“चुप कर पागल लड़के! कहाँ जाने की बात कर रहा है रात के इस पहर?” उन्होंने बैग को पलंग के नीचे धकेलते हुए डांटा, लेकिन इस डांट में वो पुराना वाला स्नेह था। “क्या समझता है तू अपनी माँ को? मेरी कोख से जन्मा है तू, क्या मैं तेरी तकलीफ नहीं समझूंगी? ठीक है… नहीं करनी तुझे शादी, तो मत कर। मैं नहीं कहूंगी आज के बाद तुझसे कुछ भी। भाड़ में जाए वो शर्मा जी का रिश्ता और भाड़ में जाए ये समाज। मुझे मेरा बेटा चाहिए, बस।”
भोपाल के एक पुराने लेकिन बेहद खूबसूरत मोहल्ले में स्थित ‘शांति-कुंज’ नाम के उस घर से आज फिर देसी घी में भुनते हुए गाजर के हलवे की मीठी-मीठी महक आ रही थी। साठ वर्षीय सुमित्रा जी रसोई में खड़ी थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। यह चमक किसी त्योहार की नहीं, बल्कि उनके छोटे बेटे अंशुमान के घर लौटने की खुशी की थी। अंशुमान बैंगलोर की एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट के पद पर काम कर रहा था। उसकी उम्र लगभग बत्तीस साल हो चुकी थी। पढ़ाई, फिर नौकरी और उसके बाद अपने करियर को एक मुकाम तक पहुँचाने की जद्दोजहद में अंशुमान ने अपनी जिंदगी के कई साल घर से दूर रहकर ही बिताए थे। सुमित्रा जी के पति का देहांत कुछ साल पहले ही हो चुका था और उनकी बड़ी बेटी की शादी होकर वो अपने ससुराल अमेरिका जा चुकी थी। अब सुमित्रा जी की जिंदगी का इकलौता मकसद अपने बेटे अंशुमान का घर बसाना और उसके आंगन में अपने पोते-पोतियों को खेलते हुए देखना था।
रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी। सुमित्रा जी ने लगभग दौड़ते हुए जाकर दरवाजा खोला। सामने अंशुमान अपना ट्रॉली बैग लिए खड़ा था। चेहरे पर सफर की थकान थी लेकिन माँ को देखते ही उसकी आँखों में एक सुकून भरी चमक आ गई। सुमित्रा जी ने झट से बेटे की आरती उतारी, उसके माथे को चूमा और उसे अंदर ले आईं। रात का खाना बहुत ही खुशनुमा माहौल में बीता। सुमित्रा जी ने अंशुमान की पसंद का हर वो व्यंजन बनाया था, जिसके लिए वो बैंगलोर में तरस जाता था। खाने के बाद दोनों माँ-बेटे टीवी वाले कमरे में बैठे। सुमित्रा जी ने अंशुमान के लिए केसर वाला दूध का गिलास मेज पर रखा और खुद उसके पास सोफे पर बैठ गईं। कुछ देर तो इधर-उधर की बातें होती रहीं, बैंगलोर के मौसम, ऑफिस के काम और उसकी सेहत को लेकर। लेकिन सुमित्रा जी के मन में तो कुछ और ही उथल-पुथल मची हुई थी। वो सही मौके की तलाश में थीं और जैसे ही बातचीत में थोड़ा ठहराव आया, उन्होंने अपने मन की बात जुबां पर ला ही दी।
“अंशु… बेटा, अब तू बत्तीस का हो गया है। नौकरी भी तेरी बहुत बढ़िया चल रही है। अपना खुद का फ्लैट भी तूने ले ही लिया है बैंगलोर में। अब और किस चीज का इंतजार है? मेरी उम्र का भी अब क्या भरोसा, कब साँसें साथ छोड़ दें। मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरे जीते जी तेरा घर बस जाए। कोई ऐसी हो जो तेरा ख्याल रखे, तेरे इस सूनेपन को दूर करे। तू हाँ कर दे, तो मैंने शर्मा जी की भतीजी की तस्वीर देखी है, बहुत ही सुसंस्कृत और प्यारी बच्ची है। तेरी जोड़ी उसके साथ बहुत…”
सुमित्रा जी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अंशुमान, जो अब तक बड़े चाव से दूध पी रहा था, उसने गिलास जोर से मेज पर रख दिया। उसके चेहरे के भाव अचानक से बदल गए थे। जो सुकून कुछ पल पहले वहाँ था, उसकी जगह अब एक गहरी झुंझलाहट और गुस्से ने ले ली थी। उसने हाथ में पकड़ा हुआ टीवी का रिमोट उठाया और सामने चल रहे न्यूज चैनल की आवाज बढ़ा दी।
टीवी स्क्रीन पर एक बड़ी सी ब्रेकिंग न्यूज फ्लैश हो रही थी। एक मशहूर न्यूज एंकर चीख-चीख कर बता रहा था कि कैसे दिल्ली की रहने वाली एक उच्च-शिक्षित लड़की ने शादी के महज छह महीने बाद ही अपने पति और उसके बूढ़े माँ-बाप पर दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया था, सिर्फ इसलिए क्योंकि पति ने अपनी सारी संपत्ति पत्नी के नाम करने से इनकार कर दिया था। स्क्रीन पर उस बेबस लड़के और उसके बुजुर्ग माता-पिता की थाने के बाहर रोती हुई तस्वीरें दिखाई जा रही थीं।
अंशुमान ने टीवी की तरफ इशारा करते हुए बहुत ही तल्ख आवाज में कहा, “देख रही हैं माँ आप? ये है आज की सच्चाई। ये कोई पहली खबर नहीं है। रोज अखबारों में, सोशल मीडिया पर, न्यूज चैनलों पर ऐसी पचासों खबरें आती हैं। पिछले महीने ही तो रोहतक की उस घटना के बारे में पढ़ा था न आपने, जहाँ एक पत्नी ने अपने आशिक़ के साथ मिलकर अपने ही पति को जहर देकर मार डाला और उसे हार्ट अटैक साबित करने की कोशिश की? और वो छोड़िए माँ, मेरे अपने ऑफिस का कलीग, विक्रम… याद है आपको? मैंने बताया था न उसकी शादी के बारे में। बेचारी उसकी माँ, जो बिल्कुल आपकी तरह ही पूजा-पाठ करने वाली सीधी-सादी महिला थीं। विक्रम की पत्नी ने उन पर ऐसे-ऐसे घिनौने इल्जाम लगाए कि समाज में उनका सिर उठना मुश्किल हो गया। विक्रम की नौकरी चली गई, वो डिप्रेशन में चला गया और आज भी वो कोर्ट-कचहरी के धक्के खा रहा है अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए। आप मुझे उसी दलदल में क्यों धकेलना चाहती हैं माँ?”
सुमित्रा जी ने टीवी म्यूट कर दिया। उन्होंने अंशुमान की तरफ बहुत ही प्यार और करुणा भरी नजरों से देखा। वो जानती थीं कि उनका बेटा गलत नहीं कह रहा है, लेकिन एक माँ का दिल इन तर्कों को कहाँ आसानी से मानता है। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथों से अंशुमान का हाथ पकड़ा और बहुत ही धीमी, लेकिन विश्वास भरी आवाज में बोलीं, “मेरे बच्चे, मैं मानती हूँ कि दुनिया में बुराई है। जो टीवी पर दिखा रहे हैं, वो सच भी है। लेकिन क्या पाँचों उंगलियां बराबर होती हैं? हर लड़की वैसी नहीं होती बेटा। समाज में आज भी अच्छे परिवार, अच्छे संस्कार वाली लड़कियां हैं। देख, तेरी बहन की भी तो शादी हुई है, क्या वो अपने ससुराल वालों के साथ बुरी तरह पेश आती है? और मैं… मैंने भी तो तेरे पिता के साथ पूरी जिंदगी खुशी-खुशी बिताई। परिवार में थोड़े बहुत मनमुटाव तो होते ही हैं, पर इसका मतलब ये तो नहीं कि इंसान डर कर घर बसाना ही छोड़ दे। अगर सब ऐसा सोचने लगे तो ये दुनिया, ये समाज कैसे चलेगा? बिना जीवनसाथी के बुढ़ापा कैसे कटेगा तेरा?”
अंशुमान ने अपना हाथ धीरे से छुड़ा लिया। उसके चेहरे पर अब गुस्से से ज्यादा एक गहरी उदासी और पीड़ा थी। वो सोफे से उठा और कमरे में टहलते हुए बोला, “माँ, आप जिस जमाने की बात कर रही हैं न, वो जमाना अब पीछे छूट गया है। आप लोगों के समय में रिश्तों में एक मर्यादा थी, एक दूसरे के प्रति त्याग की भावना थी। आज के समय में रिश्ते सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट बन गए हैं, जहाँ फायदे और नुकसान का हिसाब पहले लगाया जाता है। आप कहती हैं कि हर लड़की वैसी नहीं होती… बिल्कुल सही कहती हैं आप! सौ में से शायद अस्सी लड़कियां बहुत अच्छी होती होंगी। लेकिन अगर मेरी किस्मत में वो बची हुई बीस प्रतिशत वाली कोई आ गई, तो क्या होगा माँ? कौन लेगा इसकी गारंटी?
क्या वो समाज मेरी मदद करने आएगा, जो सिर्फ तमाशा देखना जानता है? क्या वो कानून मेरी मदद करेगा, जो आज के समय में पूरी तरह से पुरुषों के खिलाफ खड़ा नजर आता है? अगर एक बार कोई झूठा आरोप लग गया, तो एक पुरुष को अपनी बेगुनाही साबित करने में सालों लग जाते हैं, उसकी इज्जत, उसका करियर, उसका पैसा… सब खाक हो जाता है। मुझे ये जुआ नहीं खेलना है माँ। मुझे अपनी मानसिक शांति प्यारी है। मैं अकेला बहुत खुश हूँ। कम से कम मेरे घर में मुझे किसी से ये डर तो नहीं रहता कि कोई मेरे ही खिलाफ साजिश कर रहा होगा। आप अपनी उस शर्मा जी की भतीजी का रिश्ता कहीं और पक्का करवा दीजिए, क्योंकि मैं अपनी जिंदगी का सौदा ऐसे नहीं कर सकता।”
सुमित्रा जी की आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “बेटा, तू ये कैसी बातें कर रहा है? तू मुझे अकेला छोड़ जाएगा? मेरे बाद तेरा कौन होगा?”
अंशुमान का सब्र अब जवाब दे चुका था। उसे लगने लगा था कि उसकी माँ उसकी पीड़ा, उसके डर को समझने की बजाय सिर्फ अपनी जिद पर अड़ी हैं। वो तेजी से अपने कमरे की तरफ बढ़ा और अपना वो ट्रॉली बैग, जो उसने कुछ घंटे पहले ही खोला था, वापस पैक करने लगा।
“अगर मेरे घर आने का मतलब सिर्फ यही है कि मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए, मुझ पर उस चीज के लिए दबाव डाला जाए जिससे मुझे खौफ आता है, तो शायद मेरा यहाँ न आना ही बेहतर है। मैं यहाँ कुछ दिन सुकून से बिताने आता हूँ माँ, ये रोज-रोज की बहस और तानों को सुनने नहीं। अगर आपको मेरी खुशी से ज्यादा समाज और रिश्तेदारों की परवाह है, तो ठीक है। मैं वापस बैंगलोर जा रहा हूँ। मुझे माफ कर दीजिएगा।” अंशुमान ने बैग की चेन बंद करते हुए बहुत ही सख्त लहजे में कहा।
कमरे के दरवाजे पर खड़ी सुमित्रा जी सन्न रह गईं। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका इतना शांत और आज्ञाकारी बेटा कभी उनसे इस तरह बात करेगा। उन्हें अचानक एहसास हुआ कि बात उनके हाथ से निकल चुकी है। उनका बेटा सिर्फ उनसे बहस नहीं कर रहा था, वो सच में डरा हुआ था। उसके दिमाग में समाज की इन घटनाओं ने एक गहरा आघात किया था, जिसे सिर्फ ‘शादी कर लो’ कहने से ठीक नहीं किया जा सकता था। उन्हें लगा जैसे वो अपने ही हाथों से अपने बेटे को हमेशा के लिए खुद से दूर कर रही हैं। समाज क्या कहेगा, खानदान का वारिस कौन होगा, ये सब बातें अचानक बहुत छोटी और बेमानी लगने लगीं। सबसे बड़ी सच्चाई ये थी कि उनका बेटा इस वक्त उनके सामने खड़ा था, और वो उसे खोना नहीं चाहती थीं।
सुमित्रा जी ने तेजी से आगे बढ़कर अंशुमान के हाथ से बैग छीन लिया। उनके आंसू अब भी बह रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक दृढ़ संकल्प था।
“चुप कर पागल लड़के! कहाँ जाने की बात कर रहा है रात के इस पहर?” उन्होंने बैग को पलंग के नीचे धकेलते हुए डांटा, लेकिन इस डांट में वो पुराना वाला स्नेह था। “क्या समझता है तू अपनी माँ को? मेरी कोख से जन्मा है तू, क्या मैं तेरी तकलीफ नहीं समझूंगी? ठीक है… नहीं करनी तुझे शादी, तो मत कर। मैं नहीं कहूंगी आज के बाद तुझसे कुछ भी। भाड़ में जाए वो शर्मा जी का रिश्ता और भाड़ में जाए ये समाज। मुझे मेरा बेटा चाहिए, बस।”
अंशुमान हैरान होकर अपनी माँ को देखने लगा। उसका सारा गुस्सा जैसे एक पल में कहीं काफूर हो गया था।
सुमित्रा जी ने अपने पल्लू से आंसू पोछे और एक हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं, “पर एक शर्त है… ये जो तूने अभी मुझे रुलाया है ना, इसकी सजा मिलेगी तुझे। वो जो डाइनिंग टेबल पर गाजर का हलवा रखा है, वो पूरा का पूरा तुझे अभी खत्म करना होगा, और कल सुबह बाजार से मेरे लिए राशन तू खुद लेकर आएगा।”
अंशुमान की आँखों में भी नमी आ गई थी। वो अपनी माँ के गले लग गया। “लो, ठहर गया आपका बेटा। और हां, वो हलवा मैं पूरा खा जाऊंगा, आप चिंता मत कीजिए।”
सुमित्रा जी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “इतना बड़ा अफसर बन गया है, दुनिया जहान की समझ आ गई, लेकिन अपनी माँ को डराने वाली वो बचपन की आदत अब तक नहीं गई तेरी।”
दोनों माँ-बेटे एक साथ हंस पड़े। बाहर सर्द हवा चल रही थी, लेकिन ‘शांति-कुंज’ के अंदर अब एक अलग ही तरह की गर्माहट और सुकून था—एक ऐसा सुकून जो किसी भी सामाजिक दबाव या नियम से कहीं ऊपर था।
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मूल लेखिका : विभा गुप्ता