मुक़ाबला

सरिता ने काव्या का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “पागल लड़की! दुनिया का कोई भी डर, कोई भी ब्लैकमेलर एक माँ की ममता से बड़ा नहीं हो सकता। माना कि तूने लापरवाही की, लेकिन इस डर से तू अपने ही परिवार से कट जाएगी? जब भी ज़िंदगी में कोई मुसीबत आए, तो सबसे पहले अपने घर का दरवाज़ा खटखटाना। क्योंकि दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तेरा परिवार हमेशा तेरे साथ खड़ा मिलेगा।”

 घर के डाइनिंग टेबल पर बैठी सरिता सब्ज़ियां काट रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार अपनी इक्कीस साल की बेटी, काव्या के बंद कमरे के दरवाज़े पर जाकर टिक जाती थीं। पिछले पंद्रह दिनों से काव्या का बर्ताव बिल्कुल बदल गया था। वो काव्या, जिसकी चहचहाहट से पूरा घर गूंजता रहता था, अब एक गहरी और अजीब सी खामोशी की चादर ओढ़े रहती थी। उसका कॉलेज जाना कम हो गया था, खाना-पीना लगभग छूट सा गया था और सबसे डराने वाली बात यह थी कि जब भी उसके मोबाइल पर कोई नोटिफिकेशन की आवाज़ आती, वह बुरी तरह से चौंक जाती थी।

सरिता एक बहुत ही सुलझी हुई महिला थी। उसने और उसके पति राजीव ने अपने बच्चों को हमेशा एक दोस्त की तरह पाला था, लेकिन काव्या की यह चुप्पी सरिता के दिल में किसी अनजाने खौफ को जन्म दे रही थी। आज सरिता से और रहा नहीं गया। उसने चाकू एक तरफ रखा, अपने हाथ पोंछे और सीधे काव्या के कमरे की तरफ बढ़ गई। दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था, बस सटा हुआ था। सरिता ने जैसे ही दरवाज़ा हल्का सा धक्का देकर खोला, अंदर का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

कमरे में घुप्प अंधेरा था, बस लैपटॉप की स्क्रीन की नीली रोशनी काव्या के चेहरे पर पड़ रही थी। काव्या ज़मीन पर घुटनों में सिर दिए बुरी तरह सुबक रही थी। उसका पूरा शरीर कांप रहा था और पास ही उसका मोबाइल पड़ा था, जिसकी स्क्रीन पर कोई मैसेज चमक रहा था। सरिता दौड़कर अपनी बेटी के पास गई और उसे अपने सीने से लगा लिया।

माँ के उस अप्रत्याशित और गर्मजोशी भरे स्पर्श ने काव्या के अंदर के बांध को तोड़ दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। “क्या हुआ मेरी बच्ची? कौन सी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है? तू जानती है न, तेरी माँ तेरे साथ है,” सरिता ने काव्या के बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, पर उसकी अपनी आवाज़ भी भर्रा गई थी।

काव्या ने अपने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया और सरिता के हाथ में रख दिया। सरिता ने जैसे ही स्क्रीन पर नज़र डाली, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। किसी अनजान नंबर से कई तस्वीरें आई थीं—तस्वीरें काव्या की ही थीं, लेकिन उन्हें कंप्यूटर के किसी सॉफ्टवेयर (डीपफेक तकनीक) का इस्तेमाल करके इतनी भद्दी और अश्लील शक्ल दे दी गई थी कि कोई भी पहली नज़र में धोखा खा जाए। नीचे एक धमकी भरा मैसेज लिखा था: “अगर आज रात तक मेरे अकाउंट में पचास हज़ार रुपये नहीं आए, तो ये तस्वीरें तुम्हारे सारे रिश्तेदारों, दोस्तों और कॉलेज के ग्रुप्स में वायरल हो जाएंगी। फिर शक्ल दिखाने लायक नहीं रहोगी।”

सरिता के दिमाग में जैसे एक धमाका सा हुआ। एक पल के लिए उसे लगा कि उसका खून खौल उठा है। एक माँ के तौर पर उसके अंदर का ज्वालामुखी फटने को बेताब था। उसे काव्या की इस लापरवाही पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसने इतनी बड़ी बात अब तक कैसे छुपाए रखी। लेकिन अगले ही पल, जब उसने अपनी बेटी के उस पीले पड़ चुके, खौफज़दा चेहरे को देखा, तो उसने अपना सारा गुस्सा पी लिया। उसे समझ आ गया कि इस वक्त काव्या को उसके उपदेशों की नहीं, बल्कि एक मज़बूत ढाल की ज़रूरत है। अगर उसने इस वक्त काव्या पर गुस्सा किया, तो शायद वह अपनी बेटी को हमेशा के लिए खो देगी।

“कौन है यह?” सरिता ने बेहद शांत, लेकिन एक ठंडी और खतरनाक आवाज़ में पूछा।

काव्या सुबकते हुए बोली, “माँ, यह… यह हमारे कॉलेज का ही एक सीनियर है, विक्रम। कुछ दिन पहले उसने मुझसे कॉलेज के एक प्रोजेक्ट के बहाने नोट्स मांगे थे। मैंने उसे अपनी एक फाइल भेजी थी, पता नहीं कैसे उसने मेरे सोशल मीडिया अकाउंट से मेरी कुछ आम तस्वीरें निकालकर उन्हें इस तरह… मॉर्फ कर दिया। माँ, मैं बर्बाद हो गई। अगर पापा को पता चला तो वो क्या सोचेंगे? मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी। मैं मर जाना चाहती हूँ माँ…” काव्या ने अपना चेहरा फिर से हाथों में छुपा लिया।

“चुप कर!” सरिता की आवाज़ में एक ऐसा अधिकार और सख्ती थी कि काव्या का रोना एक पल के लिए रुक गया। “जब तूने कुछ गलत किया ही नहीं है, तो तू क्यों मरेगी? मरेगा वो, जिसने यह नीच हरकत की है। उठ, बैठ यहाँ।”

सरिता ने काव्या को पलंग पर बिठाया। उसने एक गिलास पानी काव्या को पिलाया और फिर उसके फोन से उसी नंबर पर कॉल मिला दी।

काव्या घबरा गई। “माँ! माँ क्या कर रही हो? वो बहुत खतरनाक है, वो सच में फोटो डाल देगा…”

“तू बस तमाशा देख,” सरिता ने फोन का स्पीकर ऑन कर दिया।

तीसरी घंटी पर फोन उठा। दूसरी तरफ से एक लड़के की घमंडी और बेपरवाह आवाज़ आई, “क्या हुआ काव्या? पैसों का इंतज़ाम हो गया? या फिर मैं अपलोड का बटन दबाऊँ?”

सरिता ने एक गहरी सांस ली। उसकी आवाज़ में न कोई डर था, न कोई घबराहट, बल्कि एक ऐसी खनक थी जो किसी भी अपराधी की रूह कंपा दे।

“सुनो विक्रम,” सरिता ने एक-एक शब्द चबाते हुए कहा। “मैं काव्या की माँ बोल रही हूँ।”

फोन के उस पार अचानक एक गहरा सन्नाटा छा गया। विक्रम ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि काव्या जैसी डरपोक लड़की यह बात अपनी माँ को बता देगी। उसने इससे पहले भी दो-तीन लड़कियों को इसी तरह डराया था, और बदनामी के डर से सबने चुपचाप उसके आगे घुटने टेक दिए थे।

सरिता रुकी नहीं, उसकी आवाज़ अब और भी तेज़ और पैनी हो गई थी। “तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को डराने की? तू सोचता है कि तू किसी भी सॉफ्टवेयर से नकली तस्वीरें बनाकर एक लड़की को ब्लैकमेल करेगा और वो डर के मारे अपनी जान दे देगी या तुझे पैसे दे देगी? सुन ले कान खोलकर। मैंने तेरी सारी चैट्स, तेरा नंबर और वो झूठी तस्वीरें अपने फोन में फॉरवर्ड कर ली हैं। और अभी, इसी वक्त मैं अपने भाई के साथ साइबर क्राइम सेल जा रही हूँ।”

“आं… आंटी वो… आप गलत समझ रही हैं…” विक्रम की आवाज़ अब लड़खड़ाने लगी थी। उसकी सारी हेकड़ी हवा हो चुकी थी।

“चुप कर बेवकूफ लड़के!” सरिता ने उसे डपट दिया। “मुझे सब पता है कि इंटरनेट की दुनिया में हर चीज़ का निशान (IP Address) रह जाता है। पुलिस जब तेरे घर पहुंचेगी ना, तो कॉलेज से तो तू निकाला ही जाएगा, लेकिन साथ ही साथ 66E और 67 आईटी एक्ट के तहत ऐसी चक्की पीसेगा जेल में कि तेरी आने वाली पीढ़ियां भी कंप्यूटर छूने से डरेंगी। तेरे माँ-बाप समाज में सिर उठाकर चलने लायक नहीं रहेंगे, ये मैं पक्का करूंगी।”

सरिता के शब्द किसी सधे हुए तीर की तरह सीधे विक्रम के दिमाग पर प्रहार कर रहे थे। वो एक कॉलेज का लड़का था, कोई पेशेवर अपराधी नहीं। पुलिस, साइबर सेल और जेल का नाम सुनते ही उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

“नहीं आंटी… प्लीज़… मेरी बात सुनिए… मैं वो सब डिलीट कर रहा हूँ। आंटी मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरा करियर बर्बाद हो जाएगा आंटी…” विक्रम अब फोन पर लगभग गिड़गिड़ा रहा था। उसे लगा कि सरिता सच में पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी है।

“करियर?” सरिता ने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा। “जब मेरी बच्ची को खून के आंसू रुला रहा था, तब अपना करियर याद नहीं आया? अगर अगले एक मिनट में तूने अपने सारे डिवाइस से वो कचरा हमेशा के लिए डिलीट नहीं किया और मेरी बेटी के नंबर को ब्लॉक नहीं किया, तो तू कल का सूरज हवालात में देखेगा। और हाँ, अगर आज के बाद काव्या की तरफ आँख उठाकर भी देखी, तो मैं वो माँ हूँ जो अपने बच्चे के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। समझ गया?”

सरिता ने खटाक से फोन काट दिया।

इधर काव्या की आँखें फटी रह गई थीं। उसने अपनी माँ का यह रूप कभी नहीं देखा था। जो माँ दिन भर रसोई और घर के कामों में शांत रहती थी, आज वो किसी रणचंडी से कम नहीं लग रही थी।

उधर विक्रम के हाथ कांप रहे थे। उसने बिना एक सेकंड की देरी किए अपने फोन, लैपटॉप और क्लाउड स्टोरेज से वो सारी तस्वीरें और बैकअप फाइल्स हमेशा के लिए डिलीट कर दीं। उसने काव्या का नंबर ब्लॉक किया और सिम कार्ड निकालकर तोड़ दिया। उसे लगने लगा था कि पुलिस बस उसके दरवाज़े पर पहुँचने ही वाली है।

सरिता ने फोन टेबल पर रखा और काव्या की तरफ देखा। काव्या ने दौड़कर अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया।

“माँ… तुम कितनी बहादुर हो। अगर तुम नहीं होती तो पता नहीं मैं आज क्या कर बैठती। मुझे माफ़ कर दो माँ, मुझे लगा आप मुझ पर ही गुस्सा करोगी, मुझे ही गलत समझोगी…” काव्या फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन इस बार ये आंसू डर के नहीं, बल्कि सुकून और आज़ादी के थे।

सरिता ने काव्या का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “पागल लड़की! दुनिया का कोई भी डर, कोई भी ब्लैकमेलर एक माँ की ममता से बड़ा नहीं हो सकता। माना कि तूने लापरवाही की, लेकिन इस डर से तू अपने ही परिवार से कट जाएगी? जब भी ज़िंदगी में कोई मुसीबत आए, तो सबसे पहले अपने घर का दरवाज़ा खटखटाना। क्योंकि दुनिया चाहे कुछ भी कहे, तेरा परिवार हमेशा तेरे साथ खड़ा मिलेगा।”

उस रात, काव्या महीनों बाद बिना किसी डर के चैन की नींद सोई। उसका सिर सरिता की गोद में था और सरिता प्यार से उसके बाल सहला रही थी। आज सरिता ने न सिर्फ अपनी बेटी को एक बहुत बड़े दलदल से निकाला था, बल्कि उसे यह भी सिखा दिया था कि मुसीबत के समय डर कर छुपने से नहीं, बल्कि डटकर सामना करने से ही जीत मिलती है।

क्या आपको लगता है कि समाज के डर से बच्चे अपनी परेशानियां माता-पिता से नहीं बाँट पाते? क्या हर घर में सरिता जैसी समझदारी की ज़रूरत नहीं है? अपने विचार ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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