ये कैसा बंधन – सुदर्शन सचदेवा

“कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते, फिर भी वे उम्रभर साथ चलते हैं… और कुछ रिश्ते नाम के होकर भी मन से बहुत दूर होते हैं।”

खिड़की के पास बैठी अनन्या बाहर हो रही बारिश को न जाने कितनी देर से देख रही थी। बारिश की हर बूँद जैसे उसके भीतर दबे किसी पुराने सवाल को छूकर लौट जाती थी।

आज फिर माँ ने फोन पर कहा था—

“बेटा, अब तो सब ठीक है न? इतने साल हो गए… कब तक उस रिश्ते को ढोती रहोगी?”

अनन्या के पास कोई उत्तर नहीं था।

रिश्ता था भी या नहीं?

वह सवाल पिछले बारह वर्षों से उसके साथ था।

बारह साल पहले जब वह विवाह के बाद इस घर में आई थी, तो उसे लगा था कि जिंदगी एक नए रंग में रंग जाएगी। पति आरव कम बोलने वाला था, मगर उसकी आँखों में अपनापन था। शुरुआत में सब कुछ अच्छा था। फिर धीरे-धीरे आरव का काम बढ़ता गया, शहर बदलते गए और बातचीत कम होती गई।

एक दिन आरव ने विदेश जाने का निर्णय लिया।

“कुछ साल की बात है अनन्या। लौटकर हम सब फिर से शुरू करेंगे।”

अनन्या ने मुस्कुराकर पूछा था—

“और अगर मैं तुम्हारा इंतजार करती रही तो?”

आरव ने उसका हाथ थामकर कहा था—

“तो शायद यही हमारे रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात होगी।”

लेकिन वह लौटकर नहीं आया।

पहले फोन आते रहे। फिर संदेश कम हुए और अंततः एक दिन बिल्कुल बंद।

लोगों ने समझाया—“जिंदगी रोककर मत बैठो।”

माँ ने कहा—“तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए।”

दोस्तों ने कहा—“जिसने तुम्हें छोड़ दिया, उसके लिए खुद को मत सज़ा दो।”

अनन्या भी आगे बढ़ना चाहती थी।

मगर मन… मन कहाँ किसी की सलाह मानता है?

वह आरव की पत्नी थी या केवल उसकी यादों की रखवाली करने वाली?

एक दिन अलमारी साफ करते हुए उसे आरव की पुरानी डायरी मिली। काँपते हाथों से उसने उसे खोला।

एक पन्ने पर लिखा था—

“अगर कभी मैं तुम्हारे साथ न रहूँ, तो इसका अर्थ यह मत समझना कि मेरा प्यार भी तुम्हारे साथ नहीं है। कुछ बंधन दूरी से नहीं टूटते, बल्कि दूरी उन्हें और गहरा कर देती है।”

अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।

“ये कैसा बंधन है, आरव?” उसने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा, “जिसमें तुम नहीं हो, फिर भी तुम हर जगह हो?”

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

सामने एक छोटा-सा लड़का खड़ा था। लगभग दस साल का।

“आप अनन्या आंटी हैं?”

“हाँ… लेकिन तुम कौन?”

उसने एक लिफाफा आगे बढ़ाया।

“पापा ने दिया है। कहा था, जब मैं बड़ा हो जाऊँ तो आपको दे दूँ।”

अनन्या के हाथ सुन्न पड़ गए।

लिफाफे पर आरव की लिखावट थी।

उसने काँपते हाथों से पत्र खोला।

“अनन्या,

शायद मेरे पास तुमसे माफी माँगने के लिए शब्द कम पड़ जाएँ। मैंने तुम्हें छोड़ना नहीं चाहा था। परिस्थितियों ने मुझे ऐसी जगह ला खड़ा किया, जहाँ लौटना मेरे लिए संभव नहीं रहा।

तुम्हें लगा होगा कि मैंने तुम्हें भुला दिया। सच यह है कि तुम्हें भूलना मेरे लिए कभी संभव नहीं था।

जिस बच्चे को यह पत्र देकर भेज रहा हूँ, वह मेरा बेटा है… और उसकी माँ अब इस दुनिया में नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि तुम उसे अपनाओ—किसी एहसान की तरह नहीं, बल्कि उस प्रेम की आखिरी निशानी समझकर, जिसे हम दोनों ने कभी सच्चे मन से जिया था।

तुम्हें कोई बंधन नहीं है।

फैसला केवल तुम्हारा होगा।”

पत्र अनन्या की गोद में गिर पड़ा।

उसने सामने खड़े बच्चे को देखा। उसकी आँखों में डर था।

“आप मुझे वापस भेज देंगी?”

अनन्या का हृदय भर आया।

वह धीरे से उसके पास गई और उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं।”

“क्यों?”

अनन्या की आँखों में आँसू थे, मगर होंठों पर मुस्कान।

“क्योंकि कुछ रिश्ते खून से नहीं, एहसासों से बनते हैं।”

बाहर बारिश अब भी हो रही थी।

अनन्या ने खिड़की बंद की और बच्चे का हाथ थामकर भीतर आ गई।

उस रात उसने पहली बार आरव का इंतजार करना बंद किया।

उसे समझ आ गया था—

वह जिस बंधन को वर्षों से बोझ समझती रही, वह दरअसल प्रेम का वह धागा था जिसने उसे टूटने से बचाए रखा था।

लेकिन उस धागे को अब किसी के लौटने की जरूरत नहीं थी।

उसने उस बच्चे का हाथ अपने हाथ में कसकर थामा।

और मन ही मन कहा—

“आरव, तुम्हारा साथ भले अधूरा रह गया… मगर तुम्हारे हिस्से का प्रेम मैं इस बच्चे में पूरा करूँगी।”

शायद यही था—

ये कैसा बंधन

कोई रिश्ता भी नहीं था, फिर भी रिश्ता बन गया |

सुदर्शन सचदेवा

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