ज़िंदगी की एक छोटी सी हार

“अरे मीना बहू, क्या बात है? आज हमारे घर का चिराग सुबह से दिखाई नहीं दिया, कहीं सूरज पश्चिम से तो नहीं निकल आया?” पचहत्तर वर्षीय रिटायर कर्नल शमशेर सिंह ने अपनी छड़ी को ज़मीन पर टिकाते हुए अपने पड़ोस में रहने वाले आयुष के घर के बरामदे में कदम रखा। उनकी भारी और रौबदार आवाज़ में भी एक अजीब सी फिक्र घुली हुई थी। आज सुबह से आयुष उनके साथ अपनी नियमित जॉगिंग पर नहीं गया था। पहले तो कर्नल साहब को लगा कि शायद रात को देर तक पढ़ाई करने की वजह से लड़का सो रहा होगा, लेकिन जब दोपहर ढल गई और शाम के साये गहरे होने लगे, तो उनसे रहा नहीं गया और वे खुद ही अपनी लाठी टेकते हुए आयुष के घर चले आए।

घर के भीतर का माहौल आज कुछ अलग ही था। रोज़ शाम को जहाँ आयुष के गिटार की धुनें या उसकी खिलखिलाती हुई आवाज़ें गूँजा करती थीं, वहाँ आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। मीना, जो कि आयुष की माँ थी, कर्नल साहब को देखते ही उनके पास आई। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही थीं। उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “क्या बताऊँ अंकल जी, आज सुबह वो अपने फाइनल ईयर का रिजल्ट लेकर आया था। पता नहीं क्या हुआ, आते ही उसने अपने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। मैंने तीन-चार बार आवाज़ दी, खाना खाने के लिए बुलाया, लेकिन उसने बस इतना कहा कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए। मुझे तो बहुत घबराहट हो रही है।”

कर्नल साहब समझ गए कि मामला सामान्य नहीं है। आयुष जैसा ज़िंदादिल और ऊर्जा से भरा हुआ लड़का, जो हर छोटी-बड़ी बात पर पूरे मोहल्ले को सिर पर उठा लेता था, उसका इस तरह खुद को कैद कर लेना किसी बड़े मानसिक तूफान का संकेत था। अगर कर्नल साहब कुछ देर और ना आते, तो शायद मीना खुद ही दौड़कर उन्हें बुलाने जाती, क्योंकि इस पूरी कॉलोनी में हर कोई यह बात भली-भांति जानता था कि जब आयुष का दिमाग खराब होता है या वो किसी गहरे अवसाद में होता है, तो उसे उस अंधेरे कुएँ से बाहर निकालने की चाबी केवल कर्नल शमशेर सिंह के पास ही होती है।

आयुष के माता-पिता, रमेश और मीना, करीब आठ साल पहले इस ‘शिवालिक एन्क्लेव’ में रहने आए थे। उस समय यह कॉलोनी नई-नई बस रही थी। दूर-दूर तक इक्का-दुक्का घर ही बने हुए थे। कर्नल शमशेर सिंह यहाँ पिछले पंद्रह सालों से रह रहे थे। फौज से रिटायर होने के बाद उन्हें शहर के शोर-शराबे से दूर एक एकांत और शांतिपूर्ण जीवन चाहिए था, इसलिए उन्होंने इस शहर के बाहरी इलाके में अपना आशियाना बनाया था। उनकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था और इकलौता बेटा अपने परिवार के साथ कनाडा में बस गया था। कर्नल साहब को शांति तो मिल गई थी, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर वह शांति धीरे-धीरे एक चुभने वाले अकेलेपन में तब्दील हो गई थी।

इसी अकेलेपन के रेगिस्तान में आयुष उनके लिए किसी मीठे पानी के झरने की तरह आया था। जब आयुष यहाँ शिफ्ट हुआ था, तब वह महज़ 12 साल का एक सहमा हुआ, शर्मीला और शारीरिक रूप से बेहद कमज़ोर बच्चा था। उसे दोस्तों से बात करने में झिझक होती थी और मोहल्ले के दूसरे लड़के अक्सर उसे चिढ़ाते थे। लेकिन कर्नल साहब की पारखी नज़रों ने उस बच्चे के अंदर छुपी हुई एक आग को पहचान लिया था। उन्होंने धीरे-धीरे आयुष से बातचीत शुरू की। एक सेना के अधिकारी का अनुशासन और एक दादा का स्नेह, दोनों का ऐसा अद्भुत मिश्रण कर्नल साहब ने आयुष को दिया कि उस बच्चे की दुनिया ही बदल गई।

दोनों की दोस्ती बड़ी अजीब थी, बिल्कुल बेमेल। एक तरफ पचहत्तर साल का एक तजुर्बेकार और सख्त मिज़ाज इंसान, जिसने जीवन के अनगिनत युद्ध लड़े थे, और दूसरी तरफ एक युवा लड़का, जो अभी ज़िंदगी की दहलीज पर खड़ा था। लेकिन जब दोनों बैठते थे, तो ऐसा लगता था जैसे दो हमउम्र जिगरी दोस्त बात कर रहे हों। कर्नल साहब ने उसे सुबह जल्दी उठना सिखाया, उसके साथ दौड़ लगाई, उसे शारीरिक रूप से मज़बूत बनाया और मानसिक रूप से एक योद्धा बना दिया। उनके फौजी किस्सों, बहादुरी की कहानियों और जीवन के कड़वे-मीठे अनुभवों ने आज उस सहमे हुए 12 साल के बच्चे को 20 साल का एक गठीले बदन वाला, आत्मविश्वास से लबरेज़ और समझदार युवक बना दिया था। आयुष उन्हें ‘कैप्टन दादू’ कहता था। कर्नल साहब भी उसे देखकर अक्सर यही सोचते थे कि अगर उनका अपना पोता उनके पास होता, तो बिल्कुल आयुष जैसा ही होता। आयुष के लिए कर्नल साहब सिर्फ एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक दोस्त, एक लाइफ कोच, एक मेंटर और एक सुरक्षा कवच थे।

कर्नल शमशेर सिंह ने बिना कोई और सवाल किए सीधे आयुष के कमरे की तरफ कदम बढ़ाए। उन्होंने अपने मज़बूत हाथों से दरवाज़े पर तीन बार दस्तक दी। “कैडेट आयुष! दरवाज़ा खोलो। तुम्हारा कमांडिंग ऑफिसर बाहर खड़ा है,” उन्होंने अपनी उसी पुरानी फौजी टोन में कहा, जिसमें एक आदेश भी था और एक अथाह प्रेम भी।

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। मीना पीछे खड़ी घबरा रही थी, लेकिन कर्नल साहब ने उसे इशारे से शांत रहने को कहा। उन्होंने फिर से दस्तक दी, “देखो आयुष, अगर तुमने अगले दस सेकंड में दरवाज़ा नहीं खोला, तो मैं अपनी पुरानी फौज वाली लात का इस्तेमाल करूँगा, और फिर रमेश को नया दरवाज़ा बनवाना पड़ेगा।”

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, अंदर से ताला खुलने की आवाज़ आई। दरवाज़ा धीरे से खुला। कमरे के अंदर घुप अंधेरा था, पर्दे गिरे हुए थे। कर्नल साहब ने अंदर कदम रखा और तुरंत लाइट जला दी। सामने बिस्तर पर आयुष बैठा था। उसकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर एक अजीब सी निराशा छाई हुई थी। वो आयुष, जो हमेशा एक शेर की तरह दहाड़ता था, आज किसी घायल परिंदे की तरह सिमटा हुआ था।

“क्या मेरे शेर, किस बात पर मुँह लटका कर बैठा है?” कर्नल साहब ने उसके बगल में बैठते हुए बड़े ही प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा।

आयुष ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके गले में जैसे कोई रुलाई का गोला अटक गया था। उसने कांपते हाथों से एक कागज़ कर्नल साहब की तरफ बढ़ा दिया। यह उसके कॉलेज का फाइनल रिजल्ट था। कर्नल साहब ने अपना चश्मा निकाला और उस कागज़ को ध्यान से देखा। आयुष दो मुख्य विषयों में फेल हो गया था, और इसके साथ ही उसका वह सपना भी टूट गया था जिसके लिए वह पिछले दो सालों से दिन-रात एक कर रहा था—कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिए उस मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पाना, जो सिर्फ फर्स्ट डिवीज़न वाले छात्रों को ही मौका देती थी।

“मैं हार गया कैप्टन दादू,” आयुष की आवाज़ भर्रा गई। “मैंने मम्मी-पापा का पैसा, उनका भरोसा और आपकी सारी मेहनत बर्बाद कर दी। मैं किसी लायक नहीं हूँ। मेरी सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई। मेरे दोस्त कहाँ से कहाँ पहुँच जाएंगे और मैं… मैं एक लूज़र बनकर रह गया हूँ।” कहते-कहते वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया।

कर्नल साहब कुछ देर शांत रहे। उन्होंने उसे रोने दिया। वे जानते थे कि कभी-कभी दर्द को आंसुओं के रास्ते बह जाने देना ही सबसे अच्छा इलाज होता है। जब आयुष का रोना थोड़ा कम हुआ, तब कर्नल साहब ने एक गहरी सांस ली और बोले, “तुम जानते हो आयुष, साल 1971 की जंग में हमारी पलटन को एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहाड़ी पर कब्ज़ा करने का आदेश मिला था। हम पूरी तैयारी के साथ गए थे, लेकिन दुश्मन की तोपखाने की आग इतनी तेज़ थी कि हमें पीछे हटना पड़ा। मेरे कई साथी घायल हुए। उस रात मुझे भी यही लगा था कि मैं हार गया हूँ, मैं एक लूज़र हूँ और मुझे वर्दी उतार देनी चाहिए।”

आयुष ने अपने आँसू पोंछते हुए हैरानी से उनकी तरफ देखा। उसने कर्नल साहब के मुँह से उनकी हार का किस्सा पहले कभी नहीं सुना था।

“फिर क्या हुआ?” आयुष ने धीमी आवाज़ में पूछा।

“फिर होना क्या था! मेरे सीनियर ऑफिसर ने मेरे पास आकर वही बात कही जो आज मैं तुम्हें कहने जा रहा हूँ,” कर्नल साहब मुस्कुराए। “उन्होंने कहा था—’शमशेर, मैदान में हारने वाला सिपाही तब तक नहीं हारता, जब तक वह अपने दिमाग में हार ना मान ले। एक लड़ाई हारने का मतलब यह नहीं कि तुमने पूरा युद्ध हार लिया है।’ अगले दिन हमने अपनी रणनीति बदली, एक दूसरे रास्ते से चढ़ाई की और उस पहाड़ी पर अपना तिरंगा लहरा कर ही वापस आए।”

कर्नल साहब ने आयुष का चेहरा अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोले, “ज़िंदगी भी बिल्कुल इसी युद्ध के मैदान की तरह है, मेरे बच्चे। यहाँ हर प्लानिंग काम नहीं आती। कभी-कभी तुम गिरोगे, और बहुत बुरी तरह गिरोगे। लेकिन तुम्हारी असली पहचान इस बात से नहीं होगी कि तुम कितनी बार गिरे, बल्कि इस बात से होगी कि गिरने के बाद तुम कितनी जल्दी उठकर वापस खड़े हुए। ये एक कागज़ का टुकड़ा तुम्हारा भविष्य तय नहीं कर सकता। क्या तुमने मेहनत करना छोड़ दिया है? क्या तुम्हारे अंदर का वो शेर मर गया है जिसे मैंने अपने हाथों से तैयार किया था?”

आयुष ने ना में सिर हिलाया। उसकी आँखों में अब आंसुओं की जगह एक नई चमक आ रही थी।

“तो फिर ये रोना-धोना बंद करो! फेल हुए हो, तो फिर से परीक्षा दो। एक कंपनी नहीं मिली, तो दूसरी मिलेगी। अगर वो भी ना मिले, तो खुद का कुछ ऐसा खड़ा करो कि तुम लोगों को नौकरियाँ दो। लेकिन इस तरह कमरे में छुपकर रोना मेरी डिक्शनरी में कायरता है, और मैंने किसी कायर को अपना दोस्त नहीं बनाया है,” कर्नल साहब की आवाज़ में अब वापस वही फौजी सख्ती आ गई थी।

आयुष ने लंबी सांस ली। उसके सीने से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ हट गया था। उसने आगे बढ़कर कर्नल साहब को कसकर गले लगा लिया। “सॉरी कैप्टन दादू। मैं भटक गया था। लेकिन अब मैं आपको कभी निराश नहीं करूँगा।”

“मुझे पता है तुम नहीं करोगे। अब जल्दी से मुँह धोकर बाहर आओ। तुम्हारी माँ बेचारी सुबह से भूखी बैठी है तुम्हारे चक्कर में, और मेरे पेट में भी चूहे दौड़ रहे हैं। आज हम सब मिलकर तुम्हारी मनपसंद पाव-भाजी खाएंगे,” कर्नल साहब ने आयुष की पीठ थपथपाते हुए कहा और अपनी लाठी उठाते हुए बाहर की तरफ चल दिए।

बाहर मीना और रमेश खड़े थे। आयुष को चेहरे पर एक हल्की मुस्कान लिए कमरे से बाहर आता देख उनकी जान में जान आई। मीना की आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। उसने हाथ जोड़कर कर्नल साहब की तरफ देखा। कर्नल साहब ने बस मुस्कुराकर सिर हिलाया। उन्हें किसी शुक्रिया की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें तो अपने अकेलेपन के अंधेरे में आयुष के रूप में जो परिवार मिला था, बस उसी की हिफाज़त करनी थी।

उस रात आयुष के घर में फिर से वही पुरानी हंसी-मज़ाक गूँज रही थी। कर्नल साहब की आवाज़ और आयुष के ठहाके बता रहे थे कि ज़िंदगी की एक छोटी सी हार इन दोनों के पक्के इरादों को नहीं तोड़ सकती। यह सिर्फ दो पड़ोसियों की कहानी नहीं थी, यह दो पीढ़ियों के बीच बने एक ऐसे अटूट पुल की कहानी थी, जहाँ एक तरफ अनुभव की ठहराव वाली छांव थी, तो दूसरी तरफ युवावस्था की बेपरवाह धूप। और इसी धूप-छांव के बीच पनप रहा था दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता, जिसमें ना कोई स्वार्थ था, ना कोई शर्त, बस एक-दूसरे को कभी हारने ना देने का एक खामोश वादा था।

क्या आपने भी कभी अपने जीवन में किसी ऐसे इंसान का साथ महसूस किया है, जो ना तो आपका रिश्तेदार था और ना ही उम्र में आपके बराबर, फिर भी उसने आपकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी? अपने अनुभव कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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