मुझे परसों वापस चेन्नई जाना था। मां नितांत बड़ी-बूड़ी के जैसे पड़ोस की चाची के साथ उसकी लड़की गायत्री के विवाह पर होने वाले रस्मों को समझा रही थी। कल गायत्री की गोद भराई की रसम पर मां को गाते हुए सुना तो मैं हैरान था कि मां को अभी भी सारे लोकगीत याद हैं और मां को उन गीतों पर खड़े होकर थिरकते हुए देखा तो
टचवुड करके दूसरी तरफ मुंह फेर लिया।
सप्ताह भर में कोई इतना ठीक कैसे हो सकता है, यह जादू ही तो हुआ।
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ खिड़की में से चाची जी के घर के आंगन में मां की बातें सुनते सुनते अपने पुराने ख्यालों में खो गया।मेरा बचपन दिल्ली के इसी गांव में बीता था 12वीं के बाद आईआई टी खड़कपुर में एडमिशन मिलने के बाद मैं हॉस्टल के लिए जो निकला तो बाहर का ही होकर रह गया। पिताजी भी केंद्रीय सरकार में ऑफिसर थे। दादी को तो नहीं देखा लेकिन घर में मां पिताजी और दादा जी तीनों रहते थे। मैं खड़गपुर से पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए विदेश में चला गया था। कुछ साल वहां लगाकर जब मैं वापस आया तो मैंने चेन्नई में एक एमएनसी को ज्वाइन करा हुआ था। वहीं मेरी मुलाकात राधिका से हुई जो कि पी.एच.डी करके वहां के ही कॉलेज में प्रोफेसर थी। उस समय पिताजी जॉब में थे इसलिए शादी तो मेरी दिल्ली में ही हुई लेकिन लगभग सप्ताह भर बाद ही हम वापस चेन्नई लौट आए थे। मां और बाबू जी दिल्ली में ही रह गए थे।
मेरे बेटे ईशान के जन्म के समय अम्मा कुछ दिन आकर चेन्नई भी रही थी लेकिन फिर भी उनका मन चेन्नई में ज्यादा नहीं लगता था बाद में राधिका की मम्मी ही मेरे दोनों बेटों ईशान और आकाश को संभालती थी। राधिका का भाई जब कनाडा में जाकर सेटल हुआ तो उसके माता-पिता भी कैनेडा ही चले गए थे और कभी कभी ही भारत आते थे। क्योंकि अब राधिका भी हैदराबाद के
सरकारी कॉलेज में ही प्रोफेसर नियुक्त हो गई थी और मैंने भी एमएनसी छोड़कर अपनी ही एक कंपनी बना ली थी। इसलिए मुझे भी अक्सर बाहर जाना पड़ता था तो रिटायरमेंट के बाद मां और बाबू जी दोनों चेन्नई ही आकर रहने लगे थे।
ईशान और आकाश को मां ने बहुत अच्छे संस्कार दिए थे। यहां तक कि बच्चों के पेरेंट्स टीचर मीटिंग में भी मां और बाबू जी ही जाते थे। राधिका और मुझे तो जीवन में कभी फुर्सत मिली ही नहीं। राधिका छुट्टियों में ही हैदराबाद से चेन्नई आती थी। चेन्नई में ही बाबूजी को भी हृदयघात हो गया था वह अस्पताल में वेंटिलेटर पर ही थे , राधिका हैदराबाद से चेन्नई टू आई थी परंतु मां ने सब कुछ अकेले ही बहुत हिम्मत से संभाला था।
पिता की मृत्यु के बाद भी हिम्मत से मां घर को संभाल रही थी। राधिका और मेरे व्यस्त जीवन का मेरे बच्चों के लालन-पालन पर कोई असर नहीं हुआ था। मां के कारण ही उनकी पढ़ाई लिखाई सब अव्वल दर्जे की चल रही थी। राधिका सिर्फ छुट्टियों में ही हैदराबाद से चेन्नई आ पाती थी लेकिन मां के कारण हम दोनों ही अपने बच्चों की तरफ से निश्चिंत थे। राधिका भी हेड ऑफ डिपार्टमेंट के बाद कॉलेज की प्रिंसिपल बनने का श्रेय मां को ही देती थी। उनके कारण ही ईशान और आकाश हमेशा अपनी क्लास में प्रथम है और दोनों ही स्कॉलरशिप लेकर पढ़ने के लिए ऑस्ट्रेलिया गए हुए थे।
अब घर में मैं और मां अकेले ही रह गए थे। मेरी व्यस्तताएं थी पर मैं महसूस कर रहा था कि मां की तबीयत दिनोंदिन बिगड़ती ही जा रही थी। वह काफी गुमसुम रहने लगी थी। हालांकि घर में उनके लिए एक अटेंडेंट भी रखी हुई थी। सावित्री ताई जो कि काफी सालों से घर में रोटी वगैरा बनाने का काम करती थी अब उसके भी बच्चे शादीशुदा हो गए थे तो वह भी अम्मा के साथ घर में ही रह जाती थी। हम सब मां को खुश रखने की पूरी कोशिश करते थे लेकिन मां अक्सर अब बीमार ही रहने लगी थी।
अभी 10 दिन पहले जब राधिका और मैं फोन पर बात कर रहे थे तो राधिका ने मुझे बताया कि मां जब भी बात करती हैं तो दिल्ली के ही घर के बारे में बात करती है। शायद मां को अपने दिल्ली वाले घर की याद आ रही हो। यूं भी मैंने मां को बहुत से डॉक्टरों को दिखा लिया। अल्ट्रासाउंड ,सीटी स्कैन सब कुछ ठीक आता है कोई बीमारी पकड़ में ही नहीं आ रही। शायद अम्मा को बच्चों की याद आती हो।
राधिका के कहने पर मैंने कुछ दिन
अम्मा के साथ दिल्ली वाले घर जाने का प्रोग्राम बनाया। वैसे भी काफी समय से हम दिल्ली वाले घर में गए भी नहीं थे। घर के काम और मां के ख्याल के लिए के लिए सावित्री ताई भी हमारे साथ ही चली गई थी। मां इतनी कमजोर हो गई थी लेकिन फिर भी वह दिल्ली वाले घर चलने के लिए एकदम तैयार हो गई। तैयार हो गई। हवाई अड्डे पर पर किसी तरह से व्हीलचेयर के द्वारा मां को हवाई जहाज में बिठाया गया। दिल्ली पहुंचने के बाद सावित्री ताई घर की साफ सफाई में लग गई थी तभी पड़ोस में रहने वाली चाची जी चाय नाश्ता लेकर आ गई थी। दिल्ली का यह गांव अब गांव नहीं रह गया था यहां बड़ी बड़ी बिल्डिंग बन चुकी थी। मां बहुत देर तक चाची से बात करती रही। दूसरे दिन और भी मां की जानकार सखियां मां से मिलने के लिए आई। तीसरे दिन तक तो मां की सारी कमजोरी खत्म हो चुकी थी और मां खुशी-खुशी चाची की बेटी गायत्री की शादी की तैयारियों में लग गई थी। मां में आए इस सुखद परिवर्तन को देखकर मैं हैरान था। सावित्रीबाई घर का सारा काम कर रही थी और मां बेहद खुशी खुशी अड़ोस पड़ोस में अपनी जानकार सखियों से जाने क्या क्या बात कर रही थी। दो दिन से तो शायद उन्होंने कोई दवाई भी नहीं ली थी। वह मां जो बिस्तर से भी नहीं उठ पा रही थी और कल आंगन में ढोलक की थाप पर थिरक भी रही थी, कोई जादू तो नहीं हो गया। तभी राधिका का फोन आया राधिका ने मुझे कहा कि मां वहां पर बहुत खुश है। अभी सावित्री ताई और उनको वहां ही छोड़ आना। वह चाची जी की बेटी की शादी अटेंड करके ही आना चाहती हैं। मैं भी कोशिश करूंगी कि मुझे अगले सप्ताह कॉलेज की 4 दिन की छुट्टियों के साथ में कुछ छुट्टियां और मिल जाए तो मैं भी कुछ दिन मां के साथ दिल्ली वाले घर में ही रह लूंगी। अपनी मिट्टी की सोंधी सी खुशबू ही दवाई का काम करती है। मम्मी के लिए वहां की मिट्टी की सुगंध ही इनहेलर है। मां जब चाची के घर से वापस आई तो मैंने मां को सूचना दी कि परसों मैं तो चेन्नई वापस जा रहा हूं लेकिन आप कुछ दिन सावित्री ताई के साथ में यहां रह लेना और चाची जी की बेटी की शादी के बाद राधिका आ जाएगी और आप तब उसके साथ ही चेन्नई आ जाना। मां के चेहरे की खुशी देखते ही बनती थी। वक्त का पहिया चलता रहता है सच ही है, भले ही कितनी ही सुख सुविधा हो लेकिन हर वृक्ष अपनी जड़ों पर लौट कर ही सुख पाता है।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा