माँ का हृदय

सुमित्रा जी की आंखों में अब हल्के से आंसू तैरने लगे थे, लेकिन वो दुख के नहीं थे। उन्होंने कांता का हाथ पकड़कर कहा, “तू नहीं समझेगी कांता। अगर वो मांगता, तो मैं चारों अंगूठियां एक साथ उतार कर दे देती। लेकिन फिर वो दोबारा कभी नहीं आता। उसने चोरी की है, वो जानता है कि मेरी उंगलियों में अभी भी तीन अंगूठियां बाकी हैं। मुझे कोई परवाह नहीं कि वो मुझे लूट रहा है… कम से कम इसी बहाने, इन बची हुई तीन अंगूठियों के लालच में ही सही, मेरा बेटा तीन बार और मेरा माथा चूमने तो आएगा। मेरे लिए इन सोने के टुकड़ों से ज्यादा कीमती मेरे बेटे के कदमों की आहट है।”

दिसंबर की सर्द दोपहर थी। कोहरे की चादर छंटने के बाद आंगन में पसरी गुनगुनी धूप किसी वरदान से कम नहीं लग रही थी। शहर के उस पुराने मोहल्ले के एक शांत कोने में बने मकान के आंगन में पैंसठ वर्षीय सुमित्रा जी अपनी पुरानी बेंत की कुर्सी पर बैठी थीं। ठंड के कारण उनके जोड़ों का दर्द बढ़ गया था, लेकिन उस गुनगुनी धूप ने उनके थके हुए शरीर को थोड़ी राहत दे रखी थी। सुमित्रा जी का जीवन एक ठहरे हुए तालाब की तरह हो गया था, जिसमें यादों के सिवा और कोई हलचल नहीं होती थी। उनके पति को गुजरे कई साल हो चुके थे, और उनका इकलौता बेटा, वैभव, शादी के बाद शहर के दूसरे कोने में एक आलीशान फ्लैट में अपनी नई दुनिया बसा चुका था।

सुमित्रा जी के दिन की शुरुआत वैभव की तस्वीर देखने से होती और रात उसी तस्वीर से बातें करते हुए कटती। महीनों बीत जाते, लेकिन वैभव के पास अपनी माँ से मिलने का वक्त नहीं होता था। कभी फोन पर बात भी होती, तो वह हमेशा अपनी व्यस्तता, ऑफिस की मीटिंग्स और घर की जिम्मेदारियों का बहाना बना देता। सुमित्रा जी हर रविवार इस उम्मीद में सुबह से ही दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए बैठी रहतीं कि शायद आज उनका बेटा आएगा। उन्होंने अपने हाथों की उंगलियों में चार भारी पुश्तैनी सोने की अंगूठियां पहन रखी थीं। ये अंगूठियां उनके सुहाग की आखिरी निशानी और उनके बुरे वक्त का इकलौता सहारा थीं। मोहल्ले के लोग अक्सर कहते कि इस उम्र में इतना सोना पहनना सुरक्षित नहीं है, लेकिन सुमित्रा जी मुस्कुराकर कहतीं, “ये मेरे सुहाग की निशानी हैं, इन्हें शरीर से कैसे अलग कर दूं?”

धूप तापते-तापते सुमित्रा जी की पलकें भारी होने लगीं। उम्र के इस पड़ाव पर नींद अक्सर बिन बुलाए मेहमान की तरह आ जाती है। हवा का एक हल्का झोंका आया और सुमित्रा जी गहरी नींद में सो गईं। उनका सिर कुर्सी की पीठ पर टिक गया और हाथ शॉल से बाहर लटक रहे थे।

तभी लोहे का मुख्य दरवाजा बिना आवाज किए खुला। वह वैभव था। महीनों बाद आज वह अपनी माँ के घर आया था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी परेशानी और हड़बड़ाहट थी। वह दबे पांव आंगन में दाखिल हुआ। उसने देखा कि उसकी माँ गहरी नींद में सो रही हैं। उसने उन्हें जगाने की कोशिश नहीं की। शायद वह जानता था कि अगर माँ जाग गईं, तो उनका प्यार, उनके सवाल और उनकी भावुकता उसका समय बर्बाद करेंगी, और उसे जिस काम के लिए आना पड़ा था, उसमें रुकावट आएगी। वैभव व्यापार में किसी भारी नुकसान से गुजर रहा था और उसे पैसों की सख्त जरूरत थी। उसकी नजर सीधे अपनी माँ के हाथों पर गई, जहां धूप की किरणों से वो सोने की अंगूठियां चमक रही थीं।

वैभव ने एक पल के लिए आसपास देखा। घर में खामोशी थी। उसने बहुत ही धीरे से, अपनी कांपती उंगलियों से सुमित्रा जी के दाएं हाथ को छुआ। माँ की नींद बहुत गहरी थी, शायद उस गुनगुनी धूप और उम्र की थकान ने उन्हें सुन्न कर दिया था। वैभव ने बड़ी सफाई से उनकी तर्जनी उंगली से एक भारी सोने की अंगूठी सरकाई और उसे निकालकर अपनी जेब में रख लिया। उसने एक बार अपनी सोती हुई माँ के झुर्रियों वाले चेहरे को देखा, लेकिन उसके माथे पर कोई पछतावा नहीं था। वह उसी दबे पांव उल्टे कदम लौटा और दरवाजा सटाकर वहां से चला गया।

यह सब कुछ आंगन की दीवार से सटी छत पर कपड़े सुखाने आई उनकी पड़ोसन और मुंहबोली बहन, कांता ने देख लिया था। कांता की आंखें फटी की फटी रह गई थीं। वह यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि इतना पढ़ा-लिखा और संस्कारी बेटा अपनी ही सोती हुई माँ के हाथ से चोरी कर सकता है। कांता के मन में उबाल आ रहा था कि वह अभी नीचे जाकर सुमित्रा जी को जगाए और उस नालायक बेटे की करतूत बताए। लेकिन जब तक वह नीचे आई, वैभव वहां से जा चुका था।

कुछ देर बाद, जब सुमित्रा जी की नींद टूटी और उन्होंने अपनी शॉल ठीक की, तो कांता उनके पास आकर बैठ गई। कांता का चेहरा लाल था और वह गुस्से में हांफ रही थी।

“जीजी, तुम कितनी गहरी नींद में थीं!” कांता ने तमतमाते हुए कहा।

सुमित्रा जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “हां कांता, सर्दियों की धूप में शरीर सिकुड़ जाता है और नींद आ ही जाती है। क्यों, क्या हुआ? तू इतनी घबराई हुई क्यों है?”

कांता से अब रहा नहीं गया। उसने सुमित्रा जी के हाथ की तरफ इशारा करते हुए कहा, “जीजी, तुम्हारा वैभव आया था अभी। मैंने अपनी आंखों से देखा है छत से। और देखो, वह तुम्हारी उंगली से तुम्हारी वो भारी पुश्तैनी अंगूठी निकालकर ले गया। तुम्हें भनक तक नहीं लगी? अरे, मुझे आवाज दे देती, मैं उस निर्लज्ज को वहीं पकड़ लेती। कैसा बेटा है जो अपनी ही माँ को लूट कर ले गया!”

कांता को उम्मीद थी कि यह सुनकर सुमित्रा जी छाती पीटकर रोने लगेंगी, अपने बेटे को कोसेंगी और अपनी किस्मत पर विलाप करेंगी। लेकिन सुमित्रा जी के चेहरे पर न तो कोई हैरानी थी और न ही कोई दुख। उन्होंने अपनी खाली उंगली को देखा, जहां अंगूठी का निशान अभी भी मौजूद था। फिर उन्होंने बहुत ही शांत और सहज भाव से कांता की आंखों में देखा। उनके होंठों पर एक ऐसी मुस्कान थी, जिसने कांता को अंदर तक कंपा दिया।

सुमित्रा जी ने बहुत ही धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा, “शांत हो जा कांता। मुझे पता था कि वो आया है। उसकी परछाई और उसकी आहट मैं नींद में भी पहचान सकती हूं। वो परेशान होगा, उसे पैसों की जरूरत होगी, तभी तो अपनी माँ के पास आया।”

कांता झुंझलाते हुए बोली, “जरूरत थी तो मांग लेता! ऐसे चोरों की तरह नींद में अंगूठी निकालकर ले जाने का क्या मतलब है? और तुम… तुम खुश हो रही हो?”

सुमित्रा जी की आंखों में अब हल्के से आंसू तैरने लगे थे, लेकिन वो दुख के नहीं थे। उन्होंने कांता का हाथ पकड़कर कहा, “तू नहीं समझेगी कांता। अगर वो मांगता, तो मैं चारों अंगूठियां एक साथ उतार कर दे देती। लेकिन फिर वो दोबारा कभी नहीं आता। उसने चोरी की है, वो जानता है कि मेरी उंगलियों में अभी भी तीन अंगूठियां बाकी हैं। मुझे कोई परवाह नहीं कि वो मुझे लूट रहा है… कम से कम इसी बहाने, इन बची हुई तीन अंगूठियों के लालच में ही सही, मेरा बेटा तीन बार और मेरा माथा चूमने तो आएगा। मेरे लिए इन सोने के टुकड़ों से ज्यादा कीमती मेरे बेटे के कदमों की आहट है।”

कांता सन्न रह गई। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। वह बस सुमित्रा जी के चेहरे को देख रही थी, जहां ममता ने स्वार्थ, छल और धोखे के हर मापदंड को बहुत छोटा कर दिया था। माँ का हृदय कितना असीम और विशाल होता है, यह आज कांता को समझ आ गया था। दुनिया जिसे चोरी और धोखा कह रही थी, एक माँ की नजरों में वह अपने बेटे से मिलने की एक और उम्मीद थी।

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**आपकी क्या राय है?**

क्या सुमित्रा जी का अपने बेटे की चोरी को इस तरह स्वीकार करना सही था? क्या ममता में इंसान इतना अंधा हो जाता है कि वह बच्चों के लालच को भी उनका प्यार समझ बैठता है? आपकी इस मार्मिक घटना पर क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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