हरियाली और शांति से घिरा नीलगिरी गाँव यूं तो बहुत शांत था, लेकिन गाँव के सबसे समृद्ध घर में रहने वाले राघवेंद्र जी का स्वभाव इसके बिल्कुल उलट था। राघवेंद्र जी एक मेहनती और सिद्धांतवादी इंसान थे,
लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उनका अत्यधिक और अनियंत्रित गुस्सा था। उनकी छोटी सी बात पर आपा खो देने की आदत से घर के सभी सदस्य सहमे रहते थे। उनकी पत्नी सुमित्रा और चौदह साल की बेटी अनन्या अक्सर उनके इस स्वभाव को सहती और संभालती आईं थीं।
अनन्या पढ़ाई में बहुत होशियार और शांत स्वभाव की लड़की थी। उसे चित्रकारी (पेंटिंग) का बहुत शौक था। वह अक्सर अपनी भावनाओं को कैनवास पर रंगों के जरिए उकेरती थी। राघवेंद्र जी अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे, लेकिन अपने गुस्से पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था।
जब भी राघवेंद्र जी का व्यापार में कोई नुकसान होता या किसी बात पर चिड़चिड़ाहट होती, तो उसका शिकार घर के सदस्य ही बनते। सुमित्रा जी उन्हें बार-बार समझातीं, “आपका यह गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा।” लेकिन राघवेंद्र जी इस बात को हमेशा हँसकर या और गुस्सा होकर टाल देते थे।
एक दिन, राज्य स्तरीय कला प्रतियोगिता के लिए अनन्या को अपनी सबसे बेहतरीन पेंटिंग जमा करनी थी। अनन्या ने पूरे तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद एक अद्भुत चित्र बनाया था, जिसमें उसने एक जलते हुए जंगल से पंछियों को बचाते हुए एक नन्ही बच्ची को दर्शाया था। यह पेंटिंग सिर्फ एक चित्र नहीं था,
बल्कि उसकी मेहनत, सपने और भविष्य की उम्मीदों का निचोड़ थी। प्रतियोगिता का अंतिम दिन अगले ही सुबह था और पेंटिंग का चयन होने पर उसे राष्ट्रीय स्तर की छात्रवृत्ति मिलने वाली थी।
उसी शाम, राघवेंद्र जी दफ़्तर से लौटे। उनका व्यापार में एक बड़ा सौदा हाथ से निकल गया था, जिसकी वजह से वे बेहद तनाव और गुस्से में थे। घर आते ही उन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया। चाय ठंडी होने पर उन्होंने कप मेज़ पर पटक दिया। माहौल बहुत तनावपूर्ण हो गया था।
तभी अनन्या अपने कमरे से अपनी वही पेंटिंग लेकर आई और बहुत उत्साह से बोली, “पापा! देखिए मेरी प्रतियोगिता की फाइनल पेंटिंग! कैसी बनी है?”
राघवेंद्र जी, जो पहले से ही गुस्से की आग में जल रहे थे, उन्होंने बिना देखे ही झुँझलाकर अनन्या का हाथ झटक दिया। बदकिस्मती से, उनके झटके से अनन्या के हाथ में रखी पेंटिंग मेज़ पर रखी जलती हुई मोमबत्ती और पास रखे काली स्याही के पॉट पर जा गिरी। स्याही का गहरा धब्बा पूरी पेंटिंग पर फैल गया और मोमबत्ती की लौ ने उसके एक हिस्से को जला दिया।
अनन्या की महीनों की मेहनत आँखों के सामने पल भर में जलकर राख हो गई। अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले। उसने रोते हुए अपने पिता की ओर देखा और कहा, “पापा, माँ बिल्कुल सही कहती थीं… आपका गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा। आज आपने मेरी सारी मेहनत और मेरे सपनों को बर्बाद कर दिया!”
इतना कहकर अनन्या रोते हुए अपने कमरे में भाग गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।
कमरे में सन्नाटा छा गया। राघवेंद्र जी वहीं सुन्न खड़े रह गए। जब उनका गुस्सा शांत हुआ, तब उन्हें अहसास हुआ कि उन्होंने अपनी ही बेटी का सबसे बड़ा सपना अपने गुस्से की बलि चढ़ा दिया है। जलती हुई पेंटिंग के टुकड़ों को देखकर उनके दिल में एक अजीब सी टीस उठी। सुमित्रा की कही बातें और अनन्या के रोते हुए कहे शब्द उनके कानों में गूंजने लगे।
उस रात राघवेंद्र जी सो नहीं पाए। पछतावे की आग उनके अंदर जल रही थी। उन्हें समझ आ गया था कि गुस्सा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि बनी-बनाई दुनिया को तबाह करने वाला दीमक है।
उन्होंने ठान लिया कि वे अपने इस अवगुण को दूर करेंगे। उन्होंने पूरी रात जागकर अपनी बेटी के लिए एक पत्र लिखा और अपनी गलती की माफी माँगी। सुबह होते ही उन्होंने अनन्या के कमरे का दरवाजा खटखटाया।
जब अनन्या ने दरवाजा खोला, तो उसके पापा की आँखों में आँसू थे। राघवेंद्र जी ने अनन्या के सामने हाथ जोड़ लिए और कहा, “मुझे माफ कर दो, मेरी बच्ची। तुमने बिल्कुल सच कहा था, मेरा गुस्सा सच में सब बर्बाद कर रहा था। लेकिन आज मैं तुमसे वादा करता हूँ कि आज के बाद मैं कभी अपने गुस्से को खुद पर हावी नहीं होने दूँगा।”
अनन्या ने देखा कि उसके पिता का अहंकार टूट चुका था और उनकी आँखों में सच्चा पछतावा था। उसने अपने पिता को गले लगा लिया। हालाँकि प्रतियोगिता के लिए पेंटिंग दोबारा नहीं बन सकती थी, लेकिन उस दिन राघवेंद्र जी ने अपने गुस्से पर विजय पाने की शुरुआत की और उनका परिवार टूटने से बच गया।
कहानी से सीख:
शिक्षा: गुस्सा एक ऐसा विष है जो दूसरों को नुकसान पहुँचाने से पहले खुद हमारे अपनों और हमारी खुशियों को नष्ट कर देता है। रिश्तों को बचाने के लिए धैर्य और शांति सबसे बड़े हथियार हैं।
धन्यवाद,
कायनात परवीन
#गुस्सा एक दिन सब बर्बाद कर देगा