त्याग की मूरत और स्वार्थ का आईना

शहर की चकाचौंध और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच, माधव अपनी पत्नी कामिनी और सात साल की बेटी रिया के साथ एक आलीशान फ्लैट में रहता था। माधव ने अपने जीवन में बहुत तरक्की की थी। एक साधारण से घर से निकलकर उसने अपनी एक अच्छी खासी कंस्ट्रक्शन कंपनी खड़ी कर ली थी। इस सफलता के पीछे उसकी अपनी मेहनत तो थी ही, लेकिन उसकी बड़ी बहन सुशीला का भी बहुत बड़ा हाथ था, जिसने बचपन में माता-पिता के गुजर जाने के बाद माधव को एक माँ की तरह पाला था। सुशीला ने अपनी पढ़ाई छोड़कर माधव को पढ़ाया, खुद फटे कपड़े पहने लेकिन माधव की किताबों में कभी कोई कमी नहीं आने दी।

लेकिन समय के साथ इंसान बदल जाता है और माधव भी बदल गया था। सुशीला की शादी एक बहुत ही साधारण परिवार में हुई थी। उसके पति एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी करते थे और उनका जीवन बड़ी मुश्किल से कटता था। जब माधव की शादी कामिनी से हुई, तो घर का माहौल पूरी तरह से बदल गया। कामिनी एक अमीर घर की बेटी थी और उसे सुशीला का रहन-सहन, उसका साधारणपन और गरीबी बिल्कुल पसंद नहीं थी।

सुशीला जब भी अपने दो बच्चों के साथ माधव के घर आती, तो कामिनी का मुँह बन जाता। सुशीला के बच्चे छोटे थे और कभी-कभी खेल-खेल में घर का कोई सामान इधर-उधर कर देते या सोफे के कुशन गिरा देते। कामिनी को यह सब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। वह अक्सर माधव से शिकायत करती कि “तुम्हारी बहन जब भी आती है, मेरे घर का सलीका बिगाड़ कर रख देती है। ऊपर से इसके बच्चों की फरमाइशें! कभी पिज्जा खाना है, कभी बाहर जाना है। हमारा खर्चा दोगुना हो जाता है। और तो और, जाते वक्त वह हमारे घर से पुराना राशन, कभी बच्चों के उतरे हुए कपड़े तो कभी तुम्हारे पुराने जूते भी बाँध कर ले जाती है। क्या हमारा घर कोई अनाथालय है?”

माधव, जो कभी अपनी बहन के बिना एक निवाला नहीं खाता था, अब अपनी पत्नी की बातों में आकर अपनी ही बहन से चिढ़ने लगा था। उसे भी लगने लगा था कि सुशीला सिर्फ अपने फायदे के लिए, या शायद कुछ पैसे और सामान ऐंठने के लिए ही उनके घर आती है।

एक दिन सुशीला रक्षाबंधन के मौके पर माधव के घर आई हुई थी। उसके बच्चों ने खेलते हुए गलती से कामिनी का एक महँगा कांच का फूलदान तोड़ दिया। कामिनी ने आसमान सिर पर उठा लिया। उसने बच्चों को बुरी तरह डांटा और सुशीला को ताने मारने लगी कि वह अपने बच्चों को तमीज नहीं सिखा सकती। माधव उस वक्त अपने कमरे में था, बाहर का शोर सुनकर वह भी आ गया। बजाय इसके कि वह हालात को संभालता, उसने भी अपनी पत्नी का ही साथ दिया।

माधव ने गुस्से में सुशीला से कहा, “दीदी, माना कि तुम मेरी बहन हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे बच्चे मेरे घर को धर्मशाला समझ लें। कामिनी सही कहती है, तुम लोग जब भी आते हो, नुकसान ही करके जाते हो। और ये जो तुम हर बार वापसी में कामिनी से घर का बचा-खुचा सामान या मेरे पुराने कपड़े मांगती हो ना, ये सब बंद करो। मुझे बहुत शर्मिंदगी होती है। तुम अब अपने घर की हो चुकी हो, वही रहा करो। बस त्योहार पर एक-दो घंटे के लिए आ जाया करो, इतना ही काफी है।”

सुशीला अवाक रह गई। जिस भाई को उसने अपनी गोद में खिलाया था, जिसके लिए उसने अपनी जवानी के सारे शौक कुर्बान कर दिए थे, आज वह उसे जलील कर रहा था। सुशीला की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने एक शब्द नहीं कहा। उसने चुपचाप अपने बच्चों का हाथ पकड़ा और बिना खाना खाए वहाँ से निकल गई। कामिनी पीछे से मुस्कुरा रही थी और माधव को लग रहा था कि उसने अपनी पत्नी के सामने अपनी हैसियत साबित कर दी है।

इस घटना के बाद भाई-बहन के बीच एक गहरी खाई बन गई। सुशीला ने माधव के घर आना लगभग छोड़ दिया। कुछ महीनों बाद, जब माधव के पुश्तैनी गाँव वाले घर को बेचने की बात आई, तो पंचायत और रिश्तेदारों ने कहा कि इस पैसे में सुशीला का भी आधा हिस्सा बनता है। सुशीला भी उस वक्त गाँव आई हुई थी। उसे पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि उसके पति की नौकरी छूट गई थी और बड़े बेटे का स्कूल छुड़वाने की नौबत आ गई थी।

लेकिन माधव ने सबके सामने साफ इंकार कर दिया। उसने बड़ी बेशर्मी से कहा, “लड़कियों का मायके की संपत्ति पर कोई हक नहीं होता। इसकी शादी में पिताजी ने बहुत खर्च किया था। मैं अपनी मेहनत और इस पुश्तैनी घर की कीमत का एक भी पैसा इसे नहीं दूंगा।” कामिनी ने भी रिश्तेदारों के सामने सुशीला को खूब जलील किया और कहा कि “ये तो बस मायके की दौलत पर नजर गड़ाए बैठी है, इसे भाई के प्यार से कोई मतलब नहीं।”

सुशीला उस दिन भी खामोश रही। उसने अपने हक के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी। वह बस माधव को एकटक देखती रही और फिर चुपचाप अपने गाँव वाले घर की दहलीज से उतरकर हमेशा के लिए चली गई। उसने माधव से सारे रिश्ते तोड़ लिए। माधव को भी कोई फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उसे लगा कि एक बहुत बड़ा बोझ उसके सिर से उतर गया है।

समय अपनी चाल चलता रहा। करीब चार साल बीत गए। माधव का व्यापार आसमान छू रहा था, लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक उसकी सात साल की बेटी रिया स्कूल में बेहोश होकर गिर पड़ी। जब उसे अस्पताल ले जाया गया, तो डॉक्टरों ने कई टेस्ट किए। रिपोर्ट आने पर माधव और कामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। रिया को ब्लड कैंसर था और वह भी एडवांस स्टेज में।

डॉक्टरों ने कहा कि रिया को बचाने के लिए जल्द से जल्द बोन मैरो ट्रांसप्लांट करना होगा और इस पूरे इलाज में कम से कम पचास लाख रुपये का खर्च आएगा। माधव के पास पैसा तो था, लेकिन पिछले ही महीने उसने अपना सारा पैसा और बचत एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट में लगा दी थी, जो कानूनी पचड़ों में फंस गया था। उसके सारे बैंक अकाउंट फ्रीज हो चुके थे और बाजार में उसका बहुत पैसा डूब गया था।

माधव ने अपने उन सभी अमीर दोस्तों और रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाए, जो उसकी पार्टियों में मुफ्त की शराब पीते थे और उसकी झूठी तारीफें करते नहीं थकते थे। लेकिन जब उसने पैसे मांगे, तो सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए। किसी ने बहाना बनाया कि उनका खुद का बिजनेस घाटे में है, तो किसी ने फोन उठाना ही बंद कर दिया। कामिनी के मायके वालों ने भी एक छोटी सी रकम देकर पल्ला झाड़ लिया।

माधव और कामिनी अस्पताल के गलियारे में बैठे फूट-फूट कर रो रहे थे। उनकी बेटी मौत के मुंह में जा रही थी और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। अस्पताल वालों ने साफ कह दिया था कि अगर कल तक पैसे जमा नहीं हुए तो वे इलाज शुरू नहीं करेंगे। माधव खुद को कोस रहा था। उसे लग रहा था कि शायद उसके किसी पाप की सजा उसकी मासूम बेटी को मिल रही है।

तभी एक शाम, जब माधव हताश होकर अस्पताल के बाहर सीढ़ियों पर सिर झुकाए बैठा था, किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। माधव ने चौंककर सिर उठाया। सामने सुशीला खड़ी थी।

माधव की आँखें फटी की फटी रह गईं। सुशीला बहुत कमजोर हो गई थी। उसने एक बहुत ही साधारण और पुरानी सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसका रंग कई जगह से उड़ चुका था। उसके पैरों की चप्पल घिस चुकी थी और चेहरे पर उम्र और थकान के गहरे निशान थे। माधव को लगा कि सुशीला उसकी हालत पर तंज कसने या पुरानी बातों का बदला लेने आई है। कामिनी भी पास आ गई और वह डर रही थी कि सुशीला अब उन्हें खरी-खोटी सुनाएगी।

लेकिन सुशीला ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने माधव के सिर पर वैसे ही हाथ फेरा जैसे बचपन में फेरती थी। उसने भारी आवाज में कहा, “पागल, तूने मुझे बताया क्यों नहीं? क्या मैं मर गई थी जो तू अकेला इतना बड़ा बोझ उठा रहा था?”

माधव कुछ बोल नहीं पाया, उसकी आवाज गले में ही अटक गई। सुशीला ने अपने कपड़े के झोले में हाथ डाला और एक पुराना सा कपड़ों में लिपटा हुआ बंडल निकाला। उसने वह बंडल माधव के हाथों में रख दिया।

“ये क्या है दीदी?” माधव ने कांपते हाथों से पूछा।

“इसमें मेरे जेवर हैं… और मेरे घर के कागज। मैंने अपना वो छोटा सा मकान गिरवी रख दिया है। कुछ पैसे नकद हैं और बाकी तू ये जेवर बेचकर इंतजाम कर ले। कुल मिलाकर पैंतीस-चालीस लाख का इंतजाम हो गया है। बाकी तू कहीं से जोड़ लेना, मेरी बच्ची का इलाज नहीं रुकना चाहिए।” सुशीला ने एक ही सांस में कह दिया।

माधव सन्न रह गया। उसने बंडल खोलकर देखा। उसमें सुशीला की शादी के वो जेवर थे जिन्हें उसने अपनी बेटी की शादी के लिए सहेज कर रखा था। माधव की नजर सुशीला की सूनी कलाइयों और उसके गले के खाली मंगलसूत्र वाले धागे पर गई।

“दीदी… तुमने… तुमने अपना घर गिरवी रख दिया? तुम्हारे बच्चे कहाँ रहेंगे? और तुम… तुम तो मुझसे नफरत करती हो ना? मैंने तो तुम्हारे साथ कितना बुरा सुलूक किया था, तुम्हें घर से निकाल दिया था, तुम्हारा हिस्सा मार लिया था। फिर तुम मेरे लिए अपनी जिंदगी भर की पूंजी क्यों लुटा रही हो?” माधव दहाड़ें मारकर रोने लगा। वह सुशीला के पैरों में गिर पड़ा।

सुशीला ने उसे उठाया और गले से लगा लिया। उसकी अपनी आँखों से भी आंसुओं की धार बह रही थी। “भाई, खून के रिश्ते कागजों के मोहताज नहीं होते। माना तूने मुझे बुरा-भला कहा, पर तू है तो मेरा ही खून। मेरी माँ की आखिरी निशानी। अगर मेरी भतीजी को कुछ हो गया, तो क्या मैं उस घर में चैन से रह पाऊंगी? बहनें भाइयों से रूठ सकती हैं, लेकिन उनका दुख नहीं देख सकतीं। तूने मुझे पराया कर दिया था, पर मैंने तुझे कभी अपने दिल से नहीं निकाला।”

कामिनी, जो दूर खड़ी यह सब देख रही थी, भागकर आई और सुशीला के पैरों पर गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दीजिए दीदी। मैंने हमेशा आपको गलत समझा। मैंने आपके गरीबी का मजाक उड़ाया, आपके बच्चों को कोसा। और आज जब मेरे अपने रिश्तेदारों ने मेरा साथ छोड़ दिया, तो आप भगवान बनकर आ गईं। मैं बहुत बुरी औरत हूँ दीदी, मुझे माफ कर दीजिए।” कामिनी बुरी तरह बिलख रही थी।

सुशीला ने कामिनी को भी उठाया और कहा, “बस कर पगली, जो बीत गया उसे भूल जा। अब जल्दी से जाकर रिया का इलाज शुरू करवाओ।”

माधव सुशीला को देख रहा था। उसके फटे हुए पल्लू, घिसी हुई चप्पल और रूखे हाथों को देखकर उसे अपनी उस घटिया सोच पर घिन आ रही थी जब उसे लगता था कि उसकी बहन उसके घर से साबुन या पुराने कपड़े चुराकर ले जाती है। उसे आज समझ आ रहा था कि उसकी बहन कितनी तंगहाली में जी रही थी, और फिर भी उसने कभी अपने भाई से कुछ नहीं मांगा। और जब भाई पर मुसीबत आई, तो उसने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

इलाज शुरू हुआ और सुशीला की दी हुई रकम से रिया की जान बच गई। जब रिया ठीक होकर घर लौटी, तो माधव ने सबसे पहला काम यह किया कि उसने अपने पुश्तैनी घर के हिस्से की रकम ब्याज सहित सुशीला के नाम कर दी और उसका गिरवी रखा घर छुड़वा दिया। लेकिन माधव जानता था कि सुशीला ने जो कर्ज उस पर चढ़ाया था, वो पैसों से कभी नहीं चुकाया जा सकता।

हम अक्सर दुनिया की इस दौड़ में, थोड़े से पैसों और झूठी शान के लिए उन रिश्तों को पीछे छोड़ देते हैं जो हमारी असली ताकत होते हैं। बहनें शायद मायके से थोड़ी सी उम्मीद रखती हैं, कुछ कपड़ों या थोड़े से पैसों की नहीं, बल्कि उस सम्मान और प्यार की, जिसकी वे हकदार होती हैं। जब एक भाई अपनी बहन को दुत्कारता है, तो वह सिर्फ एक इंसान को नहीं, बल्कि एक माँ के दूसरे रूप को दुत्कार रहा होता है।

माधव आज भी जब सुशीला के पास बैठता है, तो उसका सिर हमेशा अपनी बहन के आंचल में होता है। उसे अब समझ आ गया था कि दौलत की चमक एक दिन फीकी पड़ सकती है, लेकिन एक बहन का प्यार हमेशा चमकता रहता है।

बताइए, क्या आपने कभी अपनी बहन या परिवार के किसी ऐसे सदस्य को अनजाने में दुख पहुँचाया है? कुछ लम्हा अपने अपनों के पास बैठकर उनका हाल पूछ लिया करें। शायद उनके चेहरे पे कुछ लम्हों के लिए एक सुकून आ जाये। बहनें सच में माँ का ही रूप होती हैं।

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