मैंने जैसे ही उस डिब्बे को खोला, मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। उसमें एक बहुत ही खूबसूरत और पुरानी चांदी की पायल रखी थी और साथ में एक मुड़ा हुआ कागज था। मेरे हाथ कांपने लगे। मैंने उस कागज को खोला। वह एक चिट्ठी थी, जिसकी लिखावट कई जगह से आंसुओं की वजह से धुंधली हो चुकी थी।
उसमें लिखा था— “बेटा शीला … मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हारे ऑफिस के आई-डी कार्ड से तुम्हारा नाम पढ़ लिया था। मेरा नाम रघुनाथ है। मैं जानता हूँ कि मेरे रोज तुम्हें देखने से तुम्हें बहुत तकलीफ होती होगी, लोग बातें बनाते होंगे। लेकिन मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाता था। आज से ठीक सात साल पहले, मेरी इकलौती बेटी अंजलि एक बस दुर्घटना में मुझे छोड़कर चली गई। जब मैंने तुम्हें पहली बार बस स्टॉप पर देखा, तो मुझे लगा जैसे मेरी अंजलि वापस आ गई हो। तुम्हारी आँखें, तुम्हारे बाल, यहाँ तक कि तुम्हारे बात करने का तरीका बिल्कुल मेरी बेटी जैसा है। जब भी मैं तुम्हें देखता था, मुझे मेरे अंदर का मर चुका पिता फिर से जिंदा महसूस होता था। मैं तुम्हारे भीतर अपनी अंजलि को तलाशता था। मैं सिर्फ तुम्हें देखकर सुकून पा लेता था। मैंने कभी तुम्हारे पास आने की हिम्मत नहीं की क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ बैठो।
मैं पुणे की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी और मेरा नाम शीला है। रोज सुबह मुझे अपने ऑफिस जाने के लिए लोकल बस लेनी पड़ती थी। मेरी जिंदगी एक तय रूटीन के हिसाब से चल रही थी। लेकिन मेरी इस सामान्य सी जिंदगी में उलझन तब शुरू हुई, जब मैंने नोटिस किया कि एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति, जिनकी उम्र लगभग साठ साल के करीब रही होगी, रोज उसी बस स्टॉप पर आते थे जहाँ से मैं बस लेती थी। शुरुआत में मुझे लगा कि शायद वो भी कहीं काम पर जाते होंगे, इसलिए मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा कि उनकी नजरें अक्सर मुझ पर ही टिकी रहती थीं।
जब भी मैं बस का इंतजार कर रही होती, मैं कनखियों से देखती कि वो मुझे ही घूर रहे हैं। अगर कभी अचानक मेरी नजर उन पर पड़ जाती, तो वो हड़बड़ा कर दूसरी तरफ देखने लगते। कई बार बस के अंदर भी वो मेरे आस-पास ही सीट ढूँढ़ने की कोशिश करते। कभी-कभी मुझे देखकर उनके चेहरे पर एक अजीब सी, उदास लेकिन गहरी मुस्कान आ जाती थी, जिसे देखकर मुझे अंदर तक घबराहट होने लगती थी। मुझे समझ नहीं आता था कि एक इतनी उम्र का व्यक्ति मुझे इस तरह क्यों देखता है। उन्होंने कभी मुझसे कोई बात करने की कोशिश नहीं की, कभी कोई अश्लील इशारा नहीं किया और न ही कभी मेरे करीब आने की कोशिश की, लेकिन उनका वो लगातार मुझे देखना और मेरा पीछा करना मुझे डराने लगा था।
महीने बीतते गए और उनका यह सिलसिला थमा नहीं। मेरी ऑफिस की जो सहेलियां मेरे साथ सफर करती थीं, उन्होंने भी इस बात को नोटिस कर लिया था। वे मुझे चिढ़ाती थीं और तरह-तरह की बातें बनाती थीं। “देख शीला , तेरा आशिक आ गया,” ऐसी बातें सुनकर मुझे घिन आने लगती थी। बस के कुछ अन्य यात्री भी अब कानाफूसी करने लगे थे। मुझे अपने आप में शर्मिंदगी महसूस होने लगी। मैं इस मानसिक तनाव से इतनी परेशान हो गई कि मैंने अपनी बस का समय बदल दिया। मैंने सोचा कि शायद समय बदलने से मुझे उस अजीब इंसान से छुटकारा मिल जाएगा।
लेकिन मेरी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब दो दिन बाद मैंने उन्हें उसी नए समय पर, उसी बस स्टॉप पर खड़ा पाया। मुझे लगा कि जैसे मेरी बर्दाश्त की सारी हदें टूट गई हैं। मैंने तय कर लिया कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और मुझे इसका कोई कड़ा इलाज करना ही पड़ेगा। मैंने सोचा कि अगर वो कल भी मुझे दिखे, तो मैं बीच सड़क पर उनकी इज्जत उछालूंगी और जरूरत पड़ी तो पुलिस को भी बुला लूंगी।
अगले दिन शाम का वक्त था। ऑफिस से लौटते समय अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। मैं बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी और बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी। तभी मैंने देखा कि वो व्यक्ति बारिश में भीगते हुए मेरी तरफ ही आ रहे हैं। उनके हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था, जिसे वो भीगने से बचाने के लिए अपने सीने से लगाए हुए थे। जैसे ही वो मेरे करीब आए, मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। इससे पहले कि वो कुछ बोल पाते, उन्होंने कांपते हुए हाथों से वो डिब्बा मेरी तरफ बढ़ाया।
मेरा खून खौल उठा। मैंने बिना एक पल सोचे, पूरी ताकत से उनके हाथ पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। वो डिब्बा उनके हाथ से छूटकर कीचड़ में गिर गया। “शर्म नहीं आती आपको? उम्र देखी है अपनी? महीनों से मेरा पीछा कर रहे हो, आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे पास आने की?” मैंने चीखते हुए उन्हें न जाने क्या-क्या बुरा-भला कह डाला। मेरी तेज आवाज सुनकर आस-पास के कुछ लोग भी जमा हो गए। वो इंसान फटी-फटी आँखों से मुझे देखता रहा। उनकी आँखों से पानी बह रहा था, जो बारिश की बूंदों में मिल गया। उन्होंने कीचड़ में गिरे उस डिब्बे को उठाया, अपने कपड़ों से पोंछा और चुपचाप मेरे पैरों के पास रखकर, सिर झुकाए तेज बारिश में कहीं गुम हो गए।
मुझे उन पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मैंने पैर से उस डिब्बे को दूर धकेलना चाहा, लेकिन फिर न जाने क्या सोचकर मैंने उसे उठाया और अपने बैग में ठूंस लिया। मैंने तय किया कि घर जाकर इसे कूड़ेदान में फेंक दूंगी। उस दिन के बाद, वो व्यक्ति मुझे कभी उस बस स्टॉप पर नहीं दिखे। कई महीने बीत गए। मैं भी इस घटना को एक बुरा सपना समझकर भूलने लगी थी।
वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा और दिवाली का त्योहार करीब आ गया। मैं अपने घर की सफाई कर रही थी। पुरानी चीजों को निकालते वक्त, मेरी अलमारी के सबसे निचले दराज में मुझे वो ही पुराना डिब्बा मिला। उसे देखते ही मुझे उस दिन की बारिश और वो भयानक गुस्सा याद आ गया। मैंने सोचा कि इसे फेंकने से पहले एक बार देख तो लूँ कि आखिर उस मनचले बुड्ढे ने इसमें क्या रखा था।
मैंने जैसे ही उस डिब्बे को खोला, मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। उसमें एक बहुत ही खूबसूरत और पुरानी चांदी की पायल रखी थी और साथ में एक मुड़ा हुआ कागज था। मेरे हाथ कांपने लगे। मैंने उस कागज को खोला। वह एक चिट्ठी थी, जिसकी लिखावट कई जगह से आंसुओं की वजह से धुंधली हो चुकी थी।
उसमें लिखा था— “बेटा शीला … मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हारे ऑफिस के आई-डी कार्ड से तुम्हारा नाम पढ़ लिया था। मेरा नाम रघुनाथ है। मैं जानता हूँ कि मेरे रोज तुम्हें देखने से तुम्हें बहुत तकलीफ होती होगी, लोग बातें बनाते होंगे। लेकिन मैं चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाता था। आज से ठीक सात साल पहले, मेरी इकलौती बेटी अंजलि एक बस दुर्घटना में मुझे छोड़कर चली गई। जब मैंने तुम्हें पहली बार बस स्टॉप पर देखा, तो मुझे लगा जैसे मेरी अंजलि वापस आ गई हो। तुम्हारी आँखें, तुम्हारे बाल, यहाँ तक कि तुम्हारे बात करने का तरीका बिल्कुल मेरी बेटी जैसा है। जब भी मैं तुम्हें देखता था, मुझे मेरे अंदर का मर चुका पिता फिर से जिंदा महसूस होता था। मैं तुम्हारे भीतर अपनी अंजलि को तलाशता था। मैं सिर्फ तुम्हें देखकर सुकून पा लेता था। मैंने कभी तुम्हारे पास आने की हिम्मत नहीं की क्योंकि मुझे डर था कि कहीं तुम मुझे गलत न समझ बैठो।
बेटा, कल मेरी अंजलि का जन्मदिन है। सात साल पहले, उसके जन्मदिन के लिए मैंने यह चांदी की पायल बनवाई थी, लेकिन मैं उसे यह पहना नहीं सका और वो चली गई। मुझे ब्लड कैंसर है और डॉक्टर ने कहा है कि मेरे पास अब ज्यादा वक्त नहीं है। मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ ताकि अपनी आखिरी सांसें वहीं ले सकूँ। मेरी बस एक ही अधूरी इच्छा थी कि मैं अपनी बेटी की यह अमानत तुम्हें सौंप दूँ। क्या तुम एक अभागे पिता की इस आखिरी निशानी को स्वीकार करोगी? मुझे पता है तुम बहुत अच्छी लड़की हो। अपना ख्याल रखना मेरी बच्ची।”
चिट्ठी मेरे हाथों से छूटकर गिर पड़ी। मेरी आँखों से आंसुओं का ऐसा सैलाब फूटा जो रोके नहीं रुक रहा था। मेरी सांसें अटक रही थीं और मुझे अपने आप से भयंकर नफरत होने लगी थी। यह मैंने क्या कर दिया? मैंने एक ऐसे पिता को सरेआम बेइज्जत किया, उसे थप्पड़ मारा, जो सिर्फ मुझमें अपनी मरी हुई बेटी की छवि देख रहा था। मेरे कानों में मेरे ही कहे हुए वे कड़वे शब्द गूंजने लगे।
उस रात मैं सो नहीं सकी। मैं उस चांदी की पायल को सीने से लगाए बस रोती रही। अगले दिन मैं पागलों की तरह उस बस स्टॉप पर गई, आस-पास के लोगों से उनके बारे में पूछा, लेकिन किसी को उनके बारे में कुछ नहीं पता था। वो इंसान हमेशा के लिए जा चुका था और मेरे लिए छोड़ गया था एक ऐसा दर्द, एक ऐसा पछतावा जिसका कोई प्रायश्चित नहीं था। आज सालों बीत चुके हैं, लेकिन वो पायल आज भी मेरे पास सुरक्षित है। जब भी मैं उसे देखती हूँ, मेरा दिल छलनी हो जाता है और उस पिता की खामोश, उदास आँखें मुझे कभी माफ नहीं कर पातीं।
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