शहर के प्रतिष्ठित रिटायर्ड हेडमास्टर, पंडित दीनानाथ जी की अंतिम यात्रा उनके पुश्तैनी घर के आंगन से निकल रही थी। दीनानाथ जी ने अपने जीवन में हजारों छात्रों का भविष्य संवारा था, इसलिए आज उनके अंतिम दर्शन के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा था। अर्थी के आगे-आगे नंगे पैर, सिर मुंडाए और हाथ में सुलगता हुआ मटका लिए उनका सबसे छोटा बेटा ‘अनिकेत’ चल रहा था। उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी और चेहरा दुख से पूरी तरह निस्तेज पड़ चुका था। दीनानाथ जी की पत्नी, सावित्री देवी का स्वर्गवास कुछ वर्ष पूर्व ही हो चुका था।
अंतिम यात्रा की भीड़ में शहर के दो वयोवृद्ध, कैलाश बाबू और रमाकांत जी धीमे कदमों से चलते हुए आपस में बातें कर रहे थे।
कैलाश बाबू ने एक लंबी आह भरते हुए कहा, “रमाकांत भाई, दीनानाथ जी सचमुच बहुत भाग्यशाली थे जो उन्हें अनिकेत जैसा श्रवण कुमार मिला। पिछले चार सालों से जब से दीनानाथ जी को अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) और लकवे ने एक साथ जकड़ा था, तब से वे पूरी तरह से बिस्तर पर आ गए थे। लेकिन इस लड़के ने सेवा की ऐसी चरम सीमा पार की है कि आज के कलयुग में विश्वास ही नहीं होता।”
रमाकांत जी ने हामी भरते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रहे हो! बीमारी में दीनानाथ जी की हालत एक छह महीने के बच्चे जैसी हो गई थी। वे अपने कपड़े खुद गंदे कर लेते थे। अनिकेत अपने हाथों से उनके गंदे कपड़े धोता, उन्हें स्पंज से नहलाता, डायपर बदलता और अपने हाथों से खाना मैश करके खिलाता था। अल्जाइमर के कारण कई बार दीनानाथ जी उसे पहचानते तक नहीं थे, उसे गालियां देते और मारते थे, लेकिन यह लड़का बस मुस्कुरा कर कहता- ‘बाबूजी, मैं हूँ आपका छोटा।’ मैंने खुद देखा है, यह लड़का रात-रात भर उनके पैर दबाता और उन्हें पुरानी कविताएं सुनाकर सुलाता था।”
भीड़ में ही सबसे पीछे दीनानाथ जी के तीन बड़े बेटे—विकास, प्रकाश और सुहास—चल रहे थे। तीनों बड़े शहरों में ऊंचे पदों पर कार्यरत थे। उन्होंने सफेद डिजाइनर कुर्ते पहने हुए थे और बार-बार अपने मोबाइल फोन में समय देख रहे थे।
कैलाश बाबू ने तिरस्कार भरी नजरों से पीछे देखते हुए कहा, “इन तीनों ‘सपूतों’ को देखो! जब दीनानाथ जी बीमार थे, तब इनकी और इनकी पत्नियों की शक्ल तक नहीं दिखी। एकाध बार पैसे जरूर भेज दिए, मानो बाप कोई बैंक खाता हो जिसे चालू रखने के लिए न्यूनतम बैलेंस डालना पड़ता हो। किसी ने यह जहमत नहीं उठाई कि आकर देखे कि बाप किस हाल में जी रहा है। आज जब संपत्ति का बंटवारा होना है और समाज को मुंह दिखाना है, तो तीनों अपनी-अपनी महंगी गाड़ियों से उतर कर आंसू पोंछने का नाटक कर रहे हैं।”
तभी उनके साथ चल रहे एक तीसरे सज्जन, जो दीनानाथ जी के पुराने पड़ोसी थे, बीच में बोल पड़े, “आपको याद है कैलाश बाबू? आज से पच्चीस साल पहले का वो दिन? जब दीनानाथ जी पचपन साल के थे और सावित्री भाभी पचास की उम्र में गर्भवती हो गई थीं? पूरे मोहल्ले ने उनका कैसा उपहास उड़ाया था! यह अनिकेत एक ‘अनचाहा गर्भ’ था। इसके जन्म के समय इन तीनों बड़े भाइयों ने कॉलेज में अपने दोस्तों के ताने सुने थे और शर्म के मारे कई महीनों तक अपने माता-पिता से बात नहीं की थी। लोगों ने कहा था कि बुढ़ापे में यह क्या गलती कर दी मास्टर जी ने!”
रमाकांत जी की आंखें छलक आईं, “हां, मुझे सब याद है। लेकिन देखो विधाता का खेल! प्रकृति का अपना एक अलग ही गणित होता है। ईश्वर को पता था कि मास्टर जी के वो तीनों ‘चाहे गए’ और ‘लाड़-प्यार से पाले गए’ बेटे समय आने पर फुर्र से उड़ जाएंगे और उन्हें बुढ़ापे में अकेला छोड़ देंगे। यह अनिकेत कोई गलती नहीं था, बल्कि ईश्वर का दीनानाथ जी के लिए एक अग्रिम वरदान था। अगर आज यह अनचाहा बेटा न होता, तो दीनानाथ जी अपने ही मलमूत्र में सड़कर मर जाते या किसी अनाथालय में एड़ियां रगड़ रहे होते। इस लड़के ने अपनी जवानी, अपना करियर सब अपने पिता के चरणों में समर्पित कर दिया।”
शमशान घाट पर जब चिता सजी, तो पंडित जी ने मुखाग्नि के लिए बड़े बेटे विकास को आगे बुलाया, क्योंकि हिंदू धर्म में अक्सर बड़ा बेटा ही मुखाग्नि देता है। लेकिन विकास जैसे ही आगे बढ़ा, वहां मौजूद समाज के सभी प्रतिष्ठित लोगों ने एक स्वर में उसे रोक दिया।
“नहीं! इस चिता पर सिर्फ और सिर्फ अनिकेत का अधिकार है। जिसने जीते जी पिता को नरक की आग से बचाया, वही उन्हें मोक्ष की अग्नि देगा,” सरपंच जी ने कड़कती आवाज में कहा।
बड़े भाइयों के सिर शर्म से झुक गए। अनिकेत ने कांपते हाथों से चिता की परिक्रमा की और अपने पिता को अंतिम विदाई दी। चिता की लपटें जैसे-जैसे आसमान की ओर उठ रही थीं, वहां खड़े हर इंसान के मन में अनिकेत के लिए एक असीम श्रद्धा उमड़ रही थी। हर कोई मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था कि भगवान भले ही जिंदगी में धन-दौलत कम दे, लेकिन बुढ़ापे में अनिकेत जैसी एक औलाद जरूर दे।
जो कल तक समाज की नजरों में एक ‘अनचाही’ गलती था, आज वह हर मां-बाप की सबसे बड़ी ‘चाहत’ बन चुका था। खून के रिश्तों की असली पहचान जन्म के समय से नहीं, बल्कि अंत समय में किए गए कर्मों से होती है।
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