अनपढ़ माँ

“क्या हुआ पापा? आप खुश नहीं हैं क्या? इतनी बड़ी कामयाबी मिली है मुझे,” समीर ने हैरानी से पूछा।

रामनाथ जी ने गहरी साँस ली और बहुत ही शांत लेकिन चुभने वाले स्वर में कहा, “मैं बहुत खुश था समीर, लेकिन अभी कुछ ही पलों में तुमने मुझे यह अहसास दिला दिया कि मेरी और तुम्हारी माँ की परवरिश में कहीं न कहीं बहुत बड़ी कमी रह गई। तुमने बिल्कुल सच कहा बेटा… तुम्हारी माँ अनपढ़ है। उसे अंग्रेजी का एक अक्षर नहीं आता। लेकिन क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी इस ‘पढ़ी-लिखी’ डिग्री की कीमत उस ‘अनपढ़’ औरत ने कैसे चुकाई है?”

 समीर को आज अमेरिका की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी से सीनियर मैनेजर  के पद का ऑफर लेटर मिला था। यह कोई छोटी-मोटी कामयाबी नहीं थी। इसके साथ ही उसे करोड़ों का पैकेज और पूरे परिवार के साथ विदेश में बसने का वीज़ा भी मिलने वाला था। समीर के पिता, रामनाथ जी, जो एक साधारण से रिटायर्ड क्लर्क थे, सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे, लेकिन उनके चेहरे की चमक बता रही थी कि उनका सीना आज गर्व से कितना चौड़ा हो गया था। उनके जीवन की सारी तपस्या जैसे आज सफल हो गई थी।

तभी कूरियर वाले ने डोरबेल बजाई और एक बड़ा सा लिफाफा समीर के हाथों में थमा दिया। लिफाफा खोलते ही समीर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसमें कंपनी का आधिकारिक ऑफर लेटर और एक खूबसूरत सा मोमेंटो था। समीर खुशी से उछल पड़ा और लगभग चिल्लाते हुए बोला, “पापा! देखिए, मेरा फाइनल ऑफर लेटर आ गया। अब आपका बेटा अमेरिका जाएगा। उन्होंने मुझे कंपनी का अहम पद दिया है!” रामनाथ जी ने अपना चश्मा ठीक किया और कांपते हाथों से उस लेटर को छुआ। उनकी आँखों में खुशी के आँसू तैरने लगे।

यह शोर सुनकर समीर की माँ, कौशल्या, जो रसोई में अपने बेटे की इस बड़ी कामयाबी पर उसके लिए उसके मनपसंद बेसन के लड्डू बना रही थीं, अपने हाथों को अपनी सूती साड़ी के पल्लू से पोंछती हुई बाहर आईं। उनके चेहरे पर भी एक असीम संतोष और खुशी थी। उन्होंने उत्सुकता से समीर की तरफ देखा और कहा, “अरे वाह मेरे लाल! ज़रा मुझे भी तो दिखा तेरा यह कागज़, जिसके लिए तूने दिन-रात एक कर दिया था। ला, मैं भी देखूँ कि मेरे बेटे की मेहनत कैसी दिखती है।” उन्होंने अपने हाथ उस चमचमाते हुए लिफाफे की तरफ बढ़ाए।

कौशल्या के हाथ अभी लेटर तक पहुँचने ही वाले थे कि समीर ने अचानक अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी झुंझलाहट थी। उसने अपनी माँ की ओर देखते हुए एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “अरे माँ! आप रहने दो। आपके हाथ में घी और बेसन लगा होगा, यह गंदा हो जाएगा। और वैसे भी, यह पूरा लेटर हाई-लेवल अंग्रेजी में लिखा हुआ है। आप इसे देखकर क्या ही करोगी? आपको इसमें से एक अक्षर भी समझ में नहीं आएगा। आप तो सिर्फ सब्ज़ी का भाव और राशन का हिसाब ही पढ़ सकती हो। इसे समझना आपके बस की बात नहीं है, आप रहने दो। आप जाकर लड्डू ही बनाओ, वही आपके लिए ठीक है।”

यह सुनते ही कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कौशल्या के जो हाथ उत्साह से आगे बढ़े थे, वो धीरे से नीचे गिर गए। उनके चेहरे की वो चमक, जो अभी कुछ पल पहले थी, अचानक बुझ गई। आँखों में तैरते हुए खुशी के आँसू अब अपमान और दुःख के आँसुओं में बदल चुके थे। लेकिन एक माँ का दिल ऐसा ही होता है, वह अपने बच्चे की खुशी के दिन कोई तमाशा नहीं करना चाहती थी। कौशल्या ने अपनी नम आँखों को अपने उसी पल्लू के कोने से पोंछ लिया, जिससे उन्होंने कुछ देर पहले हाथ पोंछे थे। उन्होंने एक फीकी सी मुस्कान अपने चेहरे पर ओढ़ी और धीमे स्वर में बोली, “तू सही कह रहा है बेटा, मुझे कहाँ ये सब समझ आएगा। मैं जाकर तेरे लिए लड्डू पूरे करती हूँ।” यह कहकर वह चुपचाप रसोई की तरफ लौट गईं, लेकिन उनके कदमों की वो भारीपन और उनके झुक चुके कंधे बहुत कुछ कह रहे थे।

समीर इस बात से पूरी तरह बेपरवाह होकर फिर से अपने फोन में व्यस्त हो गया और अपने दोस्तों को मैसेज करने लगा। लेकिन सोफे पर बैठे रामनाथ जी ने यह सब बहुत गौर से देखा था। उन्होंने अखबार को मोड़कर टेबल पर रखा। उनके चेहरे पर अब खुशी नहीं, बल्कि एक गहरी निराशा और गुस्सा था। उन्होंने चश्मा उतारा और भारी आवाज़ में समीर को पुकारा, “समीर! इधर आओ और मेरे पास बैठो।”

पिता की आवाज़ की गंभीरता सुनकर समीर थोड़ा चौंका। उसने फोन जेब में रखा और उनके पास आकर बैठ गया। “क्या हुआ पापा? आप खुश नहीं हैं क्या? इतनी बड़ी कामयाबी मिली है मुझे,” समीर ने हैरानी से पूछा।

रामनाथ जी ने गहरी साँस ली और बहुत ही शांत लेकिन चुभने वाले स्वर में कहा, “मैं बहुत खुश था समीर, लेकिन अभी कुछ ही पलों में तुमने मुझे यह अहसास दिला दिया कि मेरी और तुम्हारी माँ की परवरिश में कहीं न कहीं बहुत बड़ी कमी रह गई। तुमने बिल्कुल सच कहा बेटा… तुम्हारी माँ अनपढ़ है। उसे अंग्रेजी का एक अक्षर नहीं आता। लेकिन क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी इस ‘पढ़ी-लिखी’ डिग्री की कीमत उस ‘अनपढ़’ औरत ने कैसे चुकाई है?”

समीर कुछ समझ नहीं पाया और चुपचाप अपने पिता का चेहरा देखने लगा।

रामनाथ जी ने आगे कहना शुरू किया, “आज तुम जो इस कागज़ के टुकड़े पर इतना घमंड कर रहे हो, ज़रा पीछे मुड़कर देखो। याद है जब तुम सिर्फ पाँच साल के थे? तुम्हें निमोनिया हो गया था। डॉक्टर ने कहा था कि अगर रात भर बुखार कम नहीं हुआ तो कुछ भी हो सकता है। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं तुम्हें किसी बड़े अस्पताल ले जा सकूं। उस रात तुम्हारी वह अनपढ़ माँ तुम्हें अपने सीने से चिपकाकर, बारिश में पैदल दो किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल की तरफ भागी थी। उसे थर्मामीटर देखना नहीं आता था समीर, उसे यह नहीं पता था कि 102 डिग्री बुखार क्या होता है और 104 डिग्री क्या होता है। लेकिन उसे तुम्हारे माथे की तपिश पढ़कर तुम्हारी जान की कीमत का अंदाज़ा लगाना बखूबी आता था। क्योंकि वह अनपढ़ थी ना, इसलिए उसे डिग्रियों से ज्यादा अपने बच्चे की साँसों की फिक्र थी।”

समीर की नज़रें अब धीरे-धीरे नीचे झुकने लगी थीं।

पिता ने अपनी बात जारी रखी, “जब तुम्हारा दाखिला शहर के सबसे बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवाना था, तो हम दोनों गए थे। वहां के प्रिंसिपल ने हमें देखकर ही कह दिया था कि हम अनपढ़ और गँवार माता-पिता हैं, हम बच्चे को क्या पढ़ाएंगे। प्रिंसिपल ने अंग्रेजी में कई सवाल पूछे थे जिनका जवाब हमें नहीं पता था। लेकिन तुम्हारी माँ, जिसे तुम आज अनपढ़ कहकर ताने मार रहे हो, वह उस प्रिंसिपल के सामने हाथ जोड़कर खड़ी रही। उसने अपनी टूटी-फूटी भाषा में सिर्फ इतना कहा था कि ‘मैं नहीं पढ़ पाई, लेकिन मेरे बच्चे को वह हर चीज़ मिलनी चाहिए जो मुझे नहीं मिली।’ वह पूरे तीन घंटे चिलचिलाती धूप में प्रिंसिपल के ऑफिस के बाहर खड़ी रही, ज़लील होती रही, सिर्फ इसलिए ताकि तुम्हें वह ‘अंग्रेजी’ सीखने का मौका मिल सके जिस पर तुम आज घमंड कर रहे हो। क्योंकि वह अनपढ़ थी ना, इसलिए उसे अपने आत्मसम्मान से ज्यादा तुम्हारा भविष्य प्यारा था।”

रामनाथ जी की आँखों से भी अब आँसू बहने लगे थे, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और आगे बोले, “और तुम्हारी यह पढ़ाई? जब तुम इंजीनियरिंग कॉलेज में थे और तुम्हें प्रोजेक्ट के लिए एक महंगे लैपटॉप की ज़रूरत थी, तब मेरी नौकरी छूट चुकी थी। मेरे पास तुम्हें देने के लिए पचास हज़ार रुपये नहीं थे। तुमने खाना-पीना छोड़ दिया था। तब तुम्हारी उसी अनपढ़ माँ ने अपनी शादी की वो आखिरी सोने की चेन, जो उसकी माँ ने उसे दी थी, बिना एक पल सोचे सुनार की दुकान पर गिरवी रख दी थी। उसे नहीं मालूम था कि लैपटॉप क्या बला होती है, उसे नहीं पता था कि सॉफ्टवेयर क्या होता है और हार्डवेयर क्या होता है। उसे बस इतना पता था कि उसके बेटे की पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए। पढ़े-लिखे लोग अक्सर हर रिश्ते में नफा-नुकसान देखते हैं, इन्वेस्टमेंट और रिटर्न की बात करते हैं। लेकिन तुम्हारी माँ ने कभी कोई हिसाब नहीं रखा। क्योंकि वह अनपढ़ है ना, इसलिए उसे सिर्फ देना आता है, बदले में कुछ मांगना नहीं।”

कमरे में अब सन्नाटा था, सिर्फ समीर के सुबकने की आवाज़ आ रही थी।

“तुम्हें क्या लगता है समीर, कि जब तुम रात-रात भर जागकर पढ़ाई करते थे, तो वह तुम्हारे कमरे के बाहर क्यों बैठी रहती थी? उसे तुम्हारी मोटी-मोटी किताबें समझ नहीं आती थीं। लेकिन गर्मियों की रात में जब बिजली कट जाती थी, तो वह घंटों हाथ वाला पंखा सिर्फ इसलिए झलती थी ताकि मेरा बेटा चैन से पढ़कर अमेरिका जाने का सपना पूरा कर सके। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में शायद कभी कोई नया कपड़ा नहीं खरीदा, अपनी हर इच्छा को मार दिया, सिर्फ इसलिए ताकि तुम्हें ब्रांडेड कपड़े मिल सकें और तुम्हारे दोस्त तुम्हारा मज़ाक न उड़ाएं। तुम आज अपनी इस अंग्रेजी और अपनी कामयाबी का जो चश्मा पहनकर उसे देख रहे हो, उस चश्मे को उतार कर देखो। उसकी अनपढ़ होने की इसी खामोश तपस्या ने तुम्हें आज इस मुकाम तक पहुँचाया है। और आज, जब वह तुम्हारी सफलता को सिर्फ एक बार छूकर महसूस करना चाहती थी, तो तुमने उसे उसकी अनपढ़ता का ताना दे दिया? धिक्कार है तुम्हारी ऐसी पढ़ाई पर समीर, जो तुम्हें एक सफल इंसान तो बना गई, लेकिन एक अच्छा बेटा और एक सच्चा इंसान नहीं बना सकी।”

यह सब सुनकर समीर के भीतर जैसे कोई भूचाल आ गया। उसे अपनी उस डिग्री और उस ऑफर लेटर से घिन आने लगी, जिसे वह अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई समझ रहा था। उसे अहसास हुआ कि उसने अनजाने में अपनी माँ के उस दिल के कितने टुकड़े कर दिए, जो सिर्फ और सिर्फ उसके लिए धड़कता था। उसे समझ आ गया कि दुनिया की कोई भी यूनिवर्सिटी, कोई भी कॉलेज वह शिक्षा नहीं दे सकता जो शिक्षा एक माँ अपने निस्वार्थ प्रेम से देती है।

समीर रोता हुआ अपनी जगह से उठा। उसके हाथ से वह चमचमाता हुआ ऑफर लेटर ज़मीन पर गिर गया, लेकिन अब उसे उसकी कोई परवाह नहीं थी। वह सीधे रसोई की तरफ भागा।

रसोई में कौशल्या अभी भी गैस के पास खड़ी थीं और उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, जो सीधे बेसन के उस मिश्रण में गिर रहे थे। समीर ने जाकर पीछे से अपनी माँ को ज़ोर से गले लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगा।

“माँ… मुझे माफ़ कर दो माँ! मैं सच में अंधा हो गया था। मेरे इस कागज़ के टुकड़े की कोई अहमियत नहीं है तुम्हारी उस डिग्री के सामने, जो तुमने जीवन भर के बलिदान से हासिल की है। आज मुझे पता चला कि मैं भले ही दुनिया की नज़रों में कितना भी बड़ा पढ़ा-लिखा इंसान बन गया हूँ, लेकिन असल में मैं सबसे बड़ा जाहिल और अनपढ़ हूँ। तुम्हारी कोई भी शिक्षा किसी कागज़ पर नहीं लिखी जा सकती माँ। तुम मेरी डॉक्टर भी हो जिसने बारिश में मेरी जान बचाई, तुम मेरी टीचर भी हो जिसने मुझे ज़िद करना और लड़ना सिखाया, तुम मेरी सबसे बड़ी फाइनेंसर हो जिसने बिना सोचे अपना सब कुछ मुझ पर लुटा दिया। मुझे यह झूठी कामयाबी नहीं चाहिए माँ, मुझे सिर्फ तुम चाहिए… मुझे माफ़ कर दो।”

कौशल्या का मातृ हृदय अपने बेटे को इस तरह रोता हुआ देखकर तुरंत पिघल गया। उन्होंने गैस बंद की, अपने हाथों से समीर के आँसू पोंछे और उसे अपने सीने से लगा लिया। उनके अपने आँसू भी समीर के बालों को भिगो रहे थे। उन्होंने समीर का माथा चूमा और रुंधे हुए गले से मुस्कुराते हुए बोलीं, “अरे पागल! ऐसे शुभ दिन कोई रोता है भला? तू तो मेरा राजा बेटा है। जा, मुँह धोकर आ, मैं तेरे लिए तेरे मनपसंद लड्डू लाती हूँ। मेरी तो सारी डिग्रियां और सारे इनाम बस तेरी इस खुशी में ही छिपे हैं। तू खुश है, तो तेरी यह अनपढ़ माँ दुनिया की सबसे अमीर माँ है।”

समीर अपनी माँ के गले लगा रहा। आज उसे दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई समझ आ गई थी कि एक माँ की ममता और उसके बलिदान के आगे दुनिया की हर शिक्षा, हर डिग्री और हर कामयाबी बहुत छोटी है।

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लेखिका : आरती देवी

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