मुक्कमल इश्क़

मेरा नाम लेते ही उसके हाथ कांप गए। उसने झटके से मेरी तरफ देखा। वो पत्थर जैसी दिखने वाली लड़की की आँखों में अचानक समंदर उमड़ पड़ा। वो कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मुझे एकटक देखे जा रही थी, जैसे यह यकीन करना चाहती हो कि यह कोई सपना तो नहीं है।

वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसने काउंटर के किनारे को ज़ोर से पकड़ रखा था। मैं आगे बढ़ा और मैंने उसे गले से लगा लिया। उसने भी अपने सारे गिले-शिकवे, सारी शिकायतें मेरे सीने पर आँसुओं के रूप में बहा दीं।

 क्या तुम मुझसे शादी करोगी, मेघा?” मैंने उसके कानों में फुसफुसाते हुए पूछा।

उसने कुछ नहीं कहा, बस अपना सिर मेरे सीने से लगा लिया और अपने आंसुओं से भीगी उंगलियों से मेरे गाल को छू लिया। उस रात, उस पुरानी स्टेशनरी की दुकान में, दस साल पहले अधूरी रह गई एक किताब के पन्नों पर फिर से मुहब्बत की स्याही बिखर गई थी।

शहर की चकाचौंध और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में इंसान अक्सर वो चीज़ें पीछे छोड़ आता है, जो कभी उसके जीने का इकलौता सहारा हुआ करती थीं। दस साल बाद जब मेरी गाड़ी ने मेरे छोटे से कस्बे की परिचित सड़कों पर रफ्तार धीमी की, तो एक अजीब सी सिहरन मेरे पूरे वजूद में दौड़ गई। मैं, अविनाश, जो अब एक बड़ा आर्किटेक्ट बन चुका था, अपनी चमचमाती कार के शीशे से बाहर देख रहा था। कस्बे की शक्ल काफी बदल चुकी थी। कच्चे रास्तों की जगह पक्की सड़कों ने ले ली थी, पुराने छप्पर वाले मकान अब कंक्रीट के छोटे-छोटे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में तब्दील हो गए थे। लेकिन मेरी नज़रें बस एक ही चीज़ को ढूंढ रही थीं—मास्टर जी की वो पुरानी किताबों और स्टेशनरी की दुकान, और उस दुकान के गल्ले पर बैठी वो लड़की, जिसे दुनिया ‘चश्मिश’ या ‘बावली’ कहती थी, पर मेरी डायरी के हर पन्ने पर उसका नाम ‘मेघा’ लिखा था।

घर पहुँचते ही माँ की आरती की थाली और बाबूजी के गर्व से चौड़े सीने ने मेरा स्वागत किया। घर में एक अलग ही उल्लास था। मेरी तरक्की से ज्यादा उन्हें इस बात की खुशी थी कि मैं अब शादी के लायक हो गया था। शाम की चाय पर माँ ने बातों ही बातों में बता दिया कि उन्होंने मेरे लिए शहर के सबसे बड़े कपड़े के व्यापारी की बेटी की तस्वीर देख रखी है। लड़की पढ़ी-लिखी थी, सुंदर थी और हमारे परिवार के रुतबे के बिल्कुल बराबर थी। मैंने बस हामी में सिर हिला दिया, क्योंकि मेरा मन तो कहीं और ही अटका था। वो पुरानी यादें, जो पिछले दस सालों से मेरे ज़हन के किसी कोने में दबी पड़ी थीं, आज अचानक बेकाबू हो रही थीं।

मुझे याद है, बचपन में स्कूल के बाद मेरा सबसे ज्यादा वक्त उसी स्टेशनरी की दुकान के आस-पास गुज़रता था। मेघा के बाबूजी रिटायर्ड मास्टर थे और उन्होंने घर के बाहर ही एक छोटी सी दुकान खोल ली थी। मेघा मुझसे उम्र में एक साल छोटी थी। आँखों पर बड़ा सा चश्मा, तेल लगी दो चोटियाँ और हमेशा किसी न किसी मोटी सी किताब में डूबी रहने वाली लड़की। लड़कों के बीच वो हमेशा मज़ाक का पात्र रहती, क्योंकि वो बहुत कम बोलती थी और उसका रंग सांवला था। पर मेरे लिए, वो उस पूरी दुकान की सबसे कीमती किताब थी।

“ऐ चश्मिश! वो एक लाल वाली पायलट पेन देना,” मैं अक्सर अपनी साइकिल की घंटी बजाते हुए रौब से कहता।

वो अपनी किताब से नज़रें उठाती, चश्मे को उंगली से पीछे धकेलती और सपाट आवाज़ में कहती, “पैसे निकालो पहले।”

“अरे! दे दूँगा कल। कौन सा मैं भाग रहा हूँ?”

“बिना पैसे के एक रबर भी नहीं मिलेगा। बाबूजी ने मना किया है उधारी देने से।” वो तुरंत पेन वापस डिब्बे में रख देती। मैं मुँह बनाकर वहाँ से जाने लगता, तो अचानक पीछे से आवाज़ आती, “सुनो… ये लो। कल पक्का दे देना, वरना मैं बाबूजी से तुम्हारी शिकायत कर दूँगी।”

उसने कभी शिकायत नहीं की और मैंने वो उधारी कभी चुकाई नहीं। वो लाल पेन, वो दो रुपये वाली कॉपियाँ, वो पतंग के मांझे—जाने कितनी ही उधारी मुझ पर चढ़ी थी। एक बार दिवाली के समय मैंने दुकान के बाहर रखे दीयों पर गलती से साइकिल चढ़ा दी थी। सारा नुकसान हो गया था। मेघा के बाबूजी गुस्से में बाहर आए, तो मेघा ने तुरंत कह दिया कि एक आवारा कुत्ता दीयों पर गिर गया था। उस दिन उसने मुझे बाबूजी की डांट से तो बचा लिया, लेकिन बदले में खुद दो थप्पड़ खाए। मैं दूर खड़ा सब देखता रहा, लेकिन कुछ बोल नहीं पाया।

उम्र के साथ हमारा वो बचकाना रिश्ता एक अजीब सी खामोशी में बदल गया। मैं कॉलेज जाने लगा था और वो दुकान संभालने लगी थी। बाबूजी की तबीयत अक्सर खराब रहने लगी थी। एक दिन बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। मैं दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा था। वो अंदर पुरानी किताबों की धूल साफ कर रही थी। बिजली कड़कने से वो अचानक डरी और उसके हाथ से किताबों का बंडल गिर गया। मैं मदद के लिए अंदर गया। जब हम दोनों किताबें उठा रहे थे, तो हमारे हाथ टकराए। मैंने देखा, उसकी आँखें लाल थीं। वो रो रही थी। उसने बिना कुछ कहे अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने अपनी कांपती उंगलियों से उसका माथा चूम लिया था। उस बारिश की महक और उस पल की गर्माहट, मैं अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं भूल पाया। मेरे दोस्तों ने जब ये सुना तो खूब मज़ाक उड़ाया था कि “तुझे पूरे कस्बे में वही चश्मिश मिली थी? यार वो तो एकदम डल (dull) है!” लेकिन उन्हें क्या पता था कि मेरे लिए वो क्या थी।

फिर वो मनहूस दिन आया जब मुझे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना पड़ा। जाने से एक रात पहले मैं दुकान पर गया था। वो रोज़ की तरह गल्ले पर बैठी थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस एक डिब्बे में से एक नई लाल पायलट पेन निकाली और मेरी जेब में रख दी। मैंने पलट कर देखा, तो वो किताबों की रैक के पीछे छुप गई थी। बस वही हमारी आखिरी मुलाकात थी। उसके बाद वक्त ऐसा भागा कि मैं पढ़ाई, नौकरी और करियर की दौड़ में शामिल हो गया। फोन के उस दौर में न उसके पास कोई नंबर था और न मेरे पास इतनी हिम्मत कि चिट्ठी लिख सकूँ।

आज दस साल बाद, माँ की उस शादी की बात ने मुझे बेचैन कर दिया था। रात का खाना खाने के बाद मैं बहाना बनाकर घर से निकल गया। मेरे कदम अपने आप उसी पुरानी बस्ती की तरफ बढ़ गए। धड़कनें तेज़ थीं। मन में कई सवाल थे—क्या वो अब भी वहीं होगी? क्या उसकी शादी हो गई होगी? क्या वो मुझे पहचान पाएगी?

बाज़ार लगभग बंद हो चुका था। कुछ स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी सड़क पर बिखरी थी। मेरी नज़रें उसी नुक्कड़ पर आकर ठहर गईं। वो दुकान आज भी वहीं थी, बस थोड़ी और पुरानी और जर्जर हो गई थी। दुकान का शटर आधा खुला था और अंदर एक कमज़ोर सा बल्ब जल रहा था। मैं धीरे-धीरे कदमों से आगे बढ़ा।

गल्ले पर कोई बैठा था। वही सांवला रंग, लेकिन अब आँखों से वो मोटा चश्मा गायब था। चेहरे पर एक अजीब सी थकान और परिपक्वता थी। उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहन रखी थी। मुझे पता चला था कि बाबूजी के गुज़रने के बाद घर की सारी ज़िम्मेदारी उसी पर आ गई थी। शायद इसी वजह से उसने कभी अपना घर नहीं बसाया।

मैं दुकान के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी डायरी से नज़र उठाई। उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी, कोई हैरानी नहीं थी। जैसे मैं कोई आम ग्राहक हूँ।

“जी? क्या चाहिए?” उसने बेहद ठंडे और सपाट लहजे में पूछा।

मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सीने पर मुक्का मार दिया हो। क्या वो सच में मुझे भूल गई? या मुझे पहचानने से इंकार कर रही है?

मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया था। मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, “एक लाल… लाल पायलट पेन चाहिए।”

उसने बिना कोई भाव दिखाए, दराज खोली। एक लाल पेन निकाला और मेरे सामने काउंटर पर रख दिया।

“दस रुपये,” उसने कहा।

मेरी आँखों में आँसू छलकने लगे। वो मुझे नहीं भूली थी, वो बस ज़िंदगी की मार से इतनी टूट चुकी थी कि उसने जज़्बातों को कहीं गहरे दफना दिया था।

मैंने अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला और काउंटर पर रख दिया।

“मुझे… मुझे अपनी पुरानी उधारी भी चुकानी है, मेघा।” मैंने रुंधे हुए गले से कहा।

मेरा नाम लेते ही उसके हाथ कांप गए। उसने झटके से मेरी तरफ देखा। वो पत्थर जैसी दिखने वाली लड़की की आँखों में अचानक समंदर उमड़ पड़ा। वो कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मुझे एकटक देखे जा रही थी, जैसे यह यकीन करना चाहती हो कि यह कोई सपना तो नहीं है।

मैं दुकान के अंदर चला गया। किताबों की वही पुरानी महक, वही धूल। मैं उसके ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया।

“दस साल लग गए तुम्हें ये उधारी चुकाने में, अविनाश?” उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कंपन थी।

“वक्त लग गया मेघा, लेकिन मैं मुकरा नहीं हूँ। मेरी सबसे बड़ी उधारी ये दस रुपये नहीं, वो वादे हैं जो मैंने इन किताबों की अलमारियों के पीछे तुमसे किए थे। वो माथे का चुंबन, वो तुम्हारी खामोशी… मैं सब वापस करने आया हूँ।”

वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसने काउंटर के किनारे को ज़ोर से पकड़ रखा था। मैं आगे बढ़ा और मैंने उसे गले से लगा लिया। उसने भी अपने सारे गिले-शिकवे, सारी शिकायतें मेरे सीने पर आँसुओं के रूप में बहा दीं।

“क्या तुम अब भी इस नालायक लड़के की उधारी अपने नाम लिखोगी? क्या तुम मुझसे शादी करोगी, मेघा?” मैंने उसके कानों में फुसफुसाते हुए पूछा।

उसने कुछ नहीं कहा, बस अपना सिर मेरे सीने से लगा लिया और अपने आंसुओं से भीगी उंगलियों से मेरे गाल को छू लिया। उस रात, उस पुरानी स्टेशनरी की दुकान में, दस साल पहले अधूरी रह गई एक किताब के पन्नों पर फिर से मुहब्बत की स्याही बिखर गई थी।

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मूल लेखक : विनय कुमार मिश्रा

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