परिवार के प्रति जिम्मेदारी

रोहन जैसे ही दफ्तर से थका-हारा घर लौटा, उसने देखा कि कमरे की लाइटें बंद हैं। उसने स्विच ऑन किया तो उसकी नजर सोफे के एक कोने में सिकुड़ कर बैठी अपनी पत्नी सौम्या पर पड़ी। सौम्या का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं और उसके होंठ अभी भी काँप रहे थे। रोहन ने अपना लैपटॉप बैग मेज पर रखा और तुरंत उसके पास जाकर बैठ गया।

“क्या हुआ सौम्या ? तुम इस तरह अंधेरे में क्यों बैठी हो और ये आँसू… क्या किसी ने कुछ कहा?” रोहन ने घबराहट और फिक्र के साथ सौम्या के गालों से आँसू पोछते हुए पूछा।

सौम्या ने जैसे ही रोहन की आवाज सुनी, वह उससे लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी। उसकी सिसकियाँ कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। कुछ देर तक रोहन बस उसकी पीठ सहलाता रहा, उसे शांत होने का समय देता रहा। जब सौम्या की सिसकियाँ थोड़ी कम हुईं, तो उसने अपनी डबडबाई आँखों से रोहन की तरफ देखा और भारी आवाज में बोली, “रोहन, आज मैं बाजार गई थी। वहाँ मुझे पापा मिल गए थे। मैंने उन्हें इतने महीनों बाद देखा था, मैं खुद को रोक नहीं पाई और उनके पैर छूने के लिए आगे बढ़ी। लेकिन… लेकिन उन्होंने मुझे पीछे धकेल दिया।”

सौम्या फिर से सुबकने लगी। रोहन ने उसे पानी का गिलास दिया और कहा, “सौम्या , शांत हो जाओ। फिर क्या हुआ?”

“उन्होंने सिर्फ मुझे ही नहीं दुत्कारा रोहन, उन्होंने तुम्हारे बारे में भी बहुत भला-बुरा कहा। उन्होंने भरे बाजार में मुझे जलील किया और कहा कि जिस इंसान ने एक बाप की इज्जत को बीच चौराहे पर नीलाम कर दिया, वो किसी का पति कहलाने के लायक नहीं है। उन्होंने तुम्हें एक धोखेबाज और ना जाने क्या-क्या कहा। मुझे ये सब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ। मैं मानती हूँ कि वो मेरे पिता हैं, लेकिन मेरे पति का इस तरह सरेआम अपमान करने का हक उन्हें किसने दिया? मुझे उनसे ये उम्मीद नहीं थी।” सौम्या की आवाज में दुख से ज्यादा अब गुस्सा झलक रहा था।

रोहन ने बहुत ही शांति से सौम्या की पूरी बात सुनी। उसके चेहरे पर न तो कोई गुस्सा था और न ही कोई शिकायत। उसने एक गहरी साँस ली, सौम्या के दोनों हाथों को अपने हाथों में थामा और बहुत ही धीमी लेकिन गंभीर आवाज में बोला, “सौम्या , इस बात में इतना गुस्सा होने और रोने वाली क्या बात है? वो तुम्हारे पिता हैं, अगर उन्होंने मुझे कुछ कह भी दिया तो क्या हुआ?”

सौम्या ने झटके से अपने हाथ छुड़ाए और अविश्वास से रोहन को देखने लगी। “क्या हुआ? रोहन, तुम समझ नहीं रहे हो। उन्होंने तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचाई है। वो पापा, जिन पर मुझे कभी दुनिया में सबसे ज्यादा फख्र हुआ करता था, जो हमेशा दूसरों के सामने मेरी मिसाल दिया करते थे, आज वो मेरी ही नजरों में गिर गए। कोई पिता अपनी बेटी के सामने उसके सुहाग को इतनी गंदी-गंदी गालियां कैसे दे सकता है? मुझे उनका ये रूप देखकर नफरत हो रही है खुद से कि मैं उनके पास गई ही क्यों!”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। बाहर बारिश और तेज हो गई थी। रोहन अपनी जगह से उठा, खिड़की के पास गया और बाहर गिरती हुई बारिश की बूँदों को देखते हुए बोला, “सौम्या , तुम्हें याद है तुमने अभी क्या कहा? तुमने कहा कि तुम उनका फख्र थीं, उनका गुरूर थीं। लेकिन कभी तुमने अकेले में बैठकर ये सोचा है कि उस फख्र, उस गुरूर का हमने क्या किया? हमने उसे सिर्फ तोड़ा नहीं, बल्कि समाज के सामने उसे पैरों तले रौंद दिया।”

सौम्या अपनी जगह से खड़ी हो गई, “तुम ये क्या कह रहे हो रोहन? हमने जो किया अपनी मजबूरी में किया।”

रोहन पलटा और सौम्या की आँखों में देखते हुए बोला, “मजबूरी? सौम्या , जब हम घर से भागे थे, तो हमें सिर्फ अपना प्यार दिख रहा था। मैं ये नहीं कहता कि हमारा प्यार झूठा था या हमने कोई बहुत बड़ा पाप किया। लेकिन जरा उस पिता के नजरिए से सोचो जिसने तुम्हें पैदा होने से लेकर आज तक एक राजकुमारी की तरह पाला। मास्टर दीनानाथ, जिनकी पूरे मोहल्ले में, पूरे शहर में एक इज्जत थी। जब लोग उनसे मशवरा लेने आते थे, तो उनका सीना चौड़ा हो जाता था। और उस रात… उस एक रात में हमने क्या किया? हमने उनके 25 सालों की कमाई हुई इज्जत को रातों-रात खाक में मिला दिया।”

सौम्या ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन वो अभी भी अपनी बात पर अड़ी थी। “पर रोहन, हमने प्यार किया था, कोई चोरी तो नहीं की थी। जब हम बार-बार उनके सामने गिड़गिड़ाए, तुम्हारे परिवार वाले भी आए, तब भी तो उन्होंने सिर्फ झूठी शान और बिरादरी के नाम पर हमारे रिश्ते को ठुकरा दिया था। जब वो हमारी खुशियों के लिए राजी ही नहीं हुए, तब जाकर ही तो हमने ये कदम उठाया था। इसमें हमारी क्या गलती थी?”

रोहन वापस आकर सौम्या के पास बैठ गया। उसने बहुत ही प्यार से सौम्या का माथा चूमा और बोला, “तुम अपनी जगह बिल्कुल सही हो सौम्या । एक प्रेमी और प्रेमिका के रूप में हमने वही किया जो हमें उस वक्त सही लगा। लेकिन आज तुम सिर्फ एक प्रेमिका या पत्नी नहीं हो। तुम बहुत जल्द एक माँ बनने वाली हो। तुम्हारे गर्भ में हमारा बच्चा पल रहा है। और सच कहूँ तो, जब से मुझे ये एहसास हुआ है कि मैं एक पिता बनने वाला हूँ, मुझे तुम्हारे पापा का हर दर्द, हर गुस्सा एकदम जायज लगने लगा है।”

सौम्या कुछ समझ नहीं पा रही थी। वो चुपचाप रोहन का चेहरा देख रही थी।

रोहन ने अपनी बात जारी रखी, “सौम्या , जरा सोचो… कल को जब हमारी बेटी या बेटा बड़ा होगा, हम उसके लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देंगे। अपनी नींदें, अपने शौक सब कुर्बान कर देंगे। और कल को अगर वो हमारी किसी बात से नाराज होकर, या अपने किसी फैसले के लिए हमें रातों-रात बिना बताए घर छोड़कर चला जाए, तो हम पर क्या गुजरेगी? क्या हम ये सोचकर खुश हो जाएंगे कि चलो हमारे बच्चे ने अपनी मर्जी से प्यार किया है? नहीं सौम्या , हम टूट जाएंगे। हम अंदर से खोखले हो जाएंगे। और शायद हर पिता यही करता है। जब उसकी जान से भी प्यारी बेटी, जिसे उसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया हो, वो उसकी इज्जत और उसके बुढ़ापे की परवाह किए बिना किसी और का हाथ थाम कर भाग जाती है, तो पिता का गुस्सा होना लाजिमी है।”

रोहन की आँखों में भी अब नमी आ गई थी। “बाजार में आज तुम्हारे पापा ने जो भी कहा, वो उनका गुस्सा नहीं था सौम्या । वो उनकी वो भड़ास थी, वो दर्द था जो उन्होंने इन पिछले दस महीनों में हर रोज अकेले में पिया है। सोचो, जब वो सुबह उठे होंगे और तुम्हारी अलमारी खाली देखी होगी, तो उस बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी? जब मोहल्ले वालों ने और रिश्तेदारों ने ताने मारे होंगे, तो उस इज्जतदार इंसान ने कैसे अपनी नजरें झुकाकर उन तानों को सहा होगा? हमें उनके उस कठोर चेहरे के पीछे छिपे हुए उस रोते हुए बेबस पिता को देखना चाहिए। हमने एक बहुत बड़ी गलती की है सौम्या … घर से भागने की गलती। अब हमें दूसरी गलती नहीं करनी है।”

सौम्या अब तक पूरी तरह से टूट चुकी थी। उसके अंदर का सारा गुस्सा, सारी शिकायतें जैसे रोहन की इन बातों के आगे बह गई थीं। वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि अपने प्यार को पाने की जिद में उसने अपने पिता को कितनी बड़ी सजा दे दी है।

“तो अब हम क्या करें रोहन? पापा तो हमारी शक्ल भी नहीं देखना चाहते। वो हमारी एक बात सुनने को तैयार नहीं हैं। आज भी उन्होंने मुझे कितनी बुरी तरह झिड़क दिया। मैं उनका वो दर्द नहीं देख सकती, लेकिन मैं उनके पास जाऊँ भी तो कैसे?” सौम्या ने रोहन के सीने से सिर लगाते हुए पूछा।

रोहन ने उसे अपने बाहों के घेरे में समेट लिया और बहुत ही दृढ़ता से बोला, “हमें बार-बार कोशिश करनी होगी सौम्या । एक बार नहीं, सौ बार उनके दरवाजे पर जाना होगा। वो हमें धक्के मारेंगे, गालियां देंगे, शायद दरवाजे से ही भगा देंगे… लेकिन हम वापस जाएंगे। क्योंकि वो सजा देने का हक रखते हैं। जब से तुम माँ बनने वाली हो, मैं उन माता-पिता के दिल का वो खालीपन महसूस कर सकता हूँ। तुम पापा की बातों का बुरा मानने के बजाय, उन्हें सुनने की आदत डालो। उन्हें अपना सारा जहर, सारी भड़ास हम पर निकाल लेने दो। जिस दिन उनका वो गुबार शांत हो जाएगा, उस दिन उन्हें सिर्फ अपनी बेटी नजर आएगी, वो बेटी जो उनके सामने अपने किए की माफी मांग रही है। शायद तभी वो हमें सच्चे मन से माफ कर पाएं।”

सौम्या ने रोहन की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब शिकायत नहीं, बल्कि अपने पति के लिए एक अथाह सम्मान था। उसे लगा जैसे उसने सिर्फ एक प्रेमी से नहीं, बल्कि एक बेहद परिपक्व और सुलझे हुए इंसान से शादी की है, जो न सिर्फ उसे प्यार करता है, बल्कि उसके परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी और उनकी भावनाओं को भी समझता है।

“कल सुबह हम दोनों पापा के घर जाएंगे।” रोहन ने सौम्या के आँसू पोछते हुए कहा। “हम तब तक उस चौखट पर माथा टेकेंगे, जब तक वो दरवाजा हमारे लिए हमेशा के लिए नहीं खुल जाता।”

बाहर बारिश अब रुक चुकी थी। बादलों के बीच से चाँद की हल्की सी रोशनी छनकर कमरे में आ रही थी। सौम्या के मन का तूफान भी अब शांत हो चुका था। उसे अब पता था कि उसे अपने प्यार की कहानी को अधूरा नहीं छोड़ना है, बल्कि उस कहानी में अपने माता-पिता के आशीर्वाद को भी वापस जोड़ना है।

क्या आपको लगता है कि रोहन ने सही फैसला लिया? क्या प्यार के खातिर माँ-बाप को छोड़ना सही है? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।

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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव

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