तपस्या

“डॉक्टर साहिबा, इतनी कम उम्र में जिले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का पद संभालना अपने आप में एक मिसाल है। आपकी इस असाधारण सफलता के पीछे किसका हाथ है? वो कौन सी प्रेरणा थी जिसने आपको इस मुकाम तक पहुँचाया?” पत्रकारों के कैमरों की फ्लैशलाइट्स चमक रही थीं और हर कोई उनके जवाब का इंतज़ार कर रहा था।

प्रेरणा? डॉक्टर अनन्या के होठों पर एक हल्की सी, लेकिन गहरी मुस्कान तैर गई। लोग अक्सर सफलता के पीछे किसी बड़े स्कूल, महंगी कोचिंग या किसी नामी मार्गदर्शक का नाम सुनना चाहते हैं। लेकिन अनन्या जानती थी कि उसकी कामयाबी की नींव किसी आलीशान इमारत में नहीं, बल्कि एक सीलन भरे छोटे से कमरे में रखी गई थी, जहाँ रात-रात भर एक पुरानी सिलाई मशीन की घर्र-घर्र आवाज़ गूंजा करती थी।

उसे अपने बचपन के वो दिन आज भी किसी फिल्म की रील की तरह याद थे। उसके पिता, कैलाश बाबू, पोस्ट ऑफिस में क्लर्क थे। उनकी सोच पुरानी और आमदनी सीमित थी। घर में बड़ा भाई सुमित था, जो पिता की आँखों का तारा था। पिता का मानना था कि घर का चिराग बेटा ही होता है और उसी पर सारा निवेश किया जाना चाहिए। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया वाले उस दौर में, पिता का स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया था और अक्सर इस बात का गुस्सा घर के माहौल पर, खासकर माँ पर निकलता था।

अनन्या पढ़ाई में हमेशा अव्वल आती थी, लेकिन सातवीं कक्षा पास करते ही जैसे उसके सपनों पर ग्रहण लग गया। एक शाम जब पिता चाय पी रहे थे, तो उन्होंने अचानक एक ऐसा फरमान सुना दिया जिसने अनन्या की दुनिया ही उजाड़ दी।

“अगले महीने से अनन्या का स्कूल जाना बंद। सुमित को शहर के बड़े स्कूल में दाखिला दिलवाना है, फीस ज़्यादा है। मैं दोनों का खर्च नहीं उठा सकता। वैसे भी लड़की को आगे पढ़ाकर क्या करना है? चूल्हा ही तो फूंकना है, अभी से घर के कामों में हाथ बंटाएगी तो दो साल बाद इसके हाथ पीले कर दूंगा।”

यह सुनकर अनन्या के हाथ से पानी का गिलास छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसे पढ़ना था, उसे किताबों से बेइंतहा प्यार था। वह दौड़कर अपनी माँ, रेवती के पास गई और उनके आँचल में मुँह छिपाकर सुबकने लगी। “माँ, मुझे स्कूल जाना है। मुझे घर में नहीं बैठना। मैं भाई से भी ज़्यादा नंबर लाती हूँ, फिर मेरी पढ़ाई क्यों रोकी जा रही है?”

रेवती, जो हमेशा अपने पति के हर सही-गलत फैसले पर खामोश रहती थीं, उस दिन अपनी बेटी के उन कांपते कंधों को देखकर भीतर तक हिल गईं। एक माँ, जिसने ज़िंदगी भर सिर्फ समझौते किए थे, उस दिन उसने तय कर लिया कि वह अपनी बेटी को अपनी जैसी ज़िंदगी नहीं जीने देगी।

उसी शाम, जब पिता घर के खर्चों का हिसाब लिख रहे थे, रेवती उनके सामने जाकर खड़ी हो गईं। उनकी आवाज़ में न तो कोई डर था और न ही कोई हिचकिचाहट।

“अनन्या का स्कूल नहीं छूटेगा। सुमित को जहाँ पढ़ाना है पढ़ाइए, लेकिन मेरी बेटी भी पढ़ेगी।”

कैलाश बाबू ने चौंककर अपनी पत्नी को देखा। जिस औरत ने कभी उनके सामने नज़र उठाकर बात नहीं की थी, आज वह आँखों में आँखें डालकर बोल रही थी। उनका पुरुषार्थ आहत हो गया।

“अच्छा? तो अब तुम तय करोगी कि घर कैसे चलेगा? पैसा कहाँ से आएगा महारानी? क्या तुम कमा कर लाओगी? अगर शौक है तो खुद कमाओ और पढ़ाओ इसे, मैं अपनी गाढ़ी कमाई का एक पैसा इस लड़की की पढ़ाई पर बर्बाद नहीं करूंगा!” पिता ने ताना मारते हुए मुँह फेर लिया।

रेवती ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उनकी आँखों ने एक संकल्प ले लिया था। अगले ही दिन से रेवती ने मोहल्ले की औरतों से पूछना शुरू किया। उसे बहुत अच्छे से कढ़ाई-बुनाई और स्वेटर बनाने आते थे। उसने एक स्थानीय ऊन व्यापारी से बात की और थोक में स्वेटर बुनने का काम ले लिया। साथ ही, उसने पास के एक दर्जी की दुकान से कपड़ों में तुरपाई करने और बटन टांकने का काम भी मांग लिया।

अब उस छोटे से घर का नज़ारा बदल चुका था। सुबह चार बजे उठकर घर का सारा काम निपटाने के बाद, रेवती ऊन और सलाई लेकर बैठ जाती। उसकी उंगलियां मशीन की तरह चलतीं। जब अनन्या स्कूल से लौटती, तो माँ के हाथों में कभी सुई-धागा होता तो कभी ऊन।

दिन-ब-दिन रेवती का काम बढ़ने लगा। उसकी बुनाई में ऐसी सफाई थी कि व्यापारी उसे और काम देने लगा। जो भी पैसे मिलते, वह चुपचाप एक पुराने डिब्बे में छिपाकर रख देती। उसी डिब्बे से अनन्या की स्कूल की फीस, किताबें और कॉपियां आने लगीं।

एक बार जब अनन्या दसवीं में थी, उसे विज्ञान की एक महंगी रिफ्रेशर किताब की ज़रूरत थी। पैसे कम पड़ रहे थे। रेवती अगले दिन उसी व्यापारी के घर गई और उसकी पत्नी से हाथ जोड़कर पूछा कि क्या उनके बच्चों की कोई पुरानी किताबें पड़ी हैं? रेवती को पुरानी किताबें और कपड़े मांगने में कोई शर्म नहीं आती थी, क्योंकि उसका मानना था, “ज्ञान जहाँ से मिले, जैसे मिले, ले लेना चाहिए। इसमें कोई छोटा नहीं होता।”

रात के बारह-बारह बजे तक जब अनन्या ज़मीन पर चटाई बिछाकर एक छोटे से बल्ब की रोशनी में पढ़ती, तो रेवती भी उसके पास बैठकर कपड़ों में तुरपाई करती रहती। सुई कई बार उसकी थकी हुई उंगलियों में चुभ जाती, खून की बूंदें कपड़ों पर गिरने से बचाने के लिए वह तुरंत अपनी उंगली मुँह में दबा लेती, लेकिन उसकी सिलाई नहीं रुकती थी। बेटी की आँखें नींद से बोझिल न हों, इसलिए वह बीच-बीच में उसे चाय बनाकर देती और उसके सिर पर हाथ फेरती रहती।

समय अपनी रफ्तार से भागता रहा। सुमित शहर जाकर भी कुछ खास नहीं कर पाया और पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, लेकिन अनन्या ने बारहवीं में पूरे राज्य में टॉप किया। अब लक्ष्य था मेडिकल कॉलेज। मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए किताबों और फॉर्म का खर्च बहुत ज़्यादा था। पिता ने तो पहले ही हाथ खड़े कर दिए थे।

उस दिन रेवती ने बिना किसी को बताए अपनी शादी की निशानी—चांदी की भारी पायलें—बाज़ार में जाकर गिरवी रख दीं। जब अनन्या को यह बात पता चली, तो वह बहुत रोई, लेकिन रेवती ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा, “इन पायलों की असली खनक मुझे तब सुनाई देगी, जब मेरी बेटी के गले में स्टेथोस्कोप होगा।”

अनन्या ने भी माँ के उस बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उसने सरकारी मेडिकल कॉलेज में अपनी जगह पक्की की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एमबीबीएस, फिर एमएस, और आज वह शहर की सबसे प्रतिष्ठित डॉक्टर और जिले की स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख बन चुकी थी। घर के हालात बदल चुके थे। पिता का नज़रिया भी वक्त के साथ बदल गया था, लेकिन अनन्या जानती थी कि उसकी असली भगवान कौन है।

पत्रकार का सवाल अभी भी हवा में तैर रहा था। फ्लैशलाइट्स फिर चमकीं और अनन्या अपने ख्यालों से बाहर आई। उसने माइक को थोड़ा अपनी तरफ किया, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी नमी और गर्व का मिलाजुला भाव था।

“आप पूछते हैं कि मुझे धन्यवाद किसे देना चाहिए? मेरे पास वो शब्द ही नहीं बने हैं जो उस इंसान के बलिदान को बयां कर सकें। मेरी सफलता किसी बड़े संस्थान की देन नहीं है। मेरे मेडिकल की हर किताब मेरी माँ की उंगलियों में चुभी सुइयों के बदले आई है। मेरी हर डिग्री में मेरी माँ की उन रातों की नींद शामिल है, जो उन्होंने मेरे साथ जागकर बिताईं। अगर उस दिन मेरी माँ ने मेरे पिता से बगावत न की होती, अगर उन्होंने अपने हिस्से का आसमान मेरे लिए न खोल दिया होता, तो शायद आज मैं कहीं किसी चारदीवारी में अपनी किस्मत को कोस रही होती। मेरी प्रेरणा, मेरा हौसला, मेरी सफलता… सब कुछ सिर्फ और सिर्फ मेरी माँ की खामोश तपस्या का फल है। वो… मेरी माँ हैं।”

हॉल में एक पल के लिए पिन-ड्रॉप साइलेंस छा गया, और अगले ही पल पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सबसे पहली पंक्ति में बैठी एक बूढ़ी, झुर्रियों वाली औरत अपनी सूती साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछ रही थी। आज उसकी तपस्या पूरी हो चुकी थी।

कहानी कैसी लगी? क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसी माँ है जिसने अपने बच्चों के लिए दुनिया से बगावत की हो? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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