“बाबूजी, आपसे कितनी बार कहा है कि डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाया कीजिए। बिस्तर पर फिर से दाल गिरा दी आपने। अब यह चादर कौन धोएगा? सुमन तो नौकरानी है नहीं, और मुझे ऑफिस से आकर इतनी फुर्सत नहीं कि आपकी गंध साफ करता रहूं।”
रजत की आवाज़ में कड़वाहट थी, इतनी कड़वाहट कि सामने बैठे 75 वर्षीय दीनानाथ जी का हाथ कांप गया। उनके हाथ से निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। उन्होंने सहमी हुई नज़रों से अपने बेटे को देखा और बिना कुछ बोले सिर झुका लिया। उनकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन था, जैसे उन्होंने अपमान को अपना भाग्य मान लिया हो।
रसोई से पानी का जग लेकर आती हुई सुमन ठिठक गई। उसने देखा कि उसके ससुर जी, जो कभी शहर के नामी वकील हुआ करते थे, आज अपने ही बेटे के सामने एक मुजरिम की तरह सिर झुकाए बैठे हैं। सुमन से रहा नहीं गया। उसने मेज पर पानी रखा और रजत की ओर घूरते हुए बोली, “रजत, यह क्या तरीका है? बाबूजी के हाथ कांपते हैं, पार्किंसंस की शुरुआती स्टेज है, यह आप भी जानते हैं। जानबूझकर तो उन्होंने गिराया नहीं।”
रजत ने गुस्से से पत्नी को देखा, “तुम बीच में मत बोलो सुमन। तुम अभी इस घर में नई हो। तुम नहीं जानती कि यह आदमी असल में क्या है। यह जो आज बेचारे बने बैठे हैं, इन्होंने मेरी मां की जिंदगी नर्क बना दी थी। यह वही इंसान हैं जिनकी वजह से मां घुट-घुट कर मरीं।”
रजत अपना खाना अधूरा छोड़कर कुर्सी धकेलते हुए उठ गया और बेडरूम में चला गया। दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी प्लेट उठाई और धीमे से बोले, “बहू, रहने दे। मैं… मैं साफ कर दूंगा। रजत ठीक कहता है, बुढ़ापे में हाथ-पांव साथ नहीं देते।”
सुमन का दिल पसीज गया। वह पिछले दो साल से इस घर में थी। उसने रजत से कई बार पूछा था कि वह अपने पिता से इतनी नफरत क्यों करता है? रजत का जवाब हमेशा एक ही होता था— “सुमन, मेरी मां एक हंसमुख औरत थीं। उन्हें घूमना पसंद था, लोगों से मिलना पसंद था। लेकिन बाबूजी ने हमेशा उन्हें पिंजरे में कैद करके रखा। न उन्हें किसी से मिलने देते थे, न कहीं जाने देते थे। घर में हमेशा एक तनाव रहता था। बाबूजी के डर से मां कभी खुलकर हंस भी नहीं पाईं। और जब मां को ब्रेन हैमरेज हुआ, तो डॉक्टर ने कहा था कि यह अत्यधिक तनाव का नतीजा है। इन्होंने ही मेरी मां को मारा है।”
सुमन जब भी दीनानाथ जी को देखती, उसे रजत की बातों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता। दीनानाथ जी बहुत कम बोलते थे। वे अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठकर घंटों खिड़की से बाहर ताकते रहते। उनकी आँखों में क्रूरता नहीं, बल्कि एक गहरा अवसाद दिखता था।
अगले दिन रविवार था। रजत किसी काम से बाहर गया हुआ था। सुमन घर की सफाई कर रही थी। दीनानाथ जी के कमरे की सफाई करते वक्त उसकी नज़र अलमारी के ऊपर रखे एक पुराने बक्से पर पड़ी। धूल से अटा हुआ वह बक्सा शायद सालों से खोला नहीं गया था। उत्सुकतावश सुमन ने उसे नीचे उतारा।
बक्से के अंदर कुछ पुराने कागज़ात, रजत के बचपन के खिलौने और एक मोटी सी डायरी थी। डायरी के पन्नों का रंग पीला पड़ चुका था। सुमन ने डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था— *”मेरी प्यारी सुधा के नाम, जिसे मैं अपनी जान से भी ज्यादा चाहता हूँ, लेकिन शायद कभी उसे वो खुशियां नहीं दे पाऊंगा जिसकी वो हकदार है।”*
सुमन की धड़कनें तेज हो गईं। यह दीनानाथ जी की डायरी थी। उसने पन्ने पलटने शुरू किए।
**15 जुलाई, 1990:**
*”आज डॉक्टर माथुर ने जो बताया, उसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। सुधा को ‘सिजोफ्रेनिया’ (Schizophrenia) है। उसे भ्रम होता है कि लोग उसे मारना चाहते हैं। आज उसने रजत पर चाकू उठा लिया था, यह सोचकर कि वह कोई और है। मैंने बड़ी मुश्किल से रजत को बचाया। मेरा नन्हा बेटा सहम गया था। मुझे उसे बचाना होगा, और सुधा को भी।”*
सुमन की आँखों में आंसू आ गए। वह तेजी से आगे पढ़ने लगी।
**20 अक्टूबर, 1992:**
*”सुधा की हालत बिगड़ती जा रही है। आज उसने पड़ोसियों को गालियां दीं और पत्थर फेंके। मोहल्ले वाले पुलिस बुलाने की बात कर रहे थे। मैंने सबके हाथ-पैर जोड़े। मुझे घर के दरवाजे बंद रखने पड़ते हैं। रजत को लगता है कि मैं उसकी मां को कैद कर रहा हूँ। वह छोटा है, वह नहीं समझता कि अगर सुधा बाहर गई तो वह खुद को या किसी और को नुकसान पहुंचा सकती है। आज रजत ने मुझसे कहा— ‘पापा, आप बहुत गंदे हो, मम्मी को बाहर क्यों नहीं जाने देते?’ उसके मुंह से यह सुनकर मेरा कलेजा फट गया, लेकिन मैं उसे सच नहीं बता सकता। वह अपनी मां से डरने लगेगा। मैं अपने बेटे की नज़रों में बुरा बन सकता हूँ, लेकिन उसकी मां की छवि खराब नहीं होने दूंगा।”*
सुमन का हाथ कांपने लगा। जिस पिता को रजत एक तानाशाह समझता था, वह असल में एक ढाल था जो अपने परिवार को टूटने से बचा रहा था। वह डायरी लेकर सीधे बाहर भागी, लेकिन फिर रुक गई। उसे और पढ़ना था।
**12 जनवरी, 1998:**
*”आज सुधा चली गई। ब्रेन हैमरेज। डॉक्टर ने कहा तनाव… लेकिन कौन सा तनाव? वो अपनी ही दुनिया में उलझी हुई थी। रजत अब 18 साल का है। वह मुझसे बात नहीं करता। उसकी आँखों में मेरे लिए सिर्फ नफरत है। उसे लगता है कि मेरी सख्ती ने उसकी मां की जान ली। काश मैं उसे बता पाता कि वो सख्ती नहीं, सुरक्षा थी। मैंने अपनी वकालत छोड़ दी ताकि सुधा के पास रह सकूं, लेकिन रजत को लगता है कि मैं घर पर रहकर हुकूमत चलाना चाहता था। खैर, अच्छा है कि वह मुझसे नफरत करता है। कम से कम वह अपनी मां को एक देवी की तरह याद करता है। अगर उसे पता चला कि उसकी मां ने कई बार उसे चोट पहुंचाने की कोशिश की थी, तो वह अपनी मां की यादों से नफरत करने लगेगा। यह राज मेरे साथ ही चिता पर जाएगा।”*
सुमन डायरी छाती से लगाकर वहीं फर्श पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। एक आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी, अपना करियर, अपना मान-सम्मान और यहाँ तक कि अपने बेटे का प्यार भी कुर्बान कर दिया, सिर्फ इसलिए ताकि उसके बेटे के मन में मां की पवित्र छवि बनी रहे।
शाम को जब रजत घर लौटा, तो उसने देखा कि घर में अजीब सी खामोशी है। दीनानाथ जी अपने कमरे में सो रहे थे। सुमन डाइनिंग टेबल पर बैठी थी, उसकी आँखें सूजी हुई थीं और सामने वह डायरी रखी थी।
“यह कूड़ा टेबल पर क्यों फैला रखा है?” रजत ने चिढ़ते हुए पूछा।
सुमन ने बिना कुछ बोले डायरी रजत की तरफ सरका दी। “इसे पढ़ो रजत। और पूरा पढ़ना।”
“क्या है इसमें?”
“तुम्हारे उन सारे सवालों के जवाब, जो तुमने कभी पूछे ही नहीं। तुम्हारे उस ‘तानाशाह’ पिता का सच, जिसे तुमने जीवन भर गलत समझा।”
रजत ने बेमन से डायरी उठाई। जैसे-जैसे वह पन्ने पलटता गया, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। उसका गुस्सा, उसकी अकड़, उसका अहंकार—सब कुछ आंसुओं में बहने लगा। वह कांपते हुए सोफे पर गिर पड़ा। “नहीं… यह झूठ है… यह नहीं हो सकता…” वह बुदबुदाया।
“यह सच है रजत,” सुमन ने उसके पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखा। “बाबूजी ने कभी तुम्हें नहीं बताया क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि तुम अपनी मां से डरते हुए बड़े हो। उन्होंने वो जहर खुद पिया ताकि तुम्हारी यादों में अमृत रहे।”
रजत को याद आया बचपन का वो दिन जब उसे चोट लगी थी और पिता ने उसे डांटा था। डायरी में उस दिन का ज़िक्र था—सुधा ने ही रजत को धक्का दिया था, लेकिन दीनानाथ जी ने इल्जाम अपने सिर ले लिया था कि उनकी लापरवाही से रजत गिरा, ताकि बेटा मां से न डरे।
रजत को अपना अतीत किसी फिल्म की रील की तरह याद आने लगा। पिता का रात-रात भर जागना, घर के दरवाजे चेक करना, मां की दवाइयों का ध्यान रखना, और बदले में सिर्फ गालियां और नफरत पाना।
“मैं… मैं कितना बड़ा पापी हूँ सुमन,” रजत रोते हुए बोला। “मैं भगवान जैसे पिता को राक्षस समझता रहा। मैंने उन्हें कितना दुत्कारा, कितना अपमानित किया। और वो… वो सब चुपचाप सहते रहे।”
रजत डायरी लेकर सीधे पिता के कमरे की तरफ भागा।
कमरे में जीरो वॉट का बल्ब जल रहा था। दीनानाथ जी करवट लेकर सो रहे थे। रजत उनके बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने देखा कि जिस पिता के पैर छूना तो दूर, वह जिनकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करता था, आज उन पैरों की बिवाइयां फटी हुई थीं।
रजत ने अपने पिता के पैरों पर अपना सिर रख दिया और बच्चों की तरह रोने लगा। उसके आंसुओं से दीनानाथ जी के पैर भीग गए।
दीनानाथ जी की नींद खुल गई। उन्होंने घबराकर देखा कि उनका बेटा उनके पैरों में पड़ा रो रहा है। “क्या हुआ रजत? बेटा, क्या हुआ? मैंने फिर कुछ गिरा दिया क्या? मुझे माफ़ कर दे बेटा, अब हाथ नहीं सधते…” उनकी आवाज़ में वही डर था जो रजत ने पिछले कई सालों में उनके अंदर पैदा कर दिया था।
यह सुनकर रजत का दिल चकनाचूर हो गया। उसने सिर उठाया और पिता के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया।
“नहीं बाबूजी… आपने कुछ नहीं गिराया। गिरा तो मैं हूँ, अपनी नज़रों में। मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी। मैं बहुत बुरा बेटा हूँ। मैं समझ ही नहीं पाया कि आप खामोशी से हमारे लिए क्या कर रहे थे।”
दीनानाथ जी समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक क्या हुआ। तभी सुमन दरवाजे पर आई और उसने डायरी दिखाई। दीनानाथ जी ने डायरी देखी और उनका चेहरा सफेद पड़ गया। “तुमने… तुमने रजत को यह क्यों दिखाई? मैंने कसम खाई थी…”
रजत ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया। “बस बाबूजी, और कितना सहेंगे आप? क्यों बने रहे आप विलेन? क्यों नहीं बताया कि मेरी मां बीमार थीं?”
दीनानाथ जी की आँखों से बरसों का रुका हुआ बांध टूट पड़ा। “कैसे बताता बेटा? तुम अपनी मां से बहुत प्यार करते थे। मैं तुम्हारी उस मासूमियत को नहीं छीनना चाहता था। मुझे लगा कि अगर तुम मुझसे नफरत करके खुश हो, तो यही सही। एक पिता अपने बच्चे की नफरत सह सकता है, लेकिन उसका टूटा हुआ दिल नहीं देख सकता।”
उस रात उस घर की दीवारें भी रोईं। रजत ने पिता को सीने से लगा लिया। वह शरीर जो अब हड्डियों का ढांचा बन चुका था, उसमें आज फिर से जान आ गई थी।
अगली सुबह का नज़ारा कुछ और ही था।
रजत डाइनिंग टेबल पर नहीं, बल्कि बाबूजी के बिस्तर के पास बैठा था। वह अपने हाथों से उन्हें दलिया खिला रहा था।
“मुंह खोलिए बाबूजी,” रजत ने प्यार से कहा।
दीनानाथ जी की आँखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान। “बेटा, ऑफिस के लिए देर हो जाएगी।”
“होने दीजिए बाबूजी। आज तक मैं सिर्फ एक एंप्लॉय (Employee) बनकर जिया हूँ, आज बेटा बनने का मन है,” रजत ने कहा और दलिया का चम्मच उनके मुंह में दे दिया। थोड़ा सा दलिया दीनानाथ जी की ठोड़ी पर गिर गया।
इससे पहले कि दीनानाथ जी घबराते, रजत ने अपनी रुमाल से उसे पोंछा और माथे पर चूम लिया। “कोई बात नहीं बाबूजी, बचपन में मैंने भी न जाने कितनी बार आपके कपड़ों पर खाना गिराया होगा।”
सुमन दरवाजे पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। उसे अपनी सास की याद आई। शायद स्वर्ग से वो भी आज मुस्कुरा रही होंगी। उसने महसूस किया कि सच कड़वा हो सकता है, लेकिन वह रिश्तों के घाव भरने की ताकत रखता है।
उस दिन के बाद से दीनानाथ जी का वह डर खत्म हो गया। उनकी बीमारी तो ठीक नहीं हो सकती थी, लेकिन उनका अकेलापन हमेशा के लिए खत्म हो गया था। अब वो सिर्फ ‘पिता’ नहीं थे, बल्कि उस घर की सबसे कीमती धरोहर थे।
रजत ने वह डायरी एक नए कवर में लपेटकर अपने लॉकर में रख दी—ठीक वैसे ही जैसे हम अपनी सबसे कीमती वसीयत रखते हैं। क्योंकि वह डायरी सिर्फ कागज़ का पुलिंदा नहीं थी, वह एक पिता के मूक बलिदान का दस्तावेज थी।
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**प्रश्न आपके लिए:**
क्या रजत को माफ करके दीनानाथ जी ने सही किया? या बच्चों को अपनी गलती का अहसास दिलाने के लिए मां-बाप को कभी-कभी अपना सच समय रहते बता देना चाहिए? क्या आपने भी कभी अपने माता-पिता को गलत समझा है और बाद में आपको पछतावा हुआ हो? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।
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**अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया है और दिल को छुआ है, तो इसे लाइक करें। अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखें और अपने परिवार व दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें ताकि कोई और बेटा अपने पिता को समझने में देर न कर दे। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और मार्मिक पारिवारिक कहानियां पढ़ने के लिए पेज को अभी फ़ॉलो करें। धन्यवाद!**
लेखक ; मुकेश पटेल