आँगन का गुलमोहर

मुम्बई की एक गगनचुंबी इमारत की पच्चीसवीं मंजिल पर स्थित कॉन्फ्रेंस रूम में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी। बाहर सावन की झमाझम बारिश हो रही थी और अंदर सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल प्रोजेक्टर की हल्की भिनभिनाहट तोड़ रही थी। शहर की जानी-मानी अर्बन प्लानर और आर्किटेक्ट, राधिका अपने नए प्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन दे रही थी। तभी मेज पर रखे उसके मोबाइल की स्क्रीन अचानक रोशन हुई।

स्क्रीन पर ‘बाबा कॉलिंग’ फ्लैश हो रहा था। राधिका ने एक नज़र फोन पर डाली और उसे अनदेखा कर दिया, क्योंकि उसके पिता, माधव राव, कभी भी दफ्तर के समय उसे फोन नहीं करते थे। वे बहुत ही अनुशासित व्यक्ति थे। लेकिन जब लगातार तीसरी बार फोन बजा, तो राधिका के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। उसने अपने बॉस से माफ़ी माँगी और मीटिंग रूम से बाहर निकलकर फोन उठाया।

“हैलो बाबा, सब ठीक तो है? आप इस वक्त फोन…” राधिका का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि उधर से माधव राव की काँपती और रुंधे हुए गले की आवाज़ आई।

“राधा… बेटा… वो लोग उसे मार डालेंगे। हमारा घर तो बच गया है, लेकिन वो लोग उसे नहीं छोड़ेंगे…” बाबा फूट-फूट कर रो रहे थे।

राधिका का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सातारा के उस छोटे से शांत गाँव में आखिर किसे मारने की बात हो रही है। उसने घबराते हुए पूछा, “बाबा, शांत हो जाइए। किसे मार डालेंगे? आप पहेलियाँ मत बुझाइए, मुझे बहुत डर लग रहा है। क्या हुआ है वहाँ?”

माधव राव ने किसी तरह खुद को सँभाला और भारी आवाज़ में बोले, “बेटा, सरकार हमारे गाँव के बाहर से एक नया एक्सप्रेसवे निकाल रही है। आज सुबह सर्वे वाले अधिकारी आए थे। उन्होंने बताया कि हमारे पुश्तैनी घर का अहाता तो सुरक्षित है, लेकिन… लेकिन हमारे आँगन का वह गुलमोहर का पेड़, तुम्हारी ‘नंदिनी’, उस सड़क के नक्शे के बीचों-बीच आ रही है। वे परसों उसे जड़ से काट देंगे।” यह कहते-कहते माधव राव की आवाज़ फिर से फफकन में बदल गई।

राधिका वहीं दीवार के सहारे खिसक कर ज़मीन पर बैठ गई। उसका दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया। नंदिनी… कोई आम पेड़ नहीं था। वह राधिका के लिए उसकी माँ की आखिरी निशानी और एक तरह से उसकी सगी बहन थी। बात सत्ताईस साल पुरानी है। जब राधिका का जन्म हुआ था, तो उसकी माँ, सुमित्रा, बहुत बीमार पड़ गई थीं। सुमित्रा को प्रकृति से अगाध प्रेम था। राधिका के जन्म के ठीक ग्यारहवें दिन, सुमित्रा ने अपने काँपते हाथों से आँगन में गुलमोहर का एक छोटा सा पौधा रोपा था और माधव से कहा था, “ये मेरी राधा की जुड़वा बहन है। इसका नाम ‘नंदिनी’ रखेंगे। जैसे-जैसे राधा बड़ी होगी, वैसे-वैसे नंदिनी भी बड़ी होगी। जब मैं नहीं रहूँगी, तो मेरी राधा को इसकी छाँव में मेरा ही अक्स मिलेगा।” और सचमुच, राधिका के पहले जन्मदिन से कुछ दिन पहले ही सुमित्रा इस दुनिया को छोड़कर चली गईं।

माधव राव ने कभी दूसरी शादी नहीं की। उन्होंने अपनी बेटी राधा और उस गुलमोहर के पेड़ ‘नंदिनी’ को एक समान प्यार से पाला। जब राधिका रोती, तो बाबा उसे गुलमोहर की छाँव में लिटा देते और पत्तियों की सरसराहट से राधिका चुप हो जाती। जैसे-जैसे राधिका ने चलना सीखा, वैसे-वैसे नंदिनी की जड़ें ज़मीन में गहरी होती गईं। गर्मियों में जब वह पेड़ लाल सुर्ख फूलों से लद जाता, तो पूरा आँगन जैसे सुमित्रा के प्यार से महक उठता। राधिका बचपन में अपने सारे राज़ उस पेड़ से साझा करती, उसकी डालियों से झूलती और उसकी गिरी हुई लाल पंखुड़ियों से अपने लिए गहने बनाती। बाबा तो हर दीवाली पर घर के साथ-साथ उस पेड़ को भी दीयों से सजाते थे। वह सिर्फ लकड़ी और पत्तों का ढाँचा नहीं था, वह उस परिवार का तीसरा सदस्य था, जिसमें एक माँ की आत्मा बसती थी। और आज, उसी नंदिनी की बलि चढ़ने वाली थी।

“बाबा, आप बिल्कुल मत घबराइए। मैं अभी के अभी वहाँ के लिए निकल रही हूँ। किसी की हिम्मत नहीं है जो हमारी नंदिनी को हाथ भी लगा सके। आप बस हौसला रखिए,” राधिका ने दृढ़ स्वर में कहा।

उसने तुरंत ऑफिस से छुट्टी ली, अपनी कार निकाली और मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे होते हुए सातारा की ओर निकल पड़ी। रास्ते भर उस पर पुरानी यादों का सैलाब हावी रहा। उसे याद आ रहा था कि कैसे कॉलेज जाने के लिए जब वह पहली बार घर से विदा हो रही थी, तो उसने नंदिनी के तने से लिपटकर खूब आँसू बहाए थे। आज वही नंदिनी मौत के साये में खड़ी थी। बारिश तेज़ हो रही थी, जैसे आसमान भी राधिका के दर्द में शरीक हो रहा हो।

लगभग पाँच घंटे की लगातार ड्राइविंग के बाद जब राधिका अपने पुश्तैनी घर पहुँची, तो शाम घिर आई थी। घर का दरवाज़ा खुला था। उसने देखा कि आँगन में बाबा एक पुरानी कुर्सी पर सिर झुकाए बैठे हैं। उनके चारों ओर गाँव के कुछ पुराने पड़ोसी और रिश्तेदार जमा थे। सब आपस में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे, जैसे घर में कोई शोक सभा चल रही हो। राधिका की नज़र सीधा आँगन के बीचों-बीच खड़े उस विशाल और राजसी गुलमोहर पर गई। बारिश की बूंदों से धुले उसके लाल फूल अभी भी ज़मीन पर बिखरे थे, लेकिन उसके चौड़े तने पर सफेद और लाल रंग से एक बड़ा सा क्रॉस (X) बना दिया गया था। वह क्रॉस राधिका को किसी खंजर की तरह चुभा।

वह दौड़कर बाबा के पास गई और उनके गले लग गई। बेटी को देखते ही माधव राव का बाँध टूट गया। “राधा, मैं तुम्हारी माँ की आखिरी अमानत नहीं बचा पाया। उन्होंने कहा है कि नक्शा पास हो चुका है, अब कुछ नहीं हो सकता।”

राधिका ने अपने पिता के आँसू पोंछे और उनका माथा चूमते हुए कहा, “बाबा, मैंने आपसे कहा था ना कि जब तक आपकी ये राधा ज़िंदा है, नंदिनी को कोई खरोंच नहीं आएगी। आप भूल गए कि आपकी बेटी शहरों के नक्शे बनाती है? मैं कुछ ना कुछ ज़रूर करूँगी। बस आप ये रोना बंद कीजिए, मुझे भूख लगी है, माँ के हाथ के स्वाद वाली वो पूरन पोली बनाइए ना।” राधिका ने माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की, हालाँकि अंदर से वह खुद बहुत डरी हुई थी।

अगली सुबह, सूरज निकलते ही राधिका अपने लैपटॉप और कुछ ज़रूरी कागज़ात के साथ हाईवे अथॉरिटी के स्थानीय प्रोजेक्ट कार्यालय पहुँच गई। वहाँ का माहौल काफी व्यस्त था। काफी जद्दोजहद के बाद उसे प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर, श्रीकांत देसाई से मिलने का वक्त मिला। श्रीकांत एक सख्त मिज़ाज के व्यक्ति लग रहे थे।

“देखिए मिस राधिका, मैं आपकी भावनाएँ समझता हूँ। गाँव वालों का किसी न किसी पेड़, कुएँ या मंदिर से लगाव होता ही है। लेकिन हम हर भावना के लिए राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स नहीं रोक सकते। हाईवे का अलाइनमेंट तय हो चुका है और वह सीधा उसी अहाते से होकर गुज़रेगा,” श्रीकांत ने बिना राधिका की बात पूरी सुने ही अपना फैसला सुना दिया।

राधिका, जो खुद एक अनुभवी अर्बन प्लानर थी, उसने हार नहीं मानी। उसने बहुत ही पेशेवर अंदाज़ में अपना लैपटॉप खोला और उसमें एक 3D टोपोग्राफी मैप (भौगोलिक नक्शा) स्क्रीन पर डिस्प्ले किया।

“सर, मैं यहाँ आपसे एक बेटी के रूप में नहीं, बल्कि एक सीनियर आर्किटेक्ट और अर्बन प्लानर के रूप में बात करने आई हूँ,” राधिका की आवाज़ में अब भावना की जगह आत्मविश्वास ने ले ली थी। “मैंने रात भर आपके प्रोजेक्ट के सार्वजनिक नक्शे और इस इलाके की मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट (Soil Testing Report) का अध्ययन किया है।”

श्रीकांत थोड़ा हैरान हुए और लैपटॉप की स्क्रीन की तरफ देखने लगे।

राधिका ने नक्शे के एक हिस्से को ज़ूम करते हुए कहा, “सर, जिस अलाइनमेंट पर आप हाईवे बना रहे हैं, यानी मेरे आँगन की तरफ का हिस्सा, वहाँ की ज़मीन नीचे से काफी भुरभुरी और जलभराव वाली है। अगर आप वहाँ से सड़क निकालते हैं, तो आपको भविष्य में धँसाव रोकने के लिए बहुत भारी और महंगी रिटेनिंग वॉल (सुरक्षा दीवार) बनानी पड़ेगी। इससे आपके प्रोजेक्ट का बजट कम से कम पंद्रह प्रतिशत बढ़ जाएगा।”

श्रीकांत ने चश्मा ठीक करते हुए स्क्रीन को और गौर से देखा। राधिका ने आगे कहा, “अब अगर आप इस अलाइनमेंट को सिर्फ पच्चीस मीटर बायीं ओर शिफ्ट कर दें, जहाँ अभी बंजर और पथरीली सरकारी ज़मीन पड़ी है, तो सड़क सीधे एक ठोस बेसाल्ट रॉक (कठोर चट्टान) के बेस पर बनेगी। इससे न केवल सड़क की उम्र दोगुनी हो जाएगी, बल्कि आपका कंस्ट्रक्शन कॉस्ट भी बहुत कम हो जाएगा। और सबसे बड़ी बात… उस पच्चीस मीटर के बदलाव से मेरे गुलमोहर सहित गाँव के किनारे लगे ग्यारह और पुराने पेड़ कटने से बच जाएँगे। विकास ज़रूरी है सर, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं, खासकर तब जब हमारे पास एक बेहतर और तकनीकी रूप से ज़्यादा सुरक्षित विकल्प मौजूद हो।”

कमरे में कुछ देर के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। श्रीकांत देसाई अपनी कुर्सी से उठे, उन्होंने नक्शे को अलग-अलग एंगल से देखा और फिर अपनी टीम के सर्वेयर को अंदर बुलाया। उन्होंने राधिका के डेटा को अपने ओरिजिनल डेटा से क्रॉस-चेक करने को कहा। पंद्रह मिनट की गहन चर्चा और कैलकुलेशन के बाद, सर्वेयर ने हामी भर दी कि राधिका की बात तकनीकी रूप से शत-प्रतिशत सही थी। बायीं ओर से रास्ता निकालना न सिर्फ सस्ता था, बल्कि इंजीनियरिंग के लिहाज़ से भी ज़्यादा सुरक्षित था।

श्रीकांत देसाई के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने राधिका की तरफ देखते हुए कहा, “मैडम, मुझे यह स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं है कि हमारे सर्वे में एक बड़ी चूक हुई थी। आपने न केवल एक बेटी का फर्ज़ निभाया है, बल्कि एक बेहतरीन इंजीनियर होने का भी प्रमाण दिया है। आपके द्वारा सुझाए गए बदलाव को मैं आज ही मंजूरी के लिए भेज रहा हूँ। आपका वह पेड़… या यूँ कहूँ कि आपकी बहन, अब बिल्कुल सुरक्षित है।”

राधिका की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने चीफ इंजीनियर को बार-बार धन्यवाद दिया और लगभग दौड़ती हुई अपनी कार की तरफ भागी। उसे बाबा को यह खुशखबरी देने की जल्दी थी।

जब राधिका घर पहुँची, तो माधव राव उसी कुर्सी पर बैठे थे, उनकी नज़रें ज़मीन पर टिकी थीं। राधिका ने पीछे से जाकर उनकी आँखों पर हाथ रख दिया। माधव राव ने चौंकाते हुए पीछे देखा। राधिका ने उनके पैरों में बैठकर उनके दोनों हाथ अपने गालों से लगा लिए और रुंधे हुए, लेकिन खुशी से भरे गले से बोली, “बाबा… हमारी नंदिनी कहीं नहीं जा रही है। वो यहीं रहेगी, हमारे साथ, हमेशा के लिए। नक्शा बदल गया है बाबा!”

यह सुनते ही माधव राव फूट-फूट कर रोने लगे, लेकिन इस बार ये खुशी के आँसू थे। वे तुरंत उठे और लड़खड़ाते कदमों से आँगन के बीचों-बीच खड़े उस गुलमोहर के पेड़ के पास गए। उन्होंने अपने दोनों हाथों से उस विशाल तने को ऐसे गले लगा लिया जैसे कोई पिता अपनी खोई हुई बच्ची के मिलने पर उसे चूमता है। राधिका भी उनके पास गई और उस तने से लिपट गई। हवा का एक तेज़ झोंका आया और गुलमोहर की डालियों से ढेर सारे लाल फूल राधिका और उसके बाबा के ऊपर बरसने लगे। ऐसा लग रहा था मानो स्वर्ग से सुमित्रा उन दोनों को और अपनी ‘नंदिनी’ को आशीर्वाद दे रही हों। आधुनिकता और विकास की जीत तो हुई थी, लेकिन इस बार भावनाओं और प्रकृति को कुचलकर नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर।

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