घिसी-पिटी बातें होंगी। हमारा और उनका कोई वेवलेंथ ही मैच नहीं करता। तुम ही जाकर टाइम पास करो।” कायरा भी उसकी बात पर धीरे से हंस दी।

यह सुनकर अनुष्का का खून खौल उठा। उसने एक गहरा सांस लिया, आगे बढ़कर दोनों के फोन की स्क्रीन पर अपना हाथ रख दिया और बहुत ही शांत लेकिन कड़े स्वर में बोली, “बस, बहुत हुआ! जरा मुझे देखो तुम दोनों।”

अयान और कायरा ने चौंककर अनुष्का की ओर देखा।

अनुष्का ने अपनी नजरें उन दोनों की आंखों में गड़ाते हुए कहा, “मुझे सच में समझ नहीं आता कि विदेश जाकर या दो-चार विदेशी शब्द सीखकर तुम लोग अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनों के जज्बातों को इतनी आसानी से कैसे भूल जाते हो? तुम खुद को बहुत ‘कूल’ और मॉडर्न समझते हो न? लेकिन सच कहूं, तो तुम दोनों से ज्यादा खोखला और पिछड़ा मैंने आज तक किसी को नहीं देखा!”

कायरा तमतमा कर बोली, “माइंड योर लैंग्वेज अनुष्का! तुम हमसे इस टोन में बात नहीं कर सकतीं।”

“टोन की बात तुम मत करो कायरा!” अनुष्का ने दृढ़ता से कहा। “दादी की उम्र सत्तर साल से ऊपर है। उनके घुटनों में तेज दर्द रहता है। लेकिन पिछले चार दिनों से सिर्फ तुम दोनों के लिए वो सुबह चार बजे उठकर रसोई में खड़ी थीं। वो चूरमा, वो खीर… वो कोई अनहेल्दी खाना नहीं था, वो उनकी ममता और प्यार की चाशनी थी जिसे तुम दोनों ने एक झटके में कचरा समझकर ठुकरा दिया। क्या यही मॉडर्निज्म है? क्या अपने बुजुर्गों के दिल को ठेस पहुंचाना तुम्हारी लाइफस्टाइल है?”

अनुष्का ने आगे कहा, “हेल्थ की बात करते हो? मुझे देखो। मैं यहां वही शुद्ध देसी घी खाती हूं, पूरा घर संभालती हूं, कॉलेज में टॉप करती हूं और दादी-नानी के पैरों के पास बैठकर उनसे जिंदगी का फलसफा सीखती हूं। बुजुर्गों के पास कोई फालतू बातें नहीं होतीं, उनके पास अनुभवों का वो खजाना होता है जो दुनिया का कोई गूगल या आईफोन तुम्हें नहीं दे सकता। वो हमारे अपने हैं, उन्होंने जिंदगी भर त्याग किया है ताकि आज तुम उस मुकाम पर पहुंच सको। अगर तुम उन्हें आदर नहीं दे सकते, तो कम से कम इंसानियत के नाते दो घड़ी का वक्त तो दे ही सकते हो। रिश्ते सिर्फ तस्वीरों और सोशल मीडिया के स्टेटस से नहीं चलते, अपनों के बीच बैठकर सांस लेने से चलते हैं।”

अनुष्का के एक-एक शब्द में इतनी सच्चाई, इतना दर्द और इतना गहरा आत्मसम्मान था कि अयान और कायरा के कानों में सन्नाटा छा गया। वे दोनों अवाक रह गए। उनके हाथ में पकड़े लाखों के फोन अचानक उन्हें बिल्कुल बेमानी और बेजान खिलौने लगने लगे। उन्होंने कभी इस नजरिए से सोचा ही नहीं था। उन्हें लगा था कि अंग्रेजी बोलना, डाइट की बातें करना और बुजुर्गों से दूरी बनाना ही आधुनिकता की निशानी है।

अयान की नजर आंगन की ओर गई, जहां चारपाई पर बैठी देवकी जी पल्लू के कोने से अपनी आंखें पोंछ रही थीं। उस दृश्य ने अयान के दिल को झकझोर कर रख दिया। कायरा की आंखें भी शर्म से झुक गईं।

अयान ने अपना फोन सोफे पर फेंक दिया और खड़े होकर रुंधे गले से बोला, “अनुष्का… वी आर रियली वेरी सॉरी। सच में, तुमने आज हमारी आंखों पर पड़ी झूठी आधुनिकता की पट्टी उतार दी। हम खुद को बहुत स्मार्ट और कूल समझ रहे थे, लेकिन असल में हमसे ज्यादा समझदार और कूल तो तुम हो।”

कायरा ने अनुष्का का हाथ पकड़ लिया, “हां अनुष्का, हमें अपनी गलती का बहुत पछतावा हो रहा है। क्या दादी हमें माफ करेंगी?”

अनुष्का के चेहरे पर एक सुंदर सी मुस्कान लौट आई। उसने दोनों के कंधे थपथपाए, “दादी कभी अपने बच्चों से नाराज नहीं होतीं। तो फिर देर किस बात की?”

कायरा ने तुरंत अपनी आंखें पोंछीं और बोली, “चलो, कहां चलना है?”

अयान और कायरा ने एक साथ मुस्कुराते हुए कहा, “अरे कहां क्या… दादी के हाथों का वो चूरमा और खीर खाने, और उनसे ढेर सारी बातें करने!”

अनुष्का खिलखिला उठी, “दैट्स द स्पिरिट! लेट्स गो!”

तीनों बच्चे दबे पांव दालान की ओर बढ़े। देवकी जी अभी भी शून्य में देख रही थीं। अचानक अयान और कायरा ने पीछे से आकर उन्हें अपनी बाहों में कस लिया। कायरा ने देवकी जी के कंधे पर सिर रख दिया और अयान उनके पैरों के पास जमीन पर ही बैठ गया।

“अरे मेरी सबसे सुंदर दादी जान! हमें बहुत तेज भूख लगी है, प्लीज अपने हाथों से हमें वो खीर और चूरमा खिला दो ना… हम बहुत भूखे हैं,” अयान ने एक मासूम पोते की तरह लाड़ जताते हुए कहा।

कायरा ने देवकी जी के गाल चूमते हुए कहा, “दादी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी डाइट भूल गए, हमें तो सिर्फ आपका प्यार खाना है।”

देवकी जी का कलेजा जैसे ठंडक से भर गया। उनके चेहरे पर बरसों की थकान एक पल में मिट गई। उनकी आंखों से खुशी के आंसू फिर बह निकले, पर इस बार उनमें ममता का गर्व था। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ फेरा और खुशी से गदगद होकर आवाज लगाई, “बहू… अरी कल्याणी, सुनंदा! जल्दी से थालियां लगाओ। मेरे बच्चे भूखे हैं!”

कुछ ही देर में आंगन में चारपाई के चारों ओर कुर्सियां लग गईं। पूरा परिवार एक साथ बैठा था। न कोई फोन था, न कोई दूरी। अयान और कायरा बड़े चाव से देसी घी में डूबा पारंपरिक खाना खा रहे थे और देवकी जी की पुरानी कहानियों को ऐसे सुन रहे थे मानो दुनिया की सबसे अनमोल दास्तान सुन रहे हों। आंगन का वो तुलसी का पौधा आज हवा के हर झोंके के साथ जैसे इस पारिवारिक मिलन पर अपनी आशीष बरसा रहा था।

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 मूल लेखिका : कृष्णा विवेक

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