नन्हा सा फ़रिश्ता

लगभग पाँच सालों के एक लंबे अंतराल के बाद मेरा अपनी कॉलेज की सबसे करीबी दोस्त स्मृति के घर जाना हुआ। हम दोनों की पोस्टिंग अलग-अलग शहरों में होने के कारण मिलना बहुत मुश्किल हो गया था, लेकिन इस बार जब मुझे देहरादून के एक सेमिनार में हिस्सा लेने का मौका मिला, तो मैंने सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए, मैं स्मृति से मिले बिना वापस नहीं लौटूँगी। सर्दियों की वह हल्की-हल्की धूप और देहरादून की सर्द हवाओं के बीच जब मैंने स्मृति के घर की घंटी बजाई, तो दरवाजा खुलते ही हम दोनों एक-दूसरे के गले लगकर ऐसे रो पड़े जैसे सालों से बिछड़ी हुई बहनें मिल गई हों।

ड्राइंग रूम में बैठकर हमारी गपशप का जो दौर शुरू हुआ, तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। कॉलेज के दिनों की शरारतें, प्रोफेसर्स की नकल उतारना, कैंटीन की चाय और फिर हमारी शादियाँ, बच्चे, परिवार और नौकरी—बातों का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला था जिसमें समय का पता ही नहीं चला। हम अपनी दुनिया में खोए हुए थे कि तभी बाहर से किसी के भागते हुए आने की आवाज़ आई। यह स्मृति का सात साल का बेटा आरव था। वह अपनी सोसाइटी के पार्क में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलकर लौटा था। उसके गाल पसीने से लाल हो रहे थे और घुटनों पर थोड़ी मिट्टी लगी थी।

आते ही उसने मुझे नमस्ते किया और फिर सीधे अपनी माँ के गले में बाहें डालकर झूल गया। “मम्मा! आज संडे है ना, मेरी पॉकेट मनी दे दो जल्दी से, मुझे जाना है,” उसने हाँफते हुए लेकिन एक अजीब सी उत्सुकता के साथ कहा।

स्मृति ने प्यार से उसके बालों से मिट्टी झाड़ते हुए कहा, “बेटा, पहले जाओ अपने हाथ-पैर धोकर आओ, कपड़े बदलो और थोड़ा दूध पी लो। उसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे पैसे दे दूँगी।”

“नहीं मम्मा, पहले पैसे दो, मुझे देर हो रही है, पापा मेरा बाहर इंतज़ार कर रहे हैं,” आरव ने मचलते हुए कहा।

मैंने मुस्कुराते हुए उस प्यारे से बच्चे को देखा। उसकी जिद में भी एक मासूमियत थी। लेकिन जब स्मृति ने उसे फिर से वही बात दोहराई कि बिना कपड़े बदले पैसे नहीं मिलेंगे, तो आरव थोड़ा मुँह फुलाकर अपने कमरे की तरफ भाग गया।

थोड़ी देर बाद जब हम फिर से अपनी पुरानी यादों में खोए थे, आरव कपड़े बदलकर वापस आ गया। इस बार वह सीधा स्मृति के सामने खड़ा हो गया और हाथ आगे बढ़ाकर बोला, “लो मम्मा, मैंने कपड़े बदल लिए, अब लाओ मेरे तीन सौ रुपये।”

स्मृति ने मुस्कुराते हुए अपने पर्स से सौ-सौ के तीन नोट निकाले और आरव के छोटे से हाथों में रख दिए। पैसे मिलते ही आरव की आँखों में जो चमक आई, वह देखने लायक थी। वह खुशी से उछलता हुआ बाहर की तरफ भागा, जहाँ उसके पापा अपनी कार स्टार्ट कर रहे थे।

आरव के जाने के बाद कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई। मेरे मन में सवालों का एक बवंडर उठने लगा था। एक सात साल के बच्चे को हर हफ्ते तीन सौ रुपये! यानी महीने के बारह सौ रुपये! मेरी सोच के हिसाब से यह बहुत ज्यादा था। मैं खुद दो बच्चों की माँ हूँ और मैं जानती हूँ कि बच्चों को पैसों की अहमियत सिखाना कितना जरूरी है। मुझे लगा कि स्मृति शायद अपने अकेले बच्चे को प्यार में बहुत ज्यादा बिगाड़ रही है।

मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपनी चाय का कप मेज पर रखते हुए स्मृति से पूछा, “स्मृति, तू बुरा मत मानना, पर क्या तुझे नहीं लगता कि आरव अभी बहुत छोटा है? इतने छोटे बच्चे को हर हफ्ते तीन सौ रुपये पॉकेट मनी देना कहीं उसे बिगाड़ तो नहीं रहा है? आखिर वह करता क्या है इतने पैसों का?”

इससे पहले कि स्मृति कुछ जवाब देती, मुझे याद आया कि मैंने आरव से भी यही सवाल पूछा था जब वह पैसे लेकर भाग रहा था। मैंने उसे रोककर पूछा था, “अरे आरव, क्या करोगे इतने सारे पैसों का? कोई नया खिलौना लाना है या वीडियो गेम?”

उस समय आरव ने मेरी तरफ मुड़कर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखा था और बड़ी मासूमियत से कहा था, “कुछ नहीं आंटी, मैं तो इन पैसों को पानी में बहा देता हूँ।” यह कहकर वह बाहर भाग गया था।

उस वक्त तो मैं उसकी बात सुनकर स्तब्ध रह गई थी। मुझे लगा था कि शायद आजकल के बच्चों के बात करने का यह कोई नया तरीका है, या शायद वह किसी वाटर पार्क में जाकर पैसे उड़ाता है। लेकिन एक बच्चे के मुँह से पैसों को ‘पानी में बहा देने’ की बात सुनना मुझे बहुत अजीब और खटकने वाला लगा था।

अब स्मृति मेरे सामने बैठी थी। मैंने उससे कहा, “स्मृति, अभी जब मैंने आरव से पूछा कि वह पैसों का क्या करता है, तो उसने कहा कि वह उन्हें पानी में बहा देता है। यह क्या अजीब सी बात है? अगर तुम उसे बिना सवाल किए इतने पैसे देती रहोगी, तो उसे कभी मेहनत के पैसों की कद्र नहीं होगी। आज वह तीन सौ मांग रहा है, कल तीन हज़ार मांगेगा। बच्चों को बचपन से ही गुल्लक में पैसे जमा करना सिखाना चाहिए, न कि उन्हें पानी की तरह बहाना।”

मेरी बातें सुनकर स्मृति बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हुई। बल्कि उसके चेहरे पर एक बहुत ही शांत और गहरी मुस्कान आ गई। उसने गहरी सांस ली और मेरी आँखों में देखते हुए बोली, “कविता, तेरी चिंता बिल्कुल सही है। एक माँ होने के नाते मैं भी यही सोचती थी। जब आरव ने पहली बार मुझसे हर हफ्ते तीन सौ रुपये मांगने की जिद की थी, तो मैंने भी उसे बहुत डांटा था। मुझे भी लगा था कि वह चॉकलेट्स, खिलौनों या बेकार की चीजों में पैसे उड़ा रहा है। लेकिन जब मुझे पता चला कि वह वाकई उन पैसों को ‘पानी में बहाता’ है, तो मैंने उसे कभी नहीं रोका।”

मैं उलझन में पड़ गई। “मतलब? वह सचमुच पैसे पानी में बहाता है और तुम उसे ऐसा करने देती हो? यह कैसा पागलपन है स्मृति?”

स्मृति मुस्कुराई और बोली, “सुन तो ले पूरी बात। दरअसल, कुछ महीने पहले मैं और आरव बाजार गए थे। वहाँ एक दुकान के बाहर एक आदमी छोटे-छोटे प्लास्टिक के पाउच और बहुत ही छोटी-छोटी शीशे की बोतलों में रंग-बिरंगी छोटी मछलियाँ बेच रहा था। वो पाउच इतने छोटे थे कि उनमें मछलियाँ ठीक से मुड़ भी नहीं पा रही थीं। वो सांस लेने के लिए तड़प रही थीं। आरव उन्हें देखकर वहीं रुक गया। उसने उस आदमी से पूछा कि ये मछलियाँ ऐसे क्यों तड़प रही हैं। आदमी ने हंसकर कहा कि ये बिकने के लिए हैं, जो खरीदेगा वो इन्हें घर ले जाकर एक्वेरियम में डाल देगा।”

स्मृति ने आगे बताया, “आरव ने मुझसे जिद की कि हम उन सब मछलियों को खरीद लें। मैंने उसे समझाया कि हमारे पास उन्हें रखने के लिए कोई जगह नहीं है, कोई एक्वेरियम नहीं है। लेकिन वह रोने लगा। उसने अपने जमा किए हुए सारे पैसे मुझे दिए और कहा कि माँ इन सबको खरीद लो। उस दिन उसने अपनी जिद से वो सारी मछलियाँ खरीदवा लीं। मुझे लगा अब घर जाकर ये मछलियाँ मर जाएंगी। लेकिन आरव ने अपने पापा से कहा कि उसे शहर के बाहर वाली बड़ी झील पर जाना है।”

मैं स्मृति की बात बहुत ध्यान से सुन रही थी। मेरी आँखों के सामने उस छोटे से बच्चे का चेहरा घूम रहा था।

स्मृति ने एक हल्की सी आह भरते हुए कहा, “हम उसे लेकर झील पर गए। आरव ने अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से उन सारे प्लास्टिक के पाउच को खोला और एक-एक करके उन सभी तड़पती हुई मछलियों को उस विशाल झील के साफ पानी में छोड़ दिया। मछलियाँ जैसे ही बड़े पानी में गईं, वो खुशी से तैरने लगीं और पलक झपकते ही झील की गहराईयों में गायब हो गईं। आरव उन्हें जाते हुए देखकर खुशी से तालियां बजाने लगा। उसने मुझसे कहा—मम्मा, ये मछलियाँ इस बड़ी सी झील के लिए बनी हैं, किसी छोटे से प्लास्टिक के बैग के लिए नहीं।”

मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे।

“उस दिन के बाद से,” स्मृति ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “हर रविवार आरव मुझसे तीन सौ रुपये लेता है। वह अपने पापा के साथ उसी बाजार में जाता है, उस आदमी से जितनी हो सके उतनी मछलियाँ खरीदता है, और उन्हें ले जाकर उसी झील के पानी में आज़ाद कर देता है। उसके लिए पैसों का मतलब बस इतना है कि वह किसी तड़पती हुई जान को आज़ादी दे सके। जब वह कहता है कि वह पैसे पानी में बहा देता है, तो उसका मतलब उन मछलियों को पानी में जीवन देने से होता है। अब तू ही बता कविता, क्या मैं अपने बेटे को पैसे ‘पानी में बहाने’ से रोक दूँ?”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया था। मेरी आँखों से कब आंसू छलक कर मेरे गालों पर आ गिरे, मुझे खुद पता नहीं चला। मेरे पास स्मृति की बात का कोई जवाब नहीं था। मैं उस सात साल के बच्चे की सोच के सामने खुद को बहुत छोटा महसूस कर रही थी। हम बड़े लोग पैसों का हिसाब जोड़ते रहते हैं, हम बैंक बैलेंस, इन्वेस्टमेंट्स और मुनाफे की बात करते हैं, लेकिन एक छोटे से बच्चे ने मुझे सिखा दिया था कि पैसों का सबसे बेहतरीन और सच्चा इस्तेमाल क्या हो सकता है।

मैंने हमेशा सोचा था कि बच्चों को पैसों की अहमियत सिखाना सबसे बड़ा काम है, लेकिन आज आरव ने मुझे सिखा दिया था कि जीवन की अहमियत पैसों से कहीं बढ़कर है। उसकी उस ‘पानी में बहाने’ वाली बात में जो गहराई और जो करुणा थी, वो दुनिया की किसी भी किताब या स्कूल में नहीं सिखाई जा सकती।

थोड़ी देर बाद आरव और उसके पापा लौट आए। आरव का चेहरा खुशी से दमक रहा था। वह दौड़कर मेरे पास आया और बोला, “आंटी, आज मैंने दस मछलियों को उनके बड़े घर में भेज दिया! वो बहुत खुश थीं।”

मैंने आगे बढ़कर उस नन्हें से फरिश्ते को अपने गले से लगा लिया और उसके माथे को चूमते हुए रुंधे गले से कहा, “हाँ बेटा, तुमने दुनिया का सबसे अच्छा काम किया है। तुम्हारे वो पानी में बहे हुए पैसे, दुनिया का सबसे बड़ा खजाना हैं।”

आज मैं भी मुस्कुरा रही थी। पहली बार मैंने जाना था कि पैसे पानी में बहाने का इतना खूबसूरत और पवित्र मतलब भी हो सकता है।

क्या आपको नहीं लगता कि अगर दुनिया का हर इंसान अपने पैसों का कुछ हिस्सा ऐसे ही ‘पानी में बहाने’ लगे, तो यह दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाएगी? इस कहानी ने मेरे जीवन को देखने का नजरिया बदल दिया, और मुझे यकीन है कि आरव की इस छोटी सी लेकिन महान सोच ने आपके दिल को भी जरूर छुआ होगा।

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपने कभी किसी बच्चे को ऐसा निस्वार्थ काम करते देखा है? अपने विचार नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें।

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