कांच के ख्वाब

 एक शाम जब मीरा काम से लौटी, तो उस का चेहरा उतरा हुआ था और आँखें सूजी हुई थीं। शांति से अब और रहा नहीं गया। उन्होंने मशीन बंद की और मीरा के पास जाकर बैठ गईं।

“मीरा… बेटी, मुझे बहुत डर लग रहा है। तू पिछले कई दिनों से बहुत परेशान दिख रही है। कहीं तेरे साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया?” शांति की आवाज में एक माँ की गहरी चिंता और खौफ साफ छलक रहा था।

मीरा एकदम से हड़बड़ा गई, जैसे किसी ने उसे गहरी नींद से झकझोर कर जगा दिया हो। “क्या… क्या कह रही हो माँ? नहीं तो… मुझे क्या होना है!” उस ने अपनी आंखें चुराते हुए कहा।

“देख मीरा, तू मेरी कोख से जन्मी है। तू मुझसे कुछ भी छिपा नहीं सकती। कुछ न कुछ तो ऐसा है जो तुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है,” शांति ने अपनी बेटी के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा।

शांति देवी अपनी सिलाई मशीन पर बैठी कपड़े के एक टुकड़े पर बखिया चला रही थीं, लेकिन उन का ध्यान बार-बार दीवार पर टंगी घड़ी और फिर दरवाजे की तरफ जा रहा था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। बारिश का यह मौसम वैसे तो बहुत सुहावना लगता है, लेकिन एक जवान बेटी की विधवा माँ के लिए यह मौसम और भी कई तरह की चिंताएं लेकर आता है। शांति जानती थीं कि उम्र का वह दौर जब लड़कियां लड़कपन की दहलीज लांघ कर जवानी की तरफ कदम बढ़ाती हैं, तो वह किसी उफनती हुई नदी की तरह होता है। पानी का बहाव कब, किस तरफ मुड़ जाए और किनारों को तोड़ता हुआ किस खाई में गिर पड़े, यह कोई नहीं कह सकता।

उन की इकलौती बेटी, मीरा, अब उन्नीस साल की हो चुकी थी। मीरा जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही भोली भी। शांति ने उसे दुनिया की ऊंच-नीच, समाज के दोगलेपन और मर्दों की नजरों के बारे में अनगिनत बार समझाया था। मीरा भी हर बार अपनी माँ के गले लग कर यही कहती थी कि वह कभी कोई ऐसा काम नहीं करेगी जिससे उस की माँ को किसी के सामने सिर झुकाना पड़े। शांति को अपनी परवरिश पर भरोसा था, लेकिन उन्हें इस जालिम दुनिया और जवानी की उस अंधी आंधी से डर लगता था, जो बड़े-बड़े वादों और कसमों को एक झटके में उड़ा ले जाती है।

शांति और मीरा दोनों ही अपने-अपने तरीके से जिंदगी की हकीकत को समझने की कोशिश कर रही थीं। दोनों को मालूम था कि जिंदगी हमेशा वैसी नहीं चलती जैसी हम कल्पना करते हैं। शांति दिन-रात कपड़े सिल कर घर का खर्च चलाती थीं और मीरा ने भी कॉलेज के साथ-साथ एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी कर ली थी ताकि घर की आमदनी में कुछ हाथ बंटा सके।

दिन अपनी रफ्तार से बीत रहे थे। शांति अपनी बेटी की हर छोटी-बड़ी हरकत पर नजर रखती थीं। उन के बीच में बहुत ज्यादा लंबी-चौड़ी बातें नहीं होती थीं, लेकिन एक माँ की आंखें बिना बोले ही बेटी के चेहरे की हर लकीर को पढ़ लेने का हुनर रखती हैं।

कुछ महीनों से शांति महसूस कर रही थीं कि मीरा में काफी बदलाव आ गया है। जो मीरा पहले सादे कपड़ों में कॉलेज और काम पर जाती थी, अब वह अपने सजने-संवरने पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगी थी। महंगे परफ्यूम की महक, नए-नए कपड़े और उस के चेहरे पर रहने वाली एक अजीब सी खामोशी शांति को अंदर ही अंदर डरा रही थी। मीरा अब घर के कामों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं लेती थी। वह घंटों अपने मोबाइल में खोई रहती और कभी-कभी तो वह रात को सोते-सोते अचानक किसी गहरी सोच में डूबी हुई नजर आती। उस की हंसी कहीं गायब हो गई थी और उस की जगह एक अजीब सी घबराहट ने ले ली थी।

एक शाम जब मीरा काम से लौटी, तो उस का चेहरा उतरा हुआ था और आँखें सूजी हुई थीं। शांति से अब और रहा नहीं गया। उन्होंने मशीन बंद की और मीरा के पास जाकर बैठ गईं।

“मीरा… बेटी, मुझे बहुत डर लग रहा है। तू पिछले कई दिनों से बहुत परेशान दिख रही है। कहीं तेरे साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया?” शांति की आवाज में एक माँ की गहरी चिंता और खौफ साफ छलक रहा था।

मीरा एकदम से हड़बड़ा गई, जैसे किसी ने उसे गहरी नींद से झकझोर कर जगा दिया हो। “क्या… क्या कह रही हो माँ? नहीं तो… मुझे क्या होना है!” उस ने अपनी आंखें चुराते हुए कहा।

“देख मीरा, तू मेरी कोख से जन्मी है। तू मुझसे कुछ भी छिपा नहीं सकती। कुछ न कुछ तो ऐसा है जो तुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है,” शांति ने अपनी बेटी के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा।

मीरा के होठ कांपने लगे, लेकिन उस के गले से एक भी शब्द नहीं निकला। उस ने अपना सिर झुका लिया और उस की आंखों से आंसुओं की एक मोटी धार बह निकली।

शांति का दिल धक से रह गया। उनका सालों का डर जैसे उनके सामने हकीकत बनकर खड़ा हो गया था। “तुझे कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है मीरा। मैं औरत हूं, और एक माँ भी। तेरी खामोशी ने सब कुछ चीख-चीख कर कह दिया है। पर बस मुझे एक बात का सच-सच जवाब दे… जिस से तूने यह सब किया है, जिस से तू प्यार करती है… क्या वह तुझसे शादी करेगा?”

शांति के इस सवाल ने मीरा के अंदर के उस अनजाने खौफ को और बढ़ा दिया। उस ने अपनी डरी हुई, लाल आंखों से अपनी माँ की तरफ देखा। उस की आंखों में पसरे हुए सन्नाटे और दहशत को देखकर शांति खुद बुरी तरह सहम गईं। उन्हें आभास हो गया कि हालात उस से कहीं ज्यादा बिगड़ चुके हैं जितना वह सोच रही थीं।

शांति ने अपना कलेजा पत्थर करते हुए, कांपती हुई आवाज में पूछा, “मीरा… सच-सच बताना… कहीं तू पेट से तो नहीं है?”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस बेतहाशा रोते हुए अपना सिर ‘हां’ में हिला दिया। ऐसा लग रहा था जैसे उस का वह सिर हिलाना उस की पूरी जिंदगी के सपनों को चकनाचूर कर रहा हो।

शांति को लगा जैसे किसी ने उनके सिर पर हथौड़ा मार दिया हो। उन्होंने जोर से अपना माथा पीट लिया। उनके अंदर एक ऐसा तूफान उठ रहा था कि वह न तो जोर से चीख सकती थीं, न छाती पीट कर रो सकती थीं, और न ही अपनी उस फूल सी बच्ची की जान ले सकती थीं। वह उस बेबसी के दलदल में धंस गई थीं, जहां से चीखने की आवाज भी बाहर नहीं निकल पाती।

जिस अनहोनी से शांति हमेशा डरती थीं, जिस दलदल से बचाने के लिए उन्होंने अपनी बेटी को बार-बार चेतावनी दी थी, आज उनकी अपनी ही बेटी उसी दलदल में गले तक धंस चुकी थी। शांति ने सोचा था कि बेटी उन की गरीबी का सहारा बनेगी, लेकिन जवानी की उस दहलीज पर फिसलने से खुद को रोक पाना शायद उस नादान लड़की के लिए मुमकिन नहीं था।

गले में अटके हुए आंसुओं को निगलते हुए, एक मरी हुई सी आवाज में शांति ने पूछा, “किस का है यह पाप?”

शुरू में तो मीरा चुप रही। लड़कियां अक्सर उस धोखेबाज का नाम छिपाने की कोशिश करती हैं जिसने उनकी जिंदगी बर्बाद की होती है। उन्हें लगता है कि शायद अब भी वह लौट आएगा। लेकिन एक माँ की पारखी नजरों और जिद के आगे किसी भी झूठ की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती।

आखिरकार मीरा टूट गई। उस ने रोते हुए बताया, “माँ… यह विक्रम का है… मेरी कंपनी का मालिक।”

शांति को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। “विक्रम? पर तूने तो कहा था कि तू ऑफिस में सिर्फ रिसेप्शन का काम करती है और बाकी वक्त कॉलेज में रहती है? तूने तो कहा था कि उस का ऑफिस बहुत बड़ा है और वहां बहुत सी लड़कियां काम करती हैं?”

मीरा सुबकते हुए अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ी। “माँ, मैंने तुमसे बहुत बड़ा झूठ बोला था। मैंने कॉलेज जाना बहुत पहले ही छोड़ दिया था। मैं विक्रम की मीठी-मीठी बातों और उस के झूठे प्यार के जाल में पूरी तरह फंस गई थी। वह मुझे घुमाने ले जाता था, महंगे तोहफे देता था। मैं ऑफिस में काम नहीं करती थी, मैं तो अपना सारा वक्त उस के फार्महाउस पर गुजारती थी।”

“और जो पैसे तू हर महीने मुझे लाकर देती थी?” शांति ने आंखें फाड़ कर पूछा।

“वह पैसे विक्रम मुझे देता था, ताकि तुम्हें लगे कि मैं ईमानदारी से नौकरी कर रही हूं और तुम्हें मुझ पर कोई शक न हो।”

शांति का शरीर गुस्से और सदमे से कांपने लगा। “हे भगवान! तू अपनी जवानी की आग बुझाने और झूठे शौक पूरे करने के लिए इतनी नीचे गिर गई? अरे, अगर तू मेरी एक बात मान लेती, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देती और ईमानदारी से चार पैसे कमाती, तो किसी की मजाल नहीं थी कि कोई तेरी तरफ आंख उठाकर भी देख लेता। काम में मन लगा रहता तो तेरा दिमाग इन सब में भटकता ही नहीं। पर तू तो बहुत शातिर निकली… अपनी सगी माँ की आंखों में ही धूल झोंकती रही!”

मीरा अपनी माँ के पैरों से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ कर दो माँ। मैं तुम्हारी बहुत बड़ी गुनहगार हूं। मैं उस की दौलत और झूठे वादों में अंधी हो गई थी। मुझे लगा वह मुझसे शादी करेगा। एक बार… बस एक बार मुझे इस पाप से बचा लो माँ। मैं जिंदगी भर तुम्हारी दासी बन कर रहूंगी।”

शांति ने अपने आंसुओं को पोंछा। गुस्सा अपनी जगह था, लेकिन वह जानती थीं कि अगर उन्होंने अभी अपनी बेटी का साथ छोड़ दिया, तो समाज इसे नोच कर खा जाएगा।

“जा उसी विक्रम के पास!” शांति ने कठोर स्वर में कहा। “जिस के साथ मिल कर तूने यह गुल खिलाए हैं, अब वही कुछ करेगा। उसे साथ लेकर किसी बड़े डॉक्टर के पास जा और अपने इस पाप को खत्म करवा कर आ।”

मीरा ने फटी हुई आंखों से अपनी माँ की तरफ देखा और बोली, “माँ… उस ने मना कर दिया है। जब मैंने उसे बताया कि मैं पेट से हूं, तो उस ने साफ कह दिया कि यह उस का बच्चा नहीं है। उस ने मेरे मुंह पर पैसे फेंक कर कहा कि मैं खुद जाकर अबॉर्शन करवा लूं, लेकिन वह मेरे साथ किसी क्लीनिक नहीं जाएगा। उस ने कहा कि समाज में उस की बहुत बड़ी इज्जत है, अगर किसी ने उसे मेरे साथ देख लिया तो उस की और उस के परिवार की बदनामी होगी। उस ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैंने किसी को कुछ बताया, तो वह हमें शहर से बाहर फिंकवा देगा।”

शांति यह सुनकर सन्न रह गई। फिर एक कड़वी हंसी उनके होठों पर तैर गई। “वाह री इज्जत! एक कुंआरी, गरीब लड़की की इज्जत को तार-तार करते वक्त इन रईसजादों की इज्जत कहीं नहीं जाती, लेकिन जब अपने किए पाप को सुधारने की बारी आती है, तो इन्हें अपनी इज्जत की फिक्र सताने लगती है! मैं क्या करूं? किस कुएं में जाकर कूदूं? कुछ समझ नहीं आ रहा।”

शांति के मन में अपनी बेटी के प्रति बहुत गुस्सा और नफरत थी। लेकिन जब उन्होंने अपनी फूल सी बच्ची को फर्श पर पड़े तड़पते और सिसकते हुए देखा, तो एक माँ की ममता उस सारे गुस्से पर भारी पड़ गई। उन्होंने मीरा को दुत्कारा नहीं। शांति नीचे बैठीं और मीरा को अपनी छाती से लगा लिया।

दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे के गले लग कर बहुत देर तक रोती रहीं। उस छोटे से कमरे में उनके दर्द को सुनने और समझने वाला कोई तीसरा नहीं था। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि इस मुसीबत से उन्हें खुद ही लड़ना होगा और इसके जो भी नतीजे होंगे, वो भी उन्हें अकेले ही बर्दाश्त करने होंगे। समाज तो सिर्फ तमाशा देखने और ताने मारने के लिए खड़ा होता है।

जब रो-रो कर दोनों का मन थोड़ा हल्का हुआ, तो शांति चुपचाप उठीं। उन्होंने अलमारी खोली और एक पुराना सूटकेस बाहर निकाल लिया। वह बिना कुछ कहे अपने और मीरा के कपड़े उसमें ठूंस-ठूंस कर भरने लगीं।

मीरा ने हैरान होकर अपनी माँ की तरफ देखा। उसे लगा शायद माँ उसे घर से निकाल रही हैं।

शांति ने मीरा की तरफ देखे बिना, एक ठंडी लेकिन मजबूत आवाज में कहा, “उठ जा और अपना जरूरी सामान बांध ले। हम आज रात की ही ट्रेन से अपने गांव रामनगर जा रहे हैं। इस शहर में अब हमारा कुछ नहीं हो सकता। यहां रहे तो यह समाज हमें और तुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा। गांव में दूर की रिश्तेदारी है, वहां जाकर किसी तरह इस पाप से छुटकारा पाएंगे। और उसके बाद, वहीं गांव में ही कोई सीधा-साधा लड़का देखकर तेरा ब्याह कर दूंगी। अब मैं तुझे इस जालिम शहर की हवा भी नहीं लगने दूंगी।”

मीरा खामोशी से उठी और अपना सामान बांधने लगी। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन शांति के मन में चल रहा तूफान अब एक खामोश फैसले में बदल चुका था। उन्हें अब अपनी बेटी की जिंदगी को एक नई दिशा देनी थी, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी सारी जिंदगी की जमा-पूंजी और अपना शहर ही क्यों न छोड़ना पड़े।

क्या आपको लगता है कि समाज हमेशा लड़कियों के ही चरित्र पर उंगली उठाता है, जबकि गलती करने वाले पुरुष आसानी से बच निकलते हैं? इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय है, कमेंट में जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।

error: Content is protected !!