यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा बाल-मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मौसी मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और रहने जा रही हैं। अगर शादी का मतलब बिछड़ना होता है, तो फिर शादी करनी ही क्यों? मैं दौड़कर मौसी के पास जाना चाहता था, उन्हें रोकना चाहता था, लेकिन मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। मेरी आँखों से बस लगातार आँसू बहे जा रहे थे। मैं डर गया था कि अब मेरा क्या होगा। मौसी ने जब मुझे दूर खड़े रोते हुए देखा, तो वो खुद को रोक नहीं पाईं। वो घूंघट में ही दौड़कर मेरे पास आईं और मुझे कसकर अपने सीने से लगा लिया।
मुझे आज भी अपने उस पुराने पुश्तैनी घर का वह बड़ा सा दालान याद है, जहाँ सर्दियों की गुनगुनी धूप में बैठकर माँ स्वेटर बुना करती थीं और पिताजी अख़बार के पन्ने पलटते रहते थे। लेकिन मेरे लिए उस घर की जान, उस घर की धड़कन मेरी कल्याणी मौसी थीं। कल्याणी मौसी, यानी मेरी माँ की सबसे छोटी बहन, जो अपनी आगे की पढ़ाई के लिए गाँव से हमारे पास शहर आ गई थीं। जब वो हमारे घर आईं, तब मैं बमुश्किल चार या पाँच साल का रहा हूँगा। माँ पूरे दिन घर के काम-काज, रसोई, और पिताजी के मेहमानों की खातिरदारी में उलझी रहती थीं। ऐसे में मेरी पूरी दुनिया कल्याणी मौसी के आँचल के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी। मौसी उम्र में माँ से काफी छोटी थीं, इसलिए उनमें एक अल्हड़पन था। वो मेरी मौसी कम और मेरी सबसे पक्की दोस्त ज्यादा थीं।
मेरे खाने-पीने से लेकर, मुझे नहलाने, स्कूल के लिए तैयार करने और रात को परियों की कहानियाँ सुनाकर सुलाने तक की पूरी ज़िम्मेदारी मौसी ने अपने कंधों पर ले रखी थी। जब भी पिताजी मुझे किसी शरारत के लिए डांटते, मौसी हमेशा मेरे आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती थीं। मुझे आज भी याद है कि कैसे वो अपने हिस्से की मिठाइयाँ चुपके से मेरे स्कूल बैग में रख दिया करती थीं। उनके साथ खेलते हुए कब मैं बड़ा होने लगा, मुझे पता ही नहीं चला। घर में मैं इकलौता बच्चा था, इसलिए सबका दुलारा था, लेकिन मौसी के लिए तो मैं जैसे उनकी जान था। वो मुझे ‘कान्हा’ कहकर बुलाती थीं और मैं उनके पीछे-पीछे उनकी परछाईं बनकर घूमता रहता था।
फिर एक दिन हमारे घर की शांत और एकरस ज़िंदगी में अचानक से हलचल मच गई। घर में अजनबियों का आना-जाना शुरू हो गया। बैठक में रोज़ नए-नए लोग चाय-नाश्ते पर आने लगे। मुझे कुछ खास समझ नहीं आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है। फिर एक शाम माँ ने खुशी-खुशी पिताजी को बताया कि कल्याणी का रिश्ता पक्का हो गया है। लड़के वाले शहर के बड़े व्यापारी हैं और उन्हें कल्याणी बहुत पसंद आई है। उस उम्र में ‘शादी’ या ‘रिश्ता’ जैसे शब्दों का मेरे लिए बस एक ही मतलब था—नए कपड़े, ढेर सारी मिठाइयाँ, और घर में बजने वाले गाने। मैं बहुत खुश था। मुझे लगा कि घर में कोई बड़ा त्योहार आने वाला है। धीरे-धीरे घर का रंग-रूप बदलने लगा। दीवारों पर नया रंग-रोगन होने लगा, दरवाज़ों पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों की वंदनवारें सजने लगीं।
शादी के दिन नज़दीक आते-आते घर में रिश्तेदारों की भीड़ जमा हो गई। मेरे मामा, दूसरी मौसियाँ, और उनके ढेर सारे बच्चे हमारे घर आ गए। मेरे तो जैसे मजे ही आ गए थे। अचानक से मुझे खेलने के लिए इतने सारे साथी मिल गए थे कि मैं अपनी कल्याणी मौसी को लगभग भूल ही गया। मैं दिन भर अपने चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के साथ दालान से लेकर छत तक दौड़ लगाता रहता। घर के पिछवाड़े में हलवाइयों ने अपना बड़ा सा तंबू गाड़ लिया था। वहाँ भट्टी पर कड़ाही चढ़ी रहती, और मैं अपने हमउम्र बच्चों की फौज के साथ जाकर चुपके से जलेबियाँ और लड्डू चुरा लाता। हर तरफ ढोलक की थाप, औरतों के गाए जाने वाले मंगल गीत और हँसी-ठिठोली की आवाज़ें गूंजती रहती थीं।
इस पूरे कोलाहल और जश्न के बीच मैंने एक बात पर गौर ही नहीं किया कि कल्याणी मौसी आजकल बहुत शांत रहने लगी थीं। उनके हाथों में मेहंदी रची थी, उन्हें पीले उबटन से सजाया जा रहा था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी। शायद वो मुझे अपने पास बुलाना चाहती थीं, मेरे साथ पहले की तरह खेलना चाहती थीं, लेकिन मैं तो अपने नए दोस्तों और घर की रौनक में इतना खो गया था कि मैंने उनके पास जाने की फुर्सत ही नहीं निकाली। मैं बस दूर से उन्हें देखता और फिर से अपने खेल में मस्त हो जाता। बड़ों की अपनी अलग दुनिया थी, जहाँ शादी की तैयारियों को लेकर रोज़ नई चर्चाएँ होती थीं, और मेरी अपनी एक अलग दुनिया बन गई थी।
असली हकीकत से मेरा सामना तब हुआ जब शादी की मुख्य रात बीत गई और अगले दिन विदाई की सुबह आई। घर के बाहर फूलों से सजी एक बड़ी सी कार खड़ी थी। मेहमानों की भीड़ धीरे-धीरे छंट रही थी और घर का माहौल एकदम से भारी हो गया था। मैंने देखा कि कल्याणी मौसी लाल जोड़े में सजी, सिर पर घूंघट काढ़े सुबक रही हैं। माँ, पिताजी और मामा-मामी सब रो रहे थे। मुझे अचानक से एक गहरा धक्का लगा। यह क्या हो रहा था? मौसी जा कहाँ रही हैं? मैंने घबराकर माँ का पल्लू पकड़ लिया। माँ ने रुंधे हुए गले से मुझे बताया कि कल्याणी मौसी की शादी हो गई है और अब वो अपने नए घर जा रही हैं।
यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा बाल-मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मौसी मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और रहने जा रही हैं। अगर शादी का मतलब बिछड़ना होता है, तो फिर शादी करनी ही क्यों? मैं दौड़कर मौसी के पास जाना चाहता था, उन्हें रोकना चाहता था, लेकिन मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। मेरी आँखों से बस लगातार आँसू बहे जा रहे थे। मैं डर गया था कि अब मेरा क्या होगा। मौसी ने जब मुझे दूर खड़े रोते हुए देखा, तो वो खुद को रोक नहीं पाईं। वो घूंघट में ही दौड़कर मेरे पास आईं और मुझे कसकर अपने सीने से लगा लिया।
मौसी बहुत देर तक मुझे चूमती रहीं, उनके गर्म आँसू मेरे गालों पर गिर रहे थे। फिर उन्होंने अपने लाल रंग के छोटे से बटुए को खोला और उसमें से चांदी का एक छोटा सा सिक्का निकाला, जिस पर सरस्वती जी की तस्वीर बनी थी। उन्होंने मेरे आँसू पोंछते हुए वह सिक्का मेरी मुट्ठी में दबा दिया और कांपती हुई आवाज़ में कहा, “मेरा कान्हा तो बहुत बहादुर है ना? ऐसे रोते नहीं हैं। मैं तो बस पास वाले शहर जा रही हूँ, रोज़ तुमसे मिलने आऊंगी। तुम माँ को तंग मत करना और मन लगाकर पढ़ाई करना।” मैंने मुट्ठी कसकर भींच ली, जैसे उस सिक्के में ही मेरी मौसी की जान बसी हो। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, मामा ने उन्हें सहारा देकर कार की तरफ बढ़ा दिया। कार का दरवाज़ा बंद हुआ और वो गाड़ी धूल उड़ाती हुई हमारी आँखों से ओझल हो गई। उस दिन के बाद से हमारा घर मुझे एक खाली खंडहर जैसा लगने लगा।
दिन, हफ्ते और महीने बीतते गए। शुरुआत में मौसी के कुछ खत आए, जिनमें वो हमेशा मेरे बारे में पूछती थीं। लेकिन धीरे-धीरे खतों का आना भी कम हो गया। माँ अक्सर उदास रहती थीं, और जब भी मैं मौसी के बारे में पूछता, वो बात टाल जाती थीं। मुझे लगता था कि मौसी अपने नए घर में बहुत खुश होंगी और शायद मुझे भूल गई हैं। मैं रोज़ उस चांदी के सिक्के को देखता और मौसी के आने का इंतज़ार करता रहता।
फिर एक रात, जो मेरी ज़िंदगी की सबसे मनहूस रात थी, सब कुछ बदल गया। शादी को करीब आठ महीने ही बीते होंगे। रात के लगभग तीन बज रहे थे, जब हमारे घर के लैंडलाइन फोन की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी। इतनी रात गए फोन की आवाज़ सुनकर पूरे घर में दहशत फैल गई। पिताजी ने हड़बड़ा कर फोन उठाया। मैं भी जाग गया था और बिस्तर में लेटा हुआ बाहर की आवाज़ें सुनने की कोशिश कर रहा था। अचानक मैंने पिताजी को ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए सुना। उनकी आवाज़ में गुस्सा भी था और एक खौफनाक दर्द भी।
“क्या बकवास कर रहे हो तुम लोग?… रात के दो बजे गैस सिलेंडर कैसे फट सकता है?… नहीं… मेरी बच्ची… तुम सब झूठ बोल रहे हो… तुम कातिल हो… दरिंदे हो तुम लोग… मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा!”
पिताजी की आवाज़ सुनकर माँ दौड़ती हुई बाहर आईं। फोन रिसीवर पिताजी के हाथ से छूटकर नीचे गिर गया था और वो ज़मीन पर धम्म से बैठ गए थे। माँ ने घबराकर पूछा तो पिताजी सिर्फ इतना कह पाए, “हमारी कल्याणी… जल गई…” इतना सुनते ही माँ ने एक दिल दहला देने वाली चीख मारी और वहीं ज़मीन पर बेहोश होकर गिर पड़ीं। पूरे घर में कोहराम मच गया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है, लेकिन घर की दीवारों से टकराकर लौटती माँ की चीख और पिताजी का वह रुदन मेरे रूह तक में उतर गया था।
मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया। पड़ोस की एक ताई मुझे अपने घर ले गईं। मैं बस एक कोने में सहमा हुआ बैठा रहा। मुझे सिर्फ इतना समझ में आया था कि मेरी कल्याणी मौसी अब कभी लौटकर नहीं आएंगी। उन लालची भेड़ियों ने दहेज की अपनी आग में मेरी मौसी की ज़िंदगी को राख कर दिया था। वो गैस सिलेंडर का फटना कोई हादसा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी हत्या थी।
आज जब मैं बड़ा हो गया हूँ, तो उस रात की सच्चाई और भी गहराई से समझ में आती है। वो चांदी का सिक्का आज भी मेरे पास सुरक्षित है। जब भी मैं उसे देखता हूँ, मुझे मौसी की वो उदास आँखें और उनका आखिरी वाक्य याद आ जाता है। वो मुझसे झूठ बोलकर गई थीं। वो कभी वापस नहीं आईं। लेकिन उनकी यादों की छुअन आज भी मेरे दिल के किसी कोने में एक कसक बनकर ज़िंदा है।
दोस्तों, क्या कल्याणी के साथ जो हुआ वह इस समाज का एक ऐसा कड़वा सच नहीं है जिसे हम आज भी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाए हैं? आपका इस बारे में क्या सोचना है? अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
लेखिका : सविता गर्ग