सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “अच्छा! तो वहां तेरी ननद आनी चाहिए थी अपनी माँ की सेवा करने के लिए, क्योंकि तू थक गई थी? और यहाँ? यहाँ तू ननद बनकर आई है, तो तेरी भाभी को तेज बुखार में भी तेरी और तेरे बच्चों की गुलामी करनी चाहिए? ये कैसा न्याय है नमिता?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। विशाखा हैरान होकर सास और ननद की बातें सुन रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी सासू माँ उसके लिए अपनी ही बेटी को इतनी बड़ी फटकार लगा रही हैं।
शहर के एक शांत मोहल्ले में सुमित्रा जी का पुश्तैनी मकान था। सुमित्रा जी एक सुलझी हुई और समझदार महिला थीं, जिन्होंने अपने उसूलों पर जिंदगी बिताई थी। उनके घर में उनका बेटा रोहन और बहू विशाखा रहते थे। विशाखा एक बहुत ही शांत, सहनशील और संस्कारी बहू थी। वह घर की हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाती थी। पिछले कुछ दिनों से विशाखा की तबीयत ठीक नहीं थी। उसे वायरल बुखार ने जकड़ रखा था, जिसके कारण उसके शरीर में कमजोरी आ गई थी। फिर भी, वह बिना किसी शिकायत के घर के छोटे-मोटे काम निपटाने की कोशिश करती रहती थी। सुमित्रा जी बार-बार उसे आराम करने की हिदायत देतीं, लेकिन विशाखा को लगता कि अगर वह काम नहीं करेगी तो सासू माँ को तकलीफ होगी।
तभी एक दोपहर, घर के दरवाजे पर एक टैक्सी आकर रुकी। टैक्सी से सुमित्रा जी की बेटी, नमिता उतरी। नमिता की शादी को पाँच साल हो चुके थे और वह एक भरे-पूरे परिवार की बहू थी। उसके साथ उसके दो छोटे बच्चे और ढेर सारा सामान भी था। नमिता का इस तरह अचानक मायके आना सुमित्रा जी और विशाखा दोनों के लिए हैरानी भरा था। विशाखा ने बुखार में तपते हुए भी आगे बढ़कर ननद का स्वागत किया, बच्चों को पानी पिलाया और सामान अंदर रखवाया।
नमिता स्वभाव से थोड़ी चंचल और खुद को हमेशा सही मानने वाली लड़की थी। उसे लगता था कि मायका सिर्फ उसके आराम करने और हुक्म चलाने की जगह है। घर में कदम रखते ही उसने विशाखा को ऊपर से नीचे तक देखा और नाक-भौं सिकोड़ते हुए कहा, “भाभी, घर की क्या हालत बना रखी है? हर जगह जाले और धूल नजर आ रही है। और आप ये कैसे कपड़े पहन कर घूम रही हैं? कोई मेहमान आ जाए तो क्या सोचेगा कि रोहन भइया की पत्नी को सलीका ही नहीं है?”
विशाखा ने अपनी कमजोरी को छिपाते हुए धीमी आवाज में कहा, “दीदी, पिछले चार दिनों से मुझे तेज बुखार था। आज ही थोड़ी हिम्मत जुटाकर उठी हूँ। बस अभी घर समेटना शुरू ही कर रही थी। आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय लाती हूँ।”
नमिता ने सोफे पर पसरते हुए व्यंग्य भरे लहजे में कहा, “अरे रहने दीजिए भाभी, आप रहने दीजिए। आजकल की बहुओं का तो यही नाटक है। मायके वाले आएं तो तुरंत सिरदर्द और बुखार शुरू हो जाता है। मेरी सास को देखिए, साठ साल की उम्र में भी पूरे घर का काम अकेले कर लेती हैं और एक आप हैं कि जवानी में ही चारपाई पकड़ कर बैठ गई हैं। बेचारी मेरी माँ, पता नहीं इस बुढ़ापे में कैसे आप लोगों को झेल रही है।”
विशाखा को ये बातें चुभ तो बहुत रही थीं, लेकिन उसने घर की शांति बनाए रखने के लिए चुप रहना ही बेहतर समझा। वह चुपचाप रसोई में गई और चाय-नाश्ता बनाने लगी।
अगले कुछ दिनों तक घर का माहौल पूरी तरह से बदल गया। नमिता ने घर को मानो किसी होटल में तब्दील कर दिया था। वह सुबह देर से उठती, बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी विशाखा पर डाल देती और दिन भर सोफे पर बैठकर टीवी देखती या फोन पर अपनी सहेलियों से बातें करती। विशाखा, जो अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी, अब न केवल घर का काम कर रही थी बल्कि नमिता और उसके बच्चों की हर फरमाइश पूरी करने में लगी हुई थी। कभी बच्चों के लिए अलग से पकौड़े बन रहे हैं, तो कभी नमिता के लिए खास मसालेदार चाय।
सुमित्रा जी सब कुछ खामोशी से देख रही थीं। वह अपनी बेटी को जानती थीं, लेकिन उन्हें लग रहा था कि शायद नमिता कुछ दिनों के लिए आई है, तो विशाखा भी खुशी-खुशी सब कर लेगी। लेकिन नमिता का रवैया दिन-ब-दिन और भी ज्यादा कटु होता जा रहा था। वह बात-बात पर विशाखा को ताने मारती और सुमित्रा जी के सामने यह साबित करने की कोशिश करती कि विशाखा एक नाकाम बहू है।
एक दिन सुबह-सुबह विशाखा को फिर से तेज बुखार आ गया। उसके सिर में भयानक दर्द था और शरीर टूट रहा था। उसने हिम्मत करके नमिता से कहा, “दीदी, आज मेरी तबीयत बहुत खराब लग रही है। क्या आप आज सुबह का नाश्ता और बच्चों का टिफिन बना देंगी? मम्मी जी की भी पूजा का समय हो गया है, उन्हें भी चाय देनी है।”
यह सुनते ही नमिता का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने रसोई में रखे बर्तन को जोर से स्लैब पर पटकते हुए कहा, “वाह भाभी, वाह! क्या कहने आपके! मैं यहाँ अपने मायके आई हूँ, आराम करने आई हूँ, या आपके हिस्से की रोटियां बेलने आई हूँ? जब से आई हूँ, देख रही हूँ कि आपका काम से जी चुराने का बहाना ही खत्म नहीं होता। मेरी माँ ने क्या इसलिए मेरे भाई की शादी आपसे की थी कि आप बीमार होने का नाटक करके मेरी बूढ़ी माँ और घर आए मेहमानों से काम करवाएं? पता नहीं भइया कैसे आपके साथ निभा रहे हैं। मैं होती तो ऐसा बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करती!”
नमिता की आवाज इतनी तेज थी कि बाहर पूजा कर रही सुमित्रा जी भी सब कुछ सुन रही थीं। विशाखा की आँखों से आंसू बहने लगे। वह बिना कुछ कहे वापस अपने कमरे की तरफ मुड़ने लगी।
तभी सुमित्रा जी रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। उन्होंने विशाखा को हाथ के इशारे से रुकने को कहा और फिर नमिता की तरफ मुड़कर बोलीं, “नमिता, तूने बिल्कुल सही कहा। बहुओं को तो बस काम से जी चुराने का बहाना चाहिए होता है, है ना?”
नमिता को लगा कि उसकी माँ उसका साथ दे रही है। वह सीना तानकर बोली, “हाँ मम्मी, और नहीं तो क्या! देखिए ना, जब से मैं आई हूँ, इनका मुंह फूला हुआ है। ये तो चाहती हैं कि मैं ही इस घर की नौकरानी बन जाऊं। ऐसी बहुओं को तो सीधा करने का तरीका मुझे बहुत अच्छे से आता है।”
सुमित्रा जी धीरे-धीरे चलते हुए नमिता के करीब गईं और बिल्कुल शांत, लेकिन सख्त आवाज में बोलीं, “तुझे सीधा करने का तरीका आता है ना? तो फिर तू यहाँ क्या कर रही है? तू अपनी ससुराल को सीधा क्यों नहीं करती?”
नमिता झेंपते हुए बोली, “मतलब? मम्मी, आप क्या कह रही हैं?”
सुमित्रा जी की आँखों में अब गुस्सा साफ नजर आ रहा था। उन्होंने कहा, “मैं क्या कह रही हूँ? मैं वो कह रही हूँ जो तूने मुझे नहीं बताया। कल शाम को तेरे ससुर जी का फोन आया था मेरे पास। उन्होंने बताया कि तेरी सास पिछले दस दिनों से स्लिप डिस्क की वजह से बिस्तर पर हैं। डॉक्टर ने उन्हें हिलने-डुलने से भी मना किया है। घर में मेहमान आने वाले थे और तेरी सास को तेरी जरूरत थी। लेकिन तूने क्या किया? तूने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय उनसे झगड़ा किया, झूठा बहाना बनाया कि तुझे डिप्रेशन हो रहा है, और अपना सामान बांधकर यहाँ मायके भाग आई।”
नमिता का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उसकी चोरी पकड़ी गई थी। वह हकलाते हुए बोली, “म-मम्मी… वो… वो वहां बहुत काम था। मुझसे अकेले नहीं होता। मेरी ननद भी तो आ सकती थी अपनी माँ को देखने। सारा बोझ मेरे ही सिर पर क्यों?”
सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “अच्छा! तो वहां तेरी ननद आनी चाहिए थी अपनी माँ की सेवा करने के लिए, क्योंकि तू थक गई थी? और यहाँ? यहाँ तू ननद बनकर आई है, तो तेरी भाभी को तेज बुखार में भी तेरी और तेरे बच्चों की गुलामी करनी चाहिए? ये कैसा न्याय है नमिता?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। विशाखा हैरान होकर सास और ननद की बातें सुन रही थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी सासू माँ उसके लिए अपनी ही बेटी को इतनी बड़ी फटकार लगा रही हैं।
सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी, “बेटा, हम औरतें बड़ी अजीब होती हैं। जब हम मायके में होती हैं, तो हमें लगता है कि भाभी हमारे इशारों पर नाचे, हमारी माँ की सेवा करे और घर को स्वर्ग बनाकर रखे। लेकिन वही औरत जब ससुराल जाती है, तो उसे अपनी सास में कमियां नजर आने लगती हैं, जिम्मेदारियां बोझ लगने लगती हैं, और वह चाहती है कि उसकी ननद आकर अपनी माँ की सेवा करे। तूने विशाखा को ताना मारा कि वो काम से जी चुरा रही है? विशाखा को सच में बुखार है, फिर भी वो पिछले चार दिन से रसोई में तप रही है ताकि तुझे गरम खाना मिल सके। और तू? तेरी सास तो सच में बिस्तर पर पड़ी है, और तू उन्हें भगवान भरोसे छोड़कर यहाँ रानी बनकर हुक्म चला रही है।”
नमिता की आँखें शर्म से झुक गई थीं। उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे।
सुमित्रा जी की आवाज अब भर्रा गई थी। उन्होंने कहा, “याद रख नमिता, मायका सिर्फ तब तक खूबसूरत लगता है, जब तक वहाँ एक भाभी उस घर को संभाल कर रखती है। और ससुराल तब घर बनता है, जब वहाँ की बहू उसे अपना मानती है। तू एक जगह बेटी होने का फायदा उठाना चाहती है और दूसरी जगह बहू होने की जिम्मेदारी से भाग रही है। अगर तू एक अच्छी बहू नहीं बन सकती, तो तुझे अपनी भाभी से एक अच्छी बहू होने की उम्मीद करने का कोई हक नहीं है।”
नमिता रोने लगी। उसने सुमित्रा जी के पैर पकड़ लिए, “मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं स्वार्थी हो गई थी। मुझे लगा कि मैं मायके आकर अपनी जिम्मेदारियों से बच जाऊंगी।”
सुमित्रा जी ने उसे उठाया और कहा, “माफी मुझसे नहीं, विशाखा से मांग। और अगर सच में तुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है, तो जा अपना सामान बांध। तू अभी के अभी अपने घर, अपनी ससुराल वापस जाएगी। जब तक तेरी सास पूरी तरह से ठीक नहीं हो जातीं और वे खुद खुशी से तुझे यहाँ आने की इजाजत नहीं देतीं, तू इस घर में कदम नहीं रखेगी। एक माँ होने के नाते मैं तुझे प्यार दे सकती हूँ, लेकिन तेरे गलत कामों में तेरा साथ देकर तेरा घर नहीं उजाड़ सकती।”
नमिता ने रोते हुए विशाखा के पास जाकर उसके हाथ पकड़ लिए। “भाभी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने अपने अंधेपन में आपको बहुत बुरा-भला कहा। आप सच में इस घर की लक्ष्मी हैं। मैं आज ही वापस जा रही हूँ और वादा करती हूँ कि जैसी आप इस घर की बेटी बनकर रहती हैं, मैं भी वहां वैसी ही बहू बनकर दिखाऊंगी।”
विशाखा की आँखों में भी आंसू थे। उसने नमिता को गले लगा लिया और कहा, “दीदी, परिवार में रूठना-मनाना तो चलता रहता है। आप रोइए मत। बस अपनी गृहस्थी को प्यार से संभालिए।”
कुछ ही घंटों बाद नमिता का सामान वापस टैक्सी में रखा जा रहा था। जब नमिता घर से विदा हो रही थी, तो वह एक बदली हुई इंसान थी। उसे समझ आ चुका था कि रिश्ते सिर्फ अधिकार जताने से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियां निभाने से चलते हैं। सुमित्रा जी ने दरवाजे पर खड़े होकर अपनी बेटी को जाते हुए देखा। उनका दिल थोड़ा भारी जरूर था, लेकिन उन्हें इस बात का सुकून था कि उन्होंने अपनी बेटी को सही वक्त पर सही रास्ता दिखा दिया था। विशाखा ने सुमित्रा जी के कंधे पर सिर रख दिया, और सुमित्रा जी ने अपनी बहू के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया। उस दिन सुमित्रा जी ने सिर्फ अपनी बहू का ही दिल नहीं जीता था, बल्कि अपनी बेटी का भविष्य भी संवार दिया था।
कहानी आपको कैसी लगी? आपके विचार हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
क्या सुमित्रा जी ने अपनी बेटी नमिता को वापस ससुराल भेजकर सही किया? क्या आज के समाज में हर माँ को अपनी बेटी की गलतियों पर इसी तरह निष्पक्ष होकर समझाना चाहिए?
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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल