रघुनाथ जी ने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए उसे बीच में ही टोक दिया। “नहीं बेटी, गलती तुम्हारी नहीं थी। तुमने तो अपने पिता को दिया हुआ वादा आठ सालों तक बहुत ही खूबसूरती से निभाया। गलती मेरी थी जो मैं ये समझ नहीं पाया कि प्यार से सींचा हुआ पौधा जब बड़ा होता है, तो उसे फैलने के लिए बड़े गमले की ज़रूरत होती है। अब तुम खुले आसमान में साँस लो।”
“मीरा, ये मेरे कुछ पुराने ऊनी शॉल और दो भारी रज़ाइयाँ हैं। इन्हें अपनी अलमारी में किसी तरह सहेज कर रख लो। बाहर दीमक लग सकती है।” अपनी सास सुमित्रा जी के हाथों से वह भारी गट्ठर लेते हुए मीरा ने बस एक फीकी सी मुस्कान दी और अपने कमरे की ओर मुड़ गई।
कमरे के दरवाज़े पर खड़ी होकर मीरा ने एक गहरी साँस ली। सामने का नज़ारा ऐसा था जैसे किसी कबाड़ी वाले ने अपना सारा सामान एक छोटी सी जगह में ठूंस दिया हो। अलमारी में एक इंच की भी जगह नहीं थी। डबल बेड का बॉक्स पहले ही सर्दियों के कपड़ों, पुराने बर्तनों और कभी काम न आने वाले साज़ो-सामान से खचाखच भरा हुआ था। कमरे के एक कोने में बच्चों के खिलौनों का ढेर था, तो दूसरे कोने में एक छोटी सी मेज़ पर उसके पति रोहन का लैपटॉप और ऑफिस की फाइलें पड़ी थीं।
मीरा इस घर की छोटी बहू थी। वह एक बहुत ही संपन्न और एकल परिवार से इस संयुक्त परिवार का हिस्सा बनी थी, वह भी अपनी मर्जी से। रोहन के साथ उसकी लव मैरिज थी। आज उनकी शादी को आठ साल हो चुके थे और उनके दो प्यारे बच्चे भी थे। इस घर में रोहन के बड़े भाई विकास और जेठानी कविता भी अपने दो बच्चों के साथ रहते थे। सास-ससुर बुजुर्ग ज़रूर थे, लेकिन शरीर से पूरी तरह स्वस्थ और घर के कामों में सक्रिय थे।
बाहर से देखने पर यह परिवार किसी आदर्श तस्वीर जैसा लगता था। घर का वातावरण बिल्कुल शांत था, हर सदस्य बड़ों का सम्मान करता था और किसी की ऊँची आवाज़ घर के बाहर तो क्या, कमरों के बाहर भी नहीं जाती थी। ससुर रघुनाथ जी को अपना संयुक्त परिवार अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा था। उन्हीं की जिद और उसूलों के चलते दोनों बेटे एक साथ रहने को मजबूर थे, जबकि दोनों की नौकरियाँ बहुत अच्छी थीं और वे आसानी से अपना अलग और बड़ा घर ले सकते थे।
रघुनाथ जी अक्सर अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सामने सीना तानकर अपने संस्कारों की चर्चा करते थे। “देखिए, हमारे घर में रुपए-पैसे की कोई कमी नहीं है। दोनों बेटों के पास शानदार नौकरियाँ हैं, मेरी अपनी अच्छी-खासी पेंशन आती है। लेकिन हमारा परिवार आज भी एक ही रसोई का बना खाना खाता है। हमारा परिवार सुखी, संस्कारी और मिलनसार है। मेरे बच्चे बहुत आज्ञाकारी हैं, जो मेरी हर बात का मान रखते हैं। आज के ज़माने में ऐसा परिवार कहाँ देखने को मिलता है?”
मीरा जब इस परिवार का हिस्सा बनने वाली थी, तो उसके पिता ने उसे बहुत समझाया था। मीरा के पिता जानते थे कि रघुनाथ जी का घर बहुत छोटा है और परिवार बहुत बड़ा। उन्होंने मीरा से कहा था, “देखो बेटी, रघुनाथ जी का परिवार बहुत बड़ा है और वे एक छोटे से घर में रहते हैं। वे उसूलों के पक्के इंसान हैं। छोटे घर में रहते हुए भी उन्होंने अपने घर को एक धागे में पिरो रखा है। तुम बचपन से एक बड़े घर में, अपनी पूरी आज़ादी और निजता के साथ रही हो। तुमने कभी कोई परेशानी नहीं झेली। उस संयुक्त परिवार में तुम्हें हर कदम पर समझौता करना होगा। तुम्हारी एक हल्की सी नासमझी या शिकायत उस परिवार की शांति को बिखेर सकती है। रघुनाथ जी अपने जीते-जी अपने बेटों को कभी अलग नहीं करेंगे। क्या तुम उस घुटन में रह पाओगी?”
लेकिन उस उम्र में प्यार का खुमार ही कुछ और होता है। तब मीरा ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था, “पिताजी, मैं रोहन से प्यार करती हूँ। उसके लिए और उसके परिवार के लिए मैं हर समझौता करने को तैयार हूँ। आप मेरी चिंता मत कीजिए, मैं सब संभाल लूँगी।”
आज, आठ साल बाद, हाथ में रज़ाइयों का गट्ठर लिए मीरा को अपने पिता की एक-एक बात याद आ रही थी। वह अपनी सास के दिए हुए उस शॉल और रज़ाइयों को रखने की जगह तलाश रही थी। उसके हिस्से में जो एक कमरा आया था, वह पहले ही ठसाठस भरा था। पति-पत्नी और दो बच्चों की ज़रूरत का सारा सामान उसी एक कमरे में समेटना पड़ता था।
रोहन उसी कमरे में बैठा अपना कुछ काम कर रहा था। मीरा से अब रहा नहीं गया। वह रज़ाइयों का भारी गट्ठर बिस्तर पर पटकते हुए, खीझते हुए बोली, “रोहन, तुम ही बताओ मैं इसे कहाँ रखूँ? कमरे में एक सूत भर भी जगह नहीं बची है। अलमारी का एक दरवाज़ा खोलो तो अंदर से चार चीज़ें बाहर आकर सिर पर गिरती हैं। हद है! मम्मी जी कुछ समझती ही क्यों नहीं हैं? जो चीज़ें दस-दस साल से इस्तेमाल नहीं हुईं, उन्हें भी सहेज कर रखने की क्या ज़रूरत है?”
रोहन ने अपनी फाइल बंद की और मीरा के पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीमे स्वर में बोला, “मीरा, शांत हो जाओ। कोई बाहर सुन लेगा तो व्यर्थ में बुरा मान जाएगा। तुम्हें तो पता है ना बाबूजी का स्वभाव। उन्हें पुरानी चीज़ों से लगाव है और वो चाहते हैं कि हम सब मिल-जुलकर रहें।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए। वह फुसफुसाते हुए लेकिन एक भारी दर्द के साथ बोली, “रोहन, मुझे इस परिवार से, मम्मी जी या बाबूजी से कोई शिकायत नहीं है। वे बहुत अच्छे हैं। लेकिन मिल-जुलकर रहने का मतलब यह तो नहीं कि हम सब एक डिब्बे में बंद होकर साँस लेना ही भूल जाएँ? क्या तुम्हें नहीं दिखता कि बच्चे बड़े हो रहे हैं? उन्हें पढ़ने के लिए एक अलग और शांत जगह चाहिए। कल रात हमारा बेटा अपने खिलौनों के बॉक्स से टकराकर गिर गया क्योंकि उसे रखने की जगह ही नहीं है। जेठानी जी भी दिन भर रसोई और अपने छोटे से कमरे के बीच पिसती रहती हैं, बस बाबूजी के सम्मान के डर से कुछ नहीं बोलतीं। हम दोनों पति-पत्नी आठ सालों में कभी भी खुलकर हँस या रो नहीं पाए हैं क्योंकि दीवारें बहुत पतली हैं। क्या इसी घुटन का नाम संस्कार है?”
रोहन के पास मीरा के सवालों का कोई जवाब नहीं था। वह जानता था कि मीरा जो कह रही है, वह शत-प्रतिशत सच है। एक मध्यवर्गीय परिवार में जहाँ पिता का आदेश पत्थर की लकीर होता है, वहाँ बेटे अक्सर अपने मन की बात कहने से डरते हैं।
तभी बाहर दालान से कुछ गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा और रोहन भागकर बाहर आए। उनका सात साल का बेटा आरव, जो हॉल में रखे एक पुराने दीवान पर चढ़कर ऊपर शेल्फ से अपनी किताब निकालने की कोशिश कर रहा था, संतुलन बिगड़ने से नीचे गिर गया था। उसके माथे पर गहरी चोट आई थी और खून बह रहा था।
घर में कोहराम मच गया। रघुनाथ जी और सुमित्रा जी भी दौड़कर आए। जेठानी कविता ने तुरंत बर्फ लाकर आरव के माथे पर लगाई। आरव दर्द से बुरी तरह रो रहा था। रोहन तुरंत आरव को उठाकर पास के अस्पताल ले गया।
कुछ घंटों बाद जब आरव के माथे पर पट्टी बंधवाकर रोहन और मीरा घर लौटे, तो घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। मीरा अपने कमरे में आरव को सुला रही थी। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। आज उसकी ममता का बाँध टूट गया था। रोहन कमरे में आया तो मीरा रोते हुए बोली, “रोहन, आज मेरे बच्चे के सिर पर चोट लगी है, कल को क्या होगा? हम कब तक इस झूठी शान और संस्कारों के नाम पर इस घुटन को सहते रहेंगे? क्या हम इतने असहाय हैं कि अपने बच्चों को एक सुरक्षित और खुला माहौल नहीं दे सकते? बाबूजी के उसूलों ने हमें इस घर में कैदी बना दिया है। मैं थक गई हूँ रोहन, मैं सच में टूट गई हूँ।”
मीरा को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि दरवाज़े के ठीक बाहर खड़े रघुनाथ जी उसकी एक-एक बात सुन रहे थे। आरव का हाल जानने के लिए वे कमरे की तरफ आए थे, लेकिन मीरा की बातें सुनकर उनके कदम वहीं ठिठक गए।
शुरुआत में रघुनाथ जी को मीरा की बातों पर गुस्सा आया। उनका पुरुषवादी अहंकार आहत हुआ। लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने मीरा के दर्द भरे शब्दों को सुना, उनके मन में एक अजीब सी हलचल होने लगी। “क्या मेरे उसूल सच में मेरे बच्चों का दम घोंट रहे हैं?” यह सवाल उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बजने लगा। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी छोटे से घर में बिता दी थी। उन्हें कभी जगह की कमी महसूस नहीं हुई, क्योंकि उनका ज़माना अलग था। लेकिन आज, जब उन्होंने अपने पोते को उस भीड़-भाड़ के कारण चोटिल होते देखा और अपनी उस बहू का दर्द सुना, जिसने कभी भी उनसे शिकायत नहीं की थी, तो उनका नज़रिया बदलने लगा।
रघुनाथ जी रात भर सो नहीं पाए। वे आँगन में बैठे तारों को देखते रहे। उन्हें एहसास हुआ कि एक छत के नीचे ज़बरदस्ती रहना ही ‘संयुक्त परिवार’ नहीं होता। अगर उस छत के नीचे रहने वालों के दिलों में घुटन पैदा हो जाए, तो वो दीवारें दरकने में ज्यादा समय नहीं लगता। उन्होंने अपनी झूठी शान को अपने बच्चों की खुशियों से तौलकर देखा, तो उनका गुरूर हार गया।
अगली सुबह, नाश्ते की मेज़ पर घर का माहौल काफी तनावपूर्ण था। किसी ने भी ठीक से बात नहीं की। तभी रघुनाथ जी ने अपना गला साफ किया और एक गहरी साँस लेते हुए बोले, “विकास, रोहन, और मेरी दोनों बहुओं, मुझे तुम सबसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
सब लोग सहम गए। मीरा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसे लगा कि कल रात उसकी बातें बाबूजी ने सुन ली हैं और आज इस घर में कोई बड़ा तूफान आने वाला है।
लेकिन रघुनाथ जी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। उन्होंने एक फाइल मेज़ पर रखी और कहा, “रोहन, विकास… तुम दोनों काफी अच्छा कमाते हो। मैंने कल रात हमारी पुरानी ज़मीन के खरीदार से बात की है। उस ज़मीन को बेचकर जो पैसे आएंगे, उससे हम इस घर के ठीक बगल वाली गली में एक बड़ा, चार बेडरूम का फ्लैट लेंगे। विकास और कविता अपने बच्चों के साथ उस नए घर में रहेंगे, और रोहन और मीरा इस घर के ऊपर वाले खाली हिस्से में अपने लिए दो कमरे और बनवाएंगे।”
यह सुनकर घर का हर सदस्य हक्का-बक्का रह गया। सुमित्रा जी ने काँपते हुए स्वर में पूछा, “ये आप क्या कह रहे हैं जी? हमारा परिवार टूट जाएगा। लोग क्या कहेंगे कि शर्मा जी के बेटे अलग हो गए?”
रघुनाथ जी ने अपनी पत्नी की ओर देखकर एक बेहद सौम्य मुस्कान के साथ कहा, “नहीं सुमित्रा, हमारा परिवार टूट नहीं रहा है, बल्कि और भी मजबूत हो रहा है। दीवारें अलग होने से दिल अलग नहीं होते। असली अलगाव तब होता है जब लोग एक साथ रहते हुए भी अंदर ही अंदर एक-दूसरे से नफरत करने लगें या घुटने लगें। बच्चों को अब अपनी जगह चाहिए, उड़ने के लिए आसमान चाहिए। हमने उन्हें संस्कार दिए हैं, पिंजरे नहीं। मैं अपने जीते-जी इस परिवार के प्यार को दीवारों के बोझ तले दबकर मरते हुए नहीं देख सकता।”
मीरा की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह अपनी जगह से उठी और सीधे रघुनाथ जी के पैरों में गिर पड़ी। “बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने गुस्से में…”
रघुनाथ जी ने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए उसे बीच में ही टोक दिया। “नहीं बेटी, गलती तुम्हारी नहीं थी। तुमने तो अपने पिता को दिया हुआ वादा आठ सालों तक बहुत ही खूबसूरती से निभाया। गलती मेरी थी जो मैं ये समझ नहीं पाया कि प्यार से सींचा हुआ पौधा जब बड़ा होता है, तो उसे फैलने के लिए बड़े गमले की ज़रूरत होती है। अब तुम खुले आसमान में साँस लो।”
उस दिन उस घर में जो खुशी और सुकून छाया, वह पिछले आठ सालों में कभी महसूस नहीं किया गया था। रघुनाथ जी का गुरूर टूट चुका था, लेकिन उनके परिवार का प्यार और सम्मान उनके लिए सौ गुना बढ़ गया था। मीरा को समझ आ गया था कि रिश्ते समझौतों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की तकलीफ को समझने से टिकते हैं।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश