“प्रणाम माँ जी,” अद्विका की आवाज़ में एक अजीब सी मिठास और ठहराव था। “मुझे पता है हमने आपका दिल दुखाया है, लेकिन मुझे अपनी बेटी मानकर आशीर्वाद दीजिए।”
रुक्मिणी देवी का कठोर हृदय एक पल के लिए पिघल गया। उनके हाथ अपने आप उठकर अद्विका के सिर पर चले गए। “जीती रहो,” उनके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। इसके बाद अद्विका उठी और उसने कांता और सुमित्रा के पास जाकर उनके भी पैर छुए। दोनों जेठानियाँ हड़बड़ा गईं। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई शहरी लड़की इस तरह उनके पैर छुएगी।
राजस्थान के एक पुराने और प्रतिष्ठित शहर में रामनाथ जी की हवेली अपनी परंपराओं और उसूलों के लिए जानी जाती थी। रामनाथ जी के निधन के बाद इस घर को उनकी पत्नी रुक्मिणी देवी ने बड़े ही कड़े अनुशासन से संभाल रखा था। उनके तीन बेटे थे। बड़े दो बेटों, माधव और केशव की शादियाँ उनके ही रुतबे और समाज के परिवारों में हुई थीं। उनकी बहुएँ, कांता और सुमित्रा, बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थीं, लेकिन घर के कामकाज में निपुण थीं। वे सास के हर नियम का पालन करती थीं। घर में सब कुछ एक बंधी-बंधाई लय में चल रहा था कि अचानक सबसे छोटे बेटे, चिराग ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने हवेली की शांति में भूचाल ला दिया।
चिराग पुणे में एक बड़ी आईटी कंपनी में काम करता था। उसने वहीं अपनी साथ काम करने वाली एक उच्च शिक्षित लड़की, अद्विका से कोर्ट मैरिज कर ली थी। रुक्मिणी देवी के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था। बिना परिवार की रजामंदी, बिना किसी रीति-रिवाज के हुई इस शादी ने उनके सीने में एक गहरी ठेस पहुँचाई थी। और आज वही चिराग अपनी उस नई नवेली ‘शहरी’ दुल्हन को लेकर पहली बार हवेली आ रहा था।
हवेली के बड़े से दालान में आज एक अजीब सा तनाव पसरा हुआ था। रुक्मिणी देवी अपने माथे पर चिंता की लकीरें लिए तुलसी के चौरे के पास बैठी थीं। पास ही बैठी कांता और सुमित्रा सब्जी काटते हुए आपस में फुसफुसा रही थीं।
“सुना है दीदी, ये शहर की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ बड़ों का बिल्कुल आदर नहीं करतीं,” सुमित्रा ने मटर छीलते हुए कांता से कहा। “मुझे तो टीवी सीरियलों की तरह लगता है। वो आएगी, छोटे-छोटे कपड़े पहनेगी, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलेगी और हमारे देवर जी को अपनी उंगलियों पर नचाएगी।”
कांता ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “और नहीं तो क्या! देखना, दो दिन भी हमारे साथ इस रसोई में नहीं टिकेगी। वो तो मेमसाब है, कंपनी में काम करती है। उसे तो सैंडविच और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ आता भी नहीं होगा। सासू माँ को भी उसके आगे झुकना ही पड़ेगा, आखिर कमाने वाली बहू जो ठहरी।”
रुक्मिणी देवी के कानों में बहुओं की ये बातें पिघले हुए सीसे की तरह जा रही थीं। उनका मन भी यही गवाही दे रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनके बनाए हुए संस्कारों के महल को यह शहरी लड़की एक ही दिन में ढहा देगी। उनका बेटा अब उनका नहीं रहा, वह पूरी तरह से उस ‘आधुनिक’ लड़की के चंगुल में फंस चुका है। समय ज्यों-ज्यों बीत रहा था, घर का तनाव त्यों-त्यों बढ़ता जा रहा था।
सूरज पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा था। हवेली के बाहर सड़क पर शाम का धुंधलका छाने लगा था। तभी बाहर एक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई। रुक्मिणी देवी की धड़कनें तेज़ हो गईं। कांता और सुमित्रा ने जल्दी से अपने सिर पर पल्लू खींचा और सास के पीछे आकर खड़ी हो गईं। चिराग ने कार का दरवाज़ा खोला और बाहर निकला। उसके चेहरे पर एक अजीब सी झिझक और डर था। उसने हवेली के मुख्य द्वार की तरफ देखा।
तभी कार का दूसरा दरवाज़ा खुला। रुक्मिणी, कांता और सुमित्रा ने अपनी सांसें रोक लीं। वे उम्मीद कर रही थीं कि कोई लड़की जींस और टॉप या किसी छोटे लिबास में, आँखों पर चश्मा लगाए और बालों को खुला छोड़े बाहर निकलेगी। लेकिन जो दृश्य उनके सामने था, उसने उनकी आँखों को खुला का खुला रहने पर मजबूर कर दिया।
कार से एक बेहद सौम्य और सुंदर लड़की बाहर निकली। उसने गहरे लाल और सुनहरे रंग की एक पारंपरिक बनारसी साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी को इतने सलीके से बांधा गया था कि उसकी शालीनता देखते ही बनती थी। उसके बालों का एक साफ-सुथरा जूड़ा बना हुआ था जिस पर गजरा लिपटा था। माथे पर एक बड़ी लाल बिंदी, मांग में चमकता हुआ सिंदूर, हाथों में खनखनाती कांच की चूड़ियाँ और पैरों में महावर के साथ चांदी की पायल। उसके सिर पर साड़ी का पल्लू बहुत ही अदब के साथ रखा हुआ था।
यह अद्विका थी। एक मल्टीनेशनल कंपनी की सीनियर मैनेजर, लेकिन इस वक्त वह पूरी तरह से एक भारतीय पारंपरिक बहू लग रही थी। चिराग के साथ चलते हुए जब उसने हवेली की दहलीज पर कदम रखा, तो उसने सबसे पहले झुककर ज़मीन को स्पर्श किया। उसके बाद वह सीधे रुक्मिणी देवी के पास गई और बिना किसी संकोच के घुटनों के बल बैठकर उनके दोनों पैरों को अपने हाथों से छूकर प्रणाम किया।
“प्रणाम माँ जी,” अद्विका की आवाज़ में एक अजीब सी मिठास और ठहराव था। “मुझे पता है हमने आपका दिल दुखाया है, लेकिन मुझे अपनी बेटी मानकर आशीर्वाद दीजिए।”
रुक्मिणी देवी का कठोर हृदय एक पल के लिए पिघल गया। उनके हाथ अपने आप उठकर अद्विका के सिर पर चले गए। “जीती रहो,” उनके मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। इसके बाद अद्विका उठी और उसने कांता और सुमित्रा के पास जाकर उनके भी पैर छुए। दोनों जेठानियाँ हड़बड़ा गईं। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई शहरी लड़की इस तरह उनके पैर छुएगी।
रात का समय हुआ। हवेली के मंदिर में आरती की तैयारी हो रही थी। कांता रोज़ की तरह दीया बत्ती कर रही थी। तभी अद्विका नहा-धोकर एक सादी सूती साड़ी में वहाँ आ गई। उसने बड़ी ही नम्रता से पूछा, “भाभी जी, अगर आप इजाज़त दें, तो आज की आरती मैं कर लूँ?”
कांता ने हिचकिचाते हुए आरती की थाली अद्विका की तरफ बढ़ा दी। अद्विका ने थाली हाथ में ली, अपनी आँखें बंद कीं और उसके कंठ से जो स्वर फूटा, उसने पूरे घर को मंत्रमुग्ध कर दिया। उसने किसी फिल्मी तर्ज पर नहीं, बल्कि शुद्ध शास्त्रीय राग में आरती गाई और आरती के बाद भगवान शिव का ‘रुद्राष्टकम’ इतने शुद्ध संस्कृत उच्चारण के साथ पढ़ा कि रुक्मिणी देवी, जो खुद बचपन से रामायण पढ़ती आ रही थीं, हैरान रह गईं। अद्विका के चेहरे पर एक आध्यात्मिक तेज़ था।
अगली सुबह, कांता और सुमित्रा जान-बूझकर थोड़ी देर से उठीं। उनका विचार था कि नई नवेली और वो भी नौकरीपेशा बहू है, तो नौ बजे से पहले कहाँ उठेगी। वे सोच रही थीं कि आज उन्हें ही उठकर नाश्ता बनाना पड़ेगा। लेकिन जब वे रसोई की तरफ गईं, तो वहाँ का नज़ारा देखकर वे ठगी सी रह गईं।
रसोई पूरी तरह से साफ थी। गैस पर चाय खौल रही थी, जिसकी इलायची वाली महक पूरे घर में फैल रही थी। पास ही अद्विका खड़ी थी। उसने सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लिया था और रसोई संभाल ली थी। गैस के दूसरे बर्नर पर उसने बहुत ही स्वादिष्ट राजस्थानी दाल-ढोकली, आलू-गोभी की सब्जी और गरमागरम फूली हुई पूड़ियाँ तैयार कर रखी थीं। साथ ही उसने सूजी का हलवा भी बनाया था।
जेठानियों को आता देख अद्विका मुस्कुराई। “सुप्रभात भाभी जी। मैंने सोचा आप लोग हमेशा माँ जी और पूरे घर की ज़िम्मेदारी उठाती हैं, आज आपका ये काम मैं कर दूँ। आप बस बाहर बैठिए, मैं अभी नाश्ता लगाती हूँ।”
जब डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा गया, तो खाने का स्वाद ऐसा था मानो किसी बड़े बावर्ची ने बनाया हो। पूड़ियों का कुरकुरापन, हलवे की मिठास और दाल-ढोकली का पारंपरिक स्वाद। रुक्मिणी देवी, जो अब तक खामोश थीं, खुद को रोक नहीं पाईं। उन्होंने अद्विका की तरफ देखा और पूछा, “बहू, तुम तो बड़े शहर में पली-बढ़ी हो, बड़ी-बड़ी डिग्रियां ली हैं तुमने। हम तो सोच रहे थे कि तुम्हें शायद ही रसोई का कोई काम आता होगा। तुमने यह सब कहाँ से सीखा? और यह पूजा-पाठ, यह संस्कार… आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों में यह सब कहाँ देखने को मिलता है?”
अद्विका ने एक बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ रुक्मिणी देवी के पास बैठकर जवाब दिया, “माँ जी, यह सच है कि मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और मैं एक बड़े पद पर काम करती हूँ। लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे शिक्षा के साथ-साथ दीक्षा भी दी है। उन्होंने मुझे बचपन से सिखाया है कि शिक्षा का मतलब अपनी जड़ों को काटना नहीं होता, बल्कि अपनी जड़ों को और गहरा करना होता है। डिग्रियां हमें दफ्तर में काम दिला सकती हैं, पैसा कमाना सिखा सकती हैं, लेकिन जिंदगी कैसे जीनी है, अपनों का सम्मान कैसे करना है, यह हमें हमारे परिवार के संस्कार ही सिखाते हैं।”
अद्विका ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि एक लड़की अगर चाहे तो वो कंप्यूटर के की-बोर्ड और रसोई के बेलन, दोनों को बराबर कुशलता से चला सकती है। आधुनिक होने का मतलब छोटे कपड़े पहनना या अपनी मातृभाषा भूलकर सिर्फ अंग्रेजी बोलना नहीं है। असली आधुनिकता तो विचारों में होती है—बड़ों का सम्मान करना, छोटों को प्यार देना और हर परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेना। जब मैं ऑफिस जाती हूँ तो एक पेशेवर कर्मचारी होती हूँ, लेकिन जब मैं घर की दहलीज पार करती हूँ, तो मैं एक बेटी, एक पत्नी और एक बहू होती हूँ। मैंने यह खाना अपनी माँ से सीखा है, जिन्होंने मुझे बताया था कि परिवार को जोड़ने का सबसे पहला रास्ता रसोई से ही होकर गुज़रता है।”
अद्विका के इन शब्दों ने जैसे हवेली की हवा में घुले हुए सारे ज़हर को एक झटके में साफ कर दिया। कांता और सुमित्रा की आँखें भर आईं। उन्हें अपनी छोटी सोच और उन पूर्वाग्रहों पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई जो उन्होंने अद्विका के घर आने से पहले ही बना लिए थे।
सुमित्रा ने आगे बढ़कर अद्विका का हाथ पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से कहा, “हमें माफ़ कर देना छोटी। हमने तुम्हारे बारे में न जाने क्या-क्या सोच लिया था। हम डर रहे थे कि तुम पढ़-लिख कर हम अनपढ़ों पर राज करोगी, हमारा घर टूट जाएगा। लेकिन तुमने तो अपनी शिक्षा और संस्कारों से हमारी आँखें खोल दीं।”
रुक्मिणी देवी की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने उठकर अद्विका को अपने गले से लगा लिया। “मेरी बच्ची, तूने सिर्फ चिराग का दिल नहीं जीता, तूने आज इस घर की नींव को और मजबूत कर दिया है। मुझे गर्व है कि मेरे घर में तेरे जैसी सुसंस्कृत और पढ़ी-लिखी बहू आई है। आज से तू इस घर की सिर्फ बहू नहीं, मेरी बेटी है।”
उस दिन के बाद से हवेली का माहौल पूरी तरह बदल गया। अद्विका ने न सिर्फ अपने ऑफिस का काम बखूबी संभाला, बल्कि घर में भी कांता और सुमित्रा के साथ मिलकर एक ऐसा तालमेल बिठाया कि पूरे मोहल्ले में उनकी मिसालें दी जाने लगीं। उसने अपनी जेठानियों को नई चीज़ें सिखाईं और उनसे पुरानी परंपराएं सीखीं। एक सच्ची और सुसंस्कृत शिक्षा ने एक परिवार को टूटने से बचा लिया और उसे एक नई, खूबसूरत दिशा दे दी। अद्विका ने साबित कर दिया था कि एक शिक्षित महिला अपने संस्कारों की छाँव में पूरे परिवार को एक माला की तरह पिरो कर रख सकती है।
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