अनिरुद्ध ने सब देखा, समझा, मगर उसने कभी आपा नहीं खोया। वह मर्यादा की डोर को थामे रहा। उसने सोचा कि शायद नई जगह, नया माहौल है, प्रज्ञा को सामंजस्य बिठाने में वक्त लगेगा। वह उसे बाहर घुमाने ले जाता, उसकी हर फरमाइश पूरी करता, उसके पसंदीदा उपहार लाता ताकि उसके मन का भटकाव थमे और वह इस वैवाहिक बंधन की पवित्रता को महसूस कर सके। आखिर अग्नि के सात फेरे साक्षी थे उनके रिश्ते के।
कार्तिक की सर्द शाम धीरे-धीरे हवेलीनुमा पुराने मकान के दालान में उतर रही थी। तुलसी के चौरे पर जलता दीया हवा के हल्के झोंकों से कांप रहा था, ठीक उसी तरह जैसे पिछले तीन वर्षों से यशोदा देवी का हृदय अज्ञात आशंकाओं और सवालों से कांपता आ रहा था। उम्र के साठवें पड़ाव पर खड़ी यशोदा देवी चौपाल पर बिछी मूंज की चारपाई पर निष्प्राण सी बैठी थीं। सामने का खुला आँगन, जो कभी बच्चों की खिलखिलाहट, त्योहारों के उल्लास और चूड़ियों की खनक से महकता था, आज पथरीली खामोशी ओढ़े खड़ा था।
वे शून्य में ताकते हुए अपने ही ख्यालों से उलझ रही थीं। इंसान की फितरत अजीब होती है; जब विपत्ति का पहाड़ टूटता है, तो स्वाभिमानी और सरल मन सबसे पहले अपनी ही गलतियों की थाह लेने लगता है। यशोदा जी के भीतर भी वही आत्ममंथन का तीखा दर्द सुलग रहा था।
“आखिर मुझसे कहाँ चूक हुई?” यह सवाल उनके अंतर्मन को हर रोज़ उसी तरह कुरेदता था जैसे कोई पुराना घाव।
उन्होंने अपनी स्मृति के पन्नों को पीछे पलटना शुरू किया। उनके दो बड़े बेटे थे और एक बेटी, माधवी। बेटी अपने ससुराल में पूरे सम्मान के साथ गृहस्थी संभाल रही थी। समधी-समधियाना आज भी यशोदा जी के संस्कारों की मिसाल देते नहीं थकते थे। बड़ा बेटा कानपुर में अध्यापन करता था और अपनी पत्नी के साथ मर्यादित व संतुष्ट जीवन बिता रहा था। यदि उनकी परवरिश में कोई खोट होता, संस्कारों की नींव में तनिक भी दरार होती, तो क्या वे दोनों घर इस तरह फलते-फूलते? कतई नहीं।
फिर सबसे छोटे बेटे, अनिरुद्ध, के हिस्से में ही यह वज्रपात क्यों आया?
अनिरुद्ध बचपन से ही शांत, अंतर्मुखी और अपनी किताबों की दुनिया में खोया रहने वाला लड़का था। कंप्यूटर साइंस और डेटा मॉडलिंग में उसने असाधारण योग्यता हासिल की थी। बड़े शहर की चकाचौंध को छोड़कर उसने अपने जिले के कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर ग्रामीण तकनीक पर काम करना चुना था। एक नेक, सुलझा हुआ और मातृभक्त बेटा। जब उसके लिए रिश्ते की बात चली, तो शहर के एक रसूखदार ठेकेदार और प्रभावशाली नेता की बेटी प्रज्ञा का रिश्ता आया। प्रज्ञा पढ़ी-लिखी, आधुनिक और रूपवान थी। यशोदा जी ने सोचा था कि छोटे बेटे का जीवन रंगीन हो जाएगा, घर में खुशहाली की नई बयार बहेगी।
मगर नियति ने कुछ और ही जाल बुन रखा था। विवाह के कुछ ही हफ्तों बाद उस नए रिश्ते की परतें उधड़ने लगीं।
यशोदा जी को वह दौर आज भी किसी दुःस्वप्न की तरह याद था। प्रज्ञा का मन इस शांत घर में कभी लगा ही नहीं। सुबह की धूप से लेकर आधी रात के सन्नाटे तक, उसकी आँखें और उंगलियां केवल अपने महंगे स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टिकी रहती थीं। चौके-चूल्हे की बात तो दूर, परिवार के किसी सदस्य से दो मीठे बोल बोलना भी उसे अपनी शान के खिलाफ लगता था। कमरों के बंद दरवाजों के पीछे से अक्सर किसी अजनबी से फुसफुसाहट भरी लंबी बातचीत की आवाजें आतीं। कभी हँसी के ठहाके, तो कभी अचानक फोन छुपा लेने की हड़बड़ाहट।
अनिरुद्ध ने सब देखा, समझा, मगर उसने कभी आपा नहीं खोया। वह मर्यादा की डोर को थामे रहा। उसने सोचा कि शायद नई जगह, नया माहौल है, प्रज्ञा को सामंजस्य बिठाने में वक्त लगेगा। वह उसे बाहर घुमाने ले जाता, उसकी हर फरमाइश पूरी करता, उसके पसंदीदा उपहार लाता ताकि उसके मन का भटकाव थमे और वह इस वैवाहिक बंधन की पवित्रता को महसूस कर सके। आखिर अग्नि के सात फेरे साक्षी थे उनके रिश्ते के।
परंतु जिसे भटकाव ही अपनी मंजिल लगने लगे, उसे किनारे कौन ला सकता है? प्रज्ञा की महत्वाकांक्षाएं रिश्तों की सादगी से परे किसी और ही अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी थीं।
एक दिन, जब घर के लोग एक पारिवारिक अनुष्ठान की तैयारी में व्यस्त थे, प्रज्ञा अपने सारे महंगे जेवर, नकदी और आवश्यक दस्तावेज समेटकर एक पूर्व-नियोजित षड्यंत्र के तहत चुपचाप घर छोड़कर चली गई। जाने से पहले वह पीछे केवल बदनामी और अविश्वास की धूल छोड़ गई थी। वह अपने पुराने प्रेमी के साथ भागी थी, लेकिन कहानी का असली क्रूर मोड़ इसके बाद आया।
प्रज्ञा के पिता ने अपनी राजनीतिक पहुंच और धनबल का घिनौना प्रदर्शन शुरू किया। अपनी बेटी की करतूत पर शर्मिंदा होने और सुलह का मार्ग खोजने के बजाय, उन्होंने कानून की कमज़ोरियों का सहारा लेकर अनिरुद्ध और उसके सीधे-सादे परिवार पर झूठे मुकदमों का शिकंजा कस दिया। झूठे दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और न जाने किन-किन संगीन धाराओं की धमकी देकर अनिरुद्ध के करियर को बर्बाद करने की बिसात बिछाई गई। अंततः, अपने बेटे के भविष्य और मानसिक शांति की खातिर यशोदा जी को अपने पूर्वजों की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बतौर हर्जाना उन लालची लोगों की झोली में डालना पड़ा, तब जाकर कानूनी तलाक की कागजी मुक्ति मिली।
उस दिन के बाद से अनिरुद्ध जैसे भीतर से मौन हो गया था। हँसता-खेलता बेटा अचानक गंभीर, गुमसुम और अपने कमरे की चारदीवारी तक सीमित होकर रह गया। उसने विश्वविद्यालय जाना कम कर दिया और दिन-रात अपने लैपटॉप पर कोड और एल्गोरिदम के पन्नों में खुद को कैद कर लिया।
यशोदा जी उसी चारपाई पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू से आँख की कोर पोंछने लगीं। सीधे-सादे लोगों की यही सबसे बड़ी विडंबना होती है; जब संसार उन पर अन्याय करता है, तो वे संसार से लड़ने के बजाय अपने ही आत्मसम्मान को कचोटने लगते हैं। यशोदा जी बार-बार सोचतीं कि काश उन्होंने रिश्ते की परख में जल्दबाजी न की होती।
तभी हवेली के मुख्य लोहे के फाटक के खुलने की भारी आवाज हुई।
यशोदा जी ने चौंककर दृष्टि उठाई। सामने अनिरुद्ध खड़ा था। मगर आज उसके चेहरे पर वह पुराना अवसाद नहीं था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक ठहराव और तेज था। उसके पीछे तीन-चार अपरिचित लोग भी थे, जिनके हाथों में पेशेवर कैमरे, बूम माइक और सरकारी पहचान पत्र लटके हुए थे। साथ में जिले के कृषि अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. वर्मा भी मुस्कुराते हुए कदम बढ़ा रहे थे।
अनिरुद्ध तेज कदमों से आगे बढ़ा और सीधा आकर यशोदा जी के चरणों में झुक गया। उसने अपनी माँ के दोनों पैरों को कसकर थाम लिया। जब उसने सिर उठाया, तो उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी।
यशोदा जी का कलेजा धक से रह गया। उन्होंने घबराकर बेटे के गालों को अपने दोनों हाथों में थामा, “अनिरुद्ध! क्या हुआ मेरे बच्चे? तू रो क्यों रहा है? भगवान के लिए बता, फिर कोई नई विपत्ति आ गई क्या? बेटा, जो बीत गया सो बीत गया, तू हिम्मत मत हार…”
अनिरुद्ध ने अपने कांपते हाथों से माँ के दोनों हाथ चूमे और एक गहरी, सुकून भरी सांस लेते हुए बोला, “नहीं माँ… आज विपत्ति नहीं आई, आज ईश्वर ने हमारे धैर्य का फल लौटाया है। माँ, ये आंसू दुख के नहीं, उस अंधेरे के छंटने के हैं जो हमें पिछले तीन साल से निगल रहा था। ये खुशी के आंसू हैं माँ!”
इतना सुनते ही यशोदा जी के भीतर का जमा हुआ दर्द जैसे पिघल पड़ा। उनकी भी आँखें छलक आईं।
डॉ. वर्मा आगे आए और हाथ जोड़कर बोले, “यशोदा जी, आपको अपने इस बेटे पर गर्व होना चाहिए। पूरे देश को आज इस पर गर्व है। अनिरुद्ध ने पिछले तीन वर्षों की एकांत साधना में जो ‘सॉइल एंड वेदर प्रेडिक्शन एल्गोरिदम’ विकसित किया है, उसे राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी और अंतरराष्ट्रीय कृषि संगठन ने सर्वोच्च नवाचार का पुरस्कार दिया है। इसने सूखे और बेमौसम बारिश से बर्बाद होने वाली फसलों को बचाने का ऐसा सटीक मॉडल तैयार किया है, जो देश के करोड़ों अन्नदाताओं का जीवन बदल देगा। आज केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने इसके प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की घोषणा की है। ये मीडिया वाले उसी ऐतिहासिक उपलब्धि का साक्षात्कार लेने आए हैं।”
अनिरुद्ध ने नम आँखों से अपनी माँ की ओर देखा और अत्यंत शालीन स्वर में कहा, “माँ, आप हमेशा कहती थीं न कि ईश्वर जब एक दरवाजा बंद करता है, तो उससे कहीं बड़े चार नए दरवाजे खोल देता है। उस धोखे ने मुझे तोड़ दिया था, लेकिन उसी टूटन ने मुझे इस काम में झोंक दिया। मैं दिन-रात केवल इसलिए जागता रहा ताकि अपने दर्द को किसी बड़े उद्देश्य में बदल सकूं। आज जब बड़े-बड़े वैज्ञानिक और नीति-निर्माता मेरे शोध पर भरोसा जता रहे हैं, तो मुझे लगता है कि मेरी तपस्या सफल हो गई। मुझे अपने जीवन की सार्थकता मिल गई है माँ। मुझे अब कोई मलाल नहीं।”
यशोदा जी ने अपने बेटे को सीने से लगा लिया। मातृत्व की सारी पीड़ा एक पल में बह गई और उसकी जगह असीम गौरव ने ले ली। उन्होंने अपने पल्लू से अनिरुद्ध के आंसू पोंछे और उसके माथे को चूमते हुए गद्गद कंठ से कहा, “बेटा, जो तुम्हारे भाग्य का था ही नहीं, वह चला गया तो अच्छा ही हुआ। कांटे अगर रास्ते से न हटते, तो तुम इस मुकाम तक कैसे पहुंचते? तूने अपने आंसुओं से दूसरों के खेतों को सींचने का हुनर सीख लिया, इससे बड़ा संस्कार और क्या होगा! भगवान तुझे दीर्घायु करे और तेरा यश चारों दिशाओं में फैलाए।”
दालान में उपस्थित पत्रकारों के कैमरों ने उस भावुक पल को हमेशा के लिए कैद कर लिया। तुलसी के चौरे पर जलता दीया अब शांत और स्थिर लौ के साथ पूरे आँगन को एक दिव्य रोशनी से जगमगा रहा था।
जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि असफलता, धोखा या अपमान किसी मनुष्य की अंतिम नियति नहीं होते; जब तक आत्मा में सत्य और कर्म में निष्ठा है, तब तक हर ढलती शाम के बाद एक नया, सुनहरा सवेरा अवश्य जन्म लेता है।
पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:
जीवन में जब कोई अपना विश्वासघात करता है, तो क्या हमें खुद को दोष देकर टूट जाना चाहिए, या अपनी ऊर्जा को किसी बड़े रचनात्मक उद्देश्य में लगाकर अपनी तकदीर खुद लिखनी चाहिए? अनिरुद्ध और यशोदा जी के इस संघर्ष और जीत पर आपकी क्या राय है? अपने अनमोल विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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लेखिका : शारदा सक्सेना