पछतावा

रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरे घर में खामोशी छा गई थी। सास-ससुर को दवाइयां देकर सुलाने, ननद और देवर के नखरे उठाकर उन्हें मनपसंद भोजन कराने, और अंत में पति को खाना परोसने के बाद, मीरा ने रसोई समेटी थी। हमेशा की तरह बर्तन मांजने के बाद जो थोड़ा-बहुत ठंडा खाना बचा था, उसे निगल कर वह बेडरूम में आई। अपनी सूती साड़ी के पल्लू से गीले हाथ पोंछते हुए वह थके हारे कदमों से बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसके पैरों में दर्द से टीस उठ रही थी। सामने रोहन अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहा था। मीरा ने हिम्मत जुटाकर बहुत ही धीमी आवाज़ में एक छोटी सी फरमाइश की, “रोहन, इस रविवार क्या हम कुछ देर के लिए बाहर जा सकते हैं? सिर्फ हम दोनों… किसी पास के मंदिर या बस यूं ही टहलने। बहुत दिन हो गए घर की चारदीवारी से बाहर निकले हुए।”

मीरा की यह बात सुनते ही रोहन ने झुंझलाते हुए फोन बिस्तर पर पटक दिया और तीखे स्वर में बोला, “मीरा, तुम्हारा तो हर महीने का यही ड्रामा हो गया है! दिन भर ऑफिस में खटकर आता हूँ, रविवार को एक दिन आराम का मिलता है, उसमें भी तुम्हें बाहर घूमने जाना है। तुम औरतों को बस अपनी ही पड़ी रहती है।”

रोहन के ये शब्द किसी तीर की तरह मीरा के सीने में चुभ गए। पूरे दिन की शारीरिक थकान से ज्यादा उसे इस मानसिक चोट ने दर्द दिया। उसने थोड़े नखरे और गहरी उदासी भरे लहजे में जवाब दिया, “क्या रोज़-रोज़ का ड्रामा? मैंने पिछली बार कब कहा था आपसे? शादी के इन चार सालों में शायद उंगलियों पर गिनने लायक ही हम दोनों साथ बाहर गए होंगे। आज महीनों बाद अपने लिए एक पल मांगा है, और वो भी आपको ड्रामा लग रहा है?” इतना कहकर मीरा ने करवट ली और अपनी आँखें मूंद लीं। लेकिन उन बंद आँखों के किनारों से बहते गर्म आँसू तकिये को भिगो रहे थे।

रोहन ने लाइट बंद की और सो गया। उसे जरा भी अहसास नहीं हुआ कि उसके कहे गए उन चंद कठोर शब्दों ने मीरा के अंदर के उस इंसान को कितनी गहरी चोट पहुंचाई है, जो हर दिन बिना किसी शिकायत के इस घर को अपना खून-पसीना सींचकर चलाती है।

अगली सुबह हमेशा की तरह मीरा के लिए सुबह पांच बजे शुरू हो गई। रोहन जब सोकर उठा, तो उसे अपने बिस्तर के पास गर्म चाय मिली। बाहर आंगन में मीरा अपनी सास के घुटनों में तेल की मालिश कर रही थी, क्योंकि ठंड के कारण उनका दर्द बढ़ गया था। उधर रसोई से देवर की आवाज़ आ रही थी कि उसे नाश्ते में कुछ अलग चाहिए, और ननद अपने कॉलेज जाने के लिए कपड़े प्रेस न होने की शिकायत कर रही थी। मीरा एक मशीन की तरह हर किसी की जरूरत पूरी करने में दौड़ रही थी।

रोहन तैयार होकर ऑफिस निकल गया। लेकिन आज दिन भर उसे काम में मन नहीं लगा। उसे बार-बार रात वाली बात याद आ रही थी। मीरा की वो नम आँखें और उसका वो वाक्य— ‘आज महीनों बाद अपने लिए एक पल मांगा है’। रोहन को अचानक एहसास हुआ कि मीरा ने पिछले कुछ महीनों में कभी अपने लिए एक नई साड़ी, कोई गहना या मायके जाने की जिद नहीं की थी। वह हर रोज सुबह पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक सिर्फ इस परिवार के लिए खटती है।

दोपहर के वक्त रोहन किसी फाइल के काम से वापस घर लौटा। उसने सोचा था कि मीरा शायद दोपहर में आराम कर रही होगी। लेकिन जब उसने दरवाजा खोला, तो देखा कि मीरा तेज धूप में छत पर गेहूं सुखा रही थी। उसका चेहरा पसीने से लाल हो चुका था। रोहन चुपचाप नीचे रसोई में गया। उसने देखा कि सिंक में बर्तनों का अंबार लगा है और मीरा के लिए जो रोटी बची थी, वह एक किनारे बिना ढकी सूखी पड़ी है। रोहन का दिल धक्क से रह गया। उसने अपनी मां से पूछा, “मां, मीरा ने खाना नहीं खाया?”

मां ने सहजता से कहा, “अरे कहां बेटा! आज तुम्हारी बहन की सहेलियां आ गई थीं, तो मीरा ने उन सबके लिए पकौड़े बनाए। फिर तुम्हारे बाबूजी की तबीयत थोड़ी ढीली हो गई, तो उनके लिए काढ़ा बनाने में लग गई। अब तक तो उसे फुरसत ही नहीं मिली है।”

यह सुनते ही रोहन को खुद पर गहरी ग्लानि महसूस हुई। उसे अपनी उस रात की बात पर शर्म आने लगी। जिस औरत का हर दिन, हर पल सिर्फ उसके परिवार को समर्पित था, उसके कुछ पल मांगने को उसने ‘ड्रामा’ कह दिया था। रोहन ने समझ लिया था कि एक औरत घर की बुनियाद होती है, लेकिन अक्सर हम उसी बुनियाद को सबसे ज्यादा नजरअंदाज कर देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि वो भी एक इंसान है, उसकी भी भावनाएं हैं, उसकी भी कुछ खामोश इच्छाएं हैं जो रसोई के धुएं और जिम्मेदारियों के शोर में कहीं दब कर रह जाती हैं।

शाम को जब रोहन ऑफिस से लौटा, तो उसके हाथ में एक छोटा सा पैकेट था। घर का माहौल शांत था। रात को जब सभी खाना खाकर सो गए और मीरा हमेशा की तरह अपने थके कदमों से बेडरूम में आई, तो उसने देखा कि बिस्तर पर एक बहुत ही सुंदर लाल रंग की साड़ी रखी हुई है। यह बिल्कुल वैसी ही साड़ी थी जैसी मीरा ने एक बार बाजार में देखकर पसंद की थी, लेकिन पैसे बचाने के लिए ली नहीं थी।

मीरा हैरानी से साड़ी को देख ही रही थी कि रोहन ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। उसकी आँखों में पछतावा था। “मीरा, मुझे माफ कर दो,” रोहन ने रुंधे हुए गले से कहा। “कल रात मैंने जो कहा, वो मेरी सबसे बड़ी भूल थी। मैं ऑफिस की थकान देखता हूं, लेकिन तुम्हारी उस थकान को कभी नहीं देख पाया जिसकी कोई छुट्टी नहीं होती। तुम इस घर की धड़कन हो, मीरा। और अगर मेरी धड़कन अपने लिए कुछ वक्त मांगती है, तो वो ड्रामा नहीं, उसका हक है। इस रविवार हम पूरा दिन साथ बिताएंगे, और तुम यही साड़ी पहनोगी।”

मीरा की आँखों से छलकते आंसू इस बार दुख के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। उसने साड़ी को सीने से लगा लिया। कभी-कभी एक औरत को सोने-चांदी के गहनों की दरकार नहीं होती, उसे सिर्फ अपनेपन के दो मीठे बोल और उस सम्मान की जरूरत होती है, जो उसकी खामोश तपस्या को एक सार्थक नाम दे सके।

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लेखक : राजेन्दर सक्सेना

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