सुधा की उम्र यही कोई पैंतालीस के आस-पास रही होगी। वह उन आम भारतीय महिलाओं में से एक थी, जिनके दिन की शुरुआत घर के सबसे छोटे सदस्य के जागने से पहले होती थी और रात तब होती थी जब घर का आखिरी बल्ब बुझ जाता था। सुधा का परिवार एक टिपिकल मध्यमवर्गीय परिवार था।
पति राजेश एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे, बड़ा बेटा सुमित कॉलेज में था और छोटी बेटी राधिका अभी दसवीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। सुधा की ज़िंदगी इन्हीं तीन धुरियों के इर्द-गिर्द घूमती थी। उसकी अपनी कोई दुनिया नहीं थी, या यूँ कहें कि उसने अपनी दुनिया इन्हीं में समेट ली थी।
सर्दियों के दिन थे। दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में भी सुधा सुबह पाँच बजे उठकर ठंडे पानी से काम करने की आदी थी। उस दिन मंगलवार था। शाम से ही सुधा को अपने सीने के बीचों-बीच और पेट के ऊपरी हिस्से में एक अजीब सी ऐंठन महसूस हो रही थी। शुरुआत में तो यह दर्द बहुत हल्का था,
जैसे किसी ने अंदर से कोई नस खींच ली हो। लेकिन एक गृहिणी के लिए ऐसे छोटे-मोटे दर्द तो रोज़मर्रा के गहनों की तरह होते हैं, जिन्हें पहनकर वह सारा दिन मुस्कुराती रहती है। सुधा ने भी इसे गैस या दिन भर की थकान का नतीजा माना और अजवाइन फाँक कर एक गिलास गर्म पानी पी लिया।
रात के आठ बज चुके थे। राजेश दफ्तर से आ चुके थे और टीवी पर समाचार देख रहे थे। सुमित अपने कमरे में ईयरफोन लगाए लैपटॉप पर कुछ कर रहा था और राधिका अपनी किताबों में उलझी थी। सुधा रसोई में थी। सीने का वह हल्का दर्द अब धीरे-धीरे भारीपन में बदल रहा था। रोटी बेलते हुए उसके हाथ काँप रहे थे
और माथे पर सर्दियों में भी पसीने की बारीक बूँदें उभर आई थीं। उसने एक पल के लिए स्लैब का सहारा लिया। साँस लेने में भी हल्की सी चुभन हो रही थी। लेकिन तभी बाहर से राजेश की आवाज़ आई, “सुधा, खाना बन गया क्या? भूख लग रही है।”
“बस दो मिनट, रोटियाँ सिक रही हैं!” सुधा ने अपनी तकलीफ़ को गले के नीचे उतारते हुए कहा। उसने किसी तरह हिम्मत करके परिवार को खाना परोसा। सबने शांति से खाना खाया। किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि सुधा का चेहरा पीला पड़ रहा है या वह आज खाने की मेज़ पर उनके साथ नहीं बैठी। खाना खत्म होने के बाद जब सुधा बर्तन समेट कर रसोई साफ करने गई, तो दर्द अचानक से तेज़ हो गया। ऐसा लगा जैसे कोई उसके सीने को दोनों हाथों से जकड़ कर निचोड़ रहा हो।
वह लड़खड़ाती हुई बेडरूम में आई। राजेश कंबल ओढ़े फोन पर किसी से बात कर रहे थे। सुधा ने बिस्तर के किनारे बैठते हुए अपना सीना दबाया और कराहते हुए कहा, “सुनिए, मेरे सीने में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है। घबराहट भी हो रही है।”
राजेश ने फोन कान से हटाया और उसकी तरफ एक सरसरी निगाह डालकर बोले, “अरे, वो दोपहर में तुमने जो मसालेदार कचौड़ियाँ खाई थीं ना, उसी से गैस बन गई होगी। जाकर ईनो पी लो और लेट जाओ। तुम औरतें भी ना, थोड़ा सा कुछ होता है और घबरा जाती हो। कुछ नहीं है, सो जाओ आराम से।” राजेश ने फिर से फोन कान पर लगा लिया।
सुधा ने ईनो पिया और बिस्तर पर लेट गई। लेकिन दर्द था कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। रात के करीब दो बज चुके थे। घर में सन्नाटा था, सिर्फ राजेश के खर्राटों और दीवार घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ आ रही थी। सुधा की आँखें खुली थीं। दर्द अब उसके बाएँ कंधे से होता हुआ हाथ तक फैलने लगा था। उसकी साँसें उखड़ने लगी थीं।
अचानक उसके दिमाग में एक खौफनाक विचार कौंधा— “कहीं ये हार्ट अटैक तो नहीं?”
इस एक विचार ने सुधा के शरीर में सिहरन पैदा कर दी। मौत का डर कैसा होता है, यह उसने आज पहली बार इतनी करीब से महसूस किया था। उसे लगने लगा कि शायद आज उसकी आखिरी रात है। वह तड़प रही थी, लेकिन उसने राजेश को जगाने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि उसे लगा कि शायद अब बहुत देर हो चुकी है।
लेकिन तभी, मौत के इस खौफनाक मंज़र के बीच, सुधा के दिमाग में जो अगले विचार आए, वे किसी भी इंसान को हैरान कर सकते थे। एक आम इंसान मौत के वक्त शायद भगवान को याद करता है, अपने बच्चों के भविष्य को लेकर रोता है या अपने जीवन के अधूरे सपनों का अफसोस करता है। लेकिन सुधा, जो एक शुद्ध भारतीय गृहिणी थी, उसके दिमाग का गियर एकदम अलग दिशा में घूम गया।
“हे भगवान! कल सुबह अगर मैं मर गई, तो घर में कितने सारे लोग आएँगे। मोहल्ले की औरतें, रिश्तेदार, राजेश के ऑफिस वाले… सब के सब इसी ड्राइंग रूम में बैठेंगे। लेकिन… लेकिन ड्राइंग रूम के सोफे के कवर तो पिछले एक महीने से धुले ही नहीं हैं! उन पर सुमित ने चाय भी गिराई थी। वो शर्मा जी की पत्नी और मेरी जेठानी जब आएँगी, तो सबसे पहले उन्हीं दागों को देखेंगी। कहेंगी, ‘बेचारी मर गई, लेकिन फूहड़ बहुत थी, घर का क्या हाल बना रखा था।'” सुधा का दर्द अब शर्मिंदगी में बदलने लगा था।
उसकी कल्पनाएँ यहीं नहीं रुकीं। “अरे बाप रे! मैंने तो कल सुबह के लिए राजमा भी नहीं भिगोए। अगर मैं रात में ही निकल ली, तो सुबह जब रिश्तेदार आएँगे तो राजेश उन्हें नाश्ते में क्या खिलाएँगे? बाहर से समोसे मँगवाने पड़ेंगे, और मेरी सास की बहन (बुआ जी) तो पूरे खानदान में ढिंढोरा पीट देंगी कि घर में मुट्ठी भर अनाज भी भिगो कर नहीं गई, कैसा इंतज़ाम था इसका। और मेरी अलमारी! हे राम! मेरी अलमारी का तो बुरा हाल है। साड़ियाँ बिना प्रेस किए ठुंसी पड़ी हैं। मरने के बाद जब वो मेरी साड़ियाँ किसी को दान देने के लिए निकालेंगे, तो मेरी कितनी बेइज़्ज़ती होगी। लोग कहेंगे कि इसे तो कपड़े तह करने का सलीका भी नहीं था।”
सुधा को अब अपना सीने का दर्द कम और अपनी काल्पनिक सामाजिक बेइज़्ज़ती का दर्द ज़्यादा महसूस हो रहा था। उसे राधिका की याद आई। “राधिका की स्कूल यूनिफॉर्म तो मैंने वाशिंग मशीन में ही छोड़ दी थी, उसे सुखाया ही नहीं। कल बच्ची स्कूल कैसे जाएगी? और वो दूध वाले का हिसाब! पिछले महीने का आधा पैसा देना बाकी था, मैंने डायरी में लिखा ही नहीं। मेरे मरने के बाद वो राजेश से पक्का पाँच सौ रुपये ज़्यादा ऐंठ लेगा। नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता!”
सुधा ने अपने काँपते हुए हाथों को जोड़ा और बंद आँखों से छत की तरफ देखते हुए भगवान से एक अनोखी और मार्मिक सौदेबाज़ी शुरू कर दी।
“हे कृष्ण जी, हे भगवान! मैं जानती हूँ कि मेरा बुलावा आ गया है। लेकिन प्लीज़, आज की रात मुझे मत उठाओ। मुझे सिर्फ एक दिन की मोहलत दे दो। मैं सुबह उठकर सबसे पहले सोफे के कवर धो दूँगी। पूरी अलमारी ऐसे जमा दूँगी कि जेठानी जी भी देखकर जल जाएँगी। राजमा उबाल कर रख दूँगी और दूध वाले का पूरा हिसाब डायरी में साफ-साफ लिख दूँगी। राधिका के सारे कपड़े प्रेस कर दूँगी। घर को एकदम चमका कर रख दूँगी, ताकि मेरे मरने के बाद कोई मेरे पीछे से मुझ पर उंगली ना उठा सके। बस आज मत मारना भगवान, आज ना तो मैं तैयार हूँ और ना ही मेरा ये घर। बस कल का दिन दे दो, परसों रविवार है, छुट्टी वाले दिन आराम से प्राण निकाल लेना, किसी को काम में परेशानी भी नहीं होगी।”
सुधा अपने ही ख्यालों और सामाजिक अपमान के डर से इतना रोई, इतना गिड़गिड़ाई कि उसे पता ही नहीं चला कि कब थकान और उस ईनो के असर ने (क्योंकि वह सच में सिर्फ एक बहुत भयंकर एसिडिटी का ही दर्द था) उसे नींद की आगोश में ले लिया। उसकी आँखें भारी हो गईं और वह एक गहरी नींद में डूब गई।
अगली सुबह जब सुधा की आँख खुली, तो कमरे की खिड़की से सूरज की किरणें सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। उसने गहरी साँस ली। सीने में कोई दर्द नहीं था, हाथ बिल्कुल ठीक थे। उसे एक पल के लिए यकीन ही नहीं हुआ कि वह ज़िंदा है। उसने खुद को छूकर देखा। वह पूरी तरह से ठीक थी। कल रात का वह खौफनाक दर्द और हार्ट अटैक का वहम अब छूमंतर हो चुका था।
एक पल के लिए उसने आसमान की तरफ देखा और भगवान को धन्यवाद दिया। लेकिन यह धन्यवाद जीवन दान के लिए कम, और अपनी इज़्ज़त बच जाने के लिए ज़्यादा था। वह तुरंत बिस्तर से उठी। उसने घड़ी देखी, सुबह के छह बज रहे थे।
वह सीधे वाशिंग मशीन की तरफ भागी और राधिका की यूनिफॉर्म निकालकर सूखने के लिए डाली। फिर रसोई में जाकर राजमा का डिब्बा निकाला और उन्हें पानी में भिगो दिया। चाय का पानी गैस पर चढ़ाते हुए वह मन ही मन बुदबुदाई, “आज सबसे पहले वो सोफे के कवर धोकर सुखाने हैं, और दोपहर में बैठकर पूरी अलमारी जमानी है। क्या पता भगवान कब फिर से याद कर लें, इस बार कोई रिस्क नहीं लेना।”
और इसी के साथ, सुधा एक बार फिर से अपनी उसी दुनिया में, उन्हीं ज़िम्मेदारियों के पहिए में जुत गई, जहाँ उसकी अपनी जान की कीमत सोफे के धुले हुए कवर्स और समाज के तानों से कहीं कम थी।
क्या आपने भी कभी अपने घर की महिलाओं को अपनी तबीयत से ज़्यादा घर के कामों की चिंता करते हुए देखा है? या क्या आपने खुद कभी ऐसा महसूस किया है कि बीमारी में भी आपको आराम से ज़्यादा अधूरे कामों की फिक्र सता रही हो? अपने विचार और अनुभव कमेंट करके ज़रूर बताएँ।
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#साँसों से भारी ज़िम्मेदारियाँ
लेखिका : नर्मदा श्रीवास्तव