लेकिन, यह पूरा नजारा दूसरी मंजिल की बालकनी में खड़ी मालती जी की गिद्ध जैसी नजरों से नहीं बच पाया। उन्होंने देखा कि एक जवान लड़की एक बूढ़े आदमी को महंगे फूल और तोहफे दे रही है और वह बूढ़ा आदमी उसे देखकर खुशी से फूला नहीं समा रहा है। मालती जी के खुराफाती दिमाग ने तुरंत एक बहुत ही गंदी और मनगढ़ंत कहानी बुन ली।
शाम को जब मालती जी पार्क में टहलने गईं, तो उन्होंने अपनी सहेलियों की मंडली जमा कर ली। “अरे तुम लोगों ने देखा? आज कल की इन पढ़ी-लिखी लड़कियों का कोई भरोसा नहीं! वो जो 302 वाली सुमति की लड़की है न मिताली … मुझे तो पहले दिन से ही उसके लच्छन ठीक नहीं लगते थे,” मालती जी ने अपनी आवाज को रहस्यमयी बनाते हुए कहा।
“क्यों मालती भाभी? क्या हुआ? मिताली तो बहुत सीधी लड़की है,” एक महिला ने आश्चर्य से पूछा।
“सीधी? अरे खाक सीधी! आज मैंने अपनी आँखों से देखा है। वो हमारे कर्नल साहब हैं न, उम्र में उसके बाप से भी बड़े होंगे। आज मोहतरमा उनके लिए बड़े-बड़े गुलदस्ते और तोहफे लेकर आई थी। कर्नल साहब भी उसे देखकर ऐसे लट्टू हो रहे थे जैसे कोई मजनूं हो! अरे, आजकल की लड़कियां ऐसे ही तो अमीर और अकेले बुड्ढों को फंसाती हैं, ताकि उनके मरने के बाद उनकी सारी जायदाद उनके नाम हो जाए। चक्कर चला रही है वो लड़की!” मालती जी ने आग में घी डालते हुए पूरी कहानी चटखारे लेकर सुनाई।
तेईस साल की मिताली अपनी विधवा माँ, सुमति के साथ रहती थी। मिताली एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी। वह जितनी होशियार और आत्मनिर्भर थी, उतनी ही सरल और संस्कारी भी। पिता के साये के बिना पली-बढ़ी मिताली ने बहुत छोटी उम्र में ही घर और बाहर की जिम्मेदारियां संभालना सीख लिया था। सुमति को अपनी बेटी पर गर्व था।
उसी अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट नंबर 101 में सत्तर वर्षीय रिटायर्ड कर्नल राजवीर सिंह रहते थे। कर्नल साहब की पत्नी का कुछ साल पहले देहांत हो चुका था और उनके दोनों बेटे सपरिवार विदेश में बस गए थे। कर्नल साहब एक बेहद अनुशासन प्रिय, लेकिन अंदर से बहुत अकेले इंसान थे। उम्र के इस पड़ाव पर घुटनों के दर्द और अकेलेपन ने उन्हें थोड़ा चिड़चिड़ा जरूर बना दिया था, लेकिन मिताली से उन्हें बहुत लगाव था। मिताली जब भी ऑफिस से आती या जाती, कर्नल साहब को हमेशा सम्मान के साथ ‘जय हिंद अंकल’ कहकर प्रणाम करती। कर्नल साहब को उस बच्ची में अपनी उस बेटी की छवि नजर आती थी, जिसे उन्होंने सालों पहले एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था। मिताली भी उनकी बहुत इज्जत करती थी और अक्सर उनके छोटे-मोटे काम, जैसे ऑनलाइन दवाइयां मंगाना या मोबाइल का कोई फीचर समझाना, खुशी-खुशी कर दिया करती थी।
लेकिन, समाज में जहाँ अच्छे लोग होते हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिनका काम ही दूसरों की जिंदगी में झांकना और राई का पहाड़ बनाना होता है। ऐसी ही एक महिला थीं फ्लैट नंबर 204 में रहने वालीं मालती जी। मालती जी का पूरा दिन दूसरों की बालकनी में तांक-झांक करने, कामवालियों से दूसरों के घर की बातें उगलवाने और शाम को पार्क में बैठकर महिलाओं की पंचायत लगाने में ही बीतता था। उन्हें मिताली का कर्नल साहब से बात करना, हँसना या उनके घर कोई सामान देने जाना हमेशा खटकता था। मालती जी की संकीर्ण सोच इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पाती थी कि दो अलग-अलग उम्र के लोगों के बीच एक साफ-सुथरा, पिता-पुत्री जैसा रिश्ता भी हो सकता है।
एक दिन, कर्नल साहब ने मिताली को फोन किया और बहुत ही संकोच के साथ कहा, “बेटा मिताली , अगर तुम्हारे पास कल शाम को थोड़ा वक्त हो, तो क्या तुम मेरे लिए शहर के उस पुराने बाजार से एक खास चीज ला दोगी? दरअसल, मेरे घुटनों में बहुत दर्द है और मैं खुद ड्राइव करके इतनी दूर नहीं जा सकता।”
मिताली ने बिना कोई सवाल किए, बड़ी सहजता से कहा, “अरे अंकल! इसमें पूछने वाली क्या बात है? आप बस मुझे बता दीजिए कि क्या लाना है, मैं कल ऑफिस से लौटते वक्त पक्का ले आऊंगी।”
कर्नल साहब ने उसे कुछ निर्देश दिए और मिताली ने हामी भर दी। उस दिन बात वहीं खत्म हो गई। अगले दिन शाम को जब मिताली ऑफिस से लौटी, तो उसके हाथ में एक बहुत ही खूबसूरत सा फूलों का गुलदस्ता और एक बड़ा सा गिफ्ट पैक था। उसने कैब से उतरते ही सीधा कर्नल साहब को फोन लगाया, “अंकल, मैं आ गई हूँ। सामान ले आई हूँ।”
कर्नल साहब, जो सुबह से इस पल का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, अपनी छड़ी के सहारे तेज-तेज कदम बढ़ाते हुए बिल्डिंग के गेट तक आ गए। उनके चेहरे पर एक ऐसी खुशी और चमक थी, जो पिछले कई सालों से किसी ने नहीं देखी थी। उन्होंने मिताली के सिर पर प्यार से हाथ फेरा, गुलदस्ता और गिफ्ट लिया और उसकी इस मदद के लिए उसे ढेरों दुआएं दीं। मिताली भी मुस्कुराते हुए अपने फ्लैट की तरफ चली गई।
लेकिन, यह पूरा नजारा दूसरी मंजिल की बालकनी में खड़ी मालती जी की गिद्ध जैसी नजरों से नहीं बच पाया। उन्होंने देखा कि एक जवान लड़की एक बूढ़े आदमी को महंगे फूल और तोहफे दे रही है और वह बूढ़ा आदमी उसे देखकर खुशी से फूला नहीं समा रहा है। मालती जी के खुराफाती दिमाग ने तुरंत एक बहुत ही गंदी और मनगढ़ंत कहानी बुन ली।
शाम को जब मालती जी पार्क में टहलने गईं, तो उन्होंने अपनी सहेलियों की मंडली जमा कर ली। “अरे तुम लोगों ने देखा? आज कल की इन पढ़ी-लिखी लड़कियों का कोई भरोसा नहीं! वो जो 302 वाली सुमति की लड़की है न मिताली … मुझे तो पहले दिन से ही उसके लच्छन ठीक नहीं लगते थे,” मालती जी ने अपनी आवाज को रहस्यमयी बनाते हुए कहा।
“क्यों मालती भाभी? क्या हुआ? मिताली तो बहुत सीधी लड़की है,” एक महिला ने आश्चर्य से पूछा।
“सीधी? अरे खाक सीधी! आज मैंने अपनी आँखों से देखा है। वो हमारे कर्नल साहब हैं न, उम्र में उसके बाप से भी बड़े होंगे। आज मोहतरमा उनके लिए बड़े-बड़े गुलदस्ते और तोहफे लेकर आई थी। कर्नल साहब भी उसे देखकर ऐसे लट्टू हो रहे थे जैसे कोई मजनूं हो! अरे, आजकल की लड़कियां ऐसे ही तो अमीर और अकेले बुड्ढों को फंसाती हैं, ताकि उनके मरने के बाद उनकी सारी जायदाद उनके नाम हो जाए। चक्कर चला रही है वो लड़की!” मालती जी ने आग में घी डालते हुए पूरी कहानी चटखारे लेकर सुनाई।
यह बात धीरे-धीरे पूरी सोसाइटी में जंगल की आग की तरह फैल गई। लोग अब मिताली और उसकी माँ को अजीब नजरों से देखने लगे। जब सुमति नीचे सब्जी लेने जाती, तो औरतें अचानक चुप हो जातीं और उसके मुड़ते ही फुसफुसाने लगतीं। सुमति को इस बदलते माहौल का कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि लोग उससे कतरा रहे हैं, लेकिन उसे कारण नहीं पता था।
रविवार की सुबह थी। सुमति रसोई में काम कर रही थी और मिताली अपनी बालकनी में धूप में बाल सुखा रही थी। तभी मिताली ने देखा कि नीचे पार्क में सोसाइटी की कई महिलाएं और कुछ बुजुर्ग आदमी भी इकट्ठा हो गए हैं। सबका ध्यान उसी की बालकनी की तरफ था। मालती जी सबसे आगे खड़ी थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी आक्रामकता थी।
मिताली को कुछ समझ नहीं आया। तभी मालती जी ने नीचे से ही तेज आवाज में चिल्लाना शुरू किया, “अरे सुमति! सुमति ओ 302 वाली! जरा नीचे तो आ। आज तो तेरी बेटी के सारे कारनामे मोहल्ले को बताने ही पड़ेंगे।”
मिताली घबरा गई। उसने रसोई में जाकर माँ से कहा, “माँ… नीचे मालती आंटी आपको बुला रही हैं। पता नहीं क्यों सोसाइटी के बहुत सारे लोग इकट्ठा हैं और आंटी बहुत गुस्से में चिल्ला रही हैं। क्या कोई बात हो गई है?”
सुमति भी हैरान रह गई। “मुझे क्या पता बेटा! मैंने तो किसी से कुछ कहा ही नहीं। तू पापा की तस्वीर साफ कर ले, मैं जाकर देखती हूँ कि माजरा क्या है।”
सुमति घबराई हुई सी लिफ्ट से नीचे आई। जैसे ही वह भीड़ के पास पहुँची, मालती जी उस पर टूट पड़ीं। “सुमति! तूने अपनी आँखों पर पट्टी बांध रखी है क्या? या जानबूझकर अनजान बन रही है? तेरी बेटी ने पूरी सोसाइटी का माहौल खराब कर रखा है। हमारे भी जवान बच्चे हैं यहाँ, उन पर क्या असर पड़ेगा इस गंदगी का?”
सुमति के हाथ-पैर कांपने लगे। “मालती जी, आप क्या कह रही हैं? मिताली ने क्या किया है? आप लोग इस तरह से बात क्यों कर रहे हैं?”
एक दूसरी महिला तंज कसते हुए बोली, “अरे सुमति बहन, तुम्हारी बेटी कर्नल साहब पर डोरे डाल रही है। कल शाम को मालती भाभी ने खुद देखा है उसे कर्नल साहब को महंगे फूल और गिफ्ट देते हुए। शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को! पिता की उम्र के आदमी के साथ ये सब करते हुए तुम्हारी बेटी के हाथ नहीं कांपे?”
सुमति को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। “आप लोग पागल हो गए हैं क्या? मेरी बच्ची ऐसी नहीं है। वह कर्नल साहब को पिता समान मानती है। आप लोग मेरी बच्ची को बिना वजह बदनाम कर रहे हैं!”
मालती जी ने अपना स्वर और ऊँचा कर लिया, “बदनाम? जो सच है वही कह रहे हैं। मेरी आँखें धोखा नहीं खा सकतीं। मैंने खुद देखा है उन दोनों को इशारे करते और छुप-छुप कर सामान का लेन-देन करते।” यह कहकर मालती जी ने ग्राउंड फ्लोर की तरफ मुँह करके जोर से आवाज लगाई, “कर्नल साहब! जरा बाहर आइए। आज फैसला होकर ही रहेगा।”
शोरगुल सुनकर कर्नल साहब अपनी छड़ी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आए। जब उन्होंने भीड़ को देखा और सुमति को रोते हुए पाया, तो वे भौंचक्के रह गए। कुछ बुजुर्ग लोगों ने जब उन्हें बताया कि सोसाइटी की महिलाएं मिताली और उनके रिश्ते को लेकर क्या घटिया बातें कर रही हैं, तो कर्नल साहब का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उनका फौजी खून खौल उठा।
उन्होंने अपनी छड़ी जमीन पर जोर से पटकी। उनकी कड़क और भारी आवाज ने पूरी भीड़ को सन्न कर दिया।
“चुप रहो सब के सब!” कर्नल साहब चीखे। “शर्म नहीं आती तुम लोगों को? एक मासूम बच्ची पर इतना गंदा इल्जाम लगाते हुए तुम्हारी जुबान नहीं गली? तुम्हारी इस सड़ी हुई और खोखली सोच ने आज साबित कर दिया कि समाज में कचरा सड़कों पर नहीं, तुम जैसे लोगों के दिमाग में भरा है।”
मालती जी ने थोड़ा सहमते हुए कहा, “पर कर्नल साहब, कल मैंने खुद मिताली को आपको तोहफे और फूल देते हुए देखा था। कोई भी जवान लड़की किसी…”
“चुप कर औरत!” कर्नल साहब ने मालती जी को बीच में ही डपट दिया। “तुम्हारी नजर ने जो देखा, तुम्हारी गंदी सोच ने उसे वैसा ही समझ लिया। जानना चाहती हो कि कल उस गिफ्ट में क्या था? वो फूल किसके लिए थे? तो सुनो कान खोलकर!”
कर्नल साहब की आँखों में नमी आ गई। उन्होंने गहरी सांस ली और कांपती हुई आवाज में बोले, “कल पच्चीस तारीख थी। कल ही के दिन, दस साल पहले, मेरी इकलौती बेटी इस दुनिया से चली गई थी। वह बिल्कुल मिताली की उम्र की थी। कल मेरी बेटी का जन्मदिन था। हर साल मैं अपनी बेटी के जन्मदिन पर शहर के अनाथालय में जाकर बच्चों को किताबें और कपड़े बांटता था और अपनी बेटी की तस्वीर पर उसके पसंदीदा सफेद गुलाब चढ़ाता था। लेकिन इस बार मेरे घुटनों ने जवाब दे दिया था। मैं चल नहीं पा रहा था। मैंने इस बच्ची, मिताली से मिन्नत की थी कि वो बाजार से सफेद गुलाब और बच्चों के लिए वो तोहफे ले आए, ताकि मेरी बेटी का जन्मदिन सूना न जाए।”
वहां खड़े हर इंसान की सांसें अटक गईं।
कर्नल साहब ने सुमति की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा, “इस बच्ची ने ऑफिस की थकान के बावजूद, मेरे एक बार कहने पर वो सारा सामान लाकर दिया, ताकि एक लाचार बाप अपनी मरी हुई बेटी का जन्मदिन मना सके। और तुम लोगों ने… तुम लोगों ने उस बच्ची की नेकी को, उसकी इंसानियत को अपने शक की सूली पर चढ़ा दिया? लानत है तुम सबकी इस सोच पर!”
सोसाइटी के प्रांगण में अब पिन-ड्रॉप साइलेंस था। मालती जी का सिर शर्म से झुक गया था। जिन महिलाओं ने अभी-अभी सुमति को ताने मारे थे, वे अब नजरें चुरा रही थीं।
तभी मिताली , जो बालकनी से सब सुन रही थी, दौड़ती हुई नीचे आई और सुमति के गले लगकर रोने लगी। कर्नल साहब ने आगे बढ़कर मिताली के सिर पर हाथ रखा और कहा, “मुझे माफ कर दे बेटा। मेरी वजह से तुझे आज इन जाहिलों की बातें सुननी पड़ीं। तू मेरी बेटी है, और रहेगी।”
कुछ बुजुर्गों ने आगे बढ़कर कर्नल साहब और सुमति से माफी मांगी। मालती जी बिना कुछ कहे, शर्मिंदगी के मारे नजरें झुकाए अपने घर की तरफ लौट गईं। उस दिन के बाद, गुलमोहर हाइट्स में किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह किसी के भी पवित्र रिश्ते पर कीचड़ उछाल सके।
सच है, आँखें सिर्फ वही देखती हैं जो दिमाग सोचता है। अगर सोच में ही गंदगी भरी हो, तो दुनिया का सबसे पवित्र रिश्ता भी दागदार ही नजर आता है।
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