काव्या की गोरी कलाई और कोहनी के बीच का हिस्सा नीले, काले और हरे पड़े निशानों से भरा हुआ था। वे निशान नए नहीं थे, कुछ पुराने थे जो पीले पड़ रहे थे और कुछ बिल्कुल ताज़े थे, जिनमें खून जम गया था। हीरों के उस भारी ब्रेसलेट के ठीक ऊपर, किसी सिगरेट से जलाए जाने का एक साफ निशान था।
काव्या ने झटके से अपना हाथ नंदिनी की पकड़ से छुड़ाया और घबराहट में अपनी आस्तीन नीचे खींच ली। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह हकलाते हुए बोली, “वो… वो कल रात मैं बाथरूम में फिसल गई थी… बहुत ज़ोर की चोट लग गई… हा हा, तुम तो जानती हो मैं बचपन से कितनी लापरवाह हूँ।” उसने एक और नकली ठहाका लगाने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसके गले से सिर्फ एक सिसकी निकली।
बारिश की हल्की-हल्की बूँदें खिड़की के शीशे पर दस्तक दे रही थीं। मुंबई के इस पॉश इलाके में स्थित नंदिनी के 15वीं मंजिल वाले अपार्टमेंट से पूरा शहर नहाया हुआ और खूबसूरत लग रहा था। लेकिन आज नंदिनी की आँखों में शहर की चमक नहीं, बल्कि बरसों बाद अपनी बचपन की सहेलियों से मिलने की बेताबी थी। दरवाज़े की घंटी बजी और एक साथ कई आवाज़ें गूँज उठीं। दरवाज़ा खुलते ही ठहाकों, आंसुओं और गले लगने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने उस आलीशान ड्रॉइंग रूम को वापस लखनऊ के उसी ‘शांति विहार’ मोहल्ले में बदल दिया, जहाँ ये चारों पली-बढ़ी थीं।
नंदिनी, मीरा, सुहासिनी और काव्या—ये चारों कभी एक ही साइकिल पर बैठकर स्कूल जाने वाली, एक ही टिफिन बॉक्स से खाना चुराकर खाने वाली और एक ही जैसी मध्यमवर्गीय ज़िंदगी जीने वाली लड़कियाँ थीं। उनके पिताओं की आमदनी लगभग एक जैसी थी, उनके घरों के आकार एक जैसे थे और यहाँ तक कि उनके स्कूल की यूनिफॉर्म का रंग भी एक ही था। लेकिन जो चीज़ बिल्कुल अलग थी, वह थी उन चारों घरों की हवा, उनके माता-पिता की सोच, बेटियों को लेकर उनके सपने और वो अदृश्य दीवारें जो हर घर में अलग-अलग ऊँचाई पर खड़ी की गई थीं। आज दस साल बाद, वो दीवारें और वो खुले आसमान साफ नज़र आने वाले थे।
कॉफी के मग हाथों में लिए चारों सहेलियां एक बड़े से सोफे पर सिमट कर बैठ गईं। बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो सबसे पहले नंदिनी की बारी आई। नंदिनी के पिता एक साधारण क्लर्क थे, लेकिन उनकी सोच किसी दार्शनिक से कम नहीं थी। उन्होंने हमेशा नंदिनी से कहा था, “बेटियाँ बोझ नहीं, पंख होती हैं।” इसी सोच ने नंदिनी को कभी रुकने नहीं दिया। आज वह एक सफल आर्किटेक्ट थी और अपनी खुद की फर्म चला रही थी। उसने शादी नहीं की थी क्योंकि उसे अभी कोई ऐसा साथी नहीं मिला था जो उसकी उड़ान से प्यार कर सके, न कि उसे ज़मीन पर उतारने की कोशिश करे। उसने अपने फोन में स्पेन, इटली और पेरिस की तस्वीरें दिखाईं। किसी तस्वीर में वह अपनी डिज़ाइन की हुई एक गगनचुंबी इमारत के सामने गर्व से खड़ी थी, तो किसी में वह अकेले ही पहाड़ों के बीच बैकपैक लिए मुस्कुरा रही थी। उसकी आँखों में आज़ादी की एक ऐसी चमक थी, जिसे देखकर साफ पता चलता था कि वह अपनी शर्तों पर जी रही है और बेहद खुश है।
इसके बाद मीरा की बारी आई। मीरा के घर का माहौल हमेशा से बहुत संतुलित रहा था। उसके माता-पिता मानते थे कि ज़िंदगी में उड़ान के साथ-साथ जड़ों का होना भी ज़रूरी है। मीरा आज एक मल्टीनेशनल बैंक में जोनल मैनेजर थी। उसने अपनी लव-कम-अरेंज मैरिज की कहानियाँ सुनाईं। उसने तस्वीरें दिखाईं जिनमें वह अपने पति और छह साल के बेटे के साथ थी। एक तस्वीर में उसका पति रसोई में एप्रन पहने खाना बना रहा था और मीरा लैपटॉप पर काम कर रही थी। दूसरी तस्वीर में पूरा परिवार वीकेंड पर किसी बीच पर खेल रहा था। मीरा की बातों में एक ठहराव था। उसने बताया कि कैसे उसका पति उसके हर कदम पर उसका साझीदार है, चाहे वह बच्चे की पीटीएम हो या घर की सफाई। उसकी मुस्कान बता रही थी कि उसने घर और बाहर की दुनिया के बीच एक बेहतरीन तालमेल बिठा लिया है और वह अपनी इस गृहस्थी से पूरी तरह संतुष्ट है।
तीसरे नंबर पर सुहासिनी बोल पड़ी। सुहासिनी उन चारों में सबसे शांत और घरेलू थी। उसके घर में परंपराओं का बहुत सम्मान किया जाता था, लेकिन वहाँ प्यार की कोई कमी नहीं थी। उसके माता-पिता ने उसे पढ़ाया-लिखाया, लेकिन सुहासिनी का मन हमेशा से घर सजाने, खाना पकाने और रिश्तों को सहेजने में लगता था। उसने अपनी मर्ज़ी से एक ऐसे लड़के से शादी की जो एक साधारण नौकरी करता था। सुहासिनी ने नौकरी नहीं की। उसने बड़े गर्व से अपने फोन में अपने छोटे से घर की तस्वीरें दिखाईं। बालकनी में करीने से लगाए गए पौधे, उसके खुद के हाथों से बुने गए कुशन कवर, और उसके द्वारा बनाए गए केक की तस्वीरें। एक वीडियो में उसका पति ऑफिस से आकर थका हुआ सोफे पर बैठा था और सुहासिनी उसे चाय दे रही थी, और दोनों किसी बात पर खिलखिला कर हँस रहे थे। सुहासिनी के चेहरे पर एक ऐसी अलौकिक शांति थी, जो बड़े-बड़े सीएफओ या सीईओ के चेहरों पर भी नहीं मिलती। वह अपनी छोटी सी दुनिया की रानी थी और उसे दुनिया से कोई और चाहत नहीं थी।
अब बारी थी काव्या की। काव्या हमेशा से उन चारों में सबसे सुंदर थी। आज भी वह सबसे अलग दिख रही थी। उसने एक बेहद महँगी डिज़ाइनर साड़ी पहनी हुई थी, गले में हीरों का भारी हार था और हाथों में सोने के मोटे-मोटे कंगन। काव्या के घर का माहौल हमेशा से बहुत सख्त और पितृसत्तात्मक रहा था। उसके पिता का मानना था कि बेटियां ‘पराया धन’ होती हैं और उनकी असली जगह ससुराल है। इसलिए, ग्रेजुएशन के तुरंत बाद, बिना काव्या की मर्ज़ी जाने, उसकी शादी एक बहुत अमीर और रसूखदार खानदान में कर दी गई थी।
काव्या ने अपने फोन का कवर खोला, जो खुद किसी महँगे ब्रांड का था। उसने तस्वीरें दिखानी शुरू कीं। दुबई की छुट्टियां, घर के सामने खड़ी मर्सिडीज़ और ऑडी, किसी फाइव स्टार होटल में हुई उसकी ननद की शादी की तस्वीरें, जहाँ काव्या सिर से पैर तक गहनों से लदी हुई थी। वह सबसे ज़्यादा ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थी, बीच-बीच में ऐसे ठहाके लगा रही थी जिनकी आवाज़ कमरे में गूंज जाती थी। “अरे, तुम लोगों की ज़िंदगी तो बहुत बोरिंग है! मेरे पति तो मुझे घर से बाहर पैर भी नहीं रखने देते, कहते हैं तुम्हें काम करने की क्या ज़रूरत है, नौकर-चाकर तो हैं। पिछले महीने ही उन्होंने मुझे यह डायमंड सेट गिफ्ट किया है।” काव्या लगातार अपनी अमीरी और अपने ‘परफेक्ट’ ससुराल की कसमें खा रही थी।
तस्वीरें वाकई बहुत शानदार थीं। लेकिन अगर कोई ध्यान से देखता, तो उन तस्वीरों में खड़ी काव्या की आँखों में वह नूर नहीं था, जो कभी स्कूल के दिनों में हुआ करता था। उसकी हँसी में एक अजीब सी जल्दबाज़ी थी, जैसे वह किसी चीज़ को छिपाने के लिए शोर मचा रही हो।
तभी एक छोटी सी घटना घटी। सुहासिनी कॉफी का मग टेबल पर रख रही थी कि अचानक उसका हाथ काव्या के हाथ से टकरा गया और थोड़ी सी गर्म कॉफी काव्या की कलाई पर छलक गई।
“आउच!” काव्या के मुँह से एक दर्दनाक चीख निकल गई। यह चीख सिर्फ कॉफी की गर्माहट की नहीं थी, बल्कि किसी बहुत गहरे दर्द की थी। वह सोफे पर पीछे की तरफ ऐसे सिकुड़ गई जैसे किसी ने उस पर वार कर दिया हो।
नंदिनी तुरंत उठी, “अरे रुको, मैं गीला तौलिया लाती हूँ।” नंदिनी ने भागकर तौलिया लाया और काव्या का हाथ पकड़कर उसे पोंछने लगी। कॉफी काव्या की रेशमी साड़ी की आस्तीन के अंदर तक चली गई थी। नंदिनी ने बिना सोचे काव्या की आस्तीन ऊपर की ओर सरका दी।
और उसी पल, उस आलीशान कमरे में एक श्मशान जैसा सन्नाटा छा गया।
काव्या की गोरी कलाई और कोहनी के बीच का हिस्सा नीले, काले और हरे पड़े निशानों से भरा हुआ था। वे निशान नए नहीं थे, कुछ पुराने थे जो पीले पड़ रहे थे और कुछ बिल्कुल ताज़े थे, जिनमें खून जम गया था। हीरों के उस भारी ब्रेसलेट के ठीक ऊपर, किसी सिगरेट से जलाए जाने का एक साफ निशान था।
काव्या ने झटके से अपना हाथ नंदिनी की पकड़ से छुड़ाया और घबराहट में अपनी आस्तीन नीचे खींच ली। उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह हकलाते हुए बोली, “वो… वो कल रात मैं बाथरूम में फिसल गई थी… बहुत ज़ोर की चोट लग गई… हा हा, तुम तो जानती हो मैं बचपन से कितनी लापरवाह हूँ।” उसने एक और नकली ठहाका लगाने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसके गले से सिर्फ एक सिसकी निकली।
कमरे में मौजूद बाकी तीनों सहेलियां बुत बनकर बैठी थीं। किसी को कोई सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वो सब समझ चुकी थीं कि दुबई की उन छुट्टियों और मर्सिडीज़ की तस्वीरों के पीछे का असली सच क्या था। काव्या का वो रसूखदार पति, जिसके गुणगान वह पिछले एक घंटे से कर रही थी, असल में एक दरिंदा था। और काव्या? काव्या उस सोने के पिंजरे में रोज़ अपनी रूह का सौदा कर रही थी।
मीरा की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने आगे बढ़कर काव्या को अपने गले से लगा लिया। काव्या, जो अब तक अपने झूठे गर्व और महँगे हीरों के पीछे छिपने की कोशिश कर रही थी, मीरा के गले लगते ही फफक-फफक कर रो पड़ी। उसका रोना ऐसा था जैसे कोई बरसों से बंद बाँध टूट गया हो। उसने रोते हुए बताया कि कैसे हर रात शराब के नशे में उसका पति उसे जानवरों की तरह पीटता है। कैसे बात-बात पर उसे गालियाँ दी जाती हैं।
“तो तू उसे छोड़ क्यों नहीं देती?” नंदिनी ने गुस्से और रुलाई भरे स्वर में पूछा।
काव्या ने अपने आँसू पोंछते हुए एक ऐसी बात कही, जिसने उन तीनों के दिलों को चीर कर रख दिया। “कहाँ जाऊँ? मैंने एक बार पिताजी को फोन करके बताया था। उन्होंने कहा, ‘बेटा, पति का घर ही औरत का असली घर होता है। घर की बातें घर में ही रहनी चाहिए। थोड़ा बर्दाश्त करना सीखो, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। अगर तू वापस आ गई, तो समाज में हमारी नाक कट जाएगी।’ मेरे पास कोई डिग्री नहीं है जिससे मैं नौकरी कर सकूँ, कोई बैंक बैलेंस नहीं है जो मेरे नाम पर हो। मुझे तो बचपन से यही सिखाया गया था कि अच्छी लड़कियां कभी पलट कर जवाब नहीं देतीं।”
उस रात, मुंबई के उस अपार्टमेंट में बारिश की आवाज़ के साथ चार औरतों के दिल टूटने की आवाज़ भी गूँज रही थी।
सच ही तो था। चारों एक ही स्कूल से पढ़ी थीं, एक ही मोहल्ले में बड़ी हुई थीं, एक जैसी किताबें पढ़ी थीं। लेकिन आज उनकी मंज़िलें कितनी अलग थीं। यह अंतर किसी किस्मत का नहीं था। यह अंतर उन बीजों का था, जो उनके माता-पिता ने उनके बचपन के कच्चे दिमागों में बोए थे। नंदिनी के पिता ने उसे आसमान नापना सिखाया था, इसलिए वह उड़ रही थी। मीरा के पिता ने उसे बराबरी सिखाई थी, इसलिए वह आज हर कदम पर अपने पति के साथ खड़ी थी। सुहासिनी के पिता ने उसे अपनी खुशी चुनना सिखाया था, इसलिए वह अपने छोटे से घर में भी रानी थी।
लेकिन काव्या… काव्या के पिता ने उसे सिर्फ एक ‘ज़िम्मेदारी’ समझा था, जिसे किसी रईस के गले मढ़कर उन्होंने अपना पल्ला झाड़ लिया था। उन्होंने उसे सहना सिखाया था, लड़ना नहीं। उन्होंने उसे मर्यादा सिखाई थी, आत्मसम्मान नहीं।
हीरों का वह हार अब काव्या के गले में एक फाँसी के फंदे जैसा लग रहा था। उन चारों ने एक साथ पढ़ाई की थी, लेकिन ज़िंदगी के इस इम्तिहान में, काव्या की परवरिश ने उसे हमेशा के लिए फेल कर दिया था। उस रात उन चारों ने कोई और तस्वीर नहीं देखी, क्योंकि अब देखने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। सारी हकीकत उन नीले निशानों में छप चुकी थी।
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लेखिका : निधि गुप्ता