कमरे के अंदर बैठी स्नेहा अपने कपड़ों को सूटकेस में सहेज रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार खिड़की के बाहर गिरती बारिश की बूंदों पर जा टिकती थीं। उसकी शादी को अभी महज़ चार महीने ही हुए थे। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी। बचपन से लेकर आज तक उसने हर सावन अपने मायके के उसी पुराने आंगन में सखियों के साथ झूला झूलते और मेहंदी लगाते हुए बिताया था। एक तरफ मायके जाने की वह बेतहाशा खुशी थी, तो दूसरी तरफ अपने पति रोहन से एक महीने के लिए दूर जाने का एक हल्का सा दर्द भी उसके दिल के किसी कोने में छिपा था।
तभी रोहन कमरे में दाखिल हुआ। उसने स्नेहा को यूं ख्यालों में खोए देखा तो मुस्कुराते हुए पीछे से उसके कंधों पर हाथ रख दिया। “क्या बात है श्रीमती जी? मायके जाने की इतनी खुशी है कि अभी से ख्यालों में वहां पहुंच गई हो?” रोहन ने शरारत भरे लहजे में कहा। स्नेहा ने पलटकर उसे देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “कल सुबह विकास भैया मुझे लेने आ रहे हैं। मेरी सारी सहेलियां भी आ चुकी हैं। मैं तो बस यही सोच रही थी कि इस बार सावन में कितना मज़ा आएगा।” फिर अचानक उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई, “पर… एक महीने के लिए आपको भी तो बहुत मिस करूंगी। आप कभी मेरे बिना रहे नहीं हैं, आपका ख्याल कौन रखेगा?”
रोहन ने सूटकेस बंद करते हुए कहा, “तो फिर एक काम करते हैं न, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं! वैसे भी मेरा ‘वर्क फ्रॉम होम’ चल रहा है, लैपटॉप और इंटरनेट के सहारे मैं कहीं से भी अपना ऑफिस का काम कर सकता हूं। और वैसे भी, मैंने तुम्हारे शहर की बारिश और वहां की कचौड़ियों के बारे में इतना सुना है कि अब मेरा भी वहां जाने का मन कर रहा है।”
स्नेहा की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। “क्या कह रहे हैं आप? पागल हो गए हैं क्या? हमारी परंपराओं में ऐसा कहां होता है कि पहली बार सावन में मायके जाने पर पति भी साथ जाए? अक्सर तो लड़कियां अकेली जाती हैं या भाई के साथ जाती हैं, और दामाद जी बाद में विदा कराने जाते हैं। और सबसे बड़ी बात… मां जी क्या कहेंगी? वो तो पुरानी सोच की हैं, उन्हें ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा।”
रोहन ने लापरवाही से कंधे उचकाए और बोला, “अरे, तुम उसकी चिंता मत करो। मैं मां से बात करता हूं। समय बदल रहा है स्नेहा, और हमें भी अपनी खुशियों के लिए इन छोटी-छोटी बातों से आगे बढ़ना होगा।”
रोहन सीधा रसोईघर में गया, जहां उसकी मां, सुमित्रा जी, रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। रोहन ने पीछे से अपनी मां के गले में बाहें डालते हुए कहा, “मां, एक बात पूछनी थी।” सुमित्रा जी ने रोटी बेलते हुए कहा, “हां पूछो, क्या बात है? स्नेहा की पैकिंग हो गई? कल सुबह उसका भाई आ रहा है न?”
“हां मां, वो तो आ रहा है,” रोहन ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, “लेकिन मैं सोच रहा था कि मैं भी स्नेहा के साथ चला जाऊं। मेरा ऑफिस का काम तो घर से ही चल रहा है, वहां भी कर लूंगा। उसका पहला सावन है, वो वहां खुश रहेगी और मुझे भी थोड़ा बदलाव मिल जाएगा।”
सुमित्रा जी के हाथ अचानक रुक गए। उन्होंने मुड़कर रोहन को कुछ इस तरह देखा जैसे उसने कोई बहुत बड़ी अजीब बात कह दी हो। “तुम साथ जाओगे? बेटा, दस्तूर तो यही है कि पहला सावन बहू अपने मायके में जाकर बिताती है। दामाद का इस तरह बिना किसी खास निमंत्रण के जाकर एक महीने वहां रहना अच्छा नहीं लगता। लोग क्या कहेंगे? ससुराल वाले क्या सोचेंगे कि हम कैसे लोग हैं जो बेटे को भी साथ भेज दिया। तुम अभी यहीं रुको, जब सावन खत्म होने को होगा, तब उसे लेने चले जाना।”
रोहन का चेहरा थोड़ा उतर गया। वह कुछ और कहने ही वाला था कि तभी पीछे से उसके पिता, दीनानाथ जी की भारी आवाज़ आई। वो काफी देर से अखबार पढ़ते हुए मां-बेटे की बातें सुन रहे थे। उन्होंने अपना चश्मा उतारते हुए कहा, “सुमित्रा, तुम भी किन पुरानी बातों को लेकर बैठी हो? जमाना बदल गया है। रोहन ठीक ही तो कह रहा है। जब इसका काम प्रभावित नहीं हो रहा है, तो जाने दो ना।”
सुमित्रा जी ने तर्क देते हुए कहा, “पर जी, समाज के भी तो कुछ नियम होते हैं। हम समधियों के सामने क्या मुंह लेकर जाएंगे?”
दीनानाथ जी मुस्कुराए और रोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “सुमित्रा, याद करो जब हमारी नई-नई शादी हुई थी। मेरा भी कितना मन करता था कि मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे मायके जाऊं, वहां की गलियां देखूं, तुम्हारे बचपन के किस्से सुनूं। लेकिन तब इन खोखले दस्तूरों और ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से मैं कभी तुम्हारे साथ नहीं जा पाया। हमने अपने जीवन के वो अनमोल पल सिर्फ इसलिए खो दिए क्योंकि हम परंपराओं के बोझ तले दबे थे। आज अगर इन बच्चों को वो खुशी मिल रही है, तो उन्हें क्यों रोकें? रिश्ते प्यार और साथ से मजबूत होते हैं, दस्तूरों से नहीं। जाने दो उसे।”
पति की ये बातें सुनकर सुमित्रा जी की आंखों में भी पुरानी यादें तैर गईं। उन्हें अपना वो पहला सावन याद आ गया जब वो दीनानाथ जी को बहुत याद किया करती थीं। उन्होंने एक पल सोचा, फिर मुस्कुराते हुए बोलीं, “ठीक है, अगर तुम्हारे पापा कह रहे हैं, तो चले जाओ। लेकिन वहां जाकर अपने ससुर जी का सिर मत खाना, और अपना काम भी ठीक से करना।” रोहन ने खुशी से उछलकर अपनी मां का माथा चूम लिया और भागकर स्नेहा को यह खुशखबरी देने चला गया। स्नेहा यह सुनकर इतनी खुश हुई कि उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए।
अगली सुबह स्नेहा का भाई विकास घर आ गया। सुमित्रा जी ने विकास की खूब खातिरदारी की। चाय-नाश्ते के बाद जब निकलने का समय आया, तो रोहन अपना बैग लेकर बाहर आ गया। विकास उसे देखकर थोड़ा हैरान हुआ। रोहन ने हंसते हुए विकास के गले लगकर कहा, “अरे साले साहब, हैरान मत होइए। मैं भी आप लोगों के साथ चल रहा हूं।”
विकास खुशी से बोला, “अरे जीजाजी, ये तो बहुत ही अच्छी बात है! घर पर मम्मी-पापा भी आपको देखकर बहुत खुश होंगे।”
रोहन ने एक योजना बनाते हुए कहा, “विकास भैया, एक काम करते हैं। आप अपनी गाड़ी से आराम से घर निकलिए। दस्तूर के हिसाब से आप स्नेहा को लेने आए थे, वो रस्म पूरी हो गई। अब मैं स्नेहा को अपनी गाड़ी से लेकर आऊंगा। हम दोनों थोड़ा घूमते हुए, इस सावन के मौसम का मज़ा लेते हुए शाम तक पहुंचेंगे।” विकास मुस्कुराया और हामी भरते हुए अपनी गाड़ी से निकल गया।
कुछ देर बाद रोहन और स्नेहा भी अपनी कार से निकल पड़े। रास्ता बहुत ही खूबसूरत था। दोनों तरफ हरे-भरे खेत और ऊपर से बरसती रिमझिम बारिश। गाड़ी के शीशे पर गिरती बूंदें और अंदर बजता हल्का-हल्का संगीत एक जादुई माहौल बना रहा था। स्नेहा ने खिड़की का शीशा थोड़ा सा नीचे किया और ठंडी हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस करने लगी। उसने रोहन की तरफ देखा जो बड़े ध्यान से गाड़ी चला रहा था। स्नेहा के मन में अपने ससुराल वालों के लिए, खास तौर पर अपने ससुर जी के लिए बहुत सम्मान भर गया था, जिन्होंने उसकी अनकही इच्छा को समझ लिया था। यह सफर उन दोनों के लिए सिर्फ एक रास्ता तय करना नहीं था, बल्कि एक-दूसरे को और गहराई से समझने का मौका था।
शाम ढलते-ढलते जब वे स्नेहा के मायके पहुंचे, तो दरवाजे पर ही स्नेहा के माता-पिता और उसकी छोटी बहन आरती बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे थे। विकास ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि रोहन भी आ रहा है। जैसे ही रोहन और स्नेहा ने गाड़ी से कदम नीचे रखा, स्नेहा की मां ने आगे बढ़कर दोनों की आरती उतारी। दामाद को इस तरह बिना किसी औपचारिकता के अपने घर में पाकर उनका दिल भी गदगद हो गया था। स्नेहा के पिता ने रोहन को गले लगा लिया और कहा, “बेटा, तुमने यहां आकर हमारे इस सावन की खुशियों को दोगुना कर दिया।”
अगले दिन पूरा परिवार पास के ही एक प्राकृतिक झरने पर पिकनिक मनाने गया। आसमान से हल्की-हल्की फुहारें गिर रही थीं। स्नेहा की सहेलियां भी वहीं थीं। सभी ने मिलकर पेड़ों पर झूले डाले। स्नेहा ने हरी चूड़ियां और लहरिया साड़ी पहन रखी थी। जब वो झूला झूल रही थी, तो रोहन उसे झुला रहा था। वहां मौजूद हर इंसान उनकी जोड़ी को देखकर खुश हो रहा था। स्नेहा ने अचानक रोहन का हाथ पकड़ा और उसे एक तरफ ले जाकर बोली, “पता है रोहन, मैंने हमेशा सुना था कि शादी के बाद लड़कियां अपने मायके को तरस जाती हैं, लेकिन आपने और आपके परिवार ने मुझे जो प्यार और आज़ादी दी है, उसने मेरी दुनिया ही बदल दी। मेरा यह पहला सावन सिर्फ इसलिए यादगार नहीं है क्योंकि मैं अपने मायके में हूं, बल्कि इसलिए यादगार है क्योंकि मेरी दोनों दुनिया, मेरा परिवार और आप, मेरे साथ हैं।”
रोहन ने मुस्कुराते हुए उसके माथे को चूमा और कहा, “ये तो बस शुरुआत है स्नेहा, जिंदगी के हर मौसम में हम यूं ही साथ चलेंगे।”
उस रिमझिम बरसते सावन में स्नेहा के दिल से बस यही पंक्तियां निकल रही थीं:
“सावन की इस ठंडी फुहार में,
जब मिला पिया का साथ मायके के द्वार में,
हर बूँद ने गाया जैसे मिलन का नया गीत,
ये पहला सावन बन गया जीवन का सबसे प्यारा मीत।”
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि बदलते समय के साथ हमारी पुरानी परंपराओं में ऐसे खूबसूरत बदलाव होने चाहिए, जो रिश्तों को बोझ बनने के बजाय उन्हें और मजबूत करें? क्या आपने भी अपने जीवन में कभी पुरानी सोच को पीछे छोड़कर प्यार का रास्ता चुना है? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।
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लेखिका : कविया गोयल