धूल भरी पगडंडी से होते हुए जब विकास की गाड़ी पुश्तैनी हवेली के लोहे वाले बड़े दरवाजे के सामने रुकी, तो वहां पहले से ही गांव वालों की भारी भीड़ जमा थी।
शालिनी ने गाड़ी का शीशा नीचे किया तो बाहर से आती अगरबत्ती, लोबान और रोने-पीटने की मिली-जुली आवाजें उसके कानों से टकराईं। आज पूरे पांच साल बाद वे इस चौखट पर वापस लौटे थे, लेकिन किसी त्योहार या खुशी के मौके पर नहीं, बल्कि विकास के पिता, रघुनाथ जी के निधन की खबर सुनकर।
गाड़ी से उतरते ही शालिनी की नजर उस चौड़े और पुराने आंगन पर पड़ी, जहां नीम के पेड़ के नीचे रघुनाथ जी का पार्थिव शरीर सफेद चादर से ढका हुआ रखा था। आस-पास गांव के बुजुर्ग और रिश्तेदार गमगीन चेहरों के साथ बैठे थे। विकास अभी भारी कदमों से आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक उसका छोटा भाई, सुमित भीड़ को चीरता हुआ बाहर आया। पिछले पांच सालों में दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी थी।
जायदाद और व्यापार के बंटवारे को लेकर जो भयंकर कड़वाहट पैदा हुई थी, उसने खून के इस रिश्ते में एक गहरी खाई खोद दी थी। लेकिन आज, पिता के उस बेजान शरीर को देखकर वो सारी कड़वाहट आंसुओं में बह गई। सुमित दौड़कर विकास के गले लग गया और दोनों भाई ऐसे फूट-फूट कर रोने लगे, जैसे उनके बीच कभी कोई दीवार रही ही न हो। मौत ने पल भर में सारे गिले-शिकवे मिटा दिए थे।
शालिनी वहीं खड़ी ये सब देख रही थी। उसे भी अंदर जाना था, जहां औरतें विलाप कर रही थीं। उसने अपने कदमों को आगे बढ़ाया। जैसे-जैसे वह दालान पार कर रही थी, उसकी नजरें अनजाने में ही घर के उन बदलावों को दर्ज कर रही थीं जो इन पांच सालों में हुए थे।
जिस कच्चे आंगन में कभी बारिश का पानी भर जाया करता था, जहां शालिनी ने कीचड़ में फिसलते हुए भी काम किया था, वहां अब चमकदार लाल रंग की पक्की टाइल्स लग चुकी थीं। दाईं तरफ वाला वो पुराना टिन शेड का कमरा अब एक शानदार पक्के बैठकखाने में बदल गया था, जिसमें शीशे की बड़ी-बड़ी खिड़कियां लगी थीं।
घर के पिछले हिस्से में एक आधुनिक वाशरूम भी बन गया था, जबकि शालिनी के समय में उसे नहाने के लिए आंगन के कोने में बने कच्चे गुसलखाने का सहारा लेना पड़ता था। शालिनी के मन में एक अजीब सी टीस उठी। जब वे यहां रहते थे, तब हर छोटी चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता था,
और उनके जाने के बाद यह घर कितना बदल गया था। लेकिन, वह जानती थी कि यह समय घर की दीवारों को निहारने या पुरानी बातों को कुरेदने का नहीं था। उसने अपनी इन सभी भावनाओं को मन के किसी गहरे कोने में धकेला और अंदर महिलाओं वाले कमरे की तरफ बढ़ गई।
कमरे में कदम रखते ही रुदाली का सा माहौल था। सफेद और हल्के रंग की साड़ियों और घूंघट में लिपटी औरतें फर्श पर बैठी थीं। कमरे में घुटन और पसीने की गंध थी। जैसे ही शालिनी अंदर दाखिल हुई, उसकी ताई सास, विमला देवी, अपनी जगह से उठीं और शालिनी के गले लगकर ऐसे दहाड़ें मार-मार कर रोने लगीं, जैसे रघुनाथ जी के जाने से उनका पूरा संसार ही लुट गया हो। “अरे मेरी बच्ची, ये क्या अनर्थ हो गया! हमारे तो सिर का साया ही उठ गया, अब हमारा क्या होगा,” विमला ताई जोर-जोर से छाती पीटते हुए विलाप कर रही थीं।
शालिनी ताई जी के गले तो लगी थी, लेकिन उसका शरीर एकदम सुन्न था। उसे बहुत अच्छे से याद था कि ये वही विमला ताई थीं जिन्होंने शालिनी और रघुनाथ जी के बीच गलतफहमियों की आग लगाई थी। ये वही थीं जो ताने मार-मार कर शालिनी को शहर की ‘तेज-तर्रार’ लड़की कहती थीं, जिसने उनके बेटे को उनसे छीन लिया। इन्हीं ताई की चुगलियों के कारण मजबूर होकर विकास और शालिनी को अपमानित होकर यह घर छोड़ना पड़ा था। आज उनका यह रुदन और शालिनी के प्रति यह बनावटी प्रेम शालिनी को सरासर एक नाटक लग रहा था।
शालिनी ने खुद को उनके आलिंगन से अलग किया और एक कोने में जाकर बैठ गई। वह अपने ससुर के निधन से दुखी तो थी, आखिर वो एक इंसान थे और उसके पति के पिता थे। लेकिन सच तो यह था कि उसके मन में उनके लिए कोई ऐसा गहरा प्रेम या सम्मान नहीं बचा था जो आंसुओं के रूप में बाहर छलक सके। रघुनाथ जी ने हमेशा शालिनी को एक बाहरी इंसान समझा था। उनके दिए हुए कड़वे ताने और अपमान के जख्म अभी भी शालिनी की रूह पर हरे थे। उसका दिल रोने के लिए गवाही नहीं दे रहा था। वह चुपचाप सिर झुकाए बैठी रही।
लेकिन समाज और लोक-लाज की अपनी अलग ही अदालत होती है। शालिनी की इस खामोशी पर वहां बैठी अन्य महिलाओं की नजरें टिकने लगी थीं। फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया।
“देखो, ससुर मर गया है और बहू की आंखों में एक बूंद आंसू नहीं है।”
“शहर में जाकर पत्थर दिल हो गई है, इसे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। कम से कम दिखावे के लिए ही रो लेती।”
ये चुभती हुई आवाजें शालिनी के कानों तक पहुंच रही थीं। शालिनी समझ गई कि इस समाज में दुख को महसूस करने से ज्यादा उसका प्रदर्शन करना जरूरी है। अगर वह नहीं रोई, तो यह दुनिया उसे जीवन भर एक क्रूर और संवेदनहीन बहू का तमगा दे देगी, और सारी गलती उसी की मान ली जाएगी। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी सूती साड़ी के पल्लू को खींचकर अपने चेहरे तक लाई और अपना सिर घुटनों में छिपा लिया। उसने धीरे-धीरे अपने कंधों को हिलाना शुरू किया और मुंह से सिसकियों की आवाज निकालने लगी। पल्लू के अंधेरे में उसकी आंखें एकदम सूखी थीं, लेकिन बाहर की दुनिया के लिए वह एक आदर्श, शोकाकुल बहू बन चुकी थी जो अपने ससुर के जाने के गम में टूट गई थी।
घूंघट के उस अंधेरे में शालिनी सोच रही थी कि कैसे हम सब इस समाज रूपी रंगमंच की कठपुतलियां हैं। बाहर आंगन में विकास और सुमित के आंसू शायद सच्चे थे, क्योंकि वे खून के रिश्ते थे। लेकिन अंदर इस कमरे में, विमला ताई के मगरमच्छी आंसू और शालिनी का यह झूठा रोना, दोनों ही इस समाज की उस खोखली परंपरा का हिस्सा थे, जहां इंसान को अपने सच्चे जज्बातों को मारकर वो करना पड़ता है जो ‘लोग’ देखना चाहते हैं। पुश्तैनी हवेली की दीवारें भले ही पक्की हो गई थीं, लेकिन रिश्तों की बुनियाद आज भी दिखावे और लोक-लाज की कच्ची मिट्टी पर ही टिकी हुई थी।
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लेखिका : वर्षा मंडल