रूप का अहंकार

अनिरुद्ध एक पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ इंसान था। उसने राधिका की इस बद्तमीज़ी पर अपना आपा नहीं खोया, बल्कि बहुत ही गरिमा के साथ जवाब दिया, “मिस राधिका, फोटो स्टूडियो वाले अक्सर तस्वीरों को थोड़ा बहुत एडिट कर देते हैं, लेकिन मैंने कभी अपने रंग को छिपाने की कोशिश नहीं की। मैं एक डॉक्टर हूँ, मेरी पहचान मेरा काम और मेरी इंसानियत है, मेरा रंग नहीं।”

“वेल, तुम्हारी इंसानियत तुम्हारे काम आए। मुझे तो अपने साथ खड़ा करने के लिए एक ऐसा पार्टनर चाहिए जो मेरे स्टैंडर्ड को मैच करे।

 राधिका अपने आप में किसी अप्सरा से कम नहीं थी। अट्ठाइस साल की उम्र, गज़ब का गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर की कुर्सी। राधिका की जिंदगी किसी परफेक्ट मैगज़ीन कवर जैसी थी। उसे खुद से, अपनी खूबसूरती से और अपनी कामयाबी से बेइंतहा प्यार था। लेकिन उसका यही प्यार उसके अंदर एक ऐसा घमंड पैदा कर चुका था, जिसने उसकी आँखों पर एक मोटा पर्दा डाल दिया था। उसके लिए दुनिया में हर चीज़ उसके ‘स्टैंडर्ड’ की होनी चाहिए थी, खासकर वो इंसान जिसे उसका जीवनसाथी बनना था।

राधिका की माँ, सुलोचना जी, पिछले तीन सालों से अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश में थीं। हर सुबह उनका दिन मैट्रीमोनियल साइट्स खंगालने से शुरू होता और हर रात किसी न किसी रिश्तेदार को फोन लगाकर किसी अच्छे लड़के की पूछताछ करने पर खत्म होता। लेकिन सुलोचना जी की हर कोशिश पर राधिका का घमंड पानी फेर देता। कोई लड़का अगर अच्छी नौकरी वाला होता, तो राधिका उसकी लंबाई में कमी निकाल देती। कोई देखने में अच्छा होता, तो वह उसके परिवार के रहन-सहन को ‘मिडिल क्लास’ बताकर रिजेक्ट कर देती।

“राधिका बेटा, देख शर्मा जी ने अपने भतीजे की फोटो भेजी है। लड़का चार्टर्ड अकाउंटेंट है, अपना खुद का ऑफिस है और परिवार भी बहुत सुलझा हुआ है,” सुलोचना जी ने उम्मीद भरी नज़रों से फोन की स्क्रीन राधिका की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

राधिका ने अपने आईपैड से नज़रें हटाए बिना एक तिरछी निगाह उस तस्वीर पर डाली और मुँह बनाते हुए बोली, “मम्मा, सीरियसली? इसके बाल देखे हैं आपने? अभी से झड़ रहे हैं। और इसकी ड्रेसिंग सेंस! उफ़, लगता है जैसे नब्बे के दशक का कोई क्लर्क हो। मुझे नहीं करनी ऐसे किसी इंसान से शादी जिसे देखकर मुझे अपने दोस्तों के सामने शर्मिंदगी महसूस हो।”

“बेटा, इंसान की सीरत देखी जाती है, सूरत नहीं। तुम अट्ठाइस की हो चुकी हो, लड़कियां तुम्हारी उम्र में दो बच्चों की माँ बन जाती हैं। जवानी और यह रूप हमेशा नहीं रहने वाला। कल को जब उम्र ढलेगी, तो कोई अच्छा लड़का नहीं मिलेगा,” सुलोचना जी ने समझाते हुए कहा।

“ओह मम्मा! प्लीज आप अपने ये पुराने ज़माने के डायलॉग अपने पास रखिए। मैं राधिका हूँ। मेरे पीछे लड़कों की लाइन लगी है। मैं जब चाहूँ, जिससे चाहूँ शादी कर सकती हूँ। मुझे कोई जल्दी नहीं है, लेकिन जो भी मेरा पति होगा, वो लुक्स और स्टेटस में मेरे बराबर का होना चाहिए,” राधिका ने अपने बालों को झटकते हुए बड़े ही गुरूर से कहा।

कुछ हफ़्तों बाद सुलोचना जी के एक दूर के रिश्तेदार ने एक ऐसा रिश्ता भेजा, जिसे देखकर राधिका भी एक बार के लिए रुक गई। लड़के का नाम अनिरुद्ध था। वह शहर के एक बहुत बड़े अस्पताल में न्यूरोसर्जन था। तस्वीर में अनिरुद्ध एक महँगे सूट में खड़ा था, हल्की दाढ़ी और चश्मे में वह काफी प्रभावशाली लग रहा था। राधिका को लगा कि शायद यह इंसान उसके ‘परफेक्ट मैच’ के क्राइटेरिया में फिट बैठ सकता है। उसने माँ से कह दिया कि वह अनिरुद्ध से एक बार मिलकर देखना चाहेगी। सुलोचना जी की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने तुरंत लड़के वालों से बात की और अगले ही रविवार को दोनों के मिलने का कार्यक्रम एक महँगे फाइव स्टार होटल की कॉफी शॉप में तय हो गया।

रविवार की शाम राधिका ने खुद को सजाने में घंटों लगा दिए। उसने एक महँगी डिज़ाइनर ड्रेस पहनी, परफ़ेक्ट मेकअप किया और अपने एटीट्यूड को अपने डिज़ाइनर हैंडबैग की तरह साथ लेकर होटल पहुँच गई। वह कॉफी शॉप में अपनी रिज़र्व की हुई टेबल पर बैठी इंतज़ार कर रही थी कि तभी एक साधारण सी नीली शर्ट और डार्क ट्राउज़र पहने एक शख़्स उसकी टेबल के पास आकर रुका।

“एक्सक्यूज़ मी, क्या आप मिस राधिका हैं? मैं अनिरुद्ध हूँ,” उस शख़्स ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

राधिका ने ऊपर से नीचे तक अनिरुद्ध को देखा और उसके चेहरे के भाव ऐसे बदल गए जैसे उसने किसी अजूबे को देख लिया हो। तस्वीर में लाइट और एडिटिंग की वजह से अनिरुद्ध का रंग साफ़ लग रहा था, लेकिन असल में अनिरुद्ध का रंग काफी साँवला था। उसके कपड़े बिल्कुल साधारण थे और उसमें वह ‘ग्लैमर’ बिल्कुल नहीं था जिसकी राधिका ने उम्मीद की थी।

“तुम… तुम अनिरुद्ध हो?” राधिका लगभग अपनी कुर्सी से उठते हुए चिल्ला सी पड़ी। उसकी तेज़ आवाज़ सुनकर आस-पास बैठे कुछ लोग उन्हें देखने लगे।

“जी, क्या कोई परेशानी है?” अनिरुद्ध ने बहुत ही शांत स्वर में पूछा। वह राधिका के इस अजीब व्यवहार से थोड़ा असहज हो गया था।

“परेशानी? परेशानी तो बहुत बड़ी है! तुमने अपनी जो फोटो भेजी थी, उसमें तो तुम काफी स्मार्ट और फेयर लग रहे थे। असलियत में तो तुम बहुत ही… आई मीन, तुम्हारा कॉम्प्लेक्शन कितना डार्क है। और तुम्हारे कपड़े, ऐसा लग रहा है जैसे तुम किसी सरकारी दफ्तर से सीधे यहाँ आ गए हो,” राधिका ने बिना इस बात की परवाह किए कि अनिरुद्ध को कैसा लगेगा, बेहद बेरुखी से शब्दों के तीर छोड़ दिए।

अनिरुद्ध एक पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ इंसान था। उसने राधिका की इस बद्तमीज़ी पर अपना आपा नहीं खोया, बल्कि बहुत ही गरिमा के साथ जवाब दिया, “मिस राधिका, फोटो स्टूडियो वाले अक्सर तस्वीरों को थोड़ा बहुत एडिट कर देते हैं, लेकिन मैंने कभी अपने रंग को छिपाने की कोशिश नहीं की। मैं एक डॉक्टर हूँ, मेरी पहचान मेरा काम और मेरी इंसानियत है, मेरा रंग नहीं।”

“वेल, तुम्हारी इंसानियत तुम्हारे काम आए। मुझे तो अपने साथ खड़ा करने के लिए एक ऐसा पार्टनर चाहिए जो मेरे स्टैंडर्ड को मैच करे। तुम और मैं एक साथ बिल्कुल बेमेल लगेंगे। आई एम सॉरी, लेकिन मैं अपना समय ऐसे इंसान पर बर्बाद नहीं कर सकती जो मेरे क्राइटेरिया के आस-पास भी न फटकता हो। मेरा इस मीटिंग में आना ही एक गलती थी,” राधिका ने अत्यंत तिरस्कार भरे लहज़े में कहा और अपना पर्स उठाकर जाने के लिए मुड़ी।

तभी अनिरुद्ध की गंभीर आवाज़ ने राधिका के कदमों को रोक दिया। “एक मिनट मिस राधिका।”

राधिका पलटी, उसके चेहरे पर अभी भी वही घमंड था।

अनिरुद्ध ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे कोई अफ़सोस नहीं है कि आपने मुझे रिजेक्ट कर दिया। बल्कि, मुझे खुशी है कि मुझे शादी से पहले ही आपकी असलियत पता चल गई। आपको अपनी इस बाहरी खूबसूरती और अपनी कामयाबी का बहुत गहरा घमंड है। लेकिन याद रखिएगा, चेहरे का रंग और यह रूप समय की पहली आंधी में उड़ जाता है। जिस दिन आपके चेहरे पर झुर्रियां पड़ेंगी, उस दिन आपका यह डिज़ाइनर आईना आपको आपकी असलियत दिखाएगा। आप एक जीवनसाथी नहीं, बल्कि अपने लिए एक ‘शोपीस’ ढूंढ रही हैं। जो इंसान दूसरों के रंग और रूप का इस तरह खुलेआम मज़ाक उड़ा सकता है, वह अंदर से कितना बदसूरत होगा, इसका मुझे आज अंदाज़ा हो गया। मैं दुआ करूँगा कि आपका यह घमंड सलामत रहे, क्योंकि इसके अलावा आपके पास और कुछ है भी नहीं।”

अनिरुद्ध की बातें राधिका के अहम पर किसी हथौड़े की तरह लगीं, लेकिन उसने अपनी झेंप छिपाते हुए एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसी और वहाँ से पैर पटकते हुए निकल गई। घर आकर उसने अपनी माँ पर सारा गुस्सा निकाल दिया और साफ कह दिया कि आइंदा से वह किसी भी ‘थर्ड क्लास’ लड़के से नहीं मिलेगी।

समय के पंख लग गए। राधिका अपने करियर की ऊंचाइयों को छूती रही और साथ ही साथ रिश्तों को ठुकराने का उसका सिलसिला भी चलता रहा। कभी कोई उसे अपनी हाइट का नहीं लगता, तो कभी किसी का सैलरी पैकेज उसके ईगो को चोट पहुँचाता। देखते ही देखते राधिका ने तीस की उम्र पार कर ली। धीरे-धीरे सुलोचना जी के पास आने वाले रिश्तों की संख्या कम होने लगी। अब जो रिश्ते आते, वे या तो विधुर होते, या फिर तलाकशुदा, या ऐसे लड़के जिनकी उम्र पैंतीस-चालीस के पार जा चुकी होती।

राधिका का घमंड अभी भी कम नहीं हुआ था। वह हर बार यही सोचती कि वह इतनी खूबसूरत है, वह किसी से भी समझौता क्यों करे। लेकिन धीरे-धीरे हकीकत उसके दरवाज़े पर दस्तक देने लगी थी। उसकी सहेलियां, जो शायद उससे कम खूबसूरत थीं, वे सभी अपने-अपने घरों में सेटल हो चुकी थीं। वीकेंड्स पर अब कोई राधिका के साथ क्लब या पार्टी में जाने के लिए खाली नहीं होता था, क्योंकि सब अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में व्यस्त थे।

बत्तीस, तैंतीस, और फिर पैंतीस। राधिका ने पैंतीस का आंकड़ा छू लिया था। अब स्थिति यह हो गई थी कि सुलोचना जी अगर किसी अच्छे घर में राधिका का रिश्ता लेकर जातीं, तो सामने से लोग यह कहकर मना कर देते कि, “लड़की की उम्र बहुत ज़्यादा है, और हमने सुना है कि वह बहुत अड़ियल स्वभाव की है। हमें अपने घर के लिए कोई मॉडल नहीं, बल्कि एक बहू चाहिए जो घर को जोड़कर रखे।”

राधिका के अपने ही बुने हुए गुरूर के जाल ने अब उसे कसना शुरू कर दिया था। उसका घर लौटना अब उसे सुकून नहीं देता था। एक समय था जब वह आईने के सामने घंटों खुद को निहारती थी, लेकिन अब उसी आईने में उसे अपनी आँखों के नीचे उभरते हुए हल्के काले घेरे और अकेलेपन की उदासी नज़र आने लगी थी। माँ-बाप भी अब बूढ़े हो चले थे और उनकी आँखों में अपनी बेटी के भविष्य को लेकर हमेशा एक दर्द तैरता रहता था।

एक दिन, राधिका अपनी कंपनी की तरफ से एक बहुत बड़ी मेडिकल कॉन्फ्रेंस को ऑर्गेनाइज़ कर रही थी। शहर के कई बड़े डॉक्टर्स और वीआईपी मेहमान वहां आए हुए थे। राधिका स्टेज के पास खड़ी होकर सब कुछ सुपरवाइज़ कर रही थी, तभी मंच से उद्घोषक ने एक नाम पुकारा—”और अब मैं मंच पर आमंत्रित करना चाहूँगा, इस शहर के सबसे बेहतरीन और सबसे कम उम्र के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट, डॉ. अनिरुद्ध को, जिन्हें उनकी शानदार सेवाओं के लिए आज लाइफटाइम अचीवमेंट का शुरुआती अवार्ड दिया जा रहा है।”

नाम सुनते ही राधिका के कान खड़े हो गए। उसने पलटकर देखा। वही साधारण सा दिखने वाला अनिरुद्ध आज एक बेहद शानदार और गरिमामयी व्यक्तित्व का मालिक लग रहा था। उसके साँवले रंग पर एक अजीब सा तेज़ था। पूरा हॉल उसके सम्मान में तालियां बजा रहा था। अनिरुद्ध ने मंच पर जाकर अवार्ड लिया और माइक पर बोलते हुए कहा, “मैं अपनी इस कामयाबी का पूरा श्रेय अपनी पत्नी पल्लवी को देना चाहूँगा, जिसने हर कदम पर मुझे यह अहसास दिलाया कि मैं दुनिया का सबसे खास इंसान हूँ।”

राधिका की नज़रें पहली पंक्ति में बैठी उस महिला पर गईं। पल्लवी देखने में बेहद साधारण सी, एक आम भारतीय नारी लग रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर जो संतोष, जो ख़ुशी और जो चमक थी, वो राधिका के लाखों रुपये के डिज़ाइनर मेकअप से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। पल्लवी की गोद में एक प्यारी सी बच्ची भी थी जो ताली बजा रही थी।

मंच से उतरने के बाद, जब अनिरुद्ध अपनी पत्नी और बच्ची के साथ बाहर की तरफ जा रहा था, तब उसकी नज़र अचानक राधिका पर पड़ी। राधिका वहीं बुत बनी खड़ी थी। अनिरुद्ध कुछ पल के लिए रुका। उसने एक बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ राधिका को देखा, हल्का सा सिर हिलाकर अभिवादन किया और अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गया। उसकी उस एक मुस्कान में न तो कोई ताना था और न ही कोई गुस्सा, बस एक सुकून था।

राधिका वहीं खड़ी की खड़ी रह गई। आज उसके महंगे सूट और उसके परफेक्ट फिगर पर अनिरुद्ध की वह साधारण सी ज़िंदगी भारी पड़ गई थी। राधिका को अनिरुद्ध के वो शब्द याद आ गए जो उसने सालों पहले कॉफी शॉप में कहे थे—”आपका यह डिज़ाइनर आईना आपको आपकी असलियत दिखाएगा।”

आज राधिका सैंतीस साल की हो चुकी थी। उसके बैंक अकाउंट में लाखों रुपये थे, एक शानदार गाड़ी थी, और एक बहुत बड़ी पोस्ट थी, लेकिन जब वह रात को अपने आलीशान फ्लैट में लौटती, तो वहाँ उसका इंतज़ार करने वाला कोई नहीं होता था। उसका घमंड, जो किसी समय उसका सबसे बड़ा हथियार हुआ करता था, आज उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन चुका था। उसने अपनी झूठी शान और रूप के अहंकार में एक ऐसा हीरा ठुकरा दिया था, जो शायद उसकी पूरी ज़िंदगी को रोशन कर सकता था। आज राधिका अविवाहित है और अकेली है, क्योंकि जब उसके पास समय था तब उसने रिश्तों को अपनी सुंदरता के तराजू पर तौला था, और आज जब समाज उसे तौलता है, तो वह हर पैमाने पर खुद को बहुत अकेला और खाली पाती है।

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